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शुक्रवार, 2 जुलाई 2010

महाकाव्य की अंचल यात्रा : पंडवानी के नायक भीम कैसे ना होते ?

सहज विश्वास ये है कि अक्सर लघु परम्परायें अपनी जन-स्वीकार्यता के बलबूते पर वृहत परम्पराओं में बदल जाया करती हैं , जैसे कि अयोध्या के राजकुमार विश्व के राजकुमार हुए !  आशय ये कि 'स्थानीयता' कालांतर में 'वृहत क्षेत्र' की विशेषता के रूप में विकसित हो सकती है  !   इसके उलट कोई वृहत परम्परा किसी अंचल विशेष में जाकर उसके रंगों में रंग जाये तो फिर आश्चर्य कैसा  ?  महाकाव्य के रूप में छत्तीसगढ़ अंचल तक पहुंचते पहुंचते महाभारत के साथ भी ऐसा ही हुआ !  कुरुक्षेत्र के महानायक बतौर सव्यसाची उर्फ अर्जुन का  नाम अपने शेष चारों भाइयों की तुलना में सबसे ज्यादा चमकदार नज़र आता है किन्तु जैसे ही यह महाकाव्य आदिम संसार में प्रवेश करता है , वहां के लोक जीवन के देवता भीम जोकि संयोगवश पञ्च पांडवों में से एक के नाम और शक्तिमत्ता के साथ साम्य रखते हैं , महाकाव्य के स्थानिक रूप 'पंडवानी' में विकसित होते ही अर्जुन को पीछे छोड़ कर कथा के मुख्य पात्र बन जाते हैं ! 

मुझे लगता है कि ब्लॉग आरम्भ में नायकत्व परिवर्तन की इस घटना पर विचार करते समय हिंदू धर्म की चतुरवर्णी व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डाल दिया गया है , इस सम्बन्ध में श्री राम ह्रदय तिवारी जी का  मत है कि पंडवानी गायन करने वाले अधिकांश कलाकार द्विजेतर जातियों ( वर्णों ) में से आते हैं अतः उनके शताब्दियों से उपेक्षित , दमित आक्रोश को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम भीम का चरित्र ही हो सकता है !  इसे वे सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक कारण के रूप में देखते हैं !  उन्हें आभासित होता है कि भीम के चरित्र को गाते समय इन कलाकारों में तन्मयता , जातिगत मौलिकता और आदिम लोक तत्व की ऊर्जा विद्यमान रहती है  !  श्री राम ह्रदय तिवारी जी मुझे क्षमा करेंगे कि मुझे उनकी बात तर्क संगत नहीं लगती क्योंकि ... अर्जुन और भीम अंततः सगे भाई हैं और फिर धनुर्धारी को छोड़ कर गदाधारी को नायक बनाने से जातीय आक्रोश की अभिव्यक्ति संभव कैसे हुई होगी  ?  देवार और परधान आदिवासियों के लोक गायन के रूप में विकसित इस कला को चतुवर्णी व्यवस्था के दमित आक्रोश की अभिव्यक्ति कहना उचित कैसे हुआ जबकि वे चतुवर्णी व्यवस्था का अंग ही नहीं हैं ? उत्कृष्ट कलाकार जातीय अभिमान को अभिव्यक्त करने वाले मानुष अव्वल तो होते ही नहीं और अगर ऐसा करना किसी अच्छे कलाकार पर आरोपित किया जाये तो यह उसकी प्रतिभा का  अपमान सदृश्य है !  गौर तलब है कि इस काव्य परम्परा  को विकसित करने श्रेय आदिवासी चारणों के हिस्से में आता है और यही वो स्थान / समय  है जहां भीम काव्य के महानायक के रूप में स्थापित हो चुकते हैं !  फिर इसके बाद इसे विश्व रंगमंच पर लोकप्रिय बनाने का कार्य द्विजेतर जातियों के कलाकार करते हैं , जिनके गायन और अभिनय का लोहा तो माना जा सकता है...उनकी प्रतिभा को नमन तो किया जा सकता है , पर ये नहीं कहा जा सकता कि वे दमित जातीय आक्रोश की अभिव्यक्ति कर रहे हैं और ना ही ये कहा जा सकता है कि उन्होंने भीम को पंडवानी के महानायक के रूप में स्थापित कर दिया है क्योंकि भीम तो उन्हें पूर्व से ही स्थापित नायक के रूप में प्राप्त होते हैं  परन्तु  तिवारी जी कि एक बात से मैं शत प्रतिशत सहमत हूं ...कि इस काव्य को गाते समय आदिम लोक तत्व की ऊर्जा विद्यमान रहती है  !  मेरे विचार से भीम को नायकत्व भी यही ऊर्जा देती है क्योंकि वो महाभारत से पंडवानी के रूप में विकसित हो रहे काव्य को आदिम लोक जीवन से स्वाभाविक रूप से उसी समय प्राप्त हो गई जबकि उसे गढा जा रहा था !

अब ज़रा इस तर्क की पृष्ठभूमि में आदिम लोक जीवन की हल्की सी झलक भी देख ली जाये !  क्या ये संभव नहीं है कि आदिम जातीय संसार में धनुर्धारी एकलव्य के अंगूठे ने धनुर्धारी अर्जुन के नायकत्व से पतन की बुनियाद रख दी हो ? ... पर ये तर्क संचार साधनों के अभाव में दूर की कौड़ी मानकर त्यागा भी जा सकता है ! चलिये  आगे बढते हैं ! छत्तीसगढ़ के कोरवा आदिवासी अपनी वंशबेल महाभारत के कौरवों से जोड़ते हैं , उनके लिए कौरव तथा पांडव दोनों ही पशु पालक थे जैसे कि वे स्वयं हैं !   कोंड आदिवासियों का लोक आख्यान कहता है कि भीम  ( देवपुरुष ) नें उनके मुखिया की पुत्रियों के स्नान करते समय,  जलकुंड से बाहर रखे वस्त्रों को उड़ाने (  चोरी करने ) में वायु देवता की मदद ली !  निसंदेह यह घटना भगवान श्री कृष्ण की लीला से साम्य रखती हुई स्थानिक घटना है जिसमें लिप्त भीम महाभारत के भीम हरगिज़ भी नहीं हैं ! एक अन्य आदिवासी आख्यान (बिन्झल) कीचक वध का  जिक्र करते हुए कहता है कि भीम ने कुंवारी लड़कियों के शत्रु किन्तु महादेव से वरदान प्राप्त कीचक को मसल कर जला दिया था , वर्षा होने पर राख के यही अंश लीच के रूप में पनपते हैं !  किसी और  जनआख्यान में कहते हैं कि भीम जंगल में घूमते हुए एक सुन्दर आदिवासी युवती पर मोहित हो गये फिर दोनों के संसर्ग से पहला कोया आदिवासी जन्मा !  मध्यभारत के गोंड भीम को वर्षा का देवता मानते हैं जो कि लोक नायक के रूप में अलौकिक कार्य भी करता है !  कहते हैं कि महादेव और पार्वती से जो पहला पुत्र जन्मा वे गोंड हैं ! महादेव उनके लिए जंगल के कंदमूल फलफूल की समुचित आपूर्ति नहीं कर सके तो पार्वती जी की  सलाह पर भीम से मदद ली गई ! महादेव की योजनानुसार भीम कुबेर से बीज लाये फिर हल बैल आदि की व्यवस्था करके गोंडों को कृषि कार्य का प्रशिक्षण दिया गया !  यहां ध्यातव्य है कि अज्ञातवास के समय स्वयं भीम कंदमूल फल फूल आदि का संग्रहण किया करते थे !  इन सभी आख्यानों से संकेत मिलता है कि भीम किसी ना किसी रूप में इस अंचल के नायक के रूप में पहले से ही मौजूद थे और महाभारत महाकाव्य ने जैसे ही स्थानीयता का स्पर्श किया , उसके भीम को अर्जुन पर बढ़त हासिल हो गई ! 

मेरे ख्याल से एक बात और भी कहना जरुरी है कि आदिम जीवन के देवता भीम की , महाकाव्य के मनुष्य ( भीम ) के रूप में जनस्वीकृति एकमात्र उदाहरण नहीं है कि जिसमें किसी अलौकिक शक्ति को नश्वर देह का चोला पहनाया गया हो ! याकि मनुष्य के चरित्र से उसका घालमेल किया गया हो ! सती अनुसुइया के प्रकरण में भी ब्रम्हांड के त्रिदेवों को स्थानीयता के शिशु रूप को स्वीकार करना पड़ा था ! इसीलिए बस इतना ही सूझता है कि महाकाव्य की अंचल यात्रा में पंडवानी के नायक भीम कैसे ना होते ?






[ इस आलेख को श्री संजीव तिवारी के ब्लाग आरम्भ में प्रकाशित आलेख "पंडवानी के नायक भीम और महाभारत के नायक अर्जुन" की पुरौनी माना जाये ]  

बुधवार, 30 जून 2010

समृद्ध वाचिक परम्पराओं...लोक संस्कृतियों का परकाया प्रवेश यानि इतिहास लेखन के खतरे !

[ कल रात लैपटाप की बेरुखी से परेशान होकर जल्दी सोने का निर्णय लेना पड़ा लिहाज़ा ब्लॉग आरम्भ की महत्वपूर्ण प्रविष्टि तक पहुंचने में विलम्ब हुआ...सुबह सोचा...त्वरित प्रतिक्रिया देकर आगे बढ़ें...टायपिंग शुरू भी की, लेकिन पूर्वजों की समृद्ध थाथी के प्रति कामचलाऊ टिप्पणी की धृष्ठता से बचने का ख्याल जोर मार गया...फिर क्या था...संजीव जी से बाकायदा दूरभाष पर वार्ता कर अनुमति मांगी कि...क्या मैं आपके आलेख पर मेरी इस लंबी टिप्पणी को अपने ब्लाग की प्रविष्टि बतौर प्रकाशित कर लूं ? वे सज्जन व्यक्ति हैं, उनकी सदाशयता के चलते मैं यह आलेख प्रकाशित कर पा रहा हूं! चूंकि उन्होंने काफी विस्तार से पंडवानी पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की है इसलिए मेरे आलेख में उन अंशों की पुनरावृत्ति मुझे उचित नहीं लगी! विशेष निवेदन ये है  कि मेरे आलेख को श्री तिवारी के आलेख की पुरौनी बतौर पढ़ा जाये ]


ब्लाग आरम्भ में आज का पंडवानी विषयक आलेख, दरअसल वाचिक परम्पराओं के लिखित परंपरा बतौर कायांतरण पर फोकस करते हुए, वाचिक से लिपिबद्ध होने की प्रक्रिया के दौरान भ्रांतियों के पनप जाने के खतरे की ओर स्पष्ट संकेत करता है!  मेरे ख्याल से इसे वाचिक परम्पराओं और लोक संस्कृतियों का परकाया प्रवेश यानि इतिहास लेखन के खतरे की तरह से पढ़ा और समझा जाना चाहिये!  इसमें कोई संदेह नहीं कि लोक परम्परायें और लोक संस्कृतियां सबसे पहले वाचिक परम्परा के तौर पर ही उदभूत, विकसित, पुष्पित और पल्लवित हुई हैं!  मनुष्यों की हजारों पीढियां इन्हीं की बदौलत पशु जगत पर अपनी श्रेष्ठता की बुनियाद रखती आई हैं! उसके ज्ञान भंडार का स्वत्व शेष ( बैंक बैलेंस ) , लिपि के आविष्कार से पूर्व, केवल इन्हीं वाचिक परम्पराओं पर आश्रित रहा है ! 

ये भी खूब है कि मनुष्य ने अपने अस्तित्व और सहजीविता की परम्पराओं के समानांतर अभिरुचियों और जीवन्तता की परम्पराओं को भी विकसित किया वर्ना वह केवल हाड़ मांस युक्त नीरस रोबोट अथवा दोपाया पशुओं की तरह का जीवन जी रहा होता !  रोजमर्रा के दुष्कर हालातों से जूझते हुए उसने अपने लिए मनोरंजन और उल्लास की अभिव्यक्ति का अदभुत संसार गढ़ा !  क्या कभी इस बात की कल्पना की जा सकती है कि लोककलाओं / लोकगीतों / लोकगाथाओं और लोक रंग कर्म के बिना मनुष्य का समाज और उसका सामाजिक जीवन कैसा होता ?  वाचिक परम्पराओं को नश्वर देहधारी मनुष्य की अनश्वरता की निरंतरता के रूप में देखा जा सकता है !  पीढ़ियां गुजरती गईं पर ज्ञान तथा  अनुभव के संचयन की निरंतरता बनी रही !  स्पष्ट होता है कि वाचिक परम्पराओं के अभाव में मनुष्य आज भी कहीं अपने खुर ( एड़ियां ) घिस रहा होता और पशुओं की तरह से झुण्ड बनाकर जीवन जीता रहता...उसकी सभ्यता, उसका विकास, उसकी प्रौद्योगिक उन्नति का स्तर नि:संदेह आज भी शून्य ही होता! कहने में कोई हर्ज नहीं कि वाचिक परम्पराओं ने मनुष्य और उसके सामाजिक विकास की बुनियाद का महती कार्य किया है! यहां यह उल्लेख समीचीन होगा कि वाचिक परम्परायें मनुष्य के सामाजिक संसार की बुनियाद के रूप में भले ही चीन्ही जा रही हों किन्तु उनमें पीढ़ी से पीढ़ी, स्थान से स्थान, समय से समय, बोली से बोली का जो वैविध्य / वैषम्य मिलता है उसका मूल कारण स्वयं मनुष्य है उसके मनोसंसार की विविधता भरी पृष्ठभूमि है! यदि गौर से देखा जाये तो किसी वाचिक परम्परा का नाभि केन्द्र भले ही यथावत बना रहा हो किन्तु उसकी ऊपरी सतह पर मनुष्य की मनोसांसारिक भिन्नताओं के निशान आज भी मौजूद हैं !  

लिपि के विकास के बाद वाचिक परम्पराओं के लिखित परम्पराओं में बदलने की प्रक्रिया प्रारम्भ तो हुई पर इसमें विरूपण का जोखिम बना रहा जबकि यह अपेक्षित था कि वैज्ञानिक चेतना / निरपेक्ष दृष्टि तथा इतिहास बोध संपन्न मस्तिष्क यह कार्य करेंगे पर ऐसा हुआ नहीं !  मिसाल के तौर पर पुराने राजे रजवाड़ों में यह कार्य भाटों / चारणों / कवियों / गवैय्यों / राज्याश्रित लोगों द्वारा किये गये!  मसलन पृथ्वी राज चौहान की अतिमानवीय शक्तियों का अतिरंजित वर्णन! लगभग इसी तर्ज पर  आल्हा ऊदल के पाषाण गुल्ली डंडे को  देख कर कौन कह सकता है कि इससे खेलना कभी भी संभव रहा होगा! अतः वाचिक परम्पराओं के दस्तावेजीकरण अथवा लिखित परम्पराओं के रूप में कायांतरण के समय भी भाट / चारणीय प्रस्तुतिकरण अथवा अनधिकृत हस्तक्षेप का खतरा बना हुआ था और बना रहेगा जब तक कि इन परम्पराओं के संरक्षण का दायित्व कुशल हाथों में नहीं आ जाता !  

खैर मुद्दा ये है कि श्री संजीव तिवारी ने पंडवानी जैसी सशक्त विधा पर कलम भांजते हुए उसके वेदमति और कापालिक रूपों का उल्लेख करते हुए यह संकेत दिया कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक परम्पराओं के स्तरीय लेखन की आवश्यकता है! उन्होंने लोक कलाओं के बहाने वाचिक परम्पराओं के सहेजने की प्रक्रिया में भ्रांतियां पनपने के उदाहरण बतौर मध्य प्रदेश लोक कला परिषद के मंहगे मोनोग्राफ का जिक्र किया है, जिसमें पंडवानी के विषय में कतिपय भ्रामक जानकारियां प्रकाशित की गई  हैं!  व्यक्तिगत रूप से मैं उनकी इस चिंता से शत प्रतिशत सहमत हूं कि लोक कलाओं के साथ अदक्ष / अकुशल, कथित लोक कला विशेषज्ञों / मर्मज्ञों द्वारा छेड़छाड़ नहीं की जाना चाहिये !  

छत्तीसगढ़ लोक संस्कृतियों का समृद्ध गढ़ है, धान के खेतों, कीचड़ भरे रास्तों, कवेलू पोश मकानों से,...नितांत खेतिहर / ग्राम्य जीवन से, लोक रंग के अनूठे सितारे, अंतर्राष्ट्रीय आकाश पर यूं चमकने लगते हैं गोया सारा आसमान, केवल अपना हो! लोक सांस्कृतिक परम्पराओं की अलौकिक आभा बिखेरते छत्तीसगढ़िया कलाकार धूल से उपजे देवताओं की तरह, अपनी यश गाथायें खुद बखुद गढ़ रहे हैं!  अपने आलेख में पंडवानी की वेदमति शाखा को केवल गायन यानि सुर और ध्वनि आधारित पंडवानी के रूप में तथा  कापालिक शाखा को गायन सह अभिनय अर्थात ध्वनि सह भाव भंगिमाओं के साथ जोड़ते हुए श्री  तिवारी,  श्री झाड़ू राम देवांगन श्री पूना राम जी निषाद और श्रीमती तीजन बाई, श्रीमती ऋतु वर्मा का नाम अत्यंत सहज भाव से ले डालते हैं मुझे कोई आश्चर्य नहीं होता अगर वेदमति या कापालिक कहे जाने के बजाये पंडवानी की इन दोनों शाखाओं को इन महान कलाकारों के नाम से संबोधित किया जाता !