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सोमवार, 25 मई 2026

हायसिंथस

बेहद खूबसूरत और कमसिन हायसिंथस यूं तो स्पार्टन शहजादा था पर उसका ज्यादातर वक्त संगीत और सूर्य के देवता अपोलो के साथ गुज़रता, वो दोनों अक्सर साथ में शिकार खेलने जाते, एक दूसरे के साथ खेलते रहते । हायसिंथस और अपोलो की दोस्ती, दरअसल नश्वर इंसान और अमर देवता के दरम्यान पनपी हुई मुहब्बत थी । इधर पश्चिमी हवा का देवता ज़ेफिर, हायसिंथस और अपोलो के इश्क को लेकर बेहद ईर्ष्यालु हो गया था क्योंकि वो खुद भी हायसिंथस का प्यार पाना चाहता था । हालांकि हायसिंथस का साथ पाने की उसकी तमाम कोशिशें नाकामयाब हुई थीं । मुहब्बत में अपनी शिकस्त के मद्देनजर ज़ेफिर का गुस्सा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था । वो किसी भी तरह से, किसी भी हद मे जाकर, इस इश्क पर लगाम लगा देना चाहता था ।

शहजादा हायसिंथस जब भी मछलियों के शिकार पर जाया करता तो देवता अपोलो जाल लेकर उसके साथ जाता, अगर हायसिंथस जंगली जानवरों के शिकार पर जाता तो अपोलो उसकी मदद के लिए कुत्तों को लेकर साथ चलता । हायसिंथस पहाड़ों पर घूमने निकलता तो भी अपोलो उसके साथ मौजूद रहता । हायसिंथस के करीब रहते हुए देवता अपोलो को अपनी वीणा और तीरों तक की सुध बुध नहीं रहती । इधर उन दोनों का प्यार ज़ेफिर की बर्दाश्त से बाहर हो गया था । एक तेज धूप वाली दोपहर में, अपोलो और हायसिंथस एक दूसरे के साथ खिलखिलाते, हंसी मजाक करते हुए, डिस्कस फेकने का खेल खेल रहे थे इसी दरम्यान अपोलो ने पूरी ताकत से डिस्कस को आसमान में उछाल दिया जिसे पकड़ने के लिए हायसिंथस पूरे जोश के साथ तैयार हो गया था ।

ज़ेफिर के लिए यह एक अवसर था, उसने डिस्कस की दिशा बदल दी और फिर खेल, खेल ना रहा । डिस्कस, हवा की पूरी ताकत के साथ हायसिंथस के माथे से जा टकराया और वो लहूलुहान होकर जमीन पर गिर गया । देवता अपोलो ने जमीन पर बेसुध पड़े हायसिंथस को गोद में लेकर बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसकी कोशिशें व्यर्थ हो गईं ।  चोट बहुत गहरी थी और अपोलो का उपचार उसके लिए पर्याप्त सिद्ध नहीं हुआ । हायसिंथस की गर्दन उसके कांधों पर लुढ़क गई । अपोलो का चेहरा पीला पड़ चुका था वो चिल्लाया, हायसिंथस तू मर रहा है, मैंने तेरी जवानी छीन ली,  तेरा शोक मेरा गुनाह है, काश मैं तेरे लिए खुद मर पाता पर ये असंभव है इसलिए तू मेरे यादों और गीतों में सदैव जीवित रहेगा, मेरी वीणा हमेशा तेरे ही लिए सुर साधा करेगी, तू मेरे पश्चाताप का फूल बन जाएगा । अपोलो के आर्तनाद के दौरान ठीक उसी जगह एक खूबसूरत फूल उग आया जहां हायसिंथस का रक्त बहा था । 

ये दु:खद गाथा, ग्रीक पौराणिक आख्यानों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां एक नश्वर शहजादे हायसिंथस और एक अमर देवता अपोलो की समलैंगिक प्रणय गाथा का विवरण मिलता है , कथा के तीसरे कोण में वायु देवता ज़ेफिर की उपस्थिति एक खलनायक के जैसी है क्योंकि वह भी हायसिंथस का प्रेम पाना चाहता था और देवता अपोलो की सफलता ने हायसिंथस को उससे दूर कर दिया था । इश्क में नाकाम देवता ज़ेफिर ने अपनी असफलता को हायसिंथस की मृत्यु में बदल डाला, प्रेम-मय खेल की असामयिक मृत्यु । डिस्कस के वायु वेगवान प्रहार ने युवा कदाचित कमसिन हायसिंथस के प्राण ले लिए । हायसिंथस की प्राण रक्षा में असफल और शोक में डूबे देवता अपोलो, हायसिंथस को एक फूल में बदल देते हैं । हायसिंथस जो एक नश्वर मनुष्य था और हम सभी मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करता है,वो देवता अपोलो की चाहत का केंद्र था । कथनाशय शायद यह कि सभी नश्वर लोग, दिव्य शक्ति की चाहत का केंद्र हो सकते हैं ।

इस आख्यान से यह संकेत मिलता है कि अगर पुरुष पुरुष से प्रेम करता हो तो समलैंगिकता भी पवित्र और पूज्यनीय है । मिथक में बयान किया गया इश्क, प्रथम दृष्टया भले ही दु:खांत दिखाई देता है पर वो नश्वरता की आकस्मिक मृत्यु के बाद भी जीवित रहा, हरेक बसंत में, पिछले बसंत के बीजों से पुरुत्पादन की लय, नित्यता के साथ, नश्वरता की क्रमिक अमरता के जैसा । एक फूल जो खूबसूरत है, मरता है और जीता है बारम्बार, देवता अपोलो जो हायसिंथस की आकस्मिक मृत्यु से शोकाकुल था किन्तु अपने अपराध बोध को स्वीकारते हुए भी, खुद मर नहीं सकता था क्योंकि वह तो अमरत्व का चिरयात्री है, सो उसने हायसिंथस के लिए नई तरह की नित्यता, अमरत्व का चुनाव किया । किंचित विरह और फिर पुनर्मिलन की सतत यात्रा, कदाचित इस संदेश के साथ कि प्रियतम से अलगाव स्थायी नहीं होता यदि उसमें एक अल्प विराम है तो पुनर्मिलन की आस भी है ।

सूर्य के रात्रिकालीन गोपन अस्तित्व के समांनातर हरेक अगली सुबह सूर्य की दृष्टव्य उपस्थिति के जैसा । इस आख्यान में देवता अपोलो की वीणा हायसिंथस के लिए सुर साधती है , देवता के गीत हायसिंथस के लिए प्रेम पगे हैं , दुख , सुख भरी यादों से भरे पड़े हैं । हायसिंथस जिसने योनि बदली है , काया बदली है । देवता अपोलो, जिसे प्रेम ने, इंसान बनाए रखा और देवता ज़ेफिर जिसे प्रेम की असफलता ने मनुष्यों की तरह खलनायक और हत्यारा बना दिया । बहरहाल मिथक संकेत यह कि प्रेम में समलैंगिकता या विषमलिंगीयता का भेदभाव नहीं । कथा प्रातीतिकता यह कि ईश्वर और मनुष्यों में द्वैध का भाव नहीं है अंततः ईश्वर भी जीता है प्रेम या घृणा में, मनुष्यों की तरह से...

सोमवार, 18 मई 2026

दानवी सुकन्या स्काडी

स्काडी, असुर कुल में जन्मी युवती थी किन्तु उसे सुर कुल में जन्मी किसी देवी की तरह से जंगल की सत्ता हासिल थी । वो अमूमन जंगल और पहाड़ों में शिकार किया करती थी, हालांकि उसकी पुरुषोचित वेशभूषा के कारण से, ज्यादातर सामान्य लोग , उसे एक आकर्षक पुरुष ही मानते थे । स्काडी को कुलीन देवताओं से शत्रुता की हद तक घृणा थी और वो उनसे, अपने पिता असुर राज थियाजी की हत्या का बदला लेना चाहती थी । इसीलिए एक दिन वो बदले की भावना से वशीभूत होकर युद्ध के तमाम हथियारों और जिरह बख्तर के साथ देवताओं से युद्ध करने के लिए, उनके राज्य असगार्ड जा पहुंची और फिर उसने देवताओं को युद्ध की चुनौती दी ।

देवता उससे युद्ध नहीं करना चाहते थे, तो उन्होंने स्काडी से कहा तुम मुआवजा ले लो । बतौर मुआवजा तुम किसी एक देवता से ब्याह कर सकती हो लेकिन तुम्हें ब्याह के लिए देवता का चयन उसके पैर देखकर करना होगा, तुम उसका चेहरा नहीं देख सकोगी । स्काडी ने सोचा कि सबसे खूबसूरत पैर देवता बाल्डर के होंगे । दरअसल वो बाल्डर से ब्याह की इच्छुक भी थी, लेकिन उससे फैसला लेने में चूक हो गई , असल में देवताओं में सबसे खूबसूरत पैर समुद्र के देवता न्योर्ड के थे । शर्त के अनुसार ये स्काडी की मजबूरी थी कि वो न्योर्ड से ब्याह कर ले ।

स्काडी ने बदला ना लेने के लिए एक शर्त देवताओं के सामने रखी थी कि देवताओं को उसे हंसाना होगा तभी युद्ध टाला जा सकता है । शर्त को सुनकर देवता लोकी ने रस्सी का एक सिरा  बकरे की दाढ़ी में और दूसरा उसके अडंकोश मे बांध दिया , बकरा जब भी उछलता, लोकी चीखता चिल्लाता और स्काडी की गोद में जा गिरता । इस अभिनयात्मक कृत्य से स्काडी की हंसी फूट पड़ी । तभी देवता ओडिन ने असुर राज थियाजी की दोनों आंखे , आकाश में फेंक दीं जहां वो तारों की तरह से चमकने लगीं , इससे स्काडी को हार्दिक प्रसन्नता हुई और उसने बदले की भावना को छोड़कर समुद्र के देवता न्योर्ड  से ब्याह कर लिया ।

किन्तु आकर्षक असुर देवी स्काडी  और समुद्र के देवता न्योर्ड का ब्याह असफल हो गया क्योंकि न्योर्ड अपने समुद्र तटीय घर नोआतुन में रहना चाहता था , जहां उसे सीगल की आवाजें सुनाई दें जबकि स्काडी, पहाड़ों पर रहना चाहती थी जहां वो रात में , भेड़ियों की आवाजें सुन सके इसलिए दोनों का साथ रहना असंभव हो गया था । बहरहाल उन्होंने वैवाहिक संबंध बनाए रखने के जतन बतौर एक दूसरे के साथ , क्रमशः नौ , नौ दिन के अनुक्रम में , पहाड़ और समुद्र तट पर रहने का सुनिश्चय किया , यद्यपि यह व्यवस्था ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी और वे एक दूसरे से अलग अलग जीवन बिताने लगे ।

यह लोक आख्यान स्केन्डेनेवियाई देशों में बहुश्रुत और प्रचलित है । इस मिथक के अनुसार असुर और देवताओं की प्रतिद्वंदिता का परिणाम था कि असुर राज थियाजी की हत्या, देवताओं द्वारा कर दी गई थी । अगर हम स्केन्डेनेवियाई परिदृश्य की इस कथा को भारतीय परिदृश्य की तुलना में देखें तो देवताओं और असुरों की चिरपरिचित प्रतिद्वंदिता का साम्य , भू भौतिक विविधता के बावजूद बेहद दिलचस्प लगेगा । वर्तमान समय में मानवीय बसाहटों की दूरियों और सामाजिक , सांस्कृतिक वैविध्य के बावजूद देवताओं और असुरों की दुश्मनी का एक सूत्रीय कथन कहीं ना कहीं मनुष्यों की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक सह धार्मिक और संसाधनगत कब्जेदारियों की विरासत की वैमनस्य कथा से पूर्व के आदिम युगीन सामीप्य का उदघोष तो करता ही है ।

जन सामान्य में प्रचलित विश्वास यह है कि देवताओं द्वारा, अपनी स्वयंभू कुलीनता सह स्वर्ग पर आधिपत्य के श्रेष्ठी-बोध की धारणा के तहत असुरों को पाताल लोक में ढकेला गया और वे असुरों को निम्न वर्गीय सामाजिक संस्तरण मानते हैं जबकि असुर-गण, देवताओं की इस धारणा को मिथ्या सिद्ध करने के लिए बारम्बार देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ते हैं और अक्सर उन्हे स्वर्ग से बेदखल कर देने के नाम पर भयभीत भी करते है । ऐसा प्रतीत होता है कि असुर राज थियाजी की हत्या के बाद देवतागण युद्ध से बचना चाहते थे और उन्होंने स्काडी के सामने समझौते का प्रस्ताव किया जिसमें ब्याह के नाम पर वे स्वयं विचारित, स्वघोषित अभिजात्यता से नीचे झुककर असुर कुलीन युवती स्काडी को  किसी भी देवता से ब्याह करने का प्रस्ताव देते हैं । हालांकि इस प्रस्ताव में एक सामाजिक परंपरा और एक कपट शामिल था ।

सामाजिक परंपरा यह कि ब्याह के लिए स्त्रियां निचले कुल से भी लाई जा सकती हैं और कपट  यह कि स्काडी को पति स्वरूप देवता का चयन, केवल पैरों के सौन्दर्य के आधार पर करना था , उसे देवताओं का मुख या देह देखने की छूट नहीं दी गई थी । प्रतीकात्मक रूप से इस कथन से पति परमेश्वर के चरणों की दासी जैसा भाव बोध होता है । स्काडी को देवता बाल्डर से मोह था कदाचित उसने, उसे, कहीं, कभी, किसी अवसर पर देखा जरूर होगा । उसे प्रतीत हुआ कि सबसे सुंदर पैर भी बाल्डर के ही होंगे पर उसका अनुमान गलत सिद्ध हुआ । पैरों के सौन्दर्य के आधार पर चुना गया देवता न्योर्ड निकला  । कथनाशय यह है कि न्योर्ड, देवताओं का एक कूटनीतिक पांसा था जो बाल्डर से स्काडी के मोह को ध्वस्त कर गया ।

देवताओं की कूटनीतिक चरणकमल-वत नीति ने स्काडी को ऐसे बंधन में बांध दिया जो उसने सोचा भी नहीं था । बहरहाल ये नार्स मिथक संबंधों की टूटन पर समाप्त होता है क्योंकि न्योर्ड और स्काडी अलग बसाहटों, अलग अलग परवरिशों में समाजीकृत हुए थे । भारतीय संदर्भों में कुलीन देवता और असुर-गण एक ही पिता किन्तु दो भिन्न माताओं की संतान थे पर यह संकेत इस स्केन्डेनेवियाई मिथक मे स्पष्ट परिलक्षित नहीं होता । इसे आदिम युगीन लघु समाज के क्रमशः विस्तारित होते जाने और भिन्न भूभागों में बसाहट की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो आदिकालीन सामाजिक धार्मिक और विश्वासगत एक्य से यह अनुमान किया जा सकता है कि उक्त एक्य में कुलीनता आधारित संस्तरण का सूत्रपात, विमाताओं की परवरिश का परिणाम रहा होगा ।

बहरहाल वैवाहिक संबंध स्थापित करने की कूटनीतिक पहल ने उक्त कालखंड में, स्काडी और देवताओं के मध्य युद्ध को भले ही टाल दिया हो, पर वैमनस्य और कुलीनता आधारित ऊंच नीच के कथित विश्वास इन दोनों समुदायों के अंतस में गहरे पैठ चुके थे । कथा में उल्लिखित ब्याह भिन्न पर्यावासों और भिन्न संस्तरणात्मकताओं के कृत्रिम गठजोड़ जैसा था जिसे टूटना ही था और जो टूट गया । असुर राजकुमारी को इस ब्याह रूपी समझौते से, केवल मृत पिता की आंखों के सितारों जैसा चमकने का एहसास या आभास मिला पर उसका वैवाहिक जीवन विफल रहा और देव, असुर समझौता भी छलावा सिद्ध हुआ । स्काडी, देवता बाल्डर की पति रूप में कामना करती थी और उसे ब्याह से पूर्व न्योर्ड से कोई प्रेम नहीं था ।

स्काडी को पहाड़ों में गुर्राते भेड़ियों की आवाजे प्रिय थीं और न्योर्ड को समुद्र में गूंजती हुई सीगल की आवाजें मुग्ध करती थीं । वैवाहिक जीवन की निरन्तरता का उनका नौ, नौ दिवसीय क्रमिक प्रबंधन, अंततः ध्वस्त हो गया । कथा से यह निष्कर्ष निकलता है कि दाम्पत्य जीवन की सुखद परिणति के अवसर तभी बढ़ते हैं जब युगल द्वय में सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक और पर्यावासीय भिन्नता न्यूनतम हो अथवा एक समान । वे दोनों पूर्वजों की साम्यता के बावजूद एक दूसरे के शत्रु समाज की तरह से विकसित हुए थे अतः युद्ध टालने का कोई कृत्रिम समझौता, उन्हें स्थायी गठबंधन में रख ही नहीं सकता था । अतः देवता और असुर ही नहीं, बल्कि जनसामान्य में भी इस तरह के युद्ध होते ही रहेंगे । कथासार यह है कि देवताओं ने दुर्लभ और अनमोल संसाधनों पर एक पक्षीय तौर पर जो एकाधिकार बना लिया था वंचित असुर जन उसका विरोध करते ही रहेंगे... 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

इश्क़ ना पुच्छे दीन धरम नू

मुद्दतों पहले कश्मीर में सोडा राम अपनी पत्नि  के साथ रहता था जिसने उसकी ज़िंदगी नरक बना दी थी । पत्नि बात बात पर झगड़ा करती, वो बेहद अशालीन और घटिया लहजे में बात करती जिसकी वजह से सोडा राम लगभग अवसाद ग्रस्त  हो चला था पर उसके पास पत्नि से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था । दूसरी तरफ पत्नि उससे, हमेशा असन्तुष्ट बनी रहती । एक दिन उसने सोडा राम से कहा जाओ, राजा से दया की याचना करो और भिक्षा मांग कर लाओ । सोडा राम के लिए पत्नि की ये बात कुछ दिनों के लिए ही सही पर आजादी का द्वार खोलने जैसी लगी । वो फौरन लंबी यात्रा के लिए घर से बाहर निकल गया । मीलों पैदल चलने के बाद थोड़ा आराम करने के ख्याल से वो एक झरने के पास के पेड़ की छाया में आराम करने लगा । तभी उसे एक जहरीला सांप दिखाई दिया, जिसे पकड़ कर उसने अपने थैले में डाल लिया और एक कुटिल विचार के साथ वापस अपने घर की तरफ चल दिया । उसने सोचा कि अगर ये सांप पत्नि को डस लेगा तो उसे, उसके दुखों से हमेशा के लिए निजात मिल जाएगी ।

घर पर वापस आते ही उसने पत्नि से कहा, तुम्हारे लिए एक शानदार तोहफा लाया हूँ । उसे पूरी उम्मीद थी कि पत्नि जैसे ही थैले में हाथ डालेगी सांप का जहर उसे परलोक पहुंचा देगा। लेकिन पत्नि ने जैसे ही थैले में हाथ डाला, वहाँ एक सुंदर बच्चा मुस्करा रहा था । सोडा राम हैरान था पर उसके पास आँखन देखी पर विश्वास के सिवा कोई और विकल्प शेष नहीं था । उसने बच्चे का नाम, नाग राय रखा जो जल्द ही उनके परिवार में सुख और समृद्धि की वजह बन गया ।  एक रोज बच्चे ने जिद की कि वो उस झरने में नहाना चाहता है जहां से पालक  पिता उसे लेकर आया था । सोडा राम ना चाहते हुए भी उसे उसी झरने के पास ले आया । असल में यह झरना राजकुमारी हीमल का था जहां वो स्वयं भी स्नान किया करती थी। बालक नाग राय, सांप बन कर झरने की दरार के अंदर दाखिल हुआ और नहा कर वापस आ गया ।  लेकिन ये सिलसिला यहाँ पर रुका नहीं युवा होने तक नाग राय लगभग हरेक दिन नहाने के लिए उस झरने का इस्तेमाल करने लगा जोकि राजकुमारी हीमल का निजी स्नानागार था ।

हीमल को यह अंदाज हो गया था कि कोई व्यक्ति उसके झरने का इस्तेमाल कर रहा है । उसने झरने की निगरानी बढ़ा दी और एक दिन उसने नाग राय को ऐसा करते हुए देख लिया, उसने पाया कि वो एक बांका सजीला नौजवान है । उसे पहली ही नजर में नाग राय से इश्क हो गया । उसने नाग राय से कहा कि तुम मुझसे ब्याह कर लो । नाग राय ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया और फिर धूम धाम से उनकी शादी हो गई । उन दोनों के लिए झरने के करीब ही एक शानदार महल बनवाया गया जहां वे लोग सुख से रहने लगे । उधर पाताल लोक में नाग राय की नाग पत्नियाँ, नाग राय को ढूंढती फिर रही थीं । एक दिन उन्होंने नाग राय और हीमल को एक साथ रहते देखा । वो ईर्ष्या और क्रोध से भर गईं । उन्होंने इस गठबंधन को तोड़ने के लिए भोली भाली  हीमल के मन में शक के बीज बोना शुरू कर दिये । उन्होंने कहा तुम्हारा पति  पहले से शादी शुदा है और तुम्हारे लिए वफादार नहीं है । इतना ही नहीं उसके दूसरी युवतियों से भी नाजायज रिश्ते हैं । उन्होंने सुझाव दिया कि हीमल, नाग राय कि परीक्षा ले । उसे दूध से भरे कुंड में डुबकी लगाने कहे अगर वो चरित्रवान ब्राह्मण पुत्र होगा तो कुंड में डूबने लगेगा वरना तैर कर बाहर भागेगा ।

हीमल ने ऐसा ही किया, नाग राय इस साजिश को समझ गया लेकिन हीमल उसकी ना नुकुर से संतुष्ट नहीं हुई । मजबूरी में नाग राय जैसे ही दूधिया कुंड में उतरा उसकी नाग पत्नियों ने उसे घुटनों तक दूध कुंड में खींच लिया । नाग राय ने हीमल से कहा क्या वो संतुष्ट  है ? हीमल संतुष्ट नहीं थी । वो खामोश रही इसके बाद नाग राय की जांघे, सीना और चेहरा भी डूबता गया और जब तक हीमल कुछ समझ पाती वो सशरीर दूध के कुंड में डूब गया । यह देख कर हीमल  विलाप करने लगी । उसने अपनी पूरी सुख सुविधाओं  का परित्याग कर दिया और हर दिन नाग राय की प्रतीक्षा करने लगी । एक रोज एक बूढ़े ने उसे बताया कि झरने में एक युवक नहाने आता है जो असल में सांप है ।  हीमल ने सुबह से शाम तक इंतजार किया और शाम को नाग राय को देखते ही उसके कदमों से लिपट गई । उसने कहा तुम जहां भी रहते हो मुझे अपने साथ ले चलों । नाग राय उसे प्रेम करता था, तो कंकड़ बनाकर पाताल लोक ले गया लेकिन उसकी नाग पत्नियाँ समझ गईं कि ये हीमल है । उन्होंने हीमल को प्रताड़ित करते हुए अपने बच्चों की हत्या करने का आरोप लगाया और मार डाला ।

हीमल की मौत के बाद नाग राय शोक संतप्त होकर पागलों की तरह से व्यवहार करने लगा । वो हीमल की चिता नहीं जलाना चाहता था । वो उसके जिस्म को पाताल लोक से बाहर, झरने की दुनिया में लेकर आया और उसके जिस्म को जादुई लेप से संरक्षित करते हुए एक दरख्त के नीचे रख दिया । वो हर एक दिन हीमल के शव के पास आता और शोक मनाता । एक रोज हीमल का जिस्म उस पेड़ के नीचे नहीं मिला तो वो उसे ढूँढने लगा । असल में हीमल को एक साधु ने फिर से जिंदा कर दिया था।बेचैन नाग राय उसे ढूँढता रहा, एक रोज वो सांप बनकर हीमल को ढूंढ रहा था तो साधु के बेटे ने उसे इस आशंका से मार डाला कि वो हीमल को डस ना ले । उधर हीमल साधु के संरक्षण में चैन से सो रही थी और जब वो नींद से जागी तब तक नाग राय की मौत हो चुकी थी । घटनाक्रम से दु:खी होकर हीमल ने नाग राय की चिता में ही जौहर कर लिया ।

यह मिथक प्रथम दृष्टया सतही तौर पर नागों और इंसानों की सर्वथा भिन्न प्रजातियों, देहों के मध्य प्रेम के पलने, पनपने और अपनी सुविधा के अनुसार काया बदल सकने की क्षमताओं के होने का कथन  करता है । इसे बांचते हुए जहरीले और गैर जहरीले जिस्मों के सहज सहअस्तित्व के संकेत मिलते हैं । अन्य भारतीय आख्यानों की तरह इंसानों का भूलोक में रहवास और नागों का पाताल लोक निवासी होना सामाजिक जीवन और विभाजन के कम-ओ-बेश दैवीयता और दानवीयता जैसे उच्च और निम्न स्तरीय विभाजन का प्रातीतिक कथन करता है । यह कथन किसी ज्ञानी, ऋषि की भिन्न पत्नियों के सौतेले भाइयों के अभिजात्य और अधम होने के निरंतर संघर्ष के दृष्टान्तों के मध्य यदा कदा पनपने वाले परम प्रेम, वैवाहिक संबंधों की अनुभूति कराता है । मसलन अर्जुन और नाग कन्या उलूपी , भीम और असुर हिडिंबा के किस्सों  के उलट नाग राय और हीमल ।

आख्यान की शुरुआत पत्नि पीड़ित सोडा राम के व्यथा कथन से होती है । सोडा राम का दु:ख चरम पर है और वो अपनी पत्नि की मृत्यु अथवा उससे येन केन प्रकारेण मुक्ति के सिवा कोई दूसरी बात सोचता ही नहीं है । वर्ण व्यवस्था के मानकों के अंतर्गत वो एक ब्राह्मण है और उसे ज्ञानी होना चाहिए पर कथा उसके धर्म और जातीयता से इतर उसकी निर्धनता, दम घोंटू दाम्पत्य जीवन और नि:सन्तानता पर विशेष रूप से मुखरित होती है । कहने का तात्पर्य यह है कि वर्ण, धर्म और जातीयता, स्त्री पुरुष के सहज रहवास, सहवास, संतति की अपरिहार्यता और आर्थिक विपन्नता के मुकाबिले में पिछड़ जाती है , कदाचित हाशिये मे चली जाती है । बहरहाल आर्थिक विपन्नता को दूर करने के लिए धन, वैभव सम्पन्न वर्ग से याचना का सुझाव पत्नि देती है और पति इसे सामयिक राहत का संकेत मानकर प्रसन्न है कि कम से कम यात्रा की अवधि में वो, अपनी पत्नि के असहज और क्रूर व्यवहार से मुक्ति पा लेगा ।

सोडा राम की लंबी और थकाऊ पैदल यात्रा के दौरान झरने का किनारा और दरख्त की छाया विश्राम करने के लिए सर्वथा उपयुक्त स्थल है पर यह आख्यान, इस स्थल का प्रातीतिक उपयोग जहरीले नाग के बसेरे की तरह से करता है। जिसे सोडा राम अपने सुखद, सहज भावी जीवन लिए सुअवसर की तरह से इस्तेमाल करना चाहता है । कथनाशय यह है कि सोडा राम, अपनी पत्नि से आकंठ पीड़ित है और उससे शत्रुता की सीमा तक घृणा करता है । वो दरार से प्रकटित हुए नाग को पकड़ लेता है और झोले मे डाल कर पत्नि की जहरीली किन्तु नैसर्गिक दिखने वाली मृत्यु की कामना करता है । यानि कि वो चाहता है कि समाज यह मान ले कि नाग के दंश से होने वाली मृत्यु एक प्राकृतिक दुर्योग मात्र है जिसके लिए सोडा राम या उसके द्वारा की गई, कोई मार पीट कदापि उत्तरदाई नहीं है । सच कहें तो कथा का ये संकेत बेहद दिलचस्प है जहां हत्या के प्रयास से पहले, स्वयं के उत्तरदायी नहीं होने का तर्क गढ़ा जाता है ।

सोडा राम, धन की याचना के उद्देश्य को तिलांजलि देकर वापस घर लौट आता है । उसकी प्राथमिकता स्पष्ट है । वो भिक्षा में मिले धन की तुलना में पीड़ा देने वाली पत्नि की मृत्यु अर्थात असहज रहवास, सहवास से मुक्ति का मार्ग पहले चुनता है । बहरहाल आख्यान कहता है कि सोडा राम को वधिक होने से पहले पिता होने की आवश्यकता है । क्या यह संभव नहीं कि सोडा राम अपनी पत्नि की नाग दंश से होने वाली मृत्यु की कामना के बजाए, संयोगवश रास्ते मे मिली एक संतान का उपहार लेकर लौटा हो जिससे उसकी पत्नि का मातृत्व भाव जागृत हो और स्वभाव की कटुता में कमी आए ? वो नाग पुत्र जो उनके परिवार में संपन्नता भी लाता है । मिथक में नाग के शिशु अथवा युवा हो जाने और फिर से नाग या मनुष्य होते रहने की कायिक बारंबारता स्पष्ट परिलक्षित है किन्तु इसे सीधे सपाट शाब्दिक अर्थों के बजाए समाज विज्ञानियों और नृतत्ववेत्ताओं के दृष्ठिकोणों से भी समझा जाना चाहिए ।

सोडा राम का ब्राह्मण होना, वर्ण कुलीनता के आशय में और नाग राय का नागवंशी होना नाग टोटम, नाग गण चिन्ह से जोड़ कर देखें तो नाग राय, विशुद्ध रूप से रंगने वाला नाग नहीं बल्कि नाग गोत्र, नाग समाज का शिशु या युवा माना जाएगा । इसे ऋषि कश्यप की अनेकों पत्नियों मे से अदिति के देव पुत्रों और दिती के दानव पुत्रों के स्वभाव, खान पान, वेशभूषा, राज्य सत्ता, संपन्नता के अंतर की तरह से पेश नहीं किया जा सकता । अदिति  और दिती एक ही पिता की संतान होने के नाते परस्पर बहने थीं और देवता तथा दानव माने गए सभी पुत्र एक ही पिता की संतान थे । उनकी संपन्नता और विपन्नता के साथ ही साथ स्वभावगत सज्जनता और दुष्टता के गलेमराइज्ड और चित्रमय  प्रदर्शन से यह खाई भले ही गहरी प्रतीत होती हो पर उनकी स्वजनता, बंधुत्व के सूत्र एक ही हैं । बस यही संकेत, नाग राय और राजकुमारी हीमल को मनुष्य होने की श्रेणी में रखता है उनमे से कोई भी रेंगने वाला जीव नहीं है । इस संकेत के आधार पर नाग सदृश्य मुकुट और स्वर्ण मुकुट मात्र वेशभूषा के अंतर माने जाने चाहिए ।

गोत्रज भिन्नता और सामाजिक रहवास, प्रेम और विवाह के अनुकूल अथवा प्रतिकूल भी हो सकते है किन्तु यह निश्चित है कि कथा कालीन समाज बहुविवाही समाज था । हीमल से पहले नाग राय की एकाधिक पत्नियां थीं और वे उसके अपने नाग गोत्र या समाज की सदस्य थीं यानि कि सजातीय पत्नियां। हीमल के स्नानागार में चुपके से स्नान करना नाग राय का प्रणय प्रयास माना जा सकता है । उसकी सजातीय पत्नियां उसकी पारिवारिक अनुपस्थति से असहज होकर उसे ढूंढ रही थीं और खोज की सफलता के उपरांत, उसके विजातीय नव दांपत्य जीवन से क्रुद्ध और ईर्ष्यालु हो गईं थीं, जिसकी परिणति नाग राय की मृत्यु और अंततः हीमल के जौहर पर हो जाती है । कथा कहती है कि नाग राय की पत्नियां हीमल को मार डालती हैं । संभव है यह बेसुध होने से उपजी मृत्यु जैसा भ्रम हो जिसकी पुनरावृत्ति ज्ञानी साधु के हस्तक्षेप से होती है । इसी प्रकार से यह भी संभव है कि नाग राय की मृत्यु उसकी नागोचित वेश भूषा के कारण हुई हो ?

इस कथा के अनुसार राजकुमारी हीमल, नाग राय से स्वयं ही प्रणय निवेदन करती है यानि कि उक्त समाज में स्त्रियां प्रणय निवेदन की पहल का अधिकार रखती थीं । आवासीय दृष्टि से नाग राय का खंदक, खोह, दरार, पाताल निवासी होना गरीबों के झोंपड़ों, निचली बस्तियों से,साम्य रखता है और हीमल का महल,धनाढ्य पूंजीवादी अट्टालिकाओं जैसा, पर प्रेम के आगे धन का कोई मोल नहीं । इससे आगे यह भी कि  इश्क़ ना पुच्छे दीन धरम नू, इश्क़ ना पुच्छे जातां, इश्क़ दे हाथों गरम लहू विच, डुबियां लख बरातां, के जैसा...

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

सिगर्ड और ब्रिनहिल्ड

ड्रैगन फफ़्निर को मारने के बाद सिगर्ड एक नायक की तरह से प्रसिद्ध हो गया था ।  कुछ समय के बाद उसने वाल्किरी, ब्रिनहिल्ड को आग में घिरे हुए महल से बचाया था । खूबसूरत ब्रिनहिल्ड को ओडिन द्वारा दंड स्वरूप कैद किया गया था । कैद से मुक्त हुई ब्रिनहिल्ड को सिगर्ड से मुहब्बत हो गई और सिगर्ड भी उसके सौन्दर्यपाश मे बंध गया । दोनों ने एक दूसरे से ब्याह का वादा किया लेकिन उन्ही दिनों सिगर्ड को छल से एक जादुई शर्बत पिला दिया जाता है और वो अपने अतीत को भूलकर राजा गिउकी की बेटी गुड्रुन से ब्याह कर लेता है । सिगर्ड की बेवफाई से आहत होकर ब्रिनहिल्ड यह घोषणा करती है कि वो, उस पुरुष से ब्याह करेगी, जो शक्ति और साहस के मामले में, उससे बेहतर प्रदर्शन करेगा ।

 

इधर जादुई शर्बत की वजह से याददाश्त खो चुका सिगर्ड, गुड्रुन के भाइयों को खुश करने की कोशिश के तहत गुन्नार बन कर ब्रिनहिल्ड का हाथ जीतने में उसकी मदद करता है तथा उससे शादी करवा देता है । इधर ब्रिनहिल्ड इस सत्य से अनजान थी कि सिगर्ड स्वयं ही जादुई छलावे का शिकार हो चुका है । ब्रिनहिल्ड को लगता है कि सिगर्ड ने उसके साथ दोबारा धोखा किया है और अपने साले गुन्नार से उसका ब्याह छल पूर्वक करवा दिया है तो वो गुड्रुन के भाइयों की मदद से ही सिगर्ड की हत्या करवा देती है और अंतिम संस्कार के समय मृत सिगर्ड की चिता में बैठ कर खुद भी आत्महत्या कर लेती है ।

 

यह दु:खद प्रेम कथाओं मे से, एक है । इस आख्यान के अनेकों संस्करण है जिनमे से नॉर्स और जर्मनिक स्रोतों के मिथक ज्यादा कहे और सुने जाते हैं । इस कथा में प्रेम है और विश्वासघात भी । इसके इतर कतिपय जादुई कृत्यों के आधार पर भाग्य निर्धारण के कथन भी । कथा की खूबसूरत नायिका ब्रिनहिल्ड, देवता ओडिन की अवहेलना के दंड स्वरूप जलते हुए महल में कैद है , वो नायक सिगर्ड के पराक्रम से मुक्त होती है , नायक जिसकी वीरता और ख्याति में ड्रैगन फफ़्निर की हत्या के सितारे जड़े हुए हैं । बहरहाल कथा का नायक सिगर्ड , नायिका ब्रिनहिल्ड की  देह यष्टि और सौन्दर्य का मुरीद है तथा ब्रिनहिल्ड, सिगर्ड के साहस और वीरता की ।

 

देवता द्वारा तयशुदा अंतहीन कैद से मुक्ति के बाद, खुली हवा में सांस लेते ही बलशाली सिगर्ड के साथ जीवन गुजारने की लालसा ब्रिनहिल्ड में जागना ही थी । आख्यान कहता है कि वो दोनों एक दूसरे को ब्याह का वचन देते हैं किन्तु एक जादुई कृत्य, तरल पेय पदार्थ  का सेवन, नायक का अतीत विलोपित करने मे सफल हो जाता है और नायक सिगर्ड, नायिका ब्रिनहिल्ड से की गई वैवाहिक वचनबद्धता को भूलकर राजा की बेटी से ब्याह कर लेता है । नायिका के वास्तविक जीवन में यह पहला धोखा था जो स्वयं उसके प्रेमी ने दिया था, भले ही इस धोखे के लिए जादुई कृत्य की सांकेतिकता का उल्लेख किया गया हो । किन्तु प्रश्न यह भी पूछा जा सकता है कि, क्या यह संभव नहीं कि राजा जैसे कुलीन परिवार में ब्याह करना सिगर्ड ने स्वयं ही चुना हो ?

 

प्रेम में विश्वासघात जैसे यकीन के साथ जीवन जी रही ब्रिनहिल्ड, कथित जादुई कृत्य से अनभिज्ञ है और वो किसी अन्य पराक्रमी योद्धा से ब्याह की सशर्त घोषणा करती है । सिगर्ड अपने नवदाम्पत्य से तादात्म्य स्थापित करने की कोशिश में, अपने ही साले गुन्नार से ब्रिनहिल्ड का ब्याह करवा देता है । यह दूसरा छल था जिससे आहत ब्रिनहिल्ड अपने ही पूर्व प्रेमी की हत्या का संकल्प ले लेती है , भले ही वो उसका प्रथम स्वप्न था । अंततः

जिस परिवार के लिए सिगर्ड ने जाने या अनजाने मे ही ब्रिनहिल्ड को मानसिक चोट पहुंचाई थी । उसी परिवार की मदद से वो सिगर्ड को मृत्यु दंड दे देती है । यह एक दु:खी युवती का प्रतिकार था । जिसने प्रेम में बारम्बार चोट खाई थी ।

 

ब्रिनहिल्ड छल के प्रतिशोध स्वरूप मृत्यु दंड को चुनती है । उन हाथों को चुनती है , जिन्होंने उसके प्रेमी को उससे छीन लिया था । यह मिथक, नायिका के प्रतिकार पर समाप्त नहीं होता बल्कि एक समर्पित प्रेयसी या पत्नि की तरह से सिगर्ड की मृत देह के निकट अंतिम संस्कार के समय आत्मघात कर लेना, प्रतीकात्मक रूप से राजपूताने की स्त्रियों की जौहर गाथा जैसा लगता है । संभव है कि कथा को बाँचते समय यह तथ्य याद रह जाए कि राजपूताने में बहुपत्नियों का सहअस्तित्व सहज स्वीकार्य है , जबकि ब्रिनहिल्ड पत्नियों की बहुलता में विश्वास नहीं रखती, ऐसा प्रतीत होता है ।