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मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

मैंने रखा है मुहब्बत...2


उस रोज़ लकड़हारे ने घायल हिरण को शिकारी के चंगुल से बचाया था । अहसानमंद हिरण ने लकड़हारे को बताया कि हरेक महीने के एक ख़ास दिन परियां, जंगल के तालाब में नहाने के लिए आया करती हैं और अगर लकड़हारा चाहे तो उनसे शादी भी कर सकता है । हिरण ने लकड़हारे से कहा कि वो तालाब के पास छुप कर परियों का इंतज़ार करे और फिर उनमें से किसी एक के पंख चोरी कर लेऔर उन्हें ऐसी जगह छुपा दे जो किसी को पता ना हो । हिरण ने लकड़हारे से यह भी कहा कि पंख, परियों की धरती में आमद और स्वर्ग वापसी का एक मात्र ज़रिया होते हैं सो पंख चोरी की ज़द में आई परी स्वर्ग वापस नहीं जा पायेगी । इसके बाद लकड़हारा मदद की पेशकश के साथ, उस परी को अपनी ब्याहता बना सकता है ।

हिरण ने लकड़हारे को ख़ास तौर पर यह ताकीद की, कि कम से कम तीन बच्चे होने तक वो पंख चोरी का राज़ अपनी पत्नि को ना बताये वर्ना परी उसे छोड़ कर स्वर्ग वापस चली जायेगी । जैसा हिरण ने कहा था लकड़हारे ने वैसा ही किया, फिर हुआ ये कि हिरण की सलाह के मुताबिक़ लकड़हारे ने अपने लिए परी पत्नि का इंतजाम कर लिया । बहरहाल ये शादी लकड़हारे की नज़र में बेहद खुशहाल और कामयाब शादी थी, सो वो अपनी पत्नि की सोहबत के लिए बेहद मुतमईन हो गया था और उसने हिरण की, तीसरे बच्चे की पैदाइश तक पंख चोरी की गोपनीयता बनाये रखने वाली सलाह से मुंह मोड़ते हुए, अपनी परी पत्नि को छुपाये हुए पंख दिखला दिये । पंख मिलते ही परी अपने दोनों बच्चों सहित स्वर्ग वापस चली गई ।

लकड़हारा अपनी गलती पर मायूस और शर्मिन्दा था पर...उसके पास इस अनपेक्षित घटनाक्रम से निपटने के लिए हिरण से बढ़कर कोई दूसरा सलाहकार भी नहीं था । हिरण ने लकड़हारे को जादुई फलियां दीं जिनकी मदद से लकड़हारा नश्वर मनुष्यों के लिए निर्धारित, अनेकों बाधायें पार करता हुआ स्वर्ग जा पहुंचा और उसे उसका परिवार दोबारा मिल गया । लेकिन मुश्किल ये थी कि लकड़हारे की बीमार मां धरती पर अकेली रह गई थी और लकड़हारे को उसकी फ़िक्र हो चली थी । लकड़हारे की फ़िक्र से हमदर्दी जताते हुए पत्नी ने उसे उड़ने वाला घोड़ा दिया ताकि वो धरती पर जाकर अपनी मां को लेकर स्वर्ग वापस आ जाये । पत्नि ने उसे यह भी कहा कि घोड़े से किसी भी हालत में अलग मत होना वर्ना स्वर्ग वापसी असंभव हो जायेगी ।

इस यात्रा के दौरान हुआ ये कि लकड़हारे ने गलती से अपनी मां की गर्म खिचडी घोड़े की पीठ पर छलका दी । घोड़ा उड़ने के लिए तैयार था । उसने अपने दोनों अगले पैर आकाश की ओर उठा लिए थे । लकड़हारे ने घोड़े की पीठ पर हल्की सी थपकी दी ताकि वो धीरज रखे पर घोड़े ने इसे रवानगी का संकेत समझा और स्वर्ग की ओर उड़ गया ।  लकड़हारा एक बार फिर से अकेला ही रह गया, धरती पर अपनी पत्नि और बच्चों के बिना । कहते हैं कि पत्नि के बिछोह से दुखी लकड़हारा कुछ अरसे बाद मुर्गे में तब्दील हो गया जो आसमान की ओर मुंह उठा कर चीखता है । अपने दुःख को अभिव्यक्त करता, मारा मारा फिरता है ।

ज़ाहिर है कि लकड़हारा निर्धन किन्तु सदाशय व्यक्ति था सो उसने घायल हिरण की जान बचाई । वो अपनी बूढ़ी और बीमार मां के साथ रहता था और उसकी शादी भी नहीं हुई थी । संभव है कि उस समय पशु पक्षियों और इंसानों की जागतिक अन्योनाश्रितता तथा सम्बन्ध, श्रेष्ठतम पायदान पर रहे होंगे । आख्यान का हिरण, दैवीय रूप से सक्षम और लकड़हारे को समुचित मार्गदर्शन देने की स्थिति में दिखाईं देता है । सो कह नहीं सकते कि हिरण का घायल होना और प्राण बचाने की एवज़ में लकड़हारे का अहसानमंद हो जाना, प्रतीकात्मक रूप से हिरण को हिरण ही बना रहने देगा । निश्चय ही कथा का यह पशु पात्र, हिरण केवल पशु पात्र नहीं है बल्कि उसे निर्धन लकड़हारे के शुभचिन्तक और मददगार दैवीय शक्ति के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए

कथा का नायक आर्थिक दृष्टि से समाज के निम्नतम तबके से ताल्लुक रखता है और उसमें सामान्य लोगों के जैसी चिंतायें हैं, वो सहज विश्वास करता है और फिर अपने निर्णयों पर पछताता है, उसकी सामान्यतायें / सहजतायें, उसकी असाधारण उपलब्धियों पर धूल डाल देती हैं । वो जीना चाहता है प्रेम के साथ, विश्वास और सदाशयता के साथ । पर उसका साधारण होना, सामाजिक  अभिजात्यता की गति से एक लय नहीं हो पाता और वो हमेशा वंचित हो जाता है, उस सुख से जो उसकी मुट्ठी से रेत सा फिसल गया हो । कहने को ये कथा कोरियाई द्वीप की है किन्तु एक सामान्य सा श्रोता भी इस जैसी अंतर्वस्तु वाली सैकड़ों गाथायें, भारतीय उपमहाद्वीप में खोज निकालेगा । कहन का मंतव्य ये है कि जन सामान्य के सपने, समूची दुनिया में कम-ओ-बेश एक जैसे होते हैं ।


बुधवार, 20 दिसंबर 2017

मगरमच्छ

सदियों पहले की बात है जब कि मगरमच्छों की त्वचा मुलायम और सुनहरी रंगत लिये होती थी क्योंकि वे, दिन तमाम दलदल  में रहते और रात में ही बाहर निकला करते ! तब दिन में जितने भी पशु पक्षी बाहर घूमते फिरते, वे सभी मगरमच्छों की सुनहरी त्वचा की तारीफ़ किया करते ! कहते हैं कि अपनी रंगत की तारीफ़ सुन सुन कर मगरमच्छों को घमंड हो गया और वे धूप सेकने के बहाने से दिन में भी दलदलों से बाहर आने लगे ताकि दूसरे जानवरों से अपनी सुनहरी त्वचा की और भी ज्यादा तारीफ सुन सकें ! तारीफ का लालच उन्हें, तेज चमकते सूरज वाले दिनों में भी, दलदल से बाहर ले आता ! 

धीरे धीरे उन्हें यह विश्वास होने लगा कि वे दूसरे जानवरों से बेहतर हैं सो वे दूसरे जानवरों पर हुक्म चलाते / दादागिरी दिखाते  हुए घूमने लगे ! मगरमच्छों के इस बदले हुए रवैय्ये से अन्य जानवर उकताने लगे थे, इसलिए मगरमच्छों की त्वचा देखने वाले जानवरों की संख्या दिन-ब-दिन घटने लगी थी ! बहरहाल हर एक दिन तेज चमकते सूरज के सामने अपनी त्वचा को उजागर करने के कारण से मगरमच्छों की त्वचा, भद्दी, मोटी और ऊबड़ खाबड़ होने लगी थी...और फिर जल्द ही ऐसा लगने लगा कि जैसे मगरमच्छों ने बख्तरबंद / कवच पहन रखा हो !
त्वचा की ख़ूबसूरती को खो बैठने की ज़िल्लत / अपमानजनक हालत से वे आज तक नहीं उबर पाए हैं और आज कल, अन्य जानवरों और मनुष्यों की पहुंच / निगाहों से दूर पानी में छुप कर रहते हैं ! उनकी शर्मिंदगी का आलम ये है कि पानी की सतह के ऊपर सिर्फ उनकी आँखे और नथुने ही देखे जा सकते हैं...
यह आख्यान नामीबियाई वाचिक परम्परा का हिस्सा है ! कथा को बांचने से प्रथम दृष्टया यह आभास होता है कि ये कहानी पूरी तरह से मगरमच्छों को संबोधित है, जिसमें उनकी त्वचा की रंगत तथा बनावट में परिवर्तन के बहाने, उनके पर्यावास और अन्य जीव जंतुओं, यहां तक कि मनुष्यों से दूरी बनाए रखने के कारणों का उल्लेख किया गया है ! प्रतीत होता है कि मगरमच्छों की देह रचना के भद्देपन और कुरूपता के लिये मगरमच्छ स्वयं ही उत्तरदाई हैं, अन्यथा नैसर्गिक तौर पर, वे बेहद खूबसूरत स्वर्णिम आभायुक्त, मुलायम त्वचा वाले जीव हुआ करते थे !
पूरी दुनिया में घडियाली आंसू और मोटी चमड़ी के साथ ही साथ भयावह जबड़ों के लिये ख्यात / कुख्यात मगरमच्छ...यह कहना कठिन है कि वे पिछली कितनी शताब्दियों से इन्हीं आशयों में, मनुष्यों के स्वभाव / चरित्र और व्यक्तित्व को विश्लेषित तथा  वर्गीकृत किये जाने का माध्यम बने हुए हैं, अतः बड़ी सम्भावना यह है कि ये जनश्रुति वास्तव में मगरमच्छों को संबोधित नहीं है बल्कि उनके हवाले से मनुष्यों को संबोधित है ! कहन निहितार्थ  यह है कि मनुष्यों में, घडियाली आंसू बहाने वाले, मोटी चमड़ी वाले और भयावह जबड़ों जैसी हिंसक प्रवृत्ति वाले श्रेणीदार  / वर्गवार विभाजन मौजूद हैं !   
इस कथा को उसके प्रातीतिक अर्थों में देखा जाए तो वो, समाज में मनुष्यों के स्व / आत्म / व्यक्तित्व को संबोधित करने वाली सुस्पष्ट कहन बन जाती है ! जब कथा कहती है कि पहले पहल मगरमच्छ सुनहली देहयष्टि के मालिक थे और अन्य जीवधारी उनकी प्रशंसा किया करते थे, तो इसका एक आशय यह भी हुआ कि पहले पहल मनुष्य प्रशंसा के योग्य व्यक्तित्व और कृतित्व के मालिक हुआ करते होंगे और फिर कालांतर में आत्म प्रशंसा / चाटुकारिता प्रिय होते गये होंगे ! ये कहना बिलकुल भी कठिन नहीं है कि चाटुकार प्रियता मनुष्य की सबसे बड़ी निर्बलता है,जो आत्मश्लाघा / दादागिरी की हद तक अभिव्यक्त हो सकती है, ठीक वैसे ही जैसे कि जनश्रुति के मगरमच्छों के साथ हुआ !   
प्रारंभिक मनुष्यों ने समाज में नियमों / अनुशासन के सौंदर्य के साथ बंध कर रहना सीखा होगा और फिर आत्मस्तुति जैसी प्रवृत्ति ने उन्हें अनुशासन तोडक / बर्बर / बड़बोला बना डाला होगा, जैसे सांकेतिक अर्थ के साथ, इस जनश्रुति को पढ़ना रुचिकर लगता है ! नि:संदेह कथा के मगरमच्छों का छुप कर रहना, अपने ही कारणों से सर्वस्व लुट जाने / पोल खुल जाने के बाद के मनुष्यों के मुंह छुपाने जैसा कथन है ! उचित हो जो हम इसे मनुष्यों का अपराध बोध मान लें !         

रविवार, 6 अगस्त 2017

आकाश नद

जब सृष्टि का सृजन अपने आरंभिक दौर में था, तब आकाश में तारे बहुत कम थे ! उन दिनों चेरोकी लोग भोजन के लिये मक्के की फसल पर निर्भर थे ! वे खेत से फसल काटने के बाद उसे सुखाते और फिर लकड़ी की बड़ी सी ओखली और मूसल की मदद से दाने दाने अलग कर के, बांस की बड़ी टोकरियों में सुरक्षित रख लेते ताकि सर्दियों में उनसे रोटियां बनाई जा सकें ! एक सुबह जब एक वृद्ध दंपत्ति अपने भण्डार कक्ष में गये ताकि वहां से मक्के का आटा निकाल सकें ! उन्हें लगा कि पिछली रात वहां कोई आया था ! वे इस घटना से बहुत परेशान हो गये क्योंकि इससे पहले चेरोकी गांव में चोरी की कोई घटना नहीं घटी थी ! उन्होंने देखा कि भण्डार कक्ष अस्तव्यस्त था और मक्के का आटा इधर उधर बिखरा हुआ था, जिसमें कुत्ते के पंजों के निशान दिखाई दे रहे थे !

निशान इतने बड़े थे कि उन्हें सामान्य कुत्ते के पंजे के निशान नहीं माना जा सकता था ! गांव के लोगों ने पंचायत में इस विषय में चर्चा की और लोगों को सावधान रहने की चेतावनी ज़ारी कर दी गई ! उन्हें पूरा विश्वास था कि ये कुत्ते की आत्मा रही होगी, जिसे डरा धमका कर गांव से भगा दिया जाना चाहिए ताकि वो फिर कभी वापस ना लौटे ! उन्होंने ढ़ोल और कछुवे के खोल वाले झुनझुने इकट्ठे किये और रात में उस जगह के आस पास छुप गये जहां पर चोरी की घटना घटी थी ! देर रात उन्होंने ढ़ेरों  चिड़ियों के पंख फड़फड़ाने जैसी आवाजें सुनी, उन्होंने देखा कि एक भीमकाय कुत्ता आकाश से नीचे, धरती की ओर झपट रहा है ! वो भण्डार कक्ष में आटे की टोकरी के पास उतरा और उसने अपने विशालकाय मुंह में भर भर कर आटा खाना शुरू कर दिया !

उसी समय लोगों ने ढ़ोल बजाना और शोर मचाना शुरू कर दिया! शोर इतना तेज था, जैसे कि आकाश में बिजलियां कड़क रही हों! कुत्ता वापस मुड़ा और सड़क पर भागने लगा ! लोग जितना भी तेज शोर कर सकते थे उतना ही करते हुए कुत्ते का पीछा करने लगे ! कुत्ता भागते हुए पहाड़ की चोटी पर जा पहुंचा और वहां से उसने वापस आकाश में छलांग लगा दी !  इस दौरान कुत्ते के मुंह के दोनों तरफ से मक्के का आटा आकाश में बिखर रहा था ! बहरहाल वो कुत्ता आकाश में अन्तर्ध्यान हो गया, लेकिन उसके मुंह से बिखरे हुए आटे का हर एक कण, एक तारा बन गया ! आकाश में बिखरे हुए, आटे का स्वरुप, तारों की एक विशाल नदी के जैसा था, यानि कि तारों भरा आकाश नद ! चेरोकी लोग कहते हैं कि ये वो रास्ता है, जहां से कुत्ता भागा था ! 

कथा सृजन का समय निश्चित रूप से चेरोकी समुदाय के खेतिहर हो जाने का समय है, जबकि वे लोग मक्के की फसल उगाते और तब उन्हें, सर्दियों के कठिन समय के लिये, फसल के भण्डारण और संरक्षण का, आरंभिक तकनीकी ज्ञान था ! आख्यान कहता है कि चेरोकी गांव में चोरी की घटना परेशान करने वाली थी,यानि कि चेरोकी लोगों को चोरी जैसे असामाजिक / आपराधिक कृत्य का कोई पूर्व अनुभव नहीं था ! उनके लिये यह असहज समय था, उनके समुदाय के लिये नितांत अस्वीकार्य घटनाक्रम, जिसके विरुद्ध पूरे गांव का एकजुट हो जाना महत्वपूर्ण है ! उस गांव में पंचायत की मौजूदगी, विषय विचारण के लिये न्यायालय जैसी और संकट के समाधान के लिये कार्यपालिका के जैसी थी ! उन सभी ने चोरी के लिये जिम्मेदार ठहराई गई कुत्ते की आत्मा से एक साथ जूझने का निश्चय किया, वे चोरी की पुनरावृत्ति और चोर के पुनरागमन को रोकने के लिये कृत संकल्प थे !

चेरोकी लोगों का अस्तित्व इस बात पर निर्भर था कि वे मक्के की फसल का सदुपयोग करें, इस कथा में सांकेतिक रूप से प्रस्तुत कथन यह कि मक्का, चेरोकी जीवन की संजीवनी है ! आधार तत्व है...सो तारों की उत्पत्ति, उनके जीवन चक्र और अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों सह आकाशीय संरचनाओं के अस्तित्व के लिये भी, उसे ही उत्तरदाई होना चाहिए ! धरती और आकाशीय जीवन के लिये उत्तरदाई, एक ही तत्व की कल्पनाशीलता अद्भुत है ! संभव है कि मक्के के सूखते / फूटते दानों की चमक और तारों की चमक में साम्यता का आभास इस कहन की पृष्ठभूमि में मौजूद हो, इसके अतिरिक्त ध्यान रखने योग्य कथन यह कि कुत्ते की आत्मा, आकाश से धरती पर उतरती है, लेकिन संकट में पड़ जाने की स्थिति में भागते हुए, उसे पहाड़ की ऊंचाई का सहारा है, जहां से, वो वापस ऊंचे आकाश में उड़ान भर सकती है, गज़ब का विचार है...    

सोमवार, 22 जुलाई 2013

हरित वर्ण रेशमी परिधान...!

वो गर्मियों के दिन थे , जबकि नौजवान अध्येता ‘यू’ शांतिपूर्वक अध्ययन कर पाने के ख्याल से पहाड़ी वाले मंदिर में जा पहुंचा, वहां उसने कई दिन और रात लगातार सुकून भरे माहौल में अध्ययन करते हुए गुज़ारे...अब वो थकने लगा था ! एक रात वह अपनी टेबिल पर ही हाथों का सिरहाना बना कर सो गया...असावधानी वश थोड़ी सी स्याही उसकी टेबिल पर बिखर गई थी ! वह गहरी नींद में था , सो ज़ल्द ही , उसके ख्वाब जाग उट्ठे ! उसे लगा कि हरित वर्ण के शानदार रेशमी परिधान पहने हुए एक खूबसूरत युवती , उससे मदद की गुहार कर रही है ! वो युवती ‘यू’ पर झुकते हुए गिड़गिड़ाई , कृपया मेरी मदद करो, शायद...खतरे में फंसी हुई युवती की आखिरी चीख सुनकर वह जागा और उसने अपने चारों तरफ देखा , वहां कुछ भी नहीं था !

बस एक भिनभिनाहट...जो खिड़की के बाहर मकड़ी के जाले में फंसी हुई मधुमक्खी कर रही थी ! मधुमक्खी के जीवन के ये अंतिम क्षण ही रहे होंगे , मकड़ी बस उसे अपना आहार बनाने ही वाली थी कि ‘यू’ ने खिड़की खोल कर , उस जाले के ऊपर झूलती हुई शाख से एक पत्ता तोड़ कर मकड़ी को दूर झटक दिया...और फिर उसी पत्ते के सहारे उस मधुमक्खी को अपनी टेबिल पर ले आया,मधुमक्खी लगभग बेसुध थी ! कुछ लम्हे के बाद वह हिली और लड़खड़ाते हुए , टेबिल पर बिखरी हुई स्याही के ऊपर चलने लगी , उसके बाद वह नौजवान ‘यू’ के कागजों के ऊपर कदमताल सा करती हुई हवा में उड़ गई ! ‘यू’  हैरत के साथ यह सब देखता रहा , उसने पाया कि उसके तालपत्र में आड़े टेढ़े कांपते थिरकते से नन्हें नन्हे से हर्फों में धन्यवाद लिखा हुआ साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था !

इस आख्यान के हवाले से पहली बात , स्पष्ट यह कि ज्ञानोत्सुक को एकांत की आवश्यकता होती है, जहां वह बिना व्यवधान अपने चिंतन मनन और अध्ययन का कार्य कर सके ! कथा कालीन समाज नि:संदेह आध्यात्मिक प्रकृति वाला समाज रहा होगा जहाँ पूजा और साधना के स्थल को सामान्य बसाहट से इतर पहाड़ की ऊंचाई में स्थापित किया गया होगा !  कहने का आशय यह है कि उक्त समाज में मंदिर / उपासना स्थल ज्ञान अर्जन के लिए उपयुक्त स्थल माना गया होगा ! संभव है कि चीनी पृष्ठभूमि के इस आख्यान में उल्लिखित मंदिर कोई बौद्ध पगोड़ा ही रहा हो जहां ‘यू’ नाम का साधक अपने बौद्धिक तोष के लिए उपस्थित हुआ हो...हालांकि चीनी मूल के किसी धर्म के उपासना स्थल के रूप में भी , उसका आशय , ज्ञान केन्द्र वाला ही माना जायेगा !

अध्येता ‘यू’ प्रकृति के निकट , धार्मिक उन्मुखता वाले स्थल में ज्ञानार्जन का यत्न करते हुए थककर सो जाता है और उसे ख्वाब में किसी युवती का आर्तनाद , सहायता की याचना का स्वर साफ़ सुनाई देता है , वह उसे हरे  रेशमी धागे वाले लिबास में देखता है , नि:संदेह मंदिर के चहुँ दिश की हरितिमा के आलोक / सन्दर्भ में यह रेशमी लिबास मकड़ी के द्वारा बुना गया जाला ही हो सकता है, धागों में फंसी हुई मधुमक्खी का रेशमी हरा लिबास एक गज़ब की अनुभूति है, मकड़ी के बुनाई कौशल की अदभुत प्रशंसा है !साधक ‘यू’ ख्वाब में आभासी तौर पर एक नन्हे से जीव को भी स्त्री रूप में देखता है , जोकि सुंदर है और उससे दया की याचना कर रही है ! अतः प्रतीति यह कि एकांतिक साधक होने के बावजूद उसका अंतर्मन सुन्दर ‘स्त्री’ की लालसा से मुक्त नहीं है !

‘यू’ अनजाने में ही एक सुंदर युवती का स्वप्न देखते हुए यह सिद्ध करता है , कि या तो उसके ज्ञान मार्ग में स्त्रियों का निषेध है ही नहीं अथवा उसकी साधना , उसे स्त्रियों के प्रति उसके नैसर्गिक लगाव से दूर नहीं कर सकी ! बहरहाल इस कथा का एक अन्य आयाम यह भी है कि किसी अच्छे साधक के लिए मधुमक्खी जैसा नन्हा कीट भी उतना ही अधिक महत्वपूर्ण है, जितना कि उसके स्वयं के स्वजन स्वरुप मनुष्य अथवा उसकी प्रियतम-सह-सर्वोपरि अभिलाषा स्त्री ! वह आक्रामक मकड़ी की जान नहीं लेता बल्कि उसे, हरे कोमल पत्ते की सहायता से मधुमक्खी से दूर कर देता है और मधुमक्खी की जान बचाता है ! अतः लगता है कि सर्व-जीव समभाव की सांकेतिकता लिये हुए यह कथा मांसाहार के विरुद्ध और अहिंसा / दया / करुणा के पक्ष में खड़ी हो गई हो !

इस कथा के अनुसार मधुमक्खी अपने जीवन रक्षक के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए अपने पैरों का उपयोग करती है , वह टेबिल पर बिखरी हुई स्याही से अध्येता के तालपत्र पर धन्यवाद लिखती है , नि:संदेह कथा का ये धन्यवाद अंश ध्वन्यात्मक , शाब्दिक , भाषाई दृष्टि से कीट समाज और मनुष्य समाज के मध्य पारस्परिक संवाद के लिए अनुपयुक्त ही माना जायेगा ! हमें मधुमक्खी के धन्यवाद ज्ञापन को उसकी प्रतीकात्मकता में स्वीकारना होगा और यह भी कि साधक / ज्ञानी / बुद्ध  के लिए भाषाई असाम्यता संचार को बाधित नहीं करती ! आशय यह कि जो भी व्यक्ति ज्ञानी / ज्ञानोत्सुक हो उसके लिए विविध भाषायें / भिन्न देह आकृतियां और सांसारिक विविधतायें मायने नहीं रखतीं , वह हर तरह के भेद भाव से मुक्त हो जाया करता है !