सहज विश्वास ये है कि अक्सर लघु परम्परायें अपनी जन-स्वीकार्यता के बलबूते पर वृहत परम्पराओं में बदल जाया करती हैं , जैसे कि अयोध्या के राजकुमार विश्व के राजकुमार हुए ! आशय ये कि 'स्थानीयता' कालांतर में 'वृहत क्षेत्र' की विशेषता के रूप में विकसित हो सकती है ! इसके उलट कोई वृहत परम्परा किसी अंचल विशेष में जाकर उसके रंगों में रंग जाये तो फिर आश्चर्य कैसा ? महाकाव्य के रूप में छत्तीसगढ़ अंचल तक पहुंचते पहुंचते महाभारत के साथ भी ऐसा ही हुआ ! कुरुक्षेत्र के महानायक बतौर सव्यसाची उर्फ अर्जुन का नाम अपने शेष चारों भाइयों की तुलना में सबसे ज्यादा चमकदार नज़र आता है किन्तु जैसे ही यह महाकाव्य आदिम संसार में प्रवेश करता है , वहां के लोक जीवन के देवता भीम जोकि संयोगवश पञ्च पांडवों में से एक के नाम और शक्तिमत्ता के साथ साम्य रखते हैं , महाकाव्य के स्थानिक रूप 'पंडवानी' में विकसित होते ही अर्जुन को पीछे छोड़ कर कथा के मुख्य पात्र बन जाते हैं !
मुझे लगता है कि ब्लॉग आरम्भ में नायकत्व परिवर्तन की इस घटना पर विचार करते समय हिंदू धर्म की चतुरवर्णी व्यवस्था पर अनावश्यक बोझ डाल दिया गया है , इस सम्बन्ध में श्री राम ह्रदय तिवारी जी का मत है कि पंडवानी गायन करने वाले अधिकांश कलाकार द्विजेतर जातियों ( वर्णों ) में से आते हैं अतः उनके शताब्दियों से उपेक्षित , दमित आक्रोश को अभिव्यक्त करने का सबसे सशक्त माध्यम भीम का चरित्र ही हो सकता है ! इसे वे सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक कारण के रूप में देखते हैं ! उन्हें आभासित होता है कि भीम के चरित्र को गाते समय इन कलाकारों में तन्मयता , जातिगत मौलिकता और आदिम लोक तत्व की ऊर्जा विद्यमान रहती है ! श्री राम ह्रदय तिवारी जी मुझे क्षमा करेंगे कि मुझे उनकी बात तर्क संगत नहीं लगती क्योंकि ... अर्जुन और भीम अंततः सगे भाई हैं और फिर धनुर्धारी को छोड़ कर गदाधारी को नायक बनाने से जातीय आक्रोश की अभिव्यक्ति संभव कैसे हुई होगी ? देवार और परधान आदिवासियों के लोक गायन के रूप में विकसित इस कला को चतुवर्णी व्यवस्था के दमित आक्रोश की अभिव्यक्ति कहना उचित कैसे हुआ जबकि वे चतुवर्णी व्यवस्था का अंग ही नहीं हैं ? उत्कृष्ट कलाकार जातीय अभिमान को अभिव्यक्त करने वाले मानुष अव्वल तो होते ही नहीं और अगर ऐसा करना किसी अच्छे कलाकार पर आरोपित किया जाये तो यह उसकी प्रतिभा का अपमान सदृश्य है ! गौर तलब है कि इस काव्य परम्परा को विकसित करने श्रेय आदिवासी चारणों के हिस्से में आता है और यही वो स्थान / समय है जहां भीम काव्य के महानायक के रूप में स्थापित हो चुकते हैं ! फिर इसके बाद इसे विश्व रंगमंच पर लोकप्रिय बनाने का कार्य द्विजेतर जातियों के कलाकार करते हैं , जिनके गायन और अभिनय का लोहा तो माना जा सकता है...उनकी प्रतिभा को नमन तो किया जा सकता है , पर ये नहीं कहा जा सकता कि वे दमित जातीय आक्रोश की अभिव्यक्ति कर रहे हैं और ना ही ये कहा जा सकता है कि उन्होंने भीम को पंडवानी के महानायक के रूप में स्थापित कर दिया है क्योंकि भीम तो उन्हें पूर्व से ही स्थापित नायक के रूप में प्राप्त होते हैं परन्तु तिवारी जी कि एक बात से मैं शत प्रतिशत सहमत हूं ...कि इस काव्य को गाते समय आदिम लोक तत्व की ऊर्जा विद्यमान रहती है ! मेरे विचार से भीम को नायकत्व भी यही ऊर्जा देती है क्योंकि वो महाभारत से पंडवानी के रूप में विकसित हो रहे काव्य को आदिम लोक जीवन से स्वाभाविक रूप से उसी समय प्राप्त हो गई जबकि उसे गढा जा रहा था !
अब ज़रा इस तर्क की पृष्ठभूमि में आदिम लोक जीवन की हल्की सी झलक भी देख ली जाये ! क्या ये संभव नहीं है कि आदिम जातीय संसार में धनुर्धारी एकलव्य के अंगूठे ने धनुर्धारी अर्जुन के नायकत्व से पतन की बुनियाद रख दी हो ? ... पर ये तर्क संचार साधनों के अभाव में दूर की कौड़ी मानकर त्यागा भी जा सकता है ! चलिये आगे बढते हैं ! छत्तीसगढ़ के कोरवा आदिवासी अपनी वंशबेल महाभारत के कौरवों से जोड़ते हैं , उनके लिए कौरव तथा पांडव दोनों ही पशु पालक थे जैसे कि वे स्वयं हैं ! कोंड आदिवासियों का लोक आख्यान कहता है कि भीम ( देवपुरुष ) नें उनके मुखिया की पुत्रियों के स्नान करते समय, जलकुंड से बाहर रखे वस्त्रों को उड़ाने ( चोरी करने ) में वायु देवता की मदद ली ! निसंदेह यह घटना भगवान श्री कृष्ण की लीला से साम्य रखती हुई स्थानिक घटना है जिसमें लिप्त भीम महाभारत के भीम हरगिज़ भी नहीं हैं ! एक अन्य आदिवासी आख्यान (बिन्झल) कीचक वध का जिक्र करते हुए कहता है कि भीम ने कुंवारी लड़कियों के शत्रु किन्तु महादेव से वरदान प्राप्त कीचक को मसल कर जला दिया था , वर्षा होने पर राख के यही अंश लीच के रूप में पनपते हैं ! किसी और जनआख्यान में कहते हैं कि भीम जंगल में घूमते हुए एक सुन्दर आदिवासी युवती पर मोहित हो गये फिर दोनों के संसर्ग से पहला कोया आदिवासी जन्मा ! मध्यभारत के गोंड भीम को वर्षा का देवता मानते हैं जो कि लोक नायक के रूप में अलौकिक कार्य भी करता है ! कहते हैं कि महादेव और पार्वती से जो पहला पुत्र जन्मा वे गोंड हैं ! महादेव उनके लिए जंगल के कंदमूल फलफूल की समुचित आपूर्ति नहीं कर सके तो पार्वती जी की सलाह पर भीम से मदद ली गई ! महादेव की योजनानुसार भीम कुबेर से बीज लाये फिर हल बैल आदि की व्यवस्था करके गोंडों को कृषि कार्य का प्रशिक्षण दिया गया ! यहां ध्यातव्य है कि अज्ञातवास के समय स्वयं भीम कंदमूल फल फूल आदि का संग्रहण किया करते थे ! इन सभी आख्यानों से संकेत मिलता है कि भीम किसी ना किसी रूप में इस अंचल के नायक के रूप में पहले से ही मौजूद थे और महाभारत महाकाव्य ने जैसे ही स्थानीयता का स्पर्श किया , उसके भीम को अर्जुन पर बढ़त हासिल हो गई !
मेरे ख्याल से एक बात और भी कहना जरुरी है कि आदिम जीवन के देवता भीम की , महाकाव्य के मनुष्य ( भीम ) के रूप में जनस्वीकृति एकमात्र उदाहरण नहीं है कि जिसमें किसी अलौकिक शक्ति को नश्वर देह का चोला पहनाया गया हो ! याकि मनुष्य के चरित्र से उसका घालमेल किया गया हो ! सती अनुसुइया के प्रकरण में भी ब्रम्हांड के त्रिदेवों को स्थानीयता के शिशु रूप को स्वीकार करना पड़ा था ! इसीलिए बस इतना ही सूझता है कि महाकाव्य की अंचल यात्रा में पंडवानी के नायक भीम कैसे ना होते ?
[ इस आलेख को श्री संजीव तिवारी के ब्लाग आरम्भ में प्रकाशित आलेख "पंडवानी के नायक भीम और महाभारत के नायक अर्जुन" की पुरौनी माना जाये ]
[ इस आलेख को श्री संजीव तिवारी के ब्लाग आरम्भ में प्रकाशित आलेख "पंडवानी के नायक भीम और महाभारत के नायक अर्जुन" की पुरौनी माना जाये ]