शनिवार, 16 मई 2020
सवा दो
सोमवार, 17 जून 2019
मृत्यु दूत
अर्वाचीन समय की बात है जब एक दैत्य महामार्ग में यात्रा कर रहा था । अचानक उसके सामने एक अनचीन्ही सी मनुष्य आकृति खड़ी हो गई और बोली, रुको एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाना । क्या, दैत्य चिल्लाया एक तुच्छ प्राणी, जिसे मैं अपनी चुटकी से मसल सकता हूं , मेरा रास्ता रोक रही है । इतना दुस्साहस पूर्ण बोल बोलने की हिम्मत कैसे हुई , तुम कौन हो ? उसने कहा, मैं मृत्यु हूं । कोई भी मेरा प्रतिरोध नहीं करता, सभी मेरे निर्देशों को मानते हैं । किन्तु दैत्य ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया । उसने मृत्यु से, धक्का मुक्की शुरू कर दी । यह एक लंबा और हिंसक युद्ध था । अंततः दैत्य ने मृत्यु को, अपने मुक्के से नीचे गिरा दिया और महामार्ग पर आगे बढ़ गया ।
पराजित मृत्यु इतनी कमजोर पड़ गई थी कि फिर से उठ भी नहीं सकी । उसने सोचा । अब क्या करना चाहिए ? अगर मैं ऐसे ही किनारे पड़ी रहूंगी तो दुनिया में किसी की मृत्यु नहीं होगी और भीड़ इतनी बढ़ जायेगी कि धरती पर, लोगों के खड़े होने तक की जगह नहीं बचेगी । इसी दौरान उस मार्ग पर एक बलिष्ठ युवा कुछ गाते हुए गुज़र रहा था । इस दरम्यान वो मार्ग पर इधर उधर देखते हुए भी चल रहा था । उस युवा ने कमजोर मृत्यु को जमीन पर गिरे हुए देखा और दया भावना के साथ उसे ऊपर उठाया और अपने जल पात्र से उसे जल पिलाया । जब मृत्यु को कुछ ठीक लगा तो उसने युवक से पूछा, ओ अजनबी युवा, क्या तुम जानते हो कि मैं कौन हूं ? , मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो युवा ने कहा ।
मैं मृत्यु हूं और मैं किसी को नहीं छोड़ती, लेकिन मैं तुम्हारी कृतज्ञ हूं और वादा करती हूं कि तुम तक अचानक नहीं पहुंचूंगी बल्कि मेरे आगमन से पहले तुम तक संदेश वाहक भेजूंगी । अच्छा, युवा ने कहा । आज मुझे कुछ मिला ही, मैं लंबे समय तक सुरक्षित रहने की कोशिश करूँगा । ऐसा कहते हुए वो युवा निश्चिन्त भाव से मुस्कराते हुए वहाँ से चला गया । बहरहाल वो युवा अधिक समय तक स्वस्थ नहीं रह सका, उसके दुःख, उसकी कमजोरियां बढ़ती ही जा रही थीं । उसने सोचा मैं जल्द ही स्वस्थ हो जाऊंगा, अगर मेरे मरने का समय होता तो मृत्यु ने अपना संदेश वाहक मुझ तक ज़रूर भेजा हो़ता । बस ऐसे ही वो खुद को बहलाता हुआ खुश रहने की कोशिश करने लगा ।
लेकिन एक दिन किसी ने उसे बांध कर अपने कांधे पर टांग लिया और कहा चलो मेरे साथ तुम्हारे मरने का समय हो चुका है । इस धरती पर तुम्हारे दिन पूरे हुए । क्या ? युवक चिल्लाया, तुम अपना वादा तोड़ रही हो । तुमने तो कहा था कि तुमसे पहले, तुम्हारे सन्देश वाहक मुझ तक आयेंगे, मगर तुम खुद ही आ गईं, तुम्हारे किसी सन्देश वाहक को मैंने आज तक देखा ही नहीं । शांत हो, जाओ मृत्यु ने कहा । क्या मैंने एक से ज्यादा सन्देश वाहक तुम तक नहीं भेजे ? क्या तुम तक बुखार नहीं पहुंचा, जिसके कारण से तुम कांपने लगे थे । क्या तुम्हारे सिर तक भारीपन नहीं पहुंचा ? क्या तुम्हें चक्कर नहीं आये ? क्या तुम्हारे अंगों तक टूटन नहीं पहुँची ? क्या तुम्हारे कान नहीं बजते थे ? क्या तुम्हारे दांतों तक दर्द नहीं पहुंचा था ? क्या तुम्हारी आँखों के सामने अन्धेरा नहीं छा जाता था ?
इस सबके अलावा, क्या तुम्हें हर रात, मेरी बहन नींद ने, मेरी याद नहीं दिलाई ? ये सुन कर वो युवा, मृत्यु को कोई जबाब नहीं दे सका और अपनी नियति को स्वीकार कर, मृत्यु के साथ चल पड़ा ।
ये आख्यान दार्शनिक प्रवृत्ति का है जिसमें मृत्यु के सत्य होने का कथन किया गया है । कथा का आरंभ एक महाकाय दैत्य और मनुष्य के रूप में मौजूद मृत्यु, की मुठभेड़ का उल्लेख है । दैत्य को सांकेतिक रूप से, दुष्टता / बुराई माना जा सकता है, जिसके धरती से प्रस्थान के निर्देश सहित मृत्यु, साक्षात उपस्थित है, किन्तु दैत्य / दुष्टता, मृत्यु के सहज नियंत्रण में नहीं आती, अपितु मृत्यु को पराजित कर आगे बढ़ जाती है । इस बिंदु पर ये आख्यान, धरती पे अफरा तफरी का भयावह खाका खींचता है, यानि कि दैत्य से हुए मुकाबिले में, मृत्यु की असफलता के बाद, दुनिया में जनाधिक्य के खतरे का संकेत देता हुआ आख्यान आगे बढ़ता है ।
मृत्यु, दुष्ट से पराजित है / कमजोर है / निराश है, तभी उसे एक युवा, दया भाव के साथ पानी पिलाता है, युवक बलिष्ठ है, प्रसन्न चित्त है, वो निरीह मनुष्य उर्फ़ मृत्यु के प्रति सहृदय है । हालांकि युवा मृत्यु को पहचानता ही नहीं, बहरहाल मृत्यु उसकी सुहृदयता से प्रभावित है और उसे अपना परिचय देते हुए, शरीर की नश्वरता का बयान करती है और कृतज्ञतावश, युवा को आश्वस्त करती है कि वो, निश्चित तथा अटल, मृत्यु से पूर्व अपने संदेशवाहक भेज कर युवक को सचेत करेगी । युवक अपनी धुन में है, उसे मृत्यु का भय नहीं, फिर भी कृतज्ञ मृत्यु का मान रखते हुए अपनी राह चल देता है ।
आगत जीवन में युवा अस्वस्थ होता है, किन्तु सोचता है कि मृत्यु ने कोई संदेशवाहक तो भेजा ही नहीं, उसे ये भ्रम बना रहता है और वो स्वयं को बहलाने का यत्न करता है कि जल्द ही स्वस्थ हो जाऊंगा। फिर एक दिन मृत्यु उसे अपने साथ ले जाने के लिए आती है, तो युवा, उस पर वादा तोड़ने का आरोप लगाता है और तब मृत्यु उसे विविध बीमारियों के नाम लेकर कहती है कि यही उसके संदेशवाहक थे, जिन्हें युवक ने पहचाना ही नहीं । यहां पर आख्यान, कहता है कि हरेक रात की नींद, मृत्यु की बहन जैसी है इसलिए सारे संकेतों अनदेखी युवक की अपनी भूल है...
रविवार, 16 जून 2019
मानुष तन
ईश्वर को सृष्टि की रचना करते हुए प्रत्येक
प्राणी के जीवन की अवधि तय करना थी । गधे ने
ईश्वर से पूछा, प्रभु मैं कितने दिन जिऊंगा? ईश्वर ने कहा तीस बरस, ठीक है? आह…ये तो बहुत लंबा समय है। आप मेरे दर्दनाक
अस्तित्व के बारे में सोचिये तो सही, सुबह से लेकर रात
तक बोझ ढोना । कारखानों तक मक्के के बोरे पहुंचाना । जब दूसरे प्राणी रोटियां
खायेंगे हसेंगे मुस्करायेंगे तब मैं धक्के और लातें खाता रहूँगा । कृपया मुझे इतने
लंबे जीवन से मुक्ति दो । ईश्वर ने करुणावश उसकी जीवनावधि घटा कर अट्ठारह बरस कर
दी । गधा ये सुनकर खुशी खुशी वहाँ से चला गया ।
इसके बाद, श्वान ईश्वर के पास पहुंचा तो ईश्वर ने उससे पूछा गधे के लिए तीस बरस का जीवन पर्याप्त था । क्या तुम इससे संतुष्ट होओगे? श्वान ने कहा,आप सोचिये तो सही, मेरे पास भौंकने, भागने और काटने के सिवा कोई काम नहीं । अगर मैं काटते हुए अपने दांत खो दूं तो? अगर मैं भौंकते हुए अपनी आवाज़ खो दूं तो? मेरे पास इधर उधर भागने और गुर्राने के अलावा क्या विकल्प शेष रह जाएगा? ईश्वर ने उसकी बात पर विचार करते हुए, उसे बारह बरस की आयु प्रदान की और श्वान वहाँ से संतुष्ट होकर चला गया ।
अब ईश्वर ने बंदर से पूछा, क्या तुम्हें तीस साल की जिंदगी पर्याप्त हो जायेगी? तुम्हारे पास गधे और श्वान जैसा कठिन काम भी नहीं होगा। तुम इसे मज़े से गुज़ार सकते हो । नहीं मेरा प्रकरण, उन दोनों से अलग है प्रभु, बंदर ने कहा । जब खिचड़ी मिलती है तो मेरे पास चम्मच नहीं होता । मुझे तरह तरह से मुंह बना कर लोगों का मनोरंजन करना पड़ता है । जब वे लोग मुझे सेब देते हैं तो वो खट्टा होता है । अक्सर मेरी उदासी, मेरे अभिनय के पीछे छुपी रह जाती है । तीस बरस की आयु मेरे लिए बहुत ज्यादा है । इसे कम कर दीजिए । ये सुनकर ईश्वर ने बंदर की जीवनावधि दस वर्ष कर दी ।
सबसे अंत में स्वस्थ, हर्षित, पुलकित, मनुष्य ईश्वर के पास आया और उसने ईश्वर से अपने लिए आयु तय करने की मांग की है । ईश्वर ने कहा क्या तुम्हारे लिए तीस बरस काफी होंगे? इतना कम समय, मनुष्य ने कहा जब मैं अपने लिए घर बनाऊंगा । अपने स्वस्थ जीवन के लिए चूल्हा जलाऊंगा । जब मैं अपने लिए फूल और फल के पौधे लगाऊंगा, तब तक मेरा समय खत्म हो जाएगा । जबकि मैं उस समय अपने जीवन के मजे लेना चाहूंगा । हे, ईश्वर मेरी जीवनावधि बढ़ा दी जाए । ईश्वर ने कहा, ठीक है, मैं इसमें गधे के बारह बरस और जोड़ देता हूं । लेकिन ये, पर्याप्त नहीं होगा, मनुष्य ने कहा । ये सुनकर ईश्वर ने कहा, ठीक है, मैं इसमें श्वान के अट्ठारह बरस और जोड़ देता हूं । ओह...ये फिर भी कम होगा, मनुष्य ने कहा । तब ईश्वर ने कहा, अच्छा तो तुम्हें बन्दर के दस बरस भी मिल जायेंगे । यह सुनकर मनुष्य वहाँ से चला गया हालांकि वो सत्तर बरस की आयु से संतुष्ट नहीं था । क्योंकि उसे उम्मीद थी कि ईश्वर बंदर द्वारा त्यागे गए पूरे बीस वर्ष उसे दे देगा ।
इसके बाद से मनुष्य सत्तर बरस जीने लगा, जिसमें से पहले तीस बरस उसका अपना मानव जीवन होता है, जिसे वो शादी करके, आनंद उठा कर और स्वस्थ रहकर गुज़ारता है और अगले बारह बरस वो, गधे की तरह से दूसरों का बोझ ढोता है। जिसकी एवज उसे ठोकरें और लातें खानी पड़ती हैं । इसके बाद वो अट्ठारह बरसों तक श्वान की तरह से एक छोर से दूसरे छोर भागता और गुर्राता फिरता है या किसी कोने में पड़ा रहता है क्योंकि उसके दांत उसका साथ छोड़ चुके होते हैं या भोथरे हो जाते हैं । अगले दस बरस मनुष्य, बंदर की तरह कमजोर दिमाग मूर्ख और नादान काम / अभिनय करने वाला बन जाता है । इस समय वो बच्चों के हास्य / उपहास का विषय हो जाता है ।
ये कथा मनुष्य और अन्य जीवधारियों की तुलनात्मक लालसाओं / दुःख सुख / अपेक्षाओं का बयान करती है । कथा मूलतः विभिन्न जीवों के जीवन-वृत्त के पर्यवेक्षण पर आधारित है, जिसका सार संक्षेप ये है कि नश्वरता अपरिहार्य है । मनुष्य के बरक्स शेष सभी जीव अपने जीवन की जटिलताओं से दु:खी हैं, अस्तु अपनी उम्र के वर्षों / जीवनावधि में कटौती चाहते हैं, किन्तु मनुष्य अपने लिए सुदीर्घ जीवन की कामना करता है । उसकी लालसा अंतहीन है । वो दूसरे जीवों द्वारा त्यागी गई आयु को अपनी आयु के साथ जोड़ते जाने की जुगत में है, कदाचित अंतिम क्षण तक संतुष्ट भी नहीं । इस आख्यान की कहनीयता में उपस्थित ईश्वर, सृष्टि के जीवों की जीवन मृत्यु के अन्तराल को सुनिश्चित करना चाहता है ।
ईश्वर द्वारा प्रथम आहूत गधे के दुःख, बोझ और शारीरिक पीड़ा पर आधारित है जबकि श्वान लम्बे जीवन काल में अपने अंगों के भोथरे / व्यर्थ हो जाने की आशंका से ग्रस्त है । लेकिन बन्दर अपने अभिनय की पृष्ठभूमि में छुपी उदासी का तर्क रखते हुए अपनी आयु कम करवाना चाहता है । अतः ईश्वर इन तीनों की जीवन मृत्यु के अन्तराल में क्रमशः बारह और अट्ठारह, बीस वर्षों की कटौती कर देता है । बहरहाल मनुष्य की लालसा है कि वो घर बनाये, स्वस्थ जीवन के लिए चूल्हा जलाये, फूल पौधे लगाए और जीवन के मजे लूटे । ईश्वर उसकी लालसाओं को देख कर गधे और श्वान और बंदर के समेकित चालीस बरस उसके जीवन में जोड़ देता है । लेकिन मनुष्य अतिरिक्त आयु पाकर भी खुश नहीं है उसे बन्दर के बचे हुए दस वर्ष भी चाहिये थे ।
आख्यान कहता है कि मनुष्य, स्वयं के इतर, दूसरे
जीवों की तरह से जीवन भी जीता है क्योंकि उसकी आयु में उन जीवों की आयु सम्मिलित है । वो दूसरे जीवों से बेहतर जीवन स्थिति
में है किन्तु संतुष्ट नहीं...
शुक्रवार, 25 अगस्त 2017
सवा तीन
बुधवार, 9 अगस्त 2017
वसंत की जय
सोमवार, 7 अगस्त 2017
इन्द्रधनुष
रविवार, 6 अगस्त 2017
आकाश नद
रविवार, 30 जुलाई 2017
टोकरी भर मछलियां !
शुक्रवार, 21 जुलाई 2017
स्त्रियों को भगवान भी...
बुधवार, 19 जुलाई 2017
ढ़ोल
सोमवार, 17 जुलाई 2017
उस पार वसंत
गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014
धुन के राही...!
सोमवार, 22 जुलाई 2013
हरित वर्ण रेशमी परिधान...!
बुधवार, 10 जुलाई 2013
बांसुरी बजैया : उइगुर अनीस
( यह कथा इस्लाम धर्म के उइगुर लोगों तक पहुँचने से पूर्व की कथा लगती है जोकि हमारे अपने देश के श्री कृष्ण आख्यान से किंचित मिलती जुलती सी प्रतीत होती है )