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मंगलवार, 3 जुलाई 2012

राजकुमारियां कपड़े नहीं धोतीं...!

लोक आख्यानों को पढ़ते हुए अक्सर ऐसा लगता है कि उनमें से ज्यादातर स्त्री विरोधी संदेशों से भरे पड़े हैं ! संसार में पुरुषों के वर्चस्व , उनकी प्रभुता को स्थापित करते हुए / करने का यत्न करते हुए ! इसमें कोई शक नहीं कि सामाजिक ताने बाने की यथास्थिति , पुरुषों के हित में है ! शताब्दियों पुराने आख्यान और उनसे मिलने वाले सामाजिक विवरण इस तथ्य को प्रमाणित करते हैं कि पुरुष वर्ग बहुत लंबे समय से अपने हित साधन में सफल बना रहा है ! उसने स्त्रियों की तुलना में स्वयं के श्रेष्ठतम होने के दावे की बुनियाद कब रखी थी ? कह नहीं सकते ? ...पर यह निश्चित है कि ये अवधि दस / बीस / पचास सालों के बजाये हजारों वर्षों की मापनी में ही देखी जायेगी ! स्त्रियों को संपत्ति बतौर देखे जाने / उन्हें भोग की वस्तु समझे जाने का , चलन नया नहीं है !

उनके दासत्व की धारणा को उनके ही अंतर्मन में प्रत्यारोपित करने में वह कैसे सफल हुआ ? क्यों सफल हुआ ? चिंतन का विषय तो खैर है  ही  ! हम सभी जानते हैं कि लोक आख्यान , वाचिक परम्पराओं के अंग होने की स्थिति में पीढ़ी दर पीढ़ी संशोधित होकर कहे जाने की संभावनाओं से मुक्त नहीं हैं और पुरुष वर्ग समाज में अपने आधिपत्य और यथास्थितिवाद को बनाये रखने के लिए इस अवसर का लाभ हमेशा से उठाता आया है ! कहने का आशय यह है कि मूलतः कहे गये लोक आख्यान , तो , उसके पक्ष में थे ही पर वह बाद में भी उन्हें अपने पक्ष में बनाये रखने की कवायद के तहत , आख्यानों में अपनी मनमर्जी के संशोधनों को जोड़ने से कभी नहीं चूका , अन्यथा कोई कारण नहीं था कि शताब्दियों तक जीवित रहे , आख्यान केवल उसके ही पक्ष में बने रहे ?

सामान्यतः पुरुष आरोपित दासता के विरुद्ध एक बड़ी जनसंख्या का प्रतिरोध / चिंतन , आधुनिकता की देन माना जाता है , इसलिये मुझे बेहद हैरानी हुई , जब कि मैं इस कथा को बांच रहा था ! कही गई कथा के पुराने संस्करण भले ही पुरुषों के पक्ष में रहे होंगे पर नया संस्करण स्त्रियों के प्रतिरोध और उनके जाग उठने के संकेत देता है ! यह स्पष्ट नहीं है कि http://www.corsinet.com/braincandy ने इस आख्यान का संशोधित और अद्यतन संस्करण कहां से संकलित किया है किन्तु कहन से ऐसा लगता है कि इसका स्रोत पूर्वी एशिया का ही कोई स्थान हो सकता है ? हालांकि संकलक  ने इस कथा को हास्य की श्रेणी में माना है , किन्तु कथा का अंत , कथा के ‘अंदरूनी मंतव्य’ को , प्रतीकात्मक रूप से , जिस अंदाज़ में ख़ारिज करता है , उससे स्त्रियों में नवचिंतन के प्रखर संकेत मिलते हैं ! 

आख्यान कहता है कि बहुत समय पहले की बात है , जब किसी दूर देश में एक सुन्दर राजकुमारी रहती थी ! पूर्णतः आत्म निर्भर , आत्म विश्वास से युक्त वो युवती अपने महल के आस पास के हरियाले मैदान के निकट , एक अप्रदूषित स्वच्छ जलाशय के किनारे बैठ कर पारिस्थितिकी चिंतन कर रही थी ! तभी एक मेढ़क कहीं से कूद कर , उसकी गोद में आ बैठा और कहने लगा ...ओ रमणी , पहले कभी मैं भी एक सुन्दर राजकुमार था किन्तु एक दुष्ट जादूगरनी / चुड़ैल ने मुझे जादू से मेढ़क बना दिया है , यदि तुम मुझे एक चुम्बन दे दोगी तो मैं फिर से राजकुमार बन जाऊंगा ! मेरी प्रिय ... उसके बाद हम दोनों विवाह कर सकते हैं !

विवाह के बाद हम दोनों अपने शानदार महल में रहेंगे ! जहां तुम व्यवस्थित होकर मेरी मां की सेवा करना ! अपने घर के सारे कामकाज तुम खुद संभालना , सारा इंतजाम देखना ! मेरे लिए खाना बनाया करना ! मेरे कपड़े धोना ! मेरे बच्चों को पैदा करना , उनका पालन पोषण करना और इस तरह से हम दोनों हमेशा हमेशा , खुशी खुशी आगे का जीवन गुजारेंगे ! ...और फिर उस रात , उस सुन्दर राजकुमारी के महल में रात्रि कालीन दावत के समय , परोसी गई सफ़ेद शराब की चुस्कियां लेते हुए और प्याज क्रीम सॉस में डुबा कर मेढ़क की हल्की भुनी हुई टांगों को चबाते हुए राजकुमारी बुदबुदाई ... किन्तु मैं ऐसा नहीं सोचती !

 [ मित्रो यह बहुश्रुत आख्यान का भावानुवाद है इसकी अंतिम ढ़ाई पंक्तियां संशोधन प्रतीत होती हैं ,गौर तलब है कि इन पंक्तियों ने पूरी कथा का अर्थ / मंतव्य ही बदल डाला है ]

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

शनि देव से डरे हुए मध्यमवर्गीय लोग...


जिन्हें ज्योतिष पर विश्वास ना हो वे कृपया इस पोस्ट से अपने तर्क विज्ञान को दूर रखें यह खालिस आस्था का मामला है , इसलिए कोई नुक्ताचीनी बर्दाश्त नहीं की जायेगी !  पिछले शनिवार को डाक्टर दराल साहब अपनी कार में बैठ कर शनि देव के प्रतिनिधि को चन्दा दिए बगैर आगे बढ़ लिये , उन्हें शनि देव से भय ना था पर जो दोपहिया चालक थे , बाइक से लेकर साइकिल सवार तक , उन्होंने टोल टैक्स पटाने के बाद ही रवानगी ली !  ये अदभुत संयोग है कि  दराल साहब ने शनि देव को इग्नोर किया जबकि अन्य मध्यमवर्गीय लोगों ने ऐसा करने का साहस नहीं किया ! इसका कारण बहुत साफ़ है कि शनि देव इंजीनियर्स , वैज्ञानिकों और मजदूरों के प्रतिनिधि तो है पर डाक्टरों के नहीं  ! कहने का मतलब ये है कि आजकल इंजीनियर्स और न्यायविद ,वैज्ञानिक ,सरकारी मोहकमात में नौकरी के भरोसे जीते हैं सो वे भी मुलाजिम यानि कि मजदूर ही हुए जबकि डाक्टर मुलाजिम हों...तो भी किसी की मजाल है जो उनसे प्राइवेट प्रेक्टिस करने , निजी नर्सिंग होम चलाने का हक़ छीन ले...जो डाक्टर सरकार ( सच्ची बात ममता बनर्जी और अशोक गहलोत जी के दिल से पूछो ) से नहीं डरते वो शनि देव से क्योंकर डरेंगे और शनि देव उनका कर भी क्या लेंगे आखिर को उनके अपने निकटजन भी तो देर सबेर इलाज के लिए डाक्टरों की ही शरण में आने वाले हैं  !

खैर यह पोस्ट डाक्टरों को छोड़ कर उन तमाम लोगों के लिए लिखी गई है जो अपने आप को मजदूर मानकर शनि देव का सम्मान करते हों ! इन लोगों में वे लोग भी शामिल है जो मेहनत तो बहुत करते हैं पर उन्हें इसका ठीक ठाक सिला नहीं मिलता ! मसलन ब्लागर्स , जिनके घर वालों को लगता है कि इनके बिना ब्लागजगत का पत्ता भी नहीं हिलता जबकि दूसरे ब्लागर्स को लगता है कि 'ये' यहां पर है ही क्यों  ?  कौन सा क़हर टूट पड़ता जो अगर यह रचना धर्म ना भी निबाह रहे होते और विश्वास कीजिये सारे ब्लागर्स एक दूसरे की बारे में ऐसे ही नेक ख्याल रखते हैं...कि ये यहां पर है ही क्यों...बकौल दराल साहब वो बंदा पिछले के पहले वाले शनिवार तक काले कपड़ों में टिप्पणियों की याचना करता था और अबकी सफेद पोश...जाओ नहीं देते चन्दा  !  डोंगे में नीबू मिर्च और तेल भला यह भी कोई रचना हुई !  मजा ये कि उन्होंने खुद ही इस माल से एक अदद रचना का जुगाड़ कर लिया !  सो हे मध्यमवर्गीय ब्लागर मित्रों उन मित्रों से प्रेरणा लीजिये जो शनि देव से डरते भी नहीं है और उनके आइटम्स की दम पे रचना पैदा करने का कोई मौक़ा नहीं खोते !

मित्रो आपको ज़रा भी अंदाज नहीं है कि शनि देव आपके जीवन के हर पक्ष के लिए कितने महत्वपूर्ण हैं ! ज्योतिष के जानकार कहते हैं कि एक साढ़े साती और दो ढैय्या पर मामला समाप्त  हो जाता है , लेकिन यह सही नहीं है , आपको बचे हुए नौ भावों की नौ ढैय्या की चिंता भी करना पड़ेगी  ! उदाहरण के लिए संतति के भाव की ढैय्या ,पत्नी के भाव की ढैय्या , आय के भाव की ढैय्या , भाग्य के भाव की ढैय्या , मालिक के भाव की ढैय्या , यश की ढैय्या वगैरह वगैरह !  सो आप एक काम करें अगले शनिवार को सुबह छै से साढ़े सात बजे के बीच 'ॐ शनिश्चरायें नमः'  मन्त्र का जाप उतनी बार करें जितने दिन आपने पैदा होने के बाद धरती पर बोझ बनकर गुज़ार दिये हैं पर याद रहे कि बिना नहाये ये कार्य कदापि ना करें ,चूंकि आप नीलम जैसे महंगे और कीमती पत्थर अफोर्ड नहीं कर सकते इसलिए गुग्गुल की लकड़ी सफेद कपड़े के अंदर अपनी दाहिनी बांह में बांधें ,जैसे जैसे गुग्गुल की लकड़ी ( कृपया गोंद के धोखे में ना रहें गोंद वापरने से उपजा चिपचिपापन आपके अपनों के लिए कष्टदाई होगा इसलिए लकड़ी पर ही ध्यान दें ) आपकी त्वचा को स्पर्श करेगी गूगल पर आपका प्रभाव बढ़ता जाएगा !  इसके बाद आपकी रचना कोई पढ़े या ना पढ़े , टिप्पणियां आप पर बरसने लगेंगी ! 

यदि आप ब्लागिंग के रास्ते यश और धन की कामना नहीं करते तो रिटायरमेंट के बाद के लिए यह कार्य दूसरे की जेब से पैसा निकालने के काम आएगा ! आप खुद भी बेरोजगार नहीं रहेंगे और दूसरों को रोजी रोटी कमाने का पुण्य भी कर गुजरेंगे ! यदि आपको ज्योतिष सीखना हो तो सन 2021 के अक्टूबर माह में मुझसे व्यक्तिगत संपर्क करें संभवतः मैं उस महीने रिटायर होकर दूसरों का जीवन सार्थक करने के कार्य में लग गया होऊँगा !  इसके लिए आपको मुझे कोई फीस भी नहीं देनी पड़ेगी बशर्ते हाल फिलहाल में आप मेरी हक़ नाहक पोस्ट पर  टिप्पणियां बराबर दे रहे हों तो...और हां जो ब्लागर किसी ना किसी बहाने सम्मान बांटने का अनुभव रखते हों उन्हें विशेष रूप से ज्योतिष प्रशिक्षण के दौरान अमर्त्य ब्लागर सम्मान दिया जायेगा और मेरिट में दो फीसद अंक भी मुफ्त में ! प्रशिक्षण के उपरान्त उन्हें उनके सर्टीफिकेट लेमिनेट कराके दिए जायेंगे !  चर्चाकार ब्लागरों को यथाशक्ति गुग्गुल की लकड़ी मुफ्त में दी जायेगी ताकि वे शनि देव की कृपा लिंकित ब्लागरों तक अबाध गति से पहुंचाते रहें ! यहां यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि जिन ब्लागर्स ने किसी ब्लॉग सम्मेलन में हिस्सा ना लिया हो और अपने सम्पूर्ण ब्लागीय रचनाकाल में सतत असम्मानित बने रहे हों  , उन्हें ज्योतिष प्रशिक्षण की पूरी पूरी फीस भी चुकानी होगी ! 



( डाक्टर दराल से खेद सहित )