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मंगलवार, 26 मई 2026

इफ़िस

इएंथे बेहद खूबसूरत लड़की थी , उसे युवा इफ़िस से मुहब्बत हो गई और इसके बर-अक्स इफ़िस ने भी आकर्षक इएंथे की मुहब्बत में होश गवां दिए । इफ़िस के पिता लिगडस को उनके ब्याह से कोई ऐतराज नहीं था इसलिए उन्होंने फौरन से पेश्तर इस रिश्ते के लिए हामी भर दी ।  मगर दिक्कत यह थी कि , मुहब्बत के रिश्ते को ब्याह की हद तक तक ले जाने में इफ़िस को एक ज़ेहनी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा था । उसका ख्याल था कि ब्याह होते ही यह रिश्ता टूट जाएगा क्योंकि वो भले ही एक लड़के के तौर पर पाली गई थी पर उसका जन्म बतौर लड़की ही हुआ था और यह राज उसके पिता लिगडस को भी नहीं मालूम था । केवल उसकी मां टेलेथुसा और देवी आइसिस ही इस राज को जानते थे क्योंकि उन दोनों की वज़ह से ही इफ़िस युवापन तक जीवित रह पाई थी ।

हुआ यूं कि लिगडस और टेलेथुसा जिन दिनों ब्याह के बंधन में बंधे थे वो बेहद गरीब थे उन्हें संतान की चाहत तो थी पर वो जानते थे कि लड़की का जन्म, पालन पोषण, और अंततः दहेज की व्यवस्था उनकी आमदनी के दायरे में सिमट नहीं पाएगी इसलिए जैसे ही टेलेथुसा गर्भवती हुई , लिगडस साफ साफ कह दिया कि अगर संतान, लड़की हुई तो वो उसे जन्म लेते ही मार डालेगा, भले ही वो इस कलंकित और दुखदाई घटना के लिए खुद को आजीवन दोषी मानता रहे, यह सुनकर टेलेथुसा बहुत दुखी हुई मगर उसके सामने कोई विकल्प भी नहीं था । उसने प्रार्थना की, कि देवी देवता उसकी मदद करें, उसकी अजन्मी संतान को जन्म के बाद के संकट से बचाएं । उसी रात देवी आइसिस , उसके सपने मे आई और कन्या के जन्म के बाद कन्या की सुरक्षा का वचन उसे दिया ।

बहरहाल लड़की के जन्म के बाद देवी आइसिस ने , उसे लड़के की वेशभूषा में छुपाने में मदद की । ये घटनाक्रम लिगडस की समझ में नहीं आया । वो पुत्र जन्म से संतुष्ट था , उसने संतान का नाम इफ़िस रख दिया । उन दिनों ये नाम लड़की और लड़कों, दोनों के लिए इस्तेमाल हुआ करता था , तो इफ़िस , एक लड़के की तरह से पाली गई । हालांकि इफ़िस को यह मालूम था कि वो देवी आइसिस और अपनी मां की कृपा से जीवित है । अब आगे का किस्सा ये कि, उसे इएंथे से मुहब्बत हुई , जोकि बस होती ही है , उसे कथासार और अंदरूनी रहस्योद्घाटन से कोई लेना देना नहीं होता । इफ़िस, जिसे मुहब्बत हुई, उसे डर भी था , प्रियतमा के बिछड़ने का , अपनी जग-हंसाई का और फिर, देवी आइसिस ने पुनः हस्तक्षेप किया और इफ़िस को मूलतः लड़का ही बना दिया । देवी के आशीर्वाद से युवा जोड़े का ब्याह हुआ और दोनों  खुशी खुशी पति पत्नी की तरह से जीवन गुजार पाए ।

यह आख्यान , ग्रीक पौराणिक कथाओं का महत्वपूर्ण अंश है जिसमें, संयोगवश, अजाने ही ,  दो युवतियों के मध्य प्रेम पल्लवित हुआ । इफ़िस , क्रीट में रहने वाले निर्धनतम जोड़े लिगडस और टेलेथुसा की एकमेव संतान थी , उसके पिता ने विपन्नता के नाम पर , लड़की का जन्म होते ही , उसे मार डालने का संकल्प ले लिया था , वो पुत्र जन्म की कामना करता था । उसके संकल्प में दहेज का उल्लेख भी है कदाचित उस समाज में लड़की के पिता के सामने वर मूल्य चुकाने का संकट भी मौजूद रहा होगा । गर्भवती टेलेथुसा , अजन्मी संतान के भविष्य को लेकर चिंतित थी तो उसने सामान्य , असहाय स्त्रियों की तरह से देवी देवताओं के सामने गुहार लगाई । उसके आर्तनाद को देवी आइसिस ने सुना और उसकी मदद की , हालांकि यह मदद केवल वेशभूषा के स्तर पर बदलाव तक सीमित थी ।

कथासार यह कि इफ़िस का अस्तित्व, लड़कों की तरह के वस्त्र विन्यास पर निर्भर था और वो मूलतः स्त्री ही थी । पर प्रेम , वो तो गुणा भाग सह  पूर्व नियोजन से नहीं होता , बस हो ही जाता है । इफ़िस को भी हुआ । इएंथे को इफ़िस पसंद थी पर वो तो उसे लड़का ही मानकर ब्याह करना चाहती थी । पिता लिगडस भी इफ़िस को लड़का ही समझता था । लेकिन इफ़िस, उसकी मां और देवी आइसिस तो जानते ही थे कि सच क्या है ? कल्पना करें कि , अगर इएंथे को पहले से पता होता कि इफ़िस लड़की है और तब ये प्रेम पनपता तो इसे समलैंगिक प्रेम माना जाता जो तत्कालीन समाज में सहज स्वीकार्य था । पुरुष सह पुरुष , स्त्री सह स्त्री , किन्तु ये मिथक , पिता लिगडस की निर्धनताजन्य क्रूरता के चलते इस सत्य को छुपा कर आगे बढ़ता है । एक स्तब्ध कयामत के जैसा , संबंधों की टूटन की दिशा में ।

इफ़िस के सामने अतीत के झूठ की विरासत है , उसके सामने दु:ख और विरह का भयावह संकट है । उसका अतीत उसके आगत का हत्यारा होने ही वाला था कि मिथक एक बार फिर से पारलौकिकता से ओत प्रोत उपचार लेकर हाजिर होता है और इस बार ये उपचार काम चलाऊ तथा वैकल्पिक वस्त्र विन्यास परिवर्तन के जैसा नहीं था बल्कि स्थायी तौर पर लिंगान्तरण का उद्घोष करता है , एक सुसंगत यौन परिवर्तन ताकि युवा जोड़ा ब्याह करे और सांसारिक जीवन खुशी खुशी व्यतीत कर के । बहरहाल आख्यानकालीन समाज, देवी देवताओं के सांसारिक हस्तक्षेप, उनकी दयादृष्टि और अनुग्रह तथा इहलौकिक, पारलौकिक विश्वासों पर आधारित था, इसमे कोई संदेह नहीं...  


सोमवार, 25 मई 2026

हायसिंथस

बेहद खूबसूरत और कमसिन हायसिंथस यूं तो स्पार्टन शहजादा था पर उसका ज्यादातर वक्त संगीत और सूर्य के देवता अपोलो के साथ गुज़रता, वो दोनों अक्सर साथ में शिकार खेलने जाते, एक दूसरे के साथ खेलते रहते । हायसिंथस और अपोलो की दोस्ती, दरअसल नश्वर इंसान और अमर देवता के दरम्यान पनपी हुई मुहब्बत थी । इधर पश्चिमी हवा का देवता ज़ेफिर, हायसिंथस और अपोलो के इश्क को लेकर बेहद ईर्ष्यालु हो गया था क्योंकि वो खुद भी हायसिंथस का प्यार पाना चाहता था । हालांकि हायसिंथस का साथ पाने की उसकी तमाम कोशिशें नाकामयाब हुई थीं । मुहब्बत में अपनी शिकस्त के मद्देनजर ज़ेफिर का गुस्सा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था । वो किसी भी तरह से, किसी भी हद मे जाकर, इस इश्क पर लगाम लगा देना चाहता था ।

शहजादा हायसिंथस जब भी मछलियों के शिकार पर जाया करता तो देवता अपोलो जाल लेकर उसके साथ जाता, अगर हायसिंथस जंगली जानवरों के शिकार पर जाता तो अपोलो उसकी मदद के लिए कुत्तों को लेकर साथ चलता । हायसिंथस पहाड़ों पर घूमने निकलता तो भी अपोलो उसके साथ मौजूद रहता । हायसिंथस के करीब रहते हुए देवता अपोलो को अपनी वीणा और तीरों तक की सुध बुध नहीं रहती । इधर उन दोनों का प्यार ज़ेफिर की बर्दाश्त से बाहर हो गया था । एक तेज धूप वाली दोपहर में, अपोलो और हायसिंथस एक दूसरे के साथ खिलखिलाते, हंसी मजाक करते हुए, डिस्कस फेकने का खेल खेल रहे थे इसी दरम्यान अपोलो ने पूरी ताकत से डिस्कस को आसमान में उछाल दिया जिसे पकड़ने के लिए हायसिंथस पूरे जोश के साथ तैयार हो गया था ।

ज़ेफिर के लिए यह एक अवसर था, उसने डिस्कस की दिशा बदल दी और फिर खेल, खेल ना रहा । डिस्कस, हवा की पूरी ताकत के साथ हायसिंथस के माथे से जा टकराया और वो लहूलुहान होकर जमीन पर गिर गया । देवता अपोलो ने जमीन पर बेसुध पड़े हायसिंथस को गोद में लेकर बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसकी कोशिशें व्यर्थ हो गईं ।  चोट बहुत गहरी थी और अपोलो का उपचार उसके लिए पर्याप्त सिद्ध नहीं हुआ । हायसिंथस की गर्दन उसके कांधों पर लुढ़क गई । अपोलो का चेहरा पीला पड़ चुका था वो चिल्लाया, हायसिंथस तू मर रहा है, मैंने तेरी जवानी छीन ली,  तेरा शोक मेरा गुनाह है, काश मैं तेरे लिए खुद मर पाता पर ये असंभव है इसलिए तू मेरे यादों और गीतों में सदैव जीवित रहेगा, मेरी वीणा हमेशा तेरे ही लिए सुर साधा करेगी, तू मेरे पश्चाताप का फूल बन जाएगा । अपोलो के आर्तनाद के दौरान ठीक उसी जगह एक खूबसूरत फूल उग आया जहां हायसिंथस का रक्त बहा था । 

ये दु:खद गाथा, ग्रीक पौराणिक आख्यानों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां एक नश्वर शहजादे हायसिंथस और एक अमर देवता अपोलो की समलैंगिक प्रणय गाथा का विवरण मिलता है , कथा के तीसरे कोण में वायु देवता ज़ेफिर की उपस्थिति एक खलनायक के जैसी है क्योंकि वह भी हायसिंथस का प्रेम पाना चाहता था और देवता अपोलो की सफलता ने हायसिंथस को उससे दूर कर दिया था । इश्क में नाकाम देवता ज़ेफिर ने अपनी असफलता को हायसिंथस की मृत्यु में बदल डाला, प्रेम-मय खेल की असामयिक मृत्यु । डिस्कस के वायु वेगवान प्रहार ने युवा कदाचित कमसिन हायसिंथस के प्राण ले लिए । हायसिंथस की प्राण रक्षा में असफल और शोक में डूबे देवता अपोलो, हायसिंथस को एक फूल में बदल देते हैं । हायसिंथस जो एक नश्वर मनुष्य था और हम सभी मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करता है,वो देवता अपोलो की चाहत का केंद्र था । कथनाशय शायद यह कि सभी नश्वर लोग, दिव्य शक्ति की चाहत का केंद्र हो सकते हैं ।

इस आख्यान से यह संकेत मिलता है कि अगर पुरुष पुरुष से प्रेम करता हो तो समलैंगिकता भी पवित्र और पूज्यनीय है । मिथक में बयान किया गया इश्क, प्रथम दृष्टया भले ही दु:खांत दिखाई देता है पर वो नश्वरता की आकस्मिक मृत्यु के बाद भी जीवित रहा, हरेक बसंत में, पिछले बसंत के बीजों से पुरुत्पादन की लय, नित्यता के साथ, नश्वरता की क्रमिक अमरता के जैसा । एक फूल जो खूबसूरत है, मरता है और जीता है बारम्बार, देवता अपोलो जो हायसिंथस की आकस्मिक मृत्यु से शोकाकुल था किन्तु अपने अपराध बोध को स्वीकारते हुए भी, खुद मर नहीं सकता था क्योंकि वह तो अमरत्व का चिरयात्री है, सो उसने हायसिंथस के लिए नई तरह की नित्यता, अमरत्व का चुनाव किया । किंचित विरह और फिर पुनर्मिलन की सतत यात्रा, कदाचित इस संदेश के साथ कि प्रियतम से अलगाव स्थायी नहीं होता यदि उसमें एक अल्प विराम है तो पुनर्मिलन की आस भी है ।

सूर्य के रात्रिकालीन गोपन अस्तित्व के समांनातर हरेक अगली सुबह सूर्य की दृष्टव्य उपस्थिति के जैसा । इस आख्यान में देवता अपोलो की वीणा हायसिंथस के लिए सुर साधती है , देवता के गीत हायसिंथस के लिए प्रेम पगे हैं , दुख , सुख भरी यादों से भरे पड़े हैं । हायसिंथस जिसने योनि बदली है , काया बदली है । देवता अपोलो, जिसे प्रेम ने, इंसान बनाए रखा और देवता ज़ेफिर जिसे प्रेम की असफलता ने मनुष्यों की तरह खलनायक और हत्यारा बना दिया । बहरहाल मिथक संकेत यह कि प्रेम में समलैंगिकता या विषमलिंगीयता का भेदभाव नहीं । कथा प्रातीतिकता यह कि ईश्वर और मनुष्यों में द्वैध का भाव नहीं है अंततः ईश्वर भी जीता है प्रेम या घृणा में, मनुष्यों की तरह से...

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

मे यी

राजकुमारी मे यी को एक बहादुर नौजवान से लगाव था और वो उससे ब्याह करना चाहती थी हालांकि युवक बेहद गरीब था । राजकुमारी की मां इस बात से बहुत खफा थी क्योंकि वो खुद ही उस युवक से ब्याह करना चाहती थी । एक दिन उसने गुस्से में, मे यी से सवाल किया कि क्या तुम उस गरीब नौजवान से शादी करना चाहती हो ? जबकि तुम जानती हो कि तुम दुनिया की सबसे हसीन लड़की हो और तुम्हारे खानदान के मुकाबले में उस युवक का खानदान कुछ भी नहीं है । यह सुनकर मे यी ने अपनी मां से कहा मैं उसे बहुत करीब से जानती हूं । वो मेरे लिए कुछ भी कर सकता है । वो एक नेक नीयत इंसान है और हम दोनों एक दूसरे से बेइंतिहा प्यार करते हैं । यह सुनकर मे यी की मां खामोश हो गई लेकिन उसे यह रिश्ता किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था ।

कहते हैं कि एक रोज उस रियासत में एक खूंखार ड्रेगन आ गया और उसने रियासत के बहुत सारे इंसानों को मार डाला । इंसानी जानों का नुकसान होते देखकर मे यी की मां ने घोषणा कि जो भी व्यक्ति उस ड्रेगन को मार डालेगा । वो उसकी इच्छा पूरी करेंगी । राजमाता की इस घोषणा को सुनकर मे यी के प्रेमी ने इसे एक सुअवसर मानकर, राजमाता से कहा कि वो ड्रेगन को मारने जाएगा । उसके दिल में, मे यी के लिए बेपनाह इश्क था और उसका ख्याल था कि अगर ड्रेगन को मार पाया तो राजमाता से, मे यी का हाथ मांग लेगा, हालांकि वो ड्रेगन से युद्ध का जोखिम उठा रहा था लेकिन उसके पास और कोई विकल्प शेष भी नहीं था, क्योंकि राजमाता के विरोध के चलते उसका इश्क पोखर की तरह से ठहर गया था, जिसमे भविष्य के लिए कोई लय नहीं थी ।

युवक ने मे यी को समझाया कि मेरी चिंता मत करो मेरे पास ड्रेगन को मारने की योजना है । ड्रेगन से युद्ध में जय, विजय की संभावना बराबर थी । हारे तो सब खोया और जीते तो इश्क को पाया । मे यी फिक्र मंद थी और अंदर से युवक भी आशंकित था लेकिन प्रेमिका को पाने की लालसा ने उसे हौसला दिया । वो तलवार लेकर ड्रेगन को मारने के लिए निकल पड़ा । ड्रेगन बहुत ताकतवर था । उसने युवक के हाथ पैर और पूरे जिस्म मे गंभीर चोटें पहुंचाई  लेकिन युवक को मे यी का ख्याल था वो बहादुरी से लड़ता रहा। ये युद्ध भीषण था। बहरहाल युवक ने ड्रेगन को शिकस्त दे दी, ड्रेगन मारा गया। प्रेमी की विजय पर मे यी की आँखों में खुशी के आँसू थे। वो जानती थी कि नौजवान ने उसके लिए यह जोखिम मोल लिया था जबकि इस युद्ध में उसकी जान भी जा सकती थी ।

वो युवक के व्यवहार से अभिभूत थी । ड्रेगन से भयंकर युद्ध में घायल जवान ने घर वापस लौटते ही सबसे पहले राजमाता से, मे यी का हाथ मांगा । राजमाता, ड्रेगन को मार डालने वाले योद्धा के प्रति पहले से ही वचनबद्ध थी सो उसने,  मे यी और युवक के ब्याह की अनुमति दे दी । जिसके बाद वो दोनों आजीवन एक दूसरे का होकर जिए ।

यह आख्यान मलेशिया की किसी रियासत की राजकुमारी के इश्क के हवाले से कहा सुना जाता है । प्रथम दृष्टया यह एक सपाट सी प्रेम कथा लगती है जिसमे प्रेमी, प्रेमिका को पाने के लिए रास्ते की सभी बाधाओं से जूझता है और अंततोगत्वा आख्यान का अंत सुखांत हो जाता है । हालांकि कथा को फिर फिर बाँचें तो इसके कुछ बिन्दु चौकाने वाले हैं जैसे कि प्रेमिका राजकुमारी है और प्रेमी बहादुर योद्धा, किन्तु निर्धन । अतः प्रेम में आर्थिक खाई का ऊंच नीच गौर तलब है,जहां प्रेमिका,प्रेमी की आर्थिक विपन्नता के बजाए,प्रेमी की बहादुरी और स्वयं के प्रति उसके समर्पण का खास ख्याल रखती है।कथनाशय यह है कि प्रेमासक्त जोड़े के सामने आर्थिक वर्ग भेद मायने नहीं रखता। वो दोनों बस प्रेम मे हैं और आगे भी साथ रहना चाहते हैं।

इस मिथक से एक और दिलचस्प बिन्दु प्रकटित होता है कि मे यी की मां जो इस रियासत की राजमाता है स्वयं भी उस युवक को चाहती है । वो भली भांति जानती है कि उसकी पुत्री भी उस युवक के इश्क में मुब्तिला है । उसके मन में कदाचित अपनी ही पुत्री के प्रणय संबंध के प्रति ईर्ष्या का भाव है इसीलिए वो अपनी पुत्री को इस संबंध की अनुमति नहीं देती बल्कि पुत्री के अप्रतिम सौन्दर्य और खानदानी ऊंच नीच का हवाला देते हुए टाल मटोल करती है जबकि वो स्वयं ही इस युवक के प्रति आकर्षित है और उस युवक की निर्धनता उसके लिए मायने नहीं रखती। अगर कथा संकेतों को ग्रहण करें तो राजमाता निःसंदेह उस युवक से आयु में भी बड़ी रही होगी क्योंकि युवक उसकी पुत्री का समवयस्क था अतः मे यी के मार्ग में बाधक बन गई राजमाता,मे यी को हतोत्साहित करती है और खुद के लिए आगे का रास्ता हमवार करती है ।

आख्यान में निहित इस तथ्य को हम राजमाता के अनैतिक यौन आकर्षण का नाम भी दे सकते हैं क्योंकि पुत्री के प्रणय संबंधों से परिचित होकर भी राजमाता स्वयं के लिए प्रेम के द्वार खोलती दिखाई देती हैं और इसके लिए वो अपनी सामाजिक और राजनैतिक संस्थिति, प्रभुता का इस्तेमाल करती है । मिथक में ड्रेगन के आगमन और उसकी हिंसा को प्रातीतिक रूप से स्वीकार करें तो ड्रेगन कोई शक्तिशाली शत्रु है जिसकी हिंसा से रियासत के नागरिक और राजमाता परेशान है और इसे संयोग माने कि राजमाता रियासत के विजयी योद्धा को उसकी इच्छा पूर्ति का वचन देती हैं। युवक भयभीत तो है पर वो इसे सुअवसर भी मानता है कि उसकी जय,उसको रियासत से,प्रेयसी मे यी का उपहार दिला देगी।सो वो प्रेमिका को समझा बुझा कर युद्ध भूमि जाता है।

घायल होने के बावजूद वो शत्रु से युद्ध करता है और शत्रु की मृत्यु के रूप में, मे यी का वरण करता है । कथा कहती है कि प्रेम, युवक का साहस है और फिर प्रेमिका का यह विश्वास भी नहीं टूटता कि उसने प्रणय संगी चुनने मे कोई भूल नहीं की है । बहरहाल पोखर हुआ जाता इश्क फिर से बह निकला 


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्रेम जो आसमान से गिरकर खजूर में नहीं अटकता

5000 वर्ष ईसा पूर्व के ग्रीक-ओ-रोमन गल्प कहते हैं कि देवता एगडिस्टस धरती पर,जुपिटर के बिखरे हुए शुक्राणुओं से जन्मा किन्तु देवताओं ने उसका बंध्याकरण कर दियाजिसके फलस्वरूप वो केवल देवी सायबेले के स्त्री रूप में ही शेष रह गया था। इस गल्प के समानांतर दूसरी गल्प कहती है कि एगडिस्टस, सायबेले का स्त्री पुरुष रूपेण,समेकित अवतार था और उसके पौरुष के अंश, धरती पर गिरने से अखरोट का वृक्ष पैदा हुआ, जिसके फल खाकर कुंवारी जलपरी नाना गर्भवती हुई और उसने एट्टिस को जन्म दिया, जिसे वनस्पतियों और चरवाहों के फ्रीजियन देव के तौर पर स्वीकार किया गया। स्पष्ट है कि एट्टिस, प्रकृति का देव था और उसका जन्म कुंवारी जलपरी नाना की कोख से देवी सायबेले के पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अवतार एगडिस्टस के पौरुष अंशों से हुआ था और इस सांकेतिक अर्थ में, एट्टिस को सायबेले का पुत्र भी माना जाएगा। 

इस आख्यान में अचंभित करने वाला कथन ये है कि अपने युवापन में एट्टिस और उसकी मातृस्वरूपा सायबेले, प्रेमी युगल माने गए हैं । इससे आगे बढ़कर, बेहद दिलचस्प, स्वभाविक, प्रसंग ये कि, कुछ समय के बाद, एट्टिस को अप्सरा सैग्रिटिस से प्रेम हो गया और वो उससे ब्याह करना चाहता था । एट्टिस की इस हरकत, कदाचित बेवफाई से, सायबेले अत्यधिक क्रोधित हो गई और उसकी क्रोधाग्नि से, एट्टिस विक्षिप्त हो गया । इसके उपरांत गल्प कथन ये है कि, एक तरफ अप्सरा सैग्रिटिस से प्रेम और ब्याह की आकांक्षा और दूसरी तरफ देवी सायबेले की क्रोधाग्नि, से बावले हो गए एट्टिस ने फर के एक दरख्त के नीचे खुद का बंध्याकरण कर लिया और काल के गाल में समा गया, उसके बहते, बिखरे खून से उस जगह एक जामुनी पुष्प, प्रथम नीलवर्णी फूल खिला । 

इस मिथक के अनुसार एगडिस्टस, उर्वरता की देवी सायबेले का पूर्ववर्ती, स्त्री पुरुष रूपी, समेकित संस्करण है, जो कि धरती पर बिखरे जुपिटर के शुक्राणुओं से जन्मा था लेकिन पिता जुपिटर की इस द्विलिंगीय गुण धर्म वाली संतान को अन्य देवताओं ने बंध्याकरण करके, देवी सायबेले के स्त्री-लिंगीय रूप तक सीमित कर दिया। इसी आख्यान का दूसरा संस्करण कहता है कि एगडिस्टस के शुक्राणुओं से अखरोट के दरख्त का आजन्म हुआ और उसका फल खाकर कुंवारी, जलपरी नाना, देवता एट्टिस को जन्म देती है, जो चरवाहों और वनस्पतियों का देवता है जबकि सायबेले उर्वरता की देवी है। इस कथा का यह सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि युवा एट्टिस अपनी मातातुल्य सायबेले का प्रेमी हो जाता है जिसे वर्तमान समय की यौन नैतिकता के मानदंड के हिसाब से सर्वथा अनुचित, माना जाएगा । हालांकि आख्यान कालीन समाज में इसे वर्जनाओं के दायरे में सम्मिलित नहीं किया गया है । 

सामान्य तौर पर एट्टिस और सायबेले के मध्य एक पीढ़ी का आयुगत फासला है ऐसे में स्वभाविक था कि एट्टिस सायबेले की तुलना में अप्सरा सैग्रिटिस की ओर आकर्षित हो जाता है और उससे ब्याह भी करना चाहता है। कथा को बाँचते हुए हम इसी मोड़ पर महसूस करते हैं सायबेले की सौतियाडाह, ईर्ष्या, बेवफाई के विरुद्ध क्रोध और प्रतिकार स्वरूप सामर्थ्य, शक्ति का आक्रामक, मारक प्रदर्शन। यूं तो देवता अमर माने जाते हैं पर इस आख्यान का नायक एट्टिस अतार्किकता की सीमा तक बदहवास हो चुका है और स्वयं के बंध्याकरण, सतत बहते हुए रक्त की परिणति स्वरूप मानवीय मृत्यु को स्वीकार करता है । अंततः कुंवारी मां जलपरी नाना का देवता पुत्र, उत्कर्ष और अमरता की सीढ़ियों से फिसलता हुआ पुनः वनस्पति, नील पुष्प हो जाता है । यह भी एक किस्म का प्रेम है जो नैतिक अनैतिक में भेद नहीं करता, प्रेम जो देवताओं में भी बहु-स्त्रीगामी है , प्रेम जो आसमान से गिरकर खजूर में नहीं अटकता बल्कि मिट्टी में मिल जाता है । 

रविवार, 28 सितंबर 2025

होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

 

एक रियासत का शहजादा ब्याह करना चाहता था लेकिन उसे मनपसंद युवती नहीं मिल रही थी , फिर एक दिन उसकी मुलाकात जिप्सी महिला से होती है जो शहजादे को विलो दरख्त में मौजूद घोंसले से तीन अंडे लाने की सलाह देती है । शहजादा सलाह को मान लेता है और ऊंचे विलो दरख्त में चढ़कर घोंसले से तीन अंडे लेकर महल की तरफ लौटता है तभी उसे ख्याल आता है कि वो इन तीन अंडों का करेगा क्या ? ठीक उसी वक्त उससे गलती से एक अंडा फूट जाता है जिसमें से एक खूबसूरत युवती निकलती है वो शहजादे से पीने के लिए पानी मांगती हैं लेकिन शहजादा उसे पानी पिलाना भूल जाता है और युवती प्यासी ही मर जाती है । रास्ते में आगे बढ़ते हुए शहजादा दूसरा अंडा भी फोड़ देता है और उसमें से निकलने वाली युवती भी पीने के लिए पानी मांगती है जिसे शहजादा फिर से भूल जाता है और दूसरी लड़की भी प्यास से मर जाती है। इसके बाद वो तीसरा अंडा  फोड़ कर एक और युवती को अंडे से मुक्त करता है लेकिन इस बार वो लड़की को पानी पिलाना नहीं भूलता

 

इसके बाद वो लड़की दोबारा विलो के दरख्त में चढ़ जाती है और शहजादे से कहती है कि उसे लेने के लिए वो, एक रथ लेकर वापस आए । इधर जिप्सी महिला की नीयत खराब थी, तो वो सज धज कर पानी में अपना प्रतिबिंब देखती है , जहां उसे तीसरी अंडज युवती भी दिखाई देती है । ईर्ष्यावश दरख्त में चढ़ कर वो तीसरी युवती को नीचे उतार कर पानी में डुबा देती है और खुद उसके कपड़े पहन कर दुल्हन की तरह से तैयार हो जाती है ताकि शहजादा उसे ही तीसरी अंडज युवती मानकर ब्याह कर ले, हालांकि पानी में डूबते ही अंडज युवती सुनहरे शल्कों और पंखों वाली मछली बन जाती है । वापस लौटने के बाद शहजादा उस मछली को पकड़ लेता है और महल वापसी के बाद उस मछली को पका कर खाने की इच्छा प्रकट करता है लेकिन जिप्सी महिला उससे कहती है कि ये मछली जहरीली है इसे मार कर फेंक देना चाहिए । शहजादा समझता है कि जिप्सी महिला ही तीसरी अंडज युवती है तो उसकी सलाह पर मछली को मार कर बागीचे में फेंक देता है जहां कुछ अरसा बाद सेब का एक दरख्त उग जाता है । उस दरख्त में पत्ते और फल चांदी और सोने की रंगत लिए होते हैं ।

 

शहजादा उन फलों को खाना चाहता है लेकिन नकली दुल्हन बनी हुई जिप्सी महिला उसे भड़काती है और  कहती है कि ये फल जहरीले हैं इन्हें खाना मत । इस दरख्त को काट कर फेंक देना चाहिए । शहजादा उसकी बातों में यकीन करते हुए ऐसा ही करता है , तभी एक बे-औलाद दरबारी बुजुर्ग उस दरख्त की एक टहनी कंघी बनाने के लिए अपने घर ले जाता है और यह देखकर हैरान होता है कि लकड़ी का वो टुकड़ा अनायास ही खूबसूरत युवती में तब्दील हो जाता है । बूढ़ा उसे बेटी की तरह अपने घर में रख लेता है । कुछ दिनों के बाद शहजादा यह जान जाता है कि बे-औलाद बूढ़े दम्पत्ति के यहाँ एक खूबसूरत लड़की मौजूद है , वो बूढ़े से पूछता है कि ये लड़की उसे कहाँ से मिली ? बूढ़ा कहता है कि सेब के दरख्त की टहनी से । शहजादा यह सुनते ही पहचान जाता है कि ये लड़की वास्तव में तीसरी अंडज लड़की है जो रथ लेकर वापस आने वाले शहजादे का इंतजार कर रही थी । वो फौरन उस लड़की को अपनी असली पत्नि के रूप में स्वीकार कर लेता है और साजिश रचने वाली जिप्सी महिला को महल से बाहर निकाल देता है ताकि वो बतौर सजा जीवन भर सुअर चराती और पालती रहे।

 

ये आख्यान यूक्रेनी मूल का है और इसमें चार किरदार महत्वपूर्ण है , सर्व प्रथम शहजादा, जो शादी करना चाहता है लेकिन उसे मनपसंद युवती मिल ही नहीं रही है और उसे मजबूरी में एक घुमक्कड़ जिप्सी महिला से सलाह लेना पड़ती है जोकि इस आख्यान का दूसरा किरदार है जिसकी सलाह में निज स्वार्थ भी मौजूद है यानि कि यह किरदार नकारात्मक रंगत  छुपाये हुए है । इस मिथक का तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण किरदार उस अंडज युवती का है जिसे नियति ने शहजादे की पत्नि बनने के लिए चुना था और जिसे टूटे हुए अंडे से प्रकट होने के उपरांत शहजादा पानी पिलाना नहीं भूलता और वो युवती साधिकार चाहती है कि शाहजादा उसे रथ में बैठाकर महल में ले जाये । बहरहाल इस मिथक में जिप्सी युवती के छल का शिकार हुई अंडज युवती, बे-औलाद बुजुर्ग की दत्तक संतान होने के उपरांत ही वैवाहिक जीवन में प्रवेश कर पाती है । सो यह माना जाए कि नियति ने बुजुर्ग को सकारात्मक परिणति का उचित माध्यम माना और वो आख्यान का चौथा किन्तु महत्वपूर्ण किरदार साबित हुआ ।

 

इस कथा के अनुसार शहजादा कुलीन रक्त और सम्पन्न सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक  वर्ग का प्रतिनिधि है किन्तु स्वयं के ब्याह को लेकर अनिश्चय की गिरफ्त में है । उसे पता ही नहीं कि उसकी मनचाही पत्नि उसे कहाँ मिलेगी ? ऐसे में उसके जीवन में मार्गदर्शिका के रूप में जिप्सी महिला का आगमन सांकेतिक रूप से बेहद दिलचस्प है । महिला घुमक्कड़ समुदाय में से है अतः उसने घाट घाट का पानी पिया होगा और दुनियादारी को लेकर उसके अनुभव, समझ सह निर्णय, अन्यान्य लोगों से कहीं अधिक परिपक्व और दूरदर्शी होंगे, यह मानना अत्यंत सहज प्रतीत होता है । शहजादा उसकी सलाह पर ऊंचे दरख्त में मौजूद आश्रय स्थल से तीन अंडज युवतियों के संपर्क में आता है किन्तु दैव विधान यह कि उसे प्रथम दो युवतियों को पानी पिलाना सूझता नहीं और वो दोनों प्यास से काल कवलित हो जाती है । तीसरी युवती पानी पीकर तृप्त और जीवित है सो वह शहजादे से कामना करती है कि उसे रथ पर महल ले जाया जाए यानि कि मायके से ससुराल गमन का सम्मानजनक प्रतीक है रथ आरूढ़ विदाई ।

 

दरख्त पर घोंसले का होना संभवतः उस जनसमुदाय की ओर प्रातीतिक  संकेत करता है जोकि जोखिम भरे वनों में दरख्तों की ऊंचाई पर घर बना कर रहता है । इस विचार से हटकर यदि हम दरख्त को ऊंचाई का प्रतीक माने तो वो युवतियाँ भी किसी जन समूह के उच्च सामाजिक वर्ग की प्रतिनिधि रही होंगी । मिथक में उल्लिखित युवतियों का अंडज होना मनुष्य जन्म के विज्ञान सम्मत होने जैसा है जैसे कि हम सभी अपनी माता के अंडे और पिता के शुक्राणुओं के अंडे में प्रवेश से जीवन पाते है। जिन्हें कथा की यह व्याख्या उचित प्रतीत न हो वो इसे दैवीयता के आलोक में बाँच सकते है तब उन्हें यह विश्वास भी करना होगा कि कथा की नायिका, पानी में तैर पाने वाली युवती नहीं रही होगी और मछली के रूप में उसकी मृत्यु से सेब का अद्भुत वृक्ष पनप सकता है । आख्यान की खलनायिका जिप्सी महिला शहजादे की पत्नि बनने के लिए तीसरी युवती को पानी में डुबा देती है पर वो मरती नहीं है । उसे मिथक में सुनहरी वेशभूषा वाली मछली बताया गया है जोकि  जिप्सी महिला के षडयंत्र का शिकार होकर भी सेब के दरख्त के रूप में कायांतरित होती है और एक बार फिर से जिप्सी महिला के छल प्रपंच का शिकार होकर लकड़ी के एक टुकड़े बतौर बे-औलाद बूढ़े की दत्तक पुत्री यानि कि संवेदनशील सहारा बन जाती है ।

 

आख्यान में जिप्सी महिला की कुटिलताओं का अंत तभी होता है जब एक बुजुर्ग और अनुभवी व्यक्ति अपने केश सँवारने के लिए कंघी बनाना चाहता है किन्तु सेब के दरख्त की वो लकड़ी किसी और शक्ल में उसका जीवन संवार देती है । शहजादे के भ्रम टूटते है और वह अपनी वास्तविक जीवन संगिनी को स्वीकार कर लेता है परिणामस्वरूप जिप्सी युवती को उच्च कुल से बहिष्कृत होने तथा शूकर पालन जैसे निम्न वर्गीय आर्थिक कार्य में संलग्न होने का दंड प्राप्त होता है । कथा को समाज में व्यापित छल प्रपंच, अनुभव और नासमझी की रस्साकशी के आलोक में पढ़ा जाना चाहिए भले ही शताब्दियों तक जीवित वाचिक परंपरा ने इसमे अनेकों दैवीय चमत्कार जोड़ दिये हों । बहरहाल ये आख्यान सत्य की विजय और झूठ की पराजय वाली सीधी रेखा में चलकर खत्म हो जाता है । 

सोमवार, 28 जुलाई 2025

गैलाटिया

पिग्मेलियन विलक्षण मूर्तिकार था । उसकी सृजन धर्मिता और देवत्व के प्रति भक्ति भाव, प्रेम की परिवर्तनकारी धारणा पर दैवीय हस्तक्षेप के विश्वास पर आधारित थी । महिलाओं के प्रति उसमें गहन निराशा और अनासक्ति का भाव मौजूद था । स्थानीय निवासियों मे से कुछ के अनैतिक व्यवहार से उसका मन आहत था अस्तु उसने अपनी कला को रोमांटिक गतिविधियों से पृथक करते हुए अपनी सम्पूर्ण भावनात्मक ऊर्जा को मूर्ति शिल्प से जोड़ दिया था । उसने महसूस किया कि उसके इर्द गिर्द की दुनियां में कुछ कमियां  हैं ।  जिसे उसके दक्ष हाथ नव सृजन के माध्यम से दूर कर सकते हैं । उसने नश्वर महिलाओं और उनकी कमियों को स्त्री संपूर्णता के नजरिये से देखते हुए मूर्ति कला को नए आयाम दिए ।

चिंतन के ऐसे ही किसी एक अवसर पर पिग्मेलियन ने हाथी दांत में अलौकिक सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति उकेरी । उस मूर्ति में उसकी समस्त दक्षता और भावनात्मक ऊर्जा समाहित थी । उसने छेनी की हरेक खटक के साथ सूक्ष्मतम परिशोधन किए, यहां तक कि हाथी दांत का ठंडापन, अनुग्रह और जीवंतता में परिवर्तित नजर आने लगा । उसने मूर्ति को गैलाटिया नाम दिया । वैसे तो पिग्मेलियन रूमानियत से अनासक्त था पर उसने इस मूर्ति में यौवन की रेखाओं और वक्रता को उनकी संपूर्णता के भाव से गढ़ा । यह मूर्ति कृत्रिम से दिव्यता की दिशा में बदलती गई । ना जाने क्यों, पिग्मेलियन इस मूर्ति के प्रति अनुरक्त होने लगा था जैसे कि यह कोई जीवंत स्त्री हो ।

उसने उस मूर्ति को समुद्री शंख, चमकीले फूलों, चमकदार गहनों और शानदार कपड़ों से सजाया, जैसे कि वो किसी खूबसूरत युवती को उपहार देकर प्रसन्न करना चाहता हो । महिलाओं के प्रति  आलोचनात्मक  चिंतन करने वाला पिग्मेलियन अपनी ही कृति पर मोहित हो चला था ।  प्रेम की देवी एफ़रोडाइट, पिग्मेलियन के बदलते हुए स्वभाव और जुनून से प्रभावित हुई । एफरोडाइट पिग्मेलियन की आराध्य देवी थी इसलिए अपनी भावनात्मक कशमकश को लेकर वो, एफरोडाइट के मंदिर में जा पहुंचा और उसने देवी के सम्मुख एक बैल  की आहुति दी । बलि देते ही वेदी से तीन बार अलग अलग लपटें उठीं तो वो समझ गया कि देवी ने उसकी बलि  स्वीकार कर ली है ।

मंदिर से लौटने के बाद, वेदी की पवित्र लपटों से मिले रहस्यमय संकेतों ने उसमे आशा का संचार कर दिया था । उसने मूर्ति को अपनी बांहों में भर लिया । उसे महसूस हुआ कि मूर्ति अब हाथी दांत जैसी सख्त और ठंडी नहीं है । उसमें नारियोचित ऊष्मा और कोमलता है । उसने अपने अंदर प्रेमानुभूति का ज्वार उमड़ता पाया और मूर्ति के ओंठों को चूम लिया । देवी एफरोडाइट ने उसकी कला को अद्भुत उपहार दिया था । ये अप्रतिम सौन्दर्य की स्वामिनी गैलाटिया थी । जीती जागती सुंदर युवती जिसने पिग्मेलियन के हृदय को प्रेम से भर दिया था ।

इस ग्रीक आख्यान से, प्रेम के प्रति किंचित उदासीन, सृजनहारे और प्रकृति सह देवत्व के संबंध उद्घाटित होते हैं । देवत्व उसे पुरस्कृत करता है और उसकी शुष्क हो चली भावनाओं को जीवंत करता है । संभवतः पिग्मेलियन ने व्यक्तिगत जीवन में स्त्रियों से छल पाए होंगे अतएव उसने स्वयं के जीवन में, मूर्तिकला की दक्षता का असीमित विस्तार किया । स्त्रियों से प्रेम के लिए उसकी धारणाएं विरक्ति प्रधान हो चलीं थीं तो उसने अपने हाथों को सृजन धर्मिता की आसक्ति से जोड़ लिया । एक ओर ये कथा पिग्मेलियन के निज संसार में स्त्रियों के फिसलते स्थान और मूर्ति कला के सुदृढ़ होते आयाम का प्रकटीकरण करती है तो दूसरी ओर उसके मन के किसी कोने में स्त्रियों और प्रेम की मौजूदगी का एहसास भी कराती है ।

कथनाशय यह है कि स्त्रियां नैसर्गिकता हैं, प्रकृति का अमिट अंश हैं और हरेक जीवित सत्ता के अंदर मौजूद बनी रहती हैं भले ही उनके प्रति निराशा और वैराग्य की सतही अभिव्यक्ति होती रहे । पिग्मेलियन स्त्रियों के प्रति अनासक्ति का दिखावा तो करता है पर हाथी दांत पर नक्काशी करते हुए वो, स्त्री देह की बारीक से बारीक सरल और वक्र रेखाओं को अद्भुत दक्षता के साथ उकेरता है । स्पष्ट संकेत यह है कि, उसमे यौन लालसाएं पूर्णतः भस्मीभूत नहीं हुई हैं । वो उस मूर्ति के प्रति मोहासक्त है, उसे जीवित देखना चाहता है । उसने मूर्ति को सुंदर से सुंदर गहनों, वस्त्रों और फूलों से सजाया है जैसे कि वो उसकी प्रेयसी हो । मूर्ति का शृंगार करते हुए वो जड़ कलाकृति के सजीव स्त्री होते जाने को महसूस करता है। उसकी अनासक्ति, आसक्ति में तिरोहित होती जाती है ।

मूर्ति को बहु विध उपहार देते हुए, उसके वैराग्य का क्षरण होने लगता है और उसे प्रतीत होता है कि प्रेम अब भी उसके अंतस में जिंदा है । वो हाथी दांत की बेजान और ठंडी मूर्ति को जीवित स्त्री की कोमलता और ऊष्मा के साथ जीना चाहता है, सम्मोहित सा । उसे मूर्ति के, सचमुच की स्त्री होते जाने का एहसास है और वो प्रेम की देवी एफरोडाइट का सकारात्मक हस्तक्षेप चाहता है। वो अपने सृजन, गैलाटिया संग नवजीवन चाहता है, एक प्रेमी और प्रेयसी का, पति और पत्नि का । देवी एफरोडाइट, पिग्मेलियन के परिवर्तित स्वभाव से प्रसन्न है और पिग्मेलियन के जीवन में दिव्य हस्तक्षेप करती है । फलस्वरूप गैलाटिया, प्रेम की देवी एफरोडाइट का जीता जागता उपहार बन जाती है । पिग्मेलियन की प्रेम रिक्तता, प्रेम सिक्तता मे बदल जाती है । कहते हैं प्रेम, मरुथल को नखलिस्तान कर देता है ।


शनिवार, 26 जुलाई 2025

पुटेरी गुनुंग लेदांग

मुद्दतों पहले मलक्का की धन सम्पन्न सल्तनत का सुल्तान महमूद शाह बेहद अहंकारी और महत्वाकांक्षी व्यक्ति था उसे अपनी सत्ता के विस्तार के साथ ही साथ इस बात का ख्याल था कि उसकी नई पत्नि, इतनी खूबसूरत होना चाहिए जो कि उसकी सल्तनत के वैभव से साम्यता रखे । उन दिनों पुटेरी गुनुंग लेदांग नामक अनिंद्य सुंदरी की चर्चा आम थी, कहते हैं कि वो अपने नाम के ही पवित्र पर्वत पर निवास करती थी लेकिन सभी मलक्का वासियों को यह विश्वास था कि जो भी उस युवती से ब्याह की हसरत लेकर पहाड़ पर गया कभी वापस ही नहीं लौटा । सुल्तान का ख्याल था कि पुटेरी गुनुंग लेदांग उसकी पत्नि बनने के लिए सर्वाधिक सुयोग्य युवती है ।  वो स्वयं ही उस पहाड़ पर चढ़ कर उस युवती को अपनी अर्धांगिनी बनाने का इच्छुक था पर उसके मंत्री सतर्क थे । उनका अभिमत था कि यह कार्य जोखिम भरा है, सो तय हुआ कि योद्धा हंग तुआह के नेतृत्व में एक दल युवती के पास जाएगा और सुल्तान का विवाह प्रस्ताव सौंपेगा ।

हंग तुआह और उसके साथी घने जंगल और रहस्यमय पहाड़ की ऊंचाइयों को नापते हुए बमुश्किल आगे बढ़ पर रहे थे दरख्तों की सरसराहट यूं , गोया वो किसी गुप्त भाषा में संवाद कर रहे हों । नदियां कहीं शुरू होतीं और कहीं पर खत्म हो जाती, कितने ही झरने । हंग तुआह को डर तो लग रहा था पर वो सुल्तान का विश्वस्त दरबारी था, सो आगे बढ़ता रहा । आखिरकार वे  सभी पहाड़ की चोटी पर जा पहुंचे जहां एक गुफा में पुटेरी गुनुंग लेदांग रहती थी । हंग तुआह ने सम्मान सहित उस युवती को अपने आने का प्रयोजन बतलाया तो वो थोड़ी देर खामोश रही और फिर उसने सुल्तान से ब्याह के लिए सात शर्ते रख दीं । उसने कहा अगर सुल्तान इन शर्तों को पूरा कर पाएगा तो वो उससे ब्याह कर लेगी । अब  हंग तुआह शर्तें सुनने के इंतजार में था ।

पुटेरी गुनुंग लेदांग ने बोलना शुरू किया । उसकी आवाज हवा में गूंज रही थी । उसने कहा सुल्तान के महल से पहाड़ की चोटी तक सोने का पुल और सुल्तान के अंतःपुर से मेरे आवास तक चांदी का पुल बनवाया जाए । सात थालों में भर कर मच्छरों के दिल और सात थालों में जूओं के दिल भर कर मुझे दिए जाएं । कुआंरी लड़कियों के आंसुओं से भरा एक घड़ा, सुल्तान के बेटे का एक कटोरा खून और खुद सुल्तान का एक कटोरा खून मुझे दिया जाए । हंग तुआह अवाक और निराश था पर उसके सामने और कोई विकल्प शेष नहीं था । वो दल सहित पहाड़ से नीचे उतरा और सुल्तान से मिलकर इन असंभव शर्तों का किस्सा बयान किया । यह सुनकर सुल्तान किंचित निराश हुआ पर वो अब भी दृढ़  संकल्पित था कि उसे  पुटेरी गुनुंग लेदांग से ब्याह करना ही है ।

दरबारियों में से कुछ का ख्याल था कि पुटेरी गुनुंग लेदांग ने सुल्तान के वैभव, धन संपन्नता और ब्याह की आकांक्षा का मजाक उड़ाया है हालांकि कुछ दरबारियों का मानना था कि कोशिश करना चाहिए । सुल्तान के वास्तुकार पुलों की डिजाइन बनाने में लग गए । मच्छरों और जुओं के दिल खोजने के साथ ही साथ, कुआंरी लड़कियों के आंसू एकत्रित करने के लिए हजारों लोग तैनात कर दिए गए । दिन, हफ्तों और महीनों में बदलने लगे पर हर दिशा में सिर्फ नाकामियां ही नाकामियां दिख रही थीं । सुल्तान बेचैन होने लगा था । उसे अपना और अपने प्यारे बेटे का खून निकालना एक दुःस्वप्न सा लग रहा था । एक रात जब वो अपने महल के गलियारे में टहल रहा तो उसने देखा कि पहाड़ चांदनी मे नहाया हुआ था ।  उसे महसूस हुआ कि पहाड़ की अलौकिक आभा, दमकते हुए हुस्न के आगे उसकी जिस्मानी आकांक्षाएं , बेमानी और माटी के मोल हैं ।

वो समझ गया कि पहाड़ की लड़की अनमोल है । उसकी निज कामनायें, पहाड़ के अद्भुत सौन्दर्य का पासंग भर भी नहीं हैं । वो राज्य विस्तार कर सकता है । धन दौलत जुटा सकता है पर अपनी ताकत के दम पर कुदरत  पर अधिसत्ता कायम नहीं कर सकता । अगली सुबह सुल्तान ने अपने दरबार में घोषणा की, कि वो पहाड़ की लड़की से ब्याह का अपना दावा छोड़ रहा है । उसने कहा पहाड़ का सौन्दर्य अप्रतिम है । वो बोल कि मैं इंसानों का शासक हूं  लेकिन कुदरत के आगे सामर्थ्य हीन ।  पुटेरी गुनुंग लेदांग का हुस्न अछूता रहेगा, सदा सर्वदा, अपने ही स्थान पर ।

दक्षिणी पूर्वी एशियाई मूल की ये कथा अनेकों प्रतीकात्मक निहितार्थ लिए हुए है । सुल्तान बेहद अहंकारी और सत्ता विस्तार का भूखा है । उसे लगता है कि वो दुनिया की हर शय का मालिक हो सकता है । वो पहले से शादी शुदा है पर उसे अपनी, ऐश्वर्यशाली ज़िंदगी के लिए, नवब्याहता चाहिए, उसे ख्यातनाम पुटेरी गुनुंग लेदांग की जरूरत है ।  मिथक में इस युवती को ऊंचे और पवित्र पर्वत में रहने वाला बताया गया है । वो अनिंद्य सौन्दर्य की स्वामिनी कही गई है कदाचित देवी तुल्य स्त्री, जोकि निवास और सुंदरता के उच्चतम मानदंडों पर स्थापित है । अगर हम समस्त वैश्विक धर्मों और उनके उपासना स्थलों का इतिहास देखें तो पाएंगे कि ज्यादातर आराध्य, समतल भूमि की तुलना में पर्वतों की उच्चता में निवास करते हैं । अस्तु देवत्व की, मनुष्यों पर श्रेष्ठता के प्रातीतिक अर्थों का उद्घोष इस कथा की नायिका के संदर्भ में भी स्वीकरणीय होना चाहिए ।

उल्लेखनीय है कि आख्यान मे उल्लिखित सुल्तान स्वयं को वैभवशाली राज्य का मालिक समझता है ।  उसे पूर्व ब्याहता की तुलना में पुटेरी गुनुंग लेदांग चाहिए । वो युवती जो कि देवत्व की प्रतिनिधि है और पर्वत की ऊंचाई में स्थापित है । सुल्तान को अपनी शक्तिमत्ता पर अभिमान है और उसे आख्यान की नायिका पर आधिपत्य चाहिए जैसे कि भूभाग, धन सम्पदा पर उसका निरंकुश अधिकार है वो नायिका को, देवत्व सहित अपनी पत्नि के तौर पर अपने स्वामित्व में देखना चाहता है । सुल्तान की खोज इहलोक के स्वामित्व और देवलोक के मध्य कोई अंतर नहीं करती । मिथक कहता है कि वो प्रयास करता है और असफल हो जाता है । महल के गलियारे में टहलते हुए चांदनी में नहाए हुए पर्वत की अलौकिकता उसका भ्रम तोड़ देती है । उसे यह एहसास हो जाता है कि उसकी खोज सर्वथा अनुचित है । उसे भौतिकता और अलौकिकता की समतुल्यता के भ्रम से बाहर आना ही चाहिए ।

उसका भ्रम टूटता है और वो यह स्वीकार करता है कि पर्वत की देवीय शक्ति ने उसकी परीक्षा लेने के लिए ही ऐसी शर्ते रखी हैं जिससे यह सिद्ध हो कि देवत्व के सम्मुख, सुल्तान का वैभव और सामर्थ्य गौण है ।  वो यह मान लेता है कि इंसानी महत्वाकांक्षाओं की सीमाएं हैं । उसने एक सबक सीखा कि दुनियादारी और पारलौकिकता को एक ही तराजू में तौलना, तार्किक और बौद्धिक निर्णय नहीं है और असंभव को पाने के लिए अपनों का खून नहीं बहाया जा सकता है । अगली सुबह , बौद्धिकता  के आलोक में वो, अपने दरबार में यह घोषणा करता है कि उसने पुटेरी गुनुंग लेदांग को पत्नि स्वरूप पाने की अपनी कामना का परित्याग कर दिया है और अब वो अपने सामर्थ्य, अनुभव और ज्ञान का उपयोग अपने राज्य के संचालन के लिए करेगा । वो जान गया था कि पुटेरी गुनुंग लेदांग पहाड़ की, कुदरत की, शास्वत संरक्षक है और वो सौन्दर्य, स्वतंत्रता और पुरुषों की इच्छाओं पर प्रकृति के वर्चस्व, की प्रतीक है । 

 

शनिवार, 5 जुलाई 2025

इतुएन और अत्तेम

मुद्दतें गुज़री, तब कैलाबार का राजा आफ़ियोंग बूढ़ा हो चुका था । उन दिनों उसके हरम में अनेकों रानियां हुआ करती थीं, जिनमें से, अत्तेम बेहद खूबसूरत और कम उम्र युवती थी । उसका ख्वाब था, एक बांका सजीला हम उम्र पति लेकिन उसके हिस्से आया बूढ़ा आफ़ियोंग । वो आफ़ियोंग से खुश नहीं थी । उसने अपने भरोसेमंद कारिंदे से कहा कि वो शहर मे घूम कर किसी खूबसूरत जवान की तलाश करे और आफ़ियोंग की नज़र बचाकर,उसे महल के पिछले दरवाजे से अत्तेम तक ले आए । कारिंदे ने शहर मे भटकने के बजाय बाजार में ऐसे जवान की तलाश शुरू कर दी क्योंकि उसका ख्याल था कि शहर के तमाम, खास-ओ-आम लोग बाज़ार जरूर आते हैं । बहरहाल शाम तक उसे कोई मुनासिब युवा नहीं मिला और वो निराश होकर घर लौटना ही चाहता था कि अचानक उसने इतुएन को देखा जो जमीन में बिखर गई मकई और दूसरी सब्जियां उठा रहा था ।

असल में इतुएन बेहद गरीब परिवार की इकलौती संतान था जो खूबसूरत होने के साथ ही साथ, अच्छी कद काठी और अपनी विनम्रता के लिए लोगों में लोकप्रिय था । चूंकि उसके घर में खाने तक का कोई ठिकाना नहीं था इसलिए वो रोज शाम बाजार जाता और वहां बची हुई और बर्बाद हो जाने वाली सब्जियां चुनकर घर ले आता था । अत्तेम के कारिंदे को वो पहली नज़र में ही भा गया, उसने सोचा यही बेहतर प्रेमी साबित होगा अत्तेम का । कारिंदे ने आगे बढ़कर इतुएन को, युवा रानी का प्रस्ताव दिया लेकिन इतुएन बहुत डर गया, उसे अंदाज था कि अगर राजा ने उसको पकड़ लिया तो वो यकीनन मारा जाएगा, इसलिए उसने कारिंदे से साफ साफ मना कर दिया, लेकिन कारिंदे ने उसकी गुरबत का फायदा उठाया, उसे लालच दिया, अनुनय विनय की । इतुएन को अपनी पारिवारिक दुर्दशा का ख्याल तो था ही वो डरते सहमते रात के अंधेरे में, रानी से मिलने के लिए तैयार हो गया । हालांकि रानी के पास पहुंचने के वक्त वो थर थर कांप रहा था ।

अत्तेम उस वक्त सोने चांदी के जवाहरातों से सजी धजी और बेहतरीन कपड़े पहने हुई थी, वो इतुएन को देखते ही खुश हो गई, इतुएन बिल्कुल उसके सपनों के प्रेमी जैसा था । उसने अपने चहीते प्रेमी के सुगठित अंगों की तारीफ की और रात भर प्यार में मुब्तिला रही । इतुएन सुबह का उजाला होने से पहले अपने घर लौटना चाहता था लेकिन अत्तेम ने खतरा मोल लेते हुए उसे दो सप्ताह तक अपने पास रोक लिया और छुपा कर रखा । दो सप्ताह गुज़रे तो इतुएन ने कहा कि वो अपनी मां से मिलना चाहता है, अत्तेम मान गई, उसने इतुएन के साथ रतालू, काली मिर्च, नमक, तंबाकू, शानदार कपड़ों जैसे उपहार अपने भरोसे मंद दासों के हाथ इतुएन के घर भेज दिए । इतुएन की मां ये सब देख कर बहुत खुश हुई लेकिन जब उसे पता चला कि ये सब छोटी रानी के नाजायज प्रेम का परिणाम है, तो वो डर गई, उसे पता था कि पकड़े जाने पर, इसका दंड मौत के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ।

उधर अत्तेम बेचैन थी, उसने इतुएन को वापस बुलाया, इतुएन छुप छुपा कर दोबारा महल जा पहुंचा, लेकिन इस बार उसकी वापसी उसके लिए खतरनाक साबित हुई, असल में उपहार पहुंचाने वाले कारिंदों ने ये किस्से राजा के विश्वस्त कारिंदों से कह डाले थे । सो राजा इस बार होशियार था, उसने प्रेमी युगल को रंगे हाथों पकड़ लिया, इतुएन को गिरफ्तार कर के जंगल ले जाया गया, जहां उसे दोषी बतौर दंड दिया जाना था । राजा आफ़ियोंग के आठ विश्वस्त नातेदार, दरबारियों ने उसे जंगल में एक दरख्त से बांध दिया और धारदार हथियार से उसका निचला जबड़ा काट डाला । इतुएन के साथ, अत्तेम को सजा नहीं देकर, राजा ने सुधरने का एक मौका दिया था, लेकिन वो प्रेमी की दुर्दशा से अत्यंत आहत थी और दिन-ओ-रात बस रोये ही जा रही थी, तो राजा ने उसे और उसके विश्वस्त कारिंदे को भी गिरफ्तार कर के  जंगल भेज दिया और उन दोनों के जबड़े काट डाले गए लेकिन कारिंदे की दोनों आंखेँ भी फोड़ दी गईं ।

उन तीनों को घायल, दर्द से छटपटाते, भूख से बिलबिलाते हुए, मरने के लिए, जंगल में ही छोड़ दिया गया और राजा ने एक कानून बनाया कि आगे चलकर बाजार के दिन, इतुएन परिवार का कोई सदस्य बाजार नहीं जाएगा और कोई दूसरा इंसान भी शाम को खराब होने वाली सब्जियां नहीं चुनेगा । राजा ने कहा ये प्रतिबंध कुत्तों और गिद्धों पर लागू नहीं होगा क्योंकि वे राजपरिवार की स्त्री के साथ भाग नहीं सकते, बस उस दिन से ही लोग, बाजारों में घूमते हुए कुत्तों और गिद्धों को देखते हैं ।  

दक्षिणी नाइजीरिया का ये आख्यान सामाजिक जीवन के द्वैध को प्रकटित करता है जिसे पुरुष श्रेष्ठता   बनाम स्त्रियों की हीनता जैसे लैंगिक विभाजन तथा अमीर बनाम गरीब की आर्थिक असमता के रूप में देखा जा सकता है । एक संपन्न व्यक्ति की अनेकों पत्नियों के कथन से उक्त समाज के बहु विवाही होने का संकेत मिलता है । कथाकालीन समाज में स्त्रियों की समुचित आयु और अतृप्त यौनेच्छाओं का कोई मोल नहीं है । एक पति और अनेकों पत्नियों वाले उक्त परिवार में, स्त्रियों की दबी कुचली यौन कामनाओं, दैहिक लालसाओं के अधूरेपन की भरपाई, सामाजिक मूल्यों के अंतर्गत प्रावधानित नहीं है अतः दैहिक सुख के लिए विवाहेत्तर विकल्पों की खोज स्वभाविक ही है, जैसा कि इस कथा के विवाहेत्तर प्रणय प्रसंग से स्पष्ट होता है कि सामाजिक वर्जनाएं अक्सर दैहिक लालसाओं के सामने अपना अस्तित्व खो बैठती हैं । अत्तेम युवा पत्नि है उसे सुंदर और युवा प्रेमी चाहिए जो सुगठित देहयष्टि का मालिक हो, स्पष्टतः अत्तेम को प्रणय लीला के लिए बूढ़ा पति स्वीकार्य नहीं । उसे महल के रहवास में सुदर्शन युवा प्रेमी की प्रतीक्षा है ।

कथा का प्रेम, चोरी से घटित होना तय है अतः सामाजिक आर्थिक विभाजन में निम्न क्रम के कारिंदे अपने स्वामी और स्वामिनी के अनुचित आदेश को भी सहज स्वीकारते है अत्तेम का कारिंदा उसके लिए अविधिक प्रेमी की खोज करता है और आफ़ियोंग के कारिंदे, जबड़ा तोड़ सजा और अनैसर्गिक यातनादाई मृत्यु के सहायक बनते हैं । आफ़ियोंग और अत्तेम में वैवाहिक जीवन की शुभता के लिए आयु भेद, शारीरिक दक्षता भेद और सौन्दर्य की तुलनात्मक श्रेष्ठता और हीनता का भेद है । राजा आफ़ियोंग संपन्न है तो छोटी पत्नि भी विवाहेत्तर संबंधों के लिए मनमाने उपहार देने में सक्षम है । इस आख्यान में कथा के नायक इतुएन को विनम्रता और स्वभावगत आधार पर लोकप्रिय बताया गया है किन्तु उसकी आर्थिक विवशताएं है जिनके कारण से वो अनदेखी अत्तेम का सहवास नायक बनना स्वीकार कर लेता है हालांकि उसे इस कारण से अपनी जान पर आने वाले संकट का भान है । कथा का ब्याह, बेमेल श्रेणी का ब्याह है और स्त्री को अपना प्रेमी चुनने का अधिकार नहीं। उसे पुरुष सत्तावादी समाज की कथित मान्यताओं के अनुसार पतिव्रत धर्म का पालन करना ही होगा ।

अत्तेम का प्रेम दैहिकता का प्रेम है जबकि इतुएन का प्रेम नितांत आर्थिक विवशताओं का, जिसमे उन दोनों के प्राणों पर संकट की संभावना निहित है । आख्यान में राजा और युवा रानी के विश्वस्त कारिंदे अलग अलग हैं किन्तु उन सभी का कारिंदा होना उन्हें एक ही श्रेणी में ला खड़ा करता है । युवा रानी उपहारों के रूप में अपने प्रेमी को, जो धन / वस्तुएं, खुद के विश्वस्त कारिंदों  के हाथ से भेजती है । उसका विवरण, कानफूसियों या उच्च वर्ग के उपहास उड़ाने की मानसिकता के अधीन राजा के कारिंदों तक साझा हो जाता  हैं । इस आख्यान में बहु स्त्री-गामिता आफ़ियोंग का पक्ष है और सुंदर, सुदेह, प्रणय सहयात्री चुनने का नितांत दैहिक विकल्प, अत्तेम का । इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि कथा कालीन समाज में आफ़ियोंग  का पक्ष समाज सम्मत ठहराया गया है जबकि अत्तेम का पक्ष, सामाजिक नैतिकता के विरुद्ध । कथा कहती है कि नायक इतुएन, नायिका अत्तेम और विश्वस्त कारिंदे के जबड़े काट डाले गए यानि कि यह प्रतीकात्मक रूप से मुंह को, असामाजिक वाचिकता के लिए दंड है । इसी तरह से कारिंदे की आंखें फोड़ना उस अवलोकन का दंड है जिसके द्वारा उसने बाजार में इतुएन को चुना था और सामाजिकता परंपरा की अनदेखी की थी। आख्यान में उल्लिखित इतुएन के परिवार और अन्य मनुष्यों की बाजार में उपस्थिति का निषेध और कुत्ते तथा गिद्धों की स्वीकार्यता इस आशय में स्वीकार की जाए कि सामाजिक मानदंडों का उल्लंघन करने वाले मनुष्य, कुत्तों और मृत देह भक्षण करने वाले गिद्धों से भी गए गुजरे है । 


रविवार, 29 जून 2025

फूल खिलते रहेंगे दुनिया में

उन दिनों योहिरो, बेहद उदास, ना उम्मीद, बदहवास, घूमता फिरता, तब सामंतवादी जापान में युद्ध के दिन थे । योहिरो इस गांव से उस गांव भटकता रहता, उसे खुशी की तलाश थी, जो उसके अंदर, बाहर कहीं थी ही नहीं । महीनों बीते वो भावनाहीन होता गया । कहते हैं कि युवक होने से पहले वो एक दरख्त था, बे-फूल, बिना हरियाली, मजबूत तने और लंबी शाखों के बावजूद हर मौसम, अन-खिला,युद्ध से मारों के लिए,उसके पास छिपने लायक या छायादार, कोई जगह तक नहीं थी। लोग उसके बांझपन से डरते और उसके पास फटकते तक नहीं थे । दरख्त के अटूट वीरानेपन से दुखी, वन परी ने उससे पूछा, क्या वो दूसरे दरख्तों की तरह खिलना चाहेगा ? उसने कहा, हां जरूर । परी ने कहा मैं तुम्हें बीस साल के लिए इंसान में बदल सकती हूं और इस दौरान तुम खुशियां और उम्मीदें ढूंढना, जैसे जैसे तुम्हारी उदासियां कम होती जाएंगी, तुम्हें फिर से दरख्त बनाने का मौका मिलेगा ताकि तुम दूसरे दरख्तों की तरह से मुस्करा सको, महको, खिल सको ।

तुम्हारी उम्मीदें ही, तुम्हें नई ज़िंदगी देंगी, लेकिन ख्याल रहे कि तुम्हारे हाथ सिर्फ बीस साल होंगें, अगर तुम्हारे अंदर जीवन और खुशियों की भावनाएं फिर भी नहीं जागीं तो तुम हमेशा के लिए मर जाओगे । उसके बाद तुम कभी भी धरती पर वापस लौट नहीं सकोगे । दरख्त के पास, कोई दूसरा विकल्प था भी नहीं । उसने वन परी का अहसान मानते हुए अपनी सहमति दी और वन परी ने उसे युवक के रूप में बदल दिया जिसे, मनुष्यों के दरम्यान गांव में रहना था और खुद के अंतस मुहब्बतें जगाना थीं, खुशियों की तलाश करना थी, पुर-उम्मीद होना था । महीनों यूं ही गुज़रे, एक रोज वह थक कर चूर, एक दरख्त के नीचे सुस्ताने के ख्याल से लेट गया, तभी उसने देखा एक बेहद खूबसूरत लड़की पानी का घड़ा लिए हुए, उसकी ही दिशा में बढ़ रही थी । युवक सम्मोहित सा उसे देखता रह गया, उसका दिल कर रहा था कि लड़की, उसके साथ ज्यादा से ज्यादा वक्त गुजारे, उसने युवती से कहा गांव चलोगी ? ना जाने क्यों युवती, युवक के प्रति सहृदय प्रतीत हो रही थी, उसने कहा ठीक है चलो ।

बात ही बात में युवक ने जाना कि लड़की का नाम सकुरा है । गांव पहुंचकर सकुरा ने युवक से पूछा कि उसका नाम क्या है ? युवक ने अनायास ही कहा, मेरा नाम योहिरो है । ऐसे ही उनकी सोहबत के दिन, महीने, साल गुज़रते गए । उन दोनों के शौक एक समान थे, जैसे बातें करना, गीत गाना, किताबे पढ़ना वगैरह वगैरह और फिर एक खूबसूरत शाम, योहिरो ने सकुरा से कहा कि वो उसे प्यार करने लगा है और उसके साथ ज़िंदगी गुज़ारना चाहता है । अपनी चाहत के इजहार के साथ ही उसने सकुरा को अपने एकाकीपन, बतौर इंसान अपने जीवन के शेष बचे दिनों, वन परी के अहसान, अपनी उदासियों, अपने दुखों, दरख्त के तौर पर अपनी उजाड़ ज़िंदगी के बारे में सब कुछ बता दिया । सकुरा, योहिरो की कथा से प्रभावित तो हुई पर उसे सूझा ही नहीं कि वो फौरन से पेश्तर योहिरो को, क्या जबाब दे ? सो वो खामोश रही। सकुरा का मौन, युवक को गहरी चोट दे गया, वो एक बार फिर से दरख्त में तब्दील हो गया, पहले की तरह से बेबस और उदास ।

योहिरो को पता था कि जल्द ही उसे दुनिया-ए-फ़ानी से कूच कर जाना हैं और फिर एक दिन जब, उसकी ज़िंदगी की आखिरी दोपहर सिर चढ़ गई थी, तभी सकुरा हांफती, भागती हुई उस तक पहुंची । उसे एहसास हो गया था कि वो योहिरो से मुहब्बत करती है । उस लम्हा, वन परी आस पास ही थी, उसने सकुरा से पूछा क्या वो योहिरो के साथ इंसानों की तरह से ज़िंदगी गुज़ारना चाहेगी या कि उसके दरख्त रूप से एकाकार होना चाहेगी ? बेशक सकुरा ने चुना प्रियतम के दरख्त नुमा जीवन का साथ, वो अपने सच्चे इश्क से दूर नहीं रहना चाहती थी । उसने खिली खिली मुस्कराहट और खुली बांहों के साथ चुनी योहिरो की पुरबहार, महकती ज़िंदगी, योहिरो जो अब से जियेगा पुरउम्मीद, खिलेगा हर साल, लुभाएगा इंसानों को...       

असल में रोमानियत भरा ये जापानी मिथक, सकुरा यानि चेरी ब्लासम दरख्त के वज़ूद को, संबोधित है, जो कि हर साल अप्रेल महीने मे खिलते हैं । दुनिया के लाखों पर्यटक इन फूलों के खिलने का इंतजार करते हैं, उन्हें इन फूलों की हल्की गुलाबी रंगत सम्मोहित करती है । ये फूल कुछ लम्हों के लिए खिलते हैं और सांकेतिक रूप से जीवन की नश्वरता को प्रकटित करते हैं । कहने का आशय यह है कि जीवन का अल्पकालिक होना मायने नहीं रखता अगर वो दूसरों की खुशियों की वज़ह बन जाए तो। मिथक में मौलिक रूप से उल्लिखित ये दरख्त जंगल में अन-खिला, वीरान और उजाड़ सा है । उसमें युद्ध से बचने और जीवन की आस में भागे हुए लोगों के लिए पनाह की कोई गुंजायश नहीं है । उसकी हरियाली विहीन ज़िंदगी में बेशक  परिंदों तक के लिए कोई जगह नहीं थी । लोग उसके बंजरपन से डरते और दूर रहते थे ।

कहने को एक वन परी है, शायद कोई मालिन जो उसे जंगल से हटाकर इंसानी बस्तियों में नई ज़िंदगी देती है । दरख्त के वीरान और कदाचित अनुर्वर होने का कारण उसकी अपनी उदासियां, दुख और गहन निराशा के भाव हैं , जो संभवतः युद्ध की पृष्ठभूमि और जीवन मृत्यु के दुःस्वप्नों से उपजे हैं । उसमें अपनी सृजनशीलता के प्रति घनघोर अविश्वास है । उसके अंतस खुशियां नहीं, मुहब्बतें नहीं । सो कथा संकेत ये कि सृजनशीलता, उम्मीदों, मुहब्बतों, और खुशियों पर निर्भर है । बहरहाल मालिन उर्फ वन परी उसे इंसानी बस्तियों में पनपने का अवसर देती है ताकि वो इंसानों की तरह से खुशियां और उम्मीदें ढूंढ सके, अपने अंदर या अपने बाहर । गांव में उसका कोई नाम नहीं है , वो भटकता है, आस के लिए , खुशियों के लिए और अंततः सृजनशीलता के लिए । युवती, यानि कि उसकी सृजनशीलता या उसके सृजन का सौन्दर्य, या उसकी प्रेरणा, सकुरा ।

वो सकुरा से मिलता है और उसमें सकुरा की स्थायी संगत के भाव जागते हैं । पूछ जाने पर वो सकुरा को अनायास ही अपना नाम योहिरो कह देता है । योहिरो माने उम्मीद, जबकि इससे पहले उसका कोई नाम नहीं था । कथा कहती है कि उसका स्वभाव बिल्कुल सकुरा के स्वभाव जैसा है । प्रतीकात्मक रूप से उसके प्रणय प्रस्ताव पर सकुरा के मौन को, सकारात्मकता, सृजनशीलता के पूर्व, चिकित्सीय प्रभावशीलता के प्रतीक्षा काल जैसा माना जा सकता है। योहिरो को सकुरा चाहिए और सकुरा को योहिरो, यानि कि पुरउम्मीद होना । बेशक उन्हें मालिन उर्फ वन देवी के सहयोग से यकजा होने का मौका मिलता है । अब वो दोनों खिलखिलाते हैं, महकते हैं, लुभाते हैं इंसानों को, उनकी ज़िंदगी, क्षणभंगुर है पर वो दुनिया भर के लोगों की  खुशियों की वज़ह बनते हैं । वास्तव में उन दोनों का साथ, युद्ध की विभीषिका, इंसानों के हताहत होने और द्विवर्गीय समाज की अमानवीय, असमता मूलक, श्रेष्ठता और हीनता का प्रतिकार करता है ।