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शनिवार, 16 मई 2020

सवा दो

सड़क के मोड़ पर लड़के ने इशारा किया, लड़की अपनी साइकिल से उतर गई और उसने कहा, जो भी कहना है जल्दी कहो, पीछे मोहल्ले के लड़के आते ही होंगे  लड़के ने कहा ठीक है, हम बाद में बात करेंगे...फिर 43 साल गुज़र गये, कोई बात नहीं हुई 


सोमवार, 17 जून 2019

मृत्यु दूत

 अर्वाचीन समय की बात है जब एक दैत्य महामार्ग में यात्रा कर रहा था । अचानक उसके सामने एक अनचीन्ही सी मनुष्य आकृति खड़ी हो गई और बोली, रुको एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाना । क्या, दैत्य चिल्लाया एक तुच्छ प्राणी, जिसे मैं अपनी चुटकी से मसल सकता हूं , मेरा रास्ता रोक रही है । इतना दुस्साहस पूर्ण बोल बोलने की हिम्मत कैसे हुई , तुम कौन हो ? उसने कहामैं मृत्यु हूं । कोई भी मेरा प्रतिरोध नहीं करतासभी मेरे निर्देशों को मानते हैं । किन्तु दैत्य ने ऐसा करने से इन्कार कर दिया । उसने मृत्यु सेधक्का मुक्की शुरू कर दी । यह एक लंबा और हिंसक युद्ध था । अंततः दैत्य ने मृत्यु कोअपने मुक्के से नीचे गिरा दिया और महामार्ग पर आगे बढ़ गया ।

पराजित मृत्यु इतनी कमजोर पड़ गई थी कि फिर से उठ भी नहीं सकी । उसने सोचा । अब क्या करना चाहिए ? अगर मैं ऐसे ही किनारे पड़ी रहूंगी तो दुनिया में किसी की मृत्यु नहीं होगी और भीड़ इतनी बढ़ जायेगी कि धरती पर, लोगों के खड़े होने तक की जगह नहीं बचेगी । इसी दौरान उस मार्ग पर एक बलिष्ठ युवा कुछ गाते हुए गुज़र रहा था । इस दरम्यान वो मार्ग पर इधर उधर देखते हुए भी चल रहा था । उस युवा ने कमजोर मृत्यु को जमीन पर गिरे हुए देखा और दया भावना के साथ उसे ऊपर उठाया और अपने जल पात्र से उसे जल पिलाया । जब मृत्यु को कुछ ठीक लगा तो उसने युवक से पूछा, ओ अजनबी युवा, क्या तुम जानते हो कि मैं कौन हूं ? , मैं नहीं जानता कि तुम कौन हो युवा ने कहा । 

मैं मृत्यु हूं और मैं किसी को नहीं छोड़ती, लेकिन मैं तुम्हारी कृतज्ञ हूं और वादा करती हूं कि तुम तक अचानक नहीं पहुंचूंगी बल्कि मेरे आगमन से पहले तुम तक संदेश वाहक भेजूंगी । अच्छा, युवा ने कहा । आज मुझे कुछ मिला ही, मैं लंबे समय तक सुरक्षित रहने की कोशिश करूँगा । ऐसा कहते हुए वो युवा निश्चिन्त भाव से मुस्कराते हुए वहाँ से चला गया । बहरहाल वो युवा अधिक समय तक स्वस्थ नहीं रह सका, उसके दुःख, उसकी कमजोरियां बढ़ती ही जा रही थीं । उसने सोचा मैं जल्द ही स्वस्थ हो जाऊंगा, अगर मेरे मरने का समय होता तो मृत्यु ने अपना संदेश वाहक मुझ तक ज़रूर भेजा हो़ता । बस ऐसे ही वो खुद को बहलाता हुआ खुश रहने की कोशिश करने लगा ।

लेकिन एक दिन किसी ने उसे बांध कर अपने कांधे पर टांग लिया और कहा चलो मेरे साथ तुम्हारे मरने का समय हो चुका है । इस धरती पर तुम्हारे दिन पूरे हुए । क्या ? युवक चिल्लाया, तुम अपना वादा तोड़ रही हो । तुमने तो कहा था कि तुमसे पहले, तुम्हारे सन्देश वाहक मुझ तक आयेंगे, मगर तुम खुद ही आ गईं, तुम्हारे किसी सन्देश वाहक को मैंने आज तक देखा ही नहीं । शांत हो, जाओ मृत्यु ने कहा । क्या मैंने एक से ज्यादा सन्देश वाहक तुम तक नहीं भेजे ? क्या तुम तक बुखार नहीं पहुंचा, जिसके कारण से तुम कांपने लगे थे । क्या तुम्हारे सिर तक भारीपन नहीं पहुंचा ? क्या तुम्हें चक्कर नहीं आये ? क्या तुम्हारे अंगों तक टूटन नहीं पहुँची ? क्या तुम्हारे कान नहीं बजते थे ? क्या तुम्हारे दांतों तक दर्द नहीं पहुंचा था ? क्या तुम्हारी आँखों के सामने अन्धेरा नहीं छा जाता था ?

इस सबके अलावा, क्या तुम्हें हर रात, मेरी बहन नींद ने, मेरी याद नहीं दिलाई ? ये सुन कर  वो युवा, मृत्यु को कोई जबाब नहीं दे सका और अपनी नियति को स्वीकार कर, मृत्यु के साथ चल पड़ा ।

ये आख्यान दार्शनिक प्रवृत्ति का है जिसमें मृत्यु के सत्य होने का कथन किया गया है । कथा का आरंभ एक महाकाय दैत्य और मनुष्य के रूप में मौजूद मृत्यु, की मुठभेड़ का उल्लेख है । दैत्य को सांकेतिक रूप से, दुष्टता / बुराई माना जा सकता है, जिसके धरती से प्रस्थान के निर्देश सहित मृत्यु, साक्षात उपस्थित है, किन्तु दैत्य / दुष्टता, मृत्यु के सहज नियंत्रण में नहीं आती, अपितु मृत्यु को पराजित कर आगे बढ़ जाती है । इस बिंदु पर ये आख्यान, धरती पे अफरा तफरी का भयावह खाका खींचता है, यानि कि दैत्य से हुए मुकाबिले में, मृत्यु की असफलता के बाद, दुनिया में जनाधिक्य के खतरे का संकेत देता हुआ आख्यान आगे बढ़ता है । 

मृत्यु, दुष्ट से पराजित है / कमजोर है / निराश है, तभी उसे एक युवा, दया भाव के साथ पानी पिलाता है, युवक बलिष्ठ है, प्रसन्न चित्त है, वो निरीह मनुष्य उर्फ़ मृत्यु के प्रति सहृदय है । हालांकि युवा मृत्यु को पहचानता ही नहीं, बहरहाल मृत्यु उसकी सुहृदयता से प्रभावित है और उसे अपना परिचय देते हुए, शरीर की नश्वरता का बयान करती है और कृतज्ञतावश, युवा को आश्वस्त करती है कि वो, निश्चित तथा अटल, मृत्यु से पूर्व अपने संदेशवाहक भेज कर युवक को सचेत करेगी । युवक अपनी धुन में है, उसे मृत्यु का भय नहीं, फिर भी कृतज्ञ मृत्यु का मान रखते हुए अपनी राह चल देता है । 

आगत जीवन में युवा अस्वस्थ होता है, किन्तु सोचता है कि मृत्यु ने कोई संदेशवाहक तो भेजा ही नहीं, उसे ये भ्रम बना रहता है और वो स्वयं को बहलाने का यत्न करता है कि जल्द ही स्वस्थ हो जाऊंगा। फिर एक दिन मृत्यु उसे अपने साथ ले जाने के लिए आती है, तो युवा, उस पर वादा तोड़ने का आरोप लगाता है और तब मृत्यु उसे विविध बीमारियों के नाम लेकर कहती है कि यही उसके संदेशवाहक थे, जिन्हें युवक ने पहचाना ही नहीं । यहां पर आख्यान, कहता है कि हरेक रात की नींद, मृत्यु की बहन जैसी है इसलिए सारे संकेतों अनदेखी युवक की अपनी भूल है...

रविवार, 16 जून 2019

मानुष तन

ईश्वर को सृष्टि की रचना करते हुए प्रत्येक प्राणी के जीवन की अवधि तय करना थी  गधे ने ईश्वर से पूछाप्रभु मैं कितने दिन जिऊंगाईश्वर ने कहा तीस बरसठीक हैआहये तो बहुत लंबा समय है। आप मेरे दर्दनाक अस्तित्व के बारे में सोचिये तो सहीसुबह से लेकर रात तक बोझ ढोना । कारखानों तक मक्के के बोरे पहुंचाना । जब दूसरे प्राणी रोटियां खायेंगे हसेंगे मुस्करायेंगे तब मैं धक्के और लातें खाता रहूँगा । कृपया मुझे इतने लंबे जीवन से मुक्ति दो । ईश्वर ने करुणावश उसकी जीवनावधि घटा कर अट्ठारह बरस कर दी । गधा ये सुनकर खुशी खुशी वहाँ से चला गया ।

इसके बादश्वान ईश्वर के पास पहुंचा तो ईश्वर ने उससे पूछा गधे के लिए तीस बरस का जीवन पर्याप्त था । क्या तुम इससे संतुष्ट होओगेश्वान ने कहा,आप सोचिये तो सहीमेरे पास भौंकनेभागने और काटने के सिवा कोई काम नहीं । अगर मैं काटते हुए अपने दांत खो दूं तोअगर मैं भौंकते हुए अपनी आवाज़ खो दूं तोमेरे पास इधर उधर भागने और गुर्राने के अलावा क्या विकल्प शेष रह जाएगाईश्वर ने उसकी बात पर विचार करते हुएउसे बारह बरस की आयु प्रदान की और श्वान वहाँ से संतुष्ट होकर चला गया ।

अब ईश्वर ने बंदर से पूछाक्या तुम्हें तीस साल की जिंदगी पर्याप्त हो जायेगीतुम्हारे पास गधे और श्वान जैसा कठिन काम भी नहीं होगा। तुम इसे मज़े से गुज़ार सकते हो । नहीं मेरा प्रकरणउन दोनों से अलग है प्रभुबंदर ने कहा । जब खिचड़ी मिलती है तो मेरे पास चम्मच नहीं होता । मुझे तरह तरह से मुंह बना कर लोगों का मनोरंजन करना पड़ता है । जब वे लोग मुझे सेब देते हैं तो वो खट्टा होता है । अक्सर मेरी उदासी, मेरे अभिनय के पीछे छुपी रह जाती है । तीस बरस की आयु मेरे लिए बहुत ज्यादा है । इसे कम कर दीजिए । ये सुनकर ईश्वर ने बंदर की जीवनावधि दस वर्ष कर दी ।

सबसे अंत में स्वस्थ, हर्षित, पुलकित, मनुष्य ईश्वर के पास आया और उसने ईश्वर से अपने लिए आयु तय करने की मांग की है । ईश्वर ने कहा क्या तुम्हारे लिए तीस बरस काफी होंगे? इतना कम समय, मनुष्य ने कहा जब मैं अपने लिए घर बनाऊंगा । अपने स्वस्थ जीवन के लिए चूल्हा जलाऊंगा । जब मैं अपने लिए फूल और फल के पौधे लगाऊंगा, तब तक मेरा समय खत्म हो जाएगा । जबकि मैं उस समय अपने जीवन के मजे लेना चाहूंगा । हे, ईश्वर मेरी जीवनावधि बढ़ा दी जाए । ईश्वर ने कहा, ठीक है, मैं इसमें गधे के बारह बरस और जोड़ देता हूं । लेकिन ये, पर्याप्त नहीं होगा, मनुष्य ने कहा । ये सुनकर ईश्वर ने कहा, ठीक है, मैं इसमें श्वान के अट्ठारह बरस और जोड़ देता हूं । ओह...ये फिर भी कम होगा, मनुष्य ने कहा । तब ईश्वर ने कहा, अच्छा तो तुम्हें बन्दर के दस बरस भी मिल जायेंगे । यह सुनकर मनुष्य वहाँ से चला गया हालांकि वो सत्तर बरस की आयु से संतुष्ट नहीं था । क्योंकि उसे उम्मीद थी कि ईश्वर बंदर द्वारा त्यागे गए पूरे बीस वर्ष उसे दे देगा ।

इसके बाद से मनुष्य सत्तर बरस जीने लगा, जिसमें से पहले तीस बरस उसका अपना मानव जीवन होता है, जिसे वो शादी करके, आनंद उठा कर और स्वस्थ रहकर गुज़ारता है और अगले बारह बरस वो, गधे की तरह से दूसरों का बोझ ढोता है। जिसकी एवज उसे ठोकरें और लातें खानी पड़ती हैं । इसके बाद वो अट्ठारह बरसों तक श्वान की तरह से एक छोर से दूसरे छोर भागता और गुर्राता फिरता है या किसी कोने में पड़ा रहता है क्योंकि उसके दांत उसका साथ छोड़ चुके होते हैं या भोथरे हो जाते हैं । अगले दस बरस मनुष्य, बंदर की तरह कमजोर दिमाग मूर्ख और नादान काम / अभिनय करने वाला बन जाता है । इस समय वो बच्चों के हास्य / उपहास का विषय हो जाता है । 

ये कथा मनुष्य और अन्य जीवधारियों की तुलनात्मक लालसाओं / दुःख सुख / अपेक्षाओं का बयान करती है । कथा मूलतः विभिन्न जीवों के जीवन-वृत्त के पर्यवेक्षण पर आधारित है, जिसका सार संक्षेप ये है कि नश्वरता अपरिहार्य है । मनुष्य के बरक्स शेष सभी जीव अपने जीवन की जटिलताओं से दु:खी हैं, अस्तु अपनी उम्र के वर्षों / जीवनावधि में कटौती चाहते हैं, किन्तु मनुष्य अपने लिए सुदीर्घ जीवन की कामना करता है । उसकी लालसा अंतहीन है । वो दूसरे जीवों द्वारा त्यागी गई आयु को अपनी आयु के साथ जोड़ते जाने की जुगत में है, कदाचित अंतिम क्षण तक संतुष्ट भी नहीं । इस आख्यान की कहनीयता में उपस्थित ईश्वर, सृष्टि के जीवों की जीवन मृत्यु के अन्तराल को सुनिश्चित करना चाहता है । 

ईश्वर द्वारा प्रथम आहूत गधे के दुःख, बोझ और शारीरिक पीड़ा पर आधारित है जबकि श्वान लम्बे जीवन काल में अपने अंगों के भोथरे / व्यर्थ  हो जाने की आशंका से ग्रस्त है । लेकिन बन्दर अपने अभिनय की पृष्ठभूमि में छुपी उदासी का तर्क रखते हुए अपनी आयु कम करवाना चाहता है । अतः ईश्वर इन तीनों की जीवन मृत्यु के अन्तराल में क्रमशः बारह और अट्ठारह, बीस वर्षों की कटौती कर देता है । बहरहाल मनुष्य की लालसा है कि वो घर बनाये, स्वस्थ जीवन के लिए चूल्हा जलाये, फूल पौधे लगाए और जीवन के मजे लूटे । ईश्वर उसकी लालसाओं को देख कर गधे और श्वान और बंदर के समेकित चालीस बरस उसके जीवन में जोड़ देता है । लेकिन मनुष्य अतिरिक्त आयु पाकर भी खुश नहीं है उसे बन्दर के बचे हुए दस वर्ष भी चाहिये थे । 

आख्यान कहता है कि मनुष्य, स्वयं के इतर, दूसरे जीवों की तरह से जीवन भी जीता है क्योंकि उसकी आयु में उन जीवों की आयु  सम्मिलित है । वो दूसरे जीवों से बेहतर जीवन स्थिति में है किन्तु संतुष्ट नहीं... 


शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

सवा तीन

बेहद सकरी गली थी, लड़का किनारे हट गया  सामने लड़कियां झुण्ड में थीं, पीछे चल रही लड़की की कद काठी रंगत को नापने तोलने से पहले ही, उनकी निगाहें मिली, परम आह्लाद, अनिवर्चनीय आनंद का समय, ब्रह्माण्ड ठहर गया हो जैसे  झुण्ड से आवाज उठी, चलो भी, तिलस्म टूटा...फिर प्रेम या कि ईश्वर, जो भी था, वहां नहीं रहा 

बुधवार, 9 अगस्त 2017

वसंत की जय

जब दुनिया नई नई थी, तब एक बूढा इधर उधर घूम रहा था ! उसके बाल सफ़ेद थे ! जब वो कदम बढ़ाता धरातल पत्थर की तरह सख्त हो जाता और जब सांस लेता तो बहती नदियां थम जाती, तालाब ठोस हो जाते, पशु पक्षी उसके सामने से पलायन कर जाते, पत्तियां मुरझाकर पेड़ों से नीचे गिर जातीं, पेड़ सूख कर मर जाते ! आखिरकार बूढ़े को एक जगह मिल गई, जहां वो अपने लिये आवास बना सकता था ! उसने बर्फ की दीवारें और छत बनाई और उसके अंदर आग जला कर बैठ गया हालांकि उस आग में ज़रा भी ऊष्मा नहीं थी बल्कि उससे झिलमिल करती रौशनी निकल रही थी ! उस बूढ़े का एकमात्र मित्र उत्तरी पवन था, जो बूढ़े के साथ, उस ठंडे अलाव के पास बैठा रहता, वो दोनों इस बात पर हंसते कि उन्होंने दुनिया को चरम ठंडा और सख्त बनाने के लिये क्या क्या किया ! वो उन लंबी सर्दीली रातों में धूम्रपान करते रहते !   

एक सुबह, अलाव के पास ऊंघते हुए दोनों ने महसूस किया कि बाहर कुछ बदलाव हो रहा है, उन्होंने विलक्षण घटनायें घटते हुए देखी, बर्फीले झोंके कमजोर पड़ रहे थे, तालाबों में जमी हुई बर्फ में दरारें पड़ने लगी थी ! हुंह...उत्तरी पवन ने कहा, मैं यहां ज्यादा देर तक नहीं ठहर सकता ! वो उस ठिकाने से बाहर निकल कर उत्तर दिशा की ओर उड़ चला...उड़ता रहा, जब तक कि  उसे मोटी परत वाली बर्फ और न्यूनतम ऊष्मा वाली, जगह नहीं मिल गई ! लेकिन बूढा वहां से हिला तक नहीं, उसे अपने जादू के मज़बूत होने पर पूरा विश्वास था, वो बर्फीली झोपड़ी उसने खुद ही तो बनाई थी, तभी द्वार पर खटखटाने की आवाज़ आई ! खट खट करने वाला सख्तजान था, उसकी हरकतों / थपथपाहट से जमी हुई बर्फ के टुकड़े बिखरने लगे थे, बूढ़ा चिल्लाया भागो, यहां से ! कोई भी मेरे आवास में घुस नहीं सकता !

तभी घर का द्वार टूट कर गिर गया ! बूढ़े की मनाही के बावजूद, एक नौजवान अपने चेहरे पर मुस्कराहट लिये अंदर आया और बूढ़े के सामने अलाव के दूसरी ओर बैठ गया ! उसके हाथों में एक हरी छड़ी थी जिससे उसने आग को कुरेदा, आग तेज जलने लगी और ऊष्मा बढ़ने लगी ! बूढ़े के माथे से पसीना छलकने लगा ! बूढ़े ने कहा, कौन हो तुम ? मेरी अनुमति के बिना घर में कैसे घुसे? यहां मेरे मित्र उत्तरी पवन के सिवा कोई अन्य व्यक्ति नहीं आ सकता, तुमने घर का दरवाजा कैसे तोड़ दिया ? यहां से चले जाओ वर्ना मैं अपनी सांसों से तुम्हें बर्फ की तरह जमा दूंगा ! बूढ़े ने अपनी सर्दीली सांसे उस युवक की तरफ छोड़ीं, लेकिन उस युवक पर इसका कोई असर नहीं हुआ, सिर्फ एक महीन लकीर सी धुंध / वाष्प उसके होठों से बाहर निकली !

युवक हंसा और उसने बूढ़े से कहा, मुझे यहां रहने दो और तुम्हारे अलाव से गर्माहट लेने दो ! यह सुनकर बूढ़ा बहुत नाराज हुआ, उसने कहा, मैं वो हूं जो पशु और पक्षियों को पलायन के लिये मजबूर कर देता है, मेरे क़दमों से धरातल ठोस और पाषणवत हो जाता है, बर्फ जम जाती है, मैं तुमसे अधिक शक्तिशाली हूं, यह सब कहते हुए बूढ़े के चेहरे पर आया पसीना और तेज बहने लगा पर...वो युवक लगातार मुस्कराता रहा ! सुनो, उस अपरिचित युवा ने कहा, मैं युवा हूं और शक्तिशाली भी ! तुम मुझे डरा नहीं सकते ! निश्चित रूप से तुम जानते हो कि मैं कौन हूं ! क्या मेरी सांसों की गर्मी तुम महसूस नहीं कर रहे हो ? जब मैं सांस लेता हूं तो पेड़ पनपते हैं, फूल खिलते हैं, घास अंकुरित होती है, पशु पक्षी मेरे पास आते हैं, बर्फ पिघलने लगती है !

मेरे लंबे बालों को देखो और अपने झड़ते हुए सफ़ेद बालों को भी ! ओ बूढ़े व्यक्ति, क्या तुम मुझे नहीं जानते ? जब मैं चलता हूं तो सूरज चमकता है, जहां तुम ठहर ही नहीं सकते ! क्या तुमने अपने घर के टूटते द्वार पर मेरी दोस्त की थपकियों को नहीं सुना? मेरी दोस्त दक्षिणी हवा, जो इस वक्त तुम्हारी झोपड़ी के ऊपर से बह रही है, ये समय, यहां से, तुम्हारे जाने का समय है ! बूढ़ा कुछ कहना चाहता था पर...उसका मुंह खुले का खुला रह गया, उससे एक शब्द भी बाहर नहीं निकला ! वो छोटा और छोटा होने लगा, पसीना उसकी कनपटियों से नीचे की ओर बह रहा था, वो पिघलता गया, वो चला गया ! झोपड़ी की बर्फ वाली दीवारें ढह गईं और जिस जगह, उस बूढ़े ने ठण्डी आग वाला अलाव जलाया था, उस जगह सफ़ेद फूल खिलने लगे, एक बार फिर से वसंत ने सर्दियों को शिकस्त दे दी थी ! 

सेनेका इंडियंस का यह आख्यान कहन की दृष्टि से अद्भुत है, एक बूढ़ा जिसके सफ़ेद बाल हैं, जिसके सांस लेने से नदी तालाब जम जाते हैं, पेड़ों की पत्तियां झड़ जाती हैं, परिंदे और जानवर जिससे दूर भागते हैं, उत्तरी पवन जिसका मित्र है, जो बर्फ से घर / इग्लू बना सकता है, जिसका अलाव ऊष्मा नहीं देता, वो दरअसल खत्म होती हुई शीत ऋतु है ! उसके बरक्स मुस्कराता हुआ नौजवान जो अपने साथ दक्षिणी पवन लाया है, जो सर्दियों के द्वार खटखटा कर, अपने आगमन की सूचना देता है, जिसकी सांसों से दरख्तों में जीवन पनपता है, फूल खिलते हैं, घास अंकुरित होती है, जीव जगत जिसका सामीप्य पसंद करता है, जिसके मौजूदगी में चरम शीत अपना वज़ूद खोने लगती है, जिसकी सखि दक्षिणी पवन को देख, उत्तरी पवन किसी अन्य भूक्षेत्र की ओर प्रस्थित हो जाती है ! वो वसंत है ! ऋतु परिवर्तन को वृद्ध और युवा इंसान के प्रतीकात्मक हवाले से बयान करना, किस्सागोई का खूबसूरत  नमूना है !  

अनुश्रुति में प्राकृतिक बदलावों को अभिव्यक्त करने का तरीका दिलचस्प है, ठंडे अलाव के इर्द गिर्द बैठे बूढ़े और उसके मित्र उत्तरी पवन के द्वारा धूम्रपान करने का उल्लेख, प्रकृति की शक्तियों को मनुष्यों के प्रतीकात्मक रूप में प्रस्तुत करते समय, कथाकालीन समुदाय से सहज स्वीकृति प्राप्त करने यत्न लगता है ! सामुदायिक व्यसन / आदतों को प्राकृतिक शक्तियों से जोड़ कर, इन शक्तियों के मानवीय स्वरूप को श्रोताओं के अंतस में उतारने और कहन की विश्वसनीयता स्थापित करने की चेष्ठा के अंतर्गत, कथा पात्रों के ऐन श्रोताओं के जैसा होने का रोचक आलाप है यह ! इसके अतिरिक्त, बूढ़े और नौजवान के मध्य हो रहे संवाद भी उस मनःस्थिति की अक्काशी करते हैं, जोकि अमूमन, सामुदायिक, सामाजिक दिनचर्या का सहज सुलभ हिस्सा होती है ! अस्तु ध्यातव्य यह है कि स्थापित सत्ता, स्वयं के विस्थापन का विरोध ना करे तो उसे असामान्य व्यवहार माना जाएगा !

ये जानते हुए कि परिवर्तन नैमित्तिक हैं, अपरिहार्य है ! पहले आगमन...फिर प्रस्थान...फिर पुनरागमन, पूर्व निर्धारित ऋतु चक्र / जीवन-चर्या हैं जबकि नवागत के समक्ष पुरातन का प्रतिरोध, मानवीय स्वभाव ! ऐसे में प्राकृतिक घटनाक्रम को मानवीय स्वभाव के कलेवर में पेश करने का मंतव्य यही हो सकता है कि श्रोता समुदाय, कथन को अपना परिचित जाने / समझे ! यह स्वीकार किया जा सकता है कि इस आख्यान के मंच में प्राकृतिक बदलाव, इंसानी किरदारों द्वारा प्रस्तुत और अभिनीत किये गये हैं... 




सोमवार, 7 अगस्त 2017

इन्द्रधनुष

आज कल हम जिसे सांता क्रूज द्वीप कहते हैं, चुमाश लोगों का जन्म वहीं हुआ था ! उन्हें भूमि देवी हुताश ने जादुई दरख़्त के बीजों से पैदा किया था ! हुताश का ब्याह आकाश नाग / आकाश गंगा से हुआ था जोकि अपनी जीभ से विद्युत उत्सर्जित कर सकता था ! एक दिन आकाश नाग ने चुमाश लोगों को उपहार देने की बात सोची, जिसके लिए उसने धरती पर विद्युत प्रवाहित कर दी जिसके कारण से धरती पर आग लग गई !  इसके बाद चुमाश लोगों ने उस आग को लगातार जलाए रखा ताकि वे उसमें खाना पका सकें और स्वयं को गर्म रख पायें !

कहते हैं कि उन दिनों गिद्ध सफ़ेद रंग का हुआ करता था ! गिद्ध को बेहद उत्सुक्तता थी कि चुमाश गांव में आकाश से उतरी हुई शय क्या है ? सो उसने आग के बहुत निकट से उड़ान भरी ताकि वो उसे अच्छी तरह से देख पाए और समझ सके, लेकिन उड़ते हुए वह आग के इतने पास से गुज़रा कि उसके पंख झुलस कर काले हो गये, हालांकि पंखों का कुछ हिस्सा आग के संपर्क में नहीं आ पाया सो वो सफ़ेद बना रहा ! बहरहाल उसी दिन से गिद्ध सफ़ेद की बजाये काले रंग के होने लगे हैं !

आकाश नाग से अग्नि का उपहार प्राप्त करने के बाद चुमाश लोग बहुत आरामदायक जीवन जीने लगे, उनके बच्चों की संख्या हर साल बढ़ने लगी, यहां तक कि छोटे छोटे गांव, बड़े गांव में तब्दील होने लगे और सांता क्रूज द्वीप चुमाश लोगों से भर गया ! चुमाश जनसंख्या में बढोत्तरी के कारण शोर गुल बढ़ने लगा, जिससे हुताश को खीज होने लगी थी ! उसकी रातें जागते गुज़रतीं! इसलिए उसने निश्चय किया कि कुछ चुमाश लोगों को मुख्य भूमि में भेज देना उचित होगा क्योंकि उन दिनों मुख्य भूमि जन शून्य थी ! अब समस्या यह थी कि द्वीप और मुख्य भूमि के दरम्यान जो समुद्र था उसे प्रवासी चुमाश लोग कैसे पार करेंगे ?

हुताश ने सोचा कि द्वीप और मुख्य भूमि के पर्वतों की ऊंची चोटियों के मध्य इन्द्रधनुष का पुल बनाना उचित होगा ! उसने चुमाश लोगों से कहा कि वे पुल से होकर मुख्य भूमि में चले जायें और फिर वहां से पूरी दुनियां में फ़ैल जायें ! अनेकों लोग सुरक्षित उस पार जा पहुंचे पर कुछ लोगों ने ऊंचे पुल से नीचे समुद्र को देखने गलती की गहरी धुंध के कारण उन्हें दृष्टि भ्रम हुआ और वे लोग नीचे समुद्र में जा गिरे ! यह देख कर हुताश को बहुत दुःख हुआ क्योंकि वो उन्हें सुरक्षित मुख्य भूमि में भेजना चाहती थी ना कि समुद्र में बहते हुए देखना, इसलिए उसने नीचे पानी में गिर गये लोगों को डाल्फिंस में तब्दील कर दिया ! इसलिए चुमाश लोग डाल्फिंस  को आज भी अपना भाई मानते हैं !

जिस द्वीप में चुमाश लोगों के जन्म की बात कही गई है, वह पहले लिमूव के नाम से जाना जाता था ! कहते हैं कि भूमि देवी हुताश पहले पहल अकेले ही रहती थी, बाद में उसने सोचा कि चुमाश लोगों को जन्म दिया जाए, इसके लिये उसने अपनी दैवीय शक्तियों का प्रयोग करते हुए, लिमूव द्वीप में जादुई पौधे उगाये फिर उसके बीजों से मनुष्य सृजित किये, उसने यह ध्यान रखा कि मनुष्य ऐन उसके जैसे ही दिखाई दें ! गौर करें तो धरती स्वयं एक आकाशीय पिंड है, जिसका ब्याह, आकाश नाग उर्फ आकाशीय पिंडों के सर्पाकार समुच्चय, से होने की बात इस कहानी में मुखरता से कही गई है !

यानि कि चुमाश लोग इतना तो समझते ही थे कि धरती और अन्य आकाशीय पिंड परस्पर स्वजन हैं, ये बात अलग है कि वे इस स्वजनता को रक्त (तत्वगत / पदार्थगत) संबंधों में देखने के बजाये वैवाहिक संबंधों में देखते थे !आबादियों के हिमशीतित क्षेत्रों में निवासरत होने की स्थिति में, वनैले पशुओं से तुलनात्मक दैहिक दुर्बलता की स्थिति में तथा भोजन को कच्चा उदरस्थ करने के कष्टप्रद आयोजनों में, आबादियों की सबसे बड़ी उपलब्धि अग्नि थी, जो उन्हें गर्म रखती थी, वन्य पशुओं को उनसे दूर रखती थी और भोजन को उनके लिये सुपाच्य / सहज और अनुकूल बनाती थी !

स्वभाविक ही था कि आबादियां, यह अनुमान लगायें कि अग्नि का जन्म कैसे हुआ होगा? पाषाण घर्षण अथवा आकाशीय विद्युत या फिर कोई अन्य माध्यम ? चुमाश कबीले ने अग्नि की उपलब्धता को आकाशीय विद्युत से जोड़ा, जो उन्हें सृजित करने वाली हुताश के पति आकाश नाग द्वारा प्रदत्त उपहार था ! प्रतीकात्मक रूप से कहे गये इस कथन का आशय अत्यंत स्पष्ट है कि देवी हुताश, चुमाश लोगों की मां है और पिता आकाश नाग, सो संतति के लिये पिता की ओर से अग्नि बतौर सौगात मिली !  

आख्यान में, गिद्ध के सफ़ेद से काले हो जाने का कथन बेहद रोचक है, कथानुसार वह एक जिज्ञासु पक्षी है, जो नई नवेली शय अग्नि को निकट से जांचने की कवायद में खुद को झुलसा लेता है ! बिन गुरु, ज्ञान प्राप्ति के मार्ग में यह सम्भावना तो खैर बनती ही है ! इस घटनाक्रम का विशिष्ट पक्ष ये भी है कि, मनुष्यों की बस्तियों में, गिद्धों की रुचि क्यों नहीं होना चाहिए ? चुमाश अनुश्रुति जनाधिक्य की समस्या का निराकरण देवी हुताश के हाथों होने का कथन करती है अर्थात मां अपने बच्चों की संख्या बढ़ने से हो रहे ध्वनि प्रदूषण और अन्य कारणों से दु:खी है और भविष्य की दृष्टि से उन्हें द्वीप से इतर विशाल भूक्षेत्रों में बस जाने के लिये प्रेरित भी करना चाहती है !

इंद्रधनुष के पुल होने का कथन नितांत सांकेतिक है, निश्चय ही ये एक झूलते पुल के जैसा निर्माण कार्य होगा, जिससे वो लोग नीचे गिर पड़े होंगे, जो कि कमजोर मनः स्थिति वाले रहे होंगे, ऊंचाई से डरने वाले लोग !  समुद्र में गिर पड़े लोगों का डाल्फिंस हो जाना दैवीय कृत्य है या कि नहीं यह जानना इतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि यह समझना कि डाल्फिंस मनुष्यों की तरह से स्तनपायी और मेधावी प्राणी हैं, वे चुमाश लोगों के भ्रातत्व कुल में सम्मिलित हैं क्योंकि समुद्र में गये मनुष्यों के संकट में पड़ जाने के समय में डाल्फिंस के सहयोगी व्यवहार के किस्से यूं भी सार्वजनीन हैं !
    

     

रविवार, 6 अगस्त 2017

आकाश नद

जब सृष्टि का सृजन अपने आरंभिक दौर में था, तब आकाश में तारे बहुत कम थे ! उन दिनों चेरोकी लोग भोजन के लिये मक्के की फसल पर निर्भर थे ! वे खेत से फसल काटने के बाद उसे सुखाते और फिर लकड़ी की बड़ी सी ओखली और मूसल की मदद से दाने दाने अलग कर के, बांस की बड़ी टोकरियों में सुरक्षित रख लेते ताकि सर्दियों में उनसे रोटियां बनाई जा सकें ! एक सुबह जब एक वृद्ध दंपत्ति अपने भण्डार कक्ष में गये ताकि वहां से मक्के का आटा निकाल सकें ! उन्हें लगा कि पिछली रात वहां कोई आया था ! वे इस घटना से बहुत परेशान हो गये क्योंकि इससे पहले चेरोकी गांव में चोरी की कोई घटना नहीं घटी थी ! उन्होंने देखा कि भण्डार कक्ष अस्तव्यस्त था और मक्के का आटा इधर उधर बिखरा हुआ था, जिसमें कुत्ते के पंजों के निशान दिखाई दे रहे थे !

निशान इतने बड़े थे कि उन्हें सामान्य कुत्ते के पंजे के निशान नहीं माना जा सकता था ! गांव के लोगों ने पंचायत में इस विषय में चर्चा की और लोगों को सावधान रहने की चेतावनी ज़ारी कर दी गई ! उन्हें पूरा विश्वास था कि ये कुत्ते की आत्मा रही होगी, जिसे डरा धमका कर गांव से भगा दिया जाना चाहिए ताकि वो फिर कभी वापस ना लौटे ! उन्होंने ढ़ोल और कछुवे के खोल वाले झुनझुने इकट्ठे किये और रात में उस जगह के आस पास छुप गये जहां पर चोरी की घटना घटी थी ! देर रात उन्होंने ढ़ेरों  चिड़ियों के पंख फड़फड़ाने जैसी आवाजें सुनी, उन्होंने देखा कि एक भीमकाय कुत्ता आकाश से नीचे, धरती की ओर झपट रहा है ! वो भण्डार कक्ष में आटे की टोकरी के पास उतरा और उसने अपने विशालकाय मुंह में भर भर कर आटा खाना शुरू कर दिया !

उसी समय लोगों ने ढ़ोल बजाना और शोर मचाना शुरू कर दिया! शोर इतना तेज था, जैसे कि आकाश में बिजलियां कड़क रही हों! कुत्ता वापस मुड़ा और सड़क पर भागने लगा ! लोग जितना भी तेज शोर कर सकते थे उतना ही करते हुए कुत्ते का पीछा करने लगे ! कुत्ता भागते हुए पहाड़ की चोटी पर जा पहुंचा और वहां से उसने वापस आकाश में छलांग लगा दी !  इस दौरान कुत्ते के मुंह के दोनों तरफ से मक्के का आटा आकाश में बिखर रहा था ! बहरहाल वो कुत्ता आकाश में अन्तर्ध्यान हो गया, लेकिन उसके मुंह से बिखरे हुए आटे का हर एक कण, एक तारा बन गया ! आकाश में बिखरे हुए, आटे का स्वरुप, तारों की एक विशाल नदी के जैसा था, यानि कि तारों भरा आकाश नद ! चेरोकी लोग कहते हैं कि ये वो रास्ता है, जहां से कुत्ता भागा था ! 

कथा सृजन का समय निश्चित रूप से चेरोकी समुदाय के खेतिहर हो जाने का समय है, जबकि वे लोग मक्के की फसल उगाते और तब उन्हें, सर्दियों के कठिन समय के लिये, फसल के भण्डारण और संरक्षण का, आरंभिक तकनीकी ज्ञान था ! आख्यान कहता है कि चेरोकी गांव में चोरी की घटना परेशान करने वाली थी,यानि कि चेरोकी लोगों को चोरी जैसे असामाजिक / आपराधिक कृत्य का कोई पूर्व अनुभव नहीं था ! उनके लिये यह असहज समय था, उनके समुदाय के लिये नितांत अस्वीकार्य घटनाक्रम, जिसके विरुद्ध पूरे गांव का एकजुट हो जाना महत्वपूर्ण है ! उस गांव में पंचायत की मौजूदगी, विषय विचारण के लिये न्यायालय जैसी और संकट के समाधान के लिये कार्यपालिका के जैसी थी ! उन सभी ने चोरी के लिये जिम्मेदार ठहराई गई कुत्ते की आत्मा से एक साथ जूझने का निश्चय किया, वे चोरी की पुनरावृत्ति और चोर के पुनरागमन को रोकने के लिये कृत संकल्प थे !

चेरोकी लोगों का अस्तित्व इस बात पर निर्भर था कि वे मक्के की फसल का सदुपयोग करें, इस कथा में सांकेतिक रूप से प्रस्तुत कथन यह कि मक्का, चेरोकी जीवन की संजीवनी है ! आधार तत्व है...सो तारों की उत्पत्ति, उनके जीवन चक्र और अन्य ब्रह्मांडीय पिंडों सह आकाशीय संरचनाओं के अस्तित्व के लिये भी, उसे ही उत्तरदाई होना चाहिए ! धरती और आकाशीय जीवन के लिये उत्तरदाई, एक ही तत्व की कल्पनाशीलता अद्भुत है ! संभव है कि मक्के के सूखते / फूटते दानों की चमक और तारों की चमक में साम्यता का आभास इस कहन की पृष्ठभूमि में मौजूद हो, इसके अतिरिक्त ध्यान रखने योग्य कथन यह कि कुत्ते की आत्मा, आकाश से धरती पर उतरती है, लेकिन संकट में पड़ जाने की स्थिति में भागते हुए, उसे पहाड़ की ऊंचाई का सहारा है, जहां से, वो वापस ऊंचे आकाश में उड़ान भर सकती है, गज़ब का विचार है...    

रविवार, 30 जुलाई 2017

टोकरी भर मछलियां !

हर साल, गर्मियों का मौसम खत्म होने और बाढ़ आने से पहले चीकामस नदी, स्क्वामिश लोगों के लिये पर्याप्त मात्रा में रसद उपलब्ध करा देती थी ! इस समय सलमन ( मछलियां ) अंडे देने के लिये चीकामस नदी में आ जाया करतीं और स्क्वामिश लोग देवदार की जड़ों से बनाये हुए जाल, पानी में डाल कर आने वाली सर्दियों तक के लिये सलमन जमा कर लिया करते ! ऐसे ही एक दिन, एक व्यक्ति, आगत सर्दियों के लिये, मछलियां पकड़ने, नदी तट पर आया ! उसने देखा कि अबके बरस ढ़ेरों सलमन नदी में आ पहुंची हैं ! उसने मछलियों की आत्मा को धन्यवाद दिया, कि वे इतनी बड़ी संख्या में, उसके परिजनों का आहार बन कर आई हैं...फिर नदी में जाल डाला और मछलियों के फंसने इंतज़ार करने लगा !

जल्द ही उसका जाल मछलियों से भर गया ! पकड़ी गई मछलियां, उसके परिजनों के साल भर के खाने के लिये पर्याप्त थीं ! उसने मछलियों को देवदार की छाल से बनी हुई टोकरी में रखा और घर वापस जाने के लिये तैयार हो गया ! ऐन इसी समय, उसने कुछ और मछलियां पकड़ने की बात सोची और नदी में दोबारा जाल डाल दिया ! जाल फिर से मछलियों से भर गया पर...उसने इन मछलियों को, टोकरी में रखने के बजाये, नदी तट पर बिखेर दिया और तीसरी बार फिर से पानी में जाल, डाल कर मछलियां फंसने का इंतज़ार करने लगा ! लेकिन इस बार उसका जाल टूटी फूटी लकड़ियों / नुकीली टहनियों से भरा हुआ था ! पानी से बाहर खींचते समय, जाल इतनी बुरी तरह से फट गया था कि उसमें मरम्मत की कोई गुंजायश नहीं थी !

पूरी तरह से बर्बाद हो चुके जाल में एक भी मछली नहीं थी ! उसने देखा कि, टोकरी में रखी हुई और नदी तट पर बिखेरी गई  मछलियां भी टहनियों में तब्दील हो चुकी हैं ! अब...वहां कोई मछली थी ही नहीं ! घटनाक्रम से व्यथित होकर उसने ऊंचे पहाड़ की चोटी की ओर देखा, जहां चीकामस नदी को संरक्षित रखने वाली आत्मा, वॉन्टी मौजूद थी, आत्मा ने उस व्यक्ति से कहा कि तुमने, तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की ज़रूरतों से ज्यादा मछलियां पकड़ कर नदी और प्रकृति का विश्वास तोड़ा है, यह उसी का परिणाम है ! बहरहाल उसी दिन से वॉन्टी आत्मा, चीकामस नदी और स्वर्ग जैसी उस घाटी को सुरक्षित रखने के लिये, पहाड़ की चोटियों पर हमेशा मौजूद रहती है !

पश्चिमी कनाडा के सेलिश समुद्र तट के स्क्वामिश आदिवासियों के गांव के उत्तर में बहने वाली चीकामस नदी में हर साल अंडे देने के लिये आने वाली सलमन के शिकार के बहाने गढ़ी गई ये कथा, प्रकृति और मनुष्य के पारस्परिक सम्बन्धों में संतुलन की पैरवी करती है ! रोचक कथन ये कि कथा का नायक, अपने परिवार के लिये, आगामी चरम शीत काल के लिये, रसद संग्रहीत करने के उद्देश्य से नदी तट पर पहुंचा है ! उसे, उस ऋतु का ख्याल है, जिसमें सलमन को प्रजनन के लिये चीकामस नदी में आना है, उसके पास देवदार की जड़ों / तंतुओं से बना हुआ जाल है और छाल से बनी हुई टोकरी भी, जिसमें पकड़ी गई मछलियों को रखा जाना है ! कथनाशय ये कि आखेटक को उसके पारिवारिक जीवन के लिये शुभ अशुभ ऋतु का ज्ञान है, उसके लिये नदी है, मछलियां हैं और देवदार का पेड़ भी ! अस्तित्व रक्षण के लिये सारे का सारा प्रकृति प्रदत्त !

नदी की संरक्षक आत्मा, पहाड़ की चोटियों में रहती है,जैसा अद्भुत कथन,कदाचित उन ग्राम्य अनुभवों पर आधारित है, जोकि हिमाच्छादित पर्वत शिखरों से अवतरित नदियों को समतल सपाट मैदानों में बहते और फिर समुद्र से आलिंगन करते हुए देख कर हुए होंगे ! तटीय बसाहटों के लिये यह मान लेना स्वभाविक है कि, उसकी अनंत पीढ़ियों के संस्मरणों में अजर अमर बहती आई नदी को, हिम-शिखरों में रहने वाली आत्मा का आशीर्वाद / संरक्षण  प्राप्त है ! बहरहाल कथा का नायक प्रथम दृष्टय: प्रकृति की औदार्यता के आगे नतमस्तक दिखाई देता है जबकि वो मछलियों की आत्मा को इस बात के लिये धन्यवाद देता है कि वे, उसके परिजनों के, आगत कठिन समय की रसद बतौर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, उसकी मंशा पहले प्रयास में प्राप्त मछलियों को लेकर वापस घर लौटने की है किन्तु...

वह मनुष्य ही क्या? जो स्वभावगत द्वैध से पीड़ित ना हो ! संयमी हो पर...अति-कामी ना हो ! सहज उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग तो करे, लेकिन दुरूपयोग नहीं ! क्या यह संभव है ? इस आख्यान का नायक भी स्वभावगत द्वैध से पीड़ित है ! पहले पहल जहां वो प्रकृति के आगे नतमस्तक दिखाई देता है, वहीं कुछ ही समय के अंतराल में, वो प्रकृति और मनुष्यों के मध्य संतुलन के अलिखित अनुबंध का उल्लंघन करता है ! कथा का सन्देश यह कि, प्रकृति प्रदत्त संसाधनों की अंधी लूट मनुष्यता को भुखमरी के कगार पे ला पटकेगी ठीक वैसे ही जैसे कि आखेटक के साथ हुआ ! यानि कि सुदूर कनाडा के स्क्वामिश आदिवासी भी कहते हैं, अति की वर्जना हो !

शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

स्त्रियों को भगवान भी...

चेरोकी कहते हैं कि जिस दिन ईश्वर ने प्रथम पुरुष का सृजन किया, उसी दिन, उसकी संगिनी का सृजन भी कर दिया, फिर...वो दोनों लंबे समय तक सुखपूर्वक, एक साथ रहे, हालांकि बाद में उनमें, झगड़े भी होने लगे ! एक दिन, पत्नि ने नाराज होकर पति का घर छोड़ दिया और पूर्व दिशा में, सूर्य की धरती की ओर चल पड़ी ! पत्नि त्यक्त, एकाकी और शोकाकुल पति, रूठी हुई पत्नि के पीछे पीछे चलने लगा, लेकिन वो...अनवरत आगे बढ़ती रही, उसने एक बार भी पीछे, मुड़कर नहीं देखा ! सृजनहारे / ईश्वर को दु:खी पति पर दया आ गयी, सो उसने पति से पूछा, क्या तुम अब भी अपनी पत्नि से नाराज हो ? पति ने कहा, नहीं, बिलकुल नहीं ! सृजनहारे ने फिर से पूछा, क्या तुम उसे वापस पाना चाहते हो ? पति ने बेताबी के साथ कहा, हां, ज़रूर !  

तब सृजनहारे ने, स्त्री के रास्ते के दोनों ओर हकलबेरीज की शानदार फसल उगा दी, पर वो हकलबेरीज की तरफ ध्यान दिये बगैर आगे बढ़ गयी, फिर सृजनहारे ने ब्लेकबेरीज की फसलें उगाई, लेकिन स्त्री ने उन पर भी ध्यान नहीं दिया ! स्त्री को आकर्षित करने के लिये सृजनहारा, एक से बढ़ कर एक फलों वाले दरख़्त उगाता गया, यहां तक कि उसने खूबसूरत सुर्ख बेरियों से लदे फंदे झाड़ीनुमा दरख़्त भी लगाये पर...स्त्री इन सब को देखे बिना आगे बढ़ती गयी ! अचानक स्त्री ने अपने सामने स्ट्रॉबेरीज की लहलहाती फसल देखी, पहली बार, वो रुक गयी ! उसने कुछ स्ट्रॉबेरीज खाईं और फिर कुछ स्ट्रॉबेरीज तोड़ते हुए, उसका मुंह पश्चिम दिशा की ओर घूम गया...उसे अपने पति का ख्याल आया !

वो वहीं बैठ गयी, उसे आगे बढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई ! उस जगह, बैठे बैठे, पति के साहचर्य के लिये, उसकी अभिलाषा  बलवती ‍‌‌‌होती गयी, अंततः उसने पति की खातिर स्ट्रॉबेरीज के कुछ बेहतरीन गुच्छे तोड़े और वापस चल पड़ी घर की ओर ! पति लगभग सामने ही था, वो उससे मिला विनम्रता के साथ, प्रेमपूर्वक जैसे कि उनमें कोई झगड़ा हुआ ही नहीं था और फिर वे दोनों एक साथ बढ़ चले, अपने घर की ओर...   

वर्तमान समय में पति और पत्नि के संबंधों में प्रेम और झगड़े के सह अस्तित्व जैसी ये गाथा, सृष्टि के प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री के मध्य भी ठीक ऐसे ही संबंधों का बयान करती है, यानि कि प्रेम, सुख, झगड़े और फिर मान मनौव्वल ! संबंधों की स्थायी टूट का कथन इस अनुश्रुति में नहीं मिलता, जिससे प्रतीत होता है कि कथाकालीन समाज में स्त्रियों और पुरुषों के मध्य असहमतियां अथवा झगड़े होने के बाद पारस्परिक संवाद / पुनर्विचार, तदुपरांत एकात्म हो जाना, अनिवार्य सामुदायिक मान्यता रही होगी तथा स्थाई अलगाव को निषिद्ध माना गया होगा ! यह भी संभव है कि संबंधों की टूट को हतोत्साहित करने की गरज से आख्यान में ईश्वरीय हस्तक्षेप का कथन, सायास जोड़ा गया होगा !

आख्यान में नवदम्पत्ति के लंबे समय तक सुखपूर्वक साथ रहने और फिर सतत असहमत हो कर, परस्पर झगड़ने का उल्लेख किया गया है, जिसके कारण पत्नि, पति का घर त्याग देती है, यानि कि यह पुरुष प्रधान समाज था, जहां संपत्ति / घर पति का था ! उस दिन पति और पत्नि के झगड़े के दौरान पत्नि आहत (मनः) हुई, फिर उसने अपना गार्हस्थ्य जीवन त्यागने का निर्णय ले लिया और पूर्व दिशा स्थित कथित सूर्य देश की ओर चल पड़ी ! वो दु:खी / कुपित, इतनी कि, पीछे मुड़कर भी नहीं देखती ! बहरहाल पति अपने जीवन में पत्नि की अनुपस्थिति और उसके साहचर्य के मोल को समझ, पत्नि के पीछे पीछे चलने लगता है ! निःसंदेह ये उसका अपराध बोध है कि, वो दौड़ कर, पत्नि को रोक नहीं पाता या कि आवाज देकर वापस बुलाने का हौसला नहीं जुटा पाता !

संभवतः पति के ग्लानि बोध को महसूस कर ईश्वर उसकी सहायता करना चाहता है, लेकिन सहायता से पूर्व, वो अपनी दया अनुभूति की पुष्टि के लिये पति से सवाल पूछता है ! आख्यान में उदास पति के मददगार ईश्वर का चित्रण एक नौसिखिये के जैसा है जो कि यह भी नहीं जानता / समझता / बूझता कि उसके ही द्वारा रची गई प्रथम स्त्री के मान मनौव्वल के लिये प्रथम उपहार क्या होना चाहिए ? कहन ये कि सृजनहार होकर भी, रूठी स्त्री के मन से, ईश्वर के, अपरिचय का हाल ये है कि वो तरह तरह के वानस्पतिक टोटकों को आजमाता रहता है और अन्ततोगत्वा उसका एक तुक्का निशाने पर लग भी जाता है !

इस कथा को बांचते हुए, प्रतीत ये होता है कि ईश्वर चाहता है कि, रूठी हुई पत्नियों को उपहार देकर, विनम्रता से पेश आकर तथा सफल सुफल दाम्पत्य संबंधों के लिये पत्नियों के प्रति, कृतज्ञता ज्ञापित करने का दायित्व पतियों का है !


बुधवार, 19 जुलाई 2017

ढ़ोल

कहते हैं कि जब सृजनहारा धरती मां में बसाहट के लिये आत्माओं को स्थान दे रहा था तभी कहीं दूर बूम की जोरदार आवाज़ हुई जो कि क्रमशः सृजनहारे के निकट आती गई और सृजनहारा उसे तेजतर होते सुनता रहा ! जब आवाज़ सृजनहारे के ऐन सामने पहुंच गई तो सृजनहारे ने उससे पूछा तुम कौन हो ? आवाज़ ने कहा मैं ढ़ोल की आत्मा हूं ! कृपया आप मुझे आपके अद्भुत कार्य में भागीदार होने की अनुमति प्रदान करें ! सृजनहारे ने कहा भला तुम क्या योगदान दोगी ? आवाज़ ने कहा मैं लोगों के हृदय से निकली गायकी में उनका साथ दूंगी ठीक वैसे ही जैसे कि मैं स्वयं धरती मां के हृदय की धड़कन हूं / आवाज़ हूं ! इस तरह से सारा सृजन समस्वर / अनुकूलता  में गायेगा ! सृजनहारे ने यह सुन कर आवाज़ को सृजन कार्य में सहभागिता के लिये अनुमति प्रदान कर दी और तभी से ढ़ोल लोगों के सुरों की संगत करता है !

यहां तक कि  समस्त अर्वाचीन जातियों में ढ़ोल, गीतों का केन्द्र बिंदु बना रहता है वो गीतों की आत्माओं का उत्प्रेरक है , जिससे गीत सृजनहारे तक अथवा जहां तक वे प्रार्थना बन कर पहुंचना चाहें , पहुंच सकते हैं ! समस्त समयों में ढ़ोल ध्वनि को सम्पूर्णता प्रदान करता है ! दुःख, विस्मय, उत्तेजना, गंभीरता, शक्ति, साहस और गीतों में पूर्णता लाता है ! ये धरती माता पर निर्भर लोगों को धरती माता की धड़कनों की सहमति / स्वीकृति का बोध कराता है ! यह उस ईगल की निर्मिति करता है जो सृजनहारे तक संदेशों को लाता और ले जाता है ! यह लोगों के जीवन को बदल देता है !  

अनक्षर आदिम समाजों में प्रचलित अनुश्रुतियों के अध्ययन से कम-ओ-बेश ये तो स्पष्ट होता ही है कि व्यक्तिगत और समुदायगत अनुभवों के संचयन, में प्रकृति और मानवीय पर्यवेक्षण की सुसंगति अनिवार्य शर्त है ! अद्यतन अनुभवों / ज्ञान और विज्ञान के लिये पर्यवेक्षण, अनक्षर काल में जितना महत्वपूर्ण था उससे कहीं अधिक वह आधुनिकतम समाजों की अपरिहार्यता है ! विवेचनाधीन आख्यान अबनाकी आदिम समुदाय की सृष्टि सृजन विषयक मान्यताओं पर आधारित है, वे आश्चर्यजनक रूप से सृष्टि सृजन के समय नाद / ध्वनि की उपस्थिति की परिकल्पना करते हैं, जैसे कि उनके स्वयं के दैनिन्दिक, व्यक्तिगत या सामुदायिक जीवन घटनाक्रम, जनम, मरण, उल्लास, शोक समय में ध्वनि की भूमिका दिखाई देती है, बिलकुल वैसी ही सृष्टि सृजन के समय भी रही होगी, की धारणा पर आधारित है ये कथा !  

सृजनहारा धरती में बसाहट के लिये, आत्माओं को भूमिकायें और प्रस्थितियां सौंप रहा है, तभी सुदूर कहीं तुमुल नाद का प्रकटीकरण, नाद से सृजनहारे की अनभिज्ञता और परिचय अलबेला है ! नाद स्वयं कहे कि वह ढ़ोल की आत्मा है और उसे धरती में हो रहे अद्भुत सृजन कार्य में भागीदारी की लालसा है, ठीक वैसे ही जैसे कि आदिम समुदाय के दिन प्रतिदिन के जीवन में उसकी सक्रिय भागीदारी है,सशक्त हस्तक्षेप है ! नाद स्वयं को धरती मां के हृदय की धड़कन कहे और मनुष्यों के गीतों में अनुकूलता और समस्वरता के रूप में स्वयं के अभिव्यक्त होने का कथन करे तो इसे आख्यान कहने, रचने वाले समुदाय की सृजनशीलता / कल्पनाशीलता का सर्वश्रेष्ठ ही माना जाएगा ! सृजन कर्म में नाद की भूमिका को ईश्वर का स्वीकरण, गीतों / गायन और सुरों में, ढ़ोल की सुसंगति को मनुष्यों के समर्थन जैसा है !

कथा में ढ़ोल को समस्त आदिम समुदायों के गीतों का केन्द्र बिंदु माना गया है ! आशय यह कि ढ़ोल गीतों से लेकर दुःख,उल्लास,विस्मय, उत्तेजना और शक्ति प्रदर्शन के समयों में तथा मनुष्यों की प्रार्थनाओं में परिपूर्णता का प्रतीक है, यानि कि ढ़ोल नाद की पूर्णता है, वो सृजनहारे तक पहुंचने की आकांक्षा रखने वाले मनुष्यों की सफलता की आश्वस्ति है, संदेशों के सम्प्रेषण साफल्य और एक एक एकाकी मनुष्यों के सम्पूर्ण समुदाय में बदलते जाने का महती माध्यम है ! कुल मिलाकर यह आख्यान ईश्वर, मनुष्य और धरती के मध्य एक-लय होने का कथन है ! सृष्टि में नाद की अनिवार्य उपस्थिति जो कि ईश्वरीय सृजन को सम्पूर्णत्व, धरती मां के हृदय को धड़कन और मनुष्यों को सामाजिक सांस्कृतिक प्राणी हो जाने का वरदान दे !

सोमवार, 17 जुलाई 2017

उस पार वसंत

उस योद्धा की प्रेयसी की मृत्यु विवाह से ठीक पहले हो गई थी, हालांकि वह एक प्रतिष्ठित और भला इंसान था, किन्तु उसे मृत्यु ने ग़मगीन कर दिया ! वो समय पर खाने और सोने में असमर्थ था, यहां तक कि दोस्तों के साथ आखेट पर जाने के बजाय वो प्रेयसी की कब्र के पास शून्य में देखते हुए समय गुज़ारता ! एक दिन उसने बुजुर्गों से आत्मा के संसार के विषय में सुना और उस रास्ते के हर क्षण को गहनता से याद कर लिया ! उसे पता था कि आत्मा का संसार दक्षिण दिशा में है, सो उसने दक्षिण की ओर प्रस्थान कर दिया, यद्यपि दो सप्ताह तक चलते हुए भी उसे भूदृश्य में कोई परिवर्तन दिखाई नहीं दिया, जिससे पता चलता कि आत्मा का संसार निकट ही कहीं है !
चलते चलते वह जंगल से बाहर निकला और उसने देखा मैदान पर एक झोपड़ी बनी हुई है, जिसमें एक बुद्धिमान बूढा रहता था, उसने उस बूढ़े से दिशाओं के विषय में पूछा ! बूढा भली भांति जानता था कि यह वही / कौन योद्धा है ! उसने कहा कि उसकी वधु की आत्मा एक दिन पहले ही इस मार्ग से गुज़री है, योद्धा भी वहां जा सकता है, बशर्ते कि वो अपने शरीर को यहीं छोड़ कर अपनी आत्मा को उन डोंगियों तक ले जाए जो बड़ी झील के किनारे ठहरी हुई हैं, जहां से वे उसे आत्मा के संसार वाले टापू तक ले जायेंगी ! बूढ़े ने योद्धा से कहा कि वह तभी तक सुरक्षित रहेगा जब तक कि वह टापू तक पहुंचने से पहले अपनी वधु की आत्मा से बात नहीं करेगा !
बूढ़े ने मन्त्र पढ़े ! योद्धा ने अनुभव किया कि उसकी आत्मा उसके शरीर से बाहर आ गयी है और वो बड़ी झील के किनारे की डोंगी तक जा पहुंचा, उसने देखा कि उसकी वधु की आत्मा एक डोंगी पर बैठी हुई है, तो वो एक अलग डोंगी में बैठ कर डोंगी को झील में खेने लगा, उसने देखा कि उसकी वधु की आत्मा भी उसकी तरह से अपनी डोंगी का परिचालन करने लगी है ! वे दोनों एक ही डोंगी पर एक साथ इसलिए नहीं बैठे क्यों कि उन्हें मालूम था कि आत्मा के संसार तक एक आत्मा एक ही डोंगी में बैठ कर जा सकती है और जहां हरेक का व्यक्तिगत मूल्यांकन किया जाना होता है ! झील के मध्य तक पहुंचते पहुंचते एक तूफ़ान उठा और उन सभी आत्माओं की डोंगियों को उड़ा ले गया जो अपने जीवन काल में दुष्ट थे किन्तु योद्धा और उसकी प्रेयसी अच्छे लोग थे इसलिए वे दोनों अपनी डोंगियों सहित सुरक्षित बने रहे !
उसने देखा कि पानी उथला और पारदर्शी हो चला था ! वह द्वीप अत्यंत सुन्दर था वहां आस्मां साफ़ था और हर समय वसंत बिखरा रहता था ! ना ज्यादा गर्म और ना ही ज्यादा ठंडा ! उसने अपनी वधु का हाथ अपने हाथ में ले लिया बमुश्किल वह दस कदम ही साथ चले होंगे कि पीछे से एक मधुर आवाज़ आई, जो उसके जीवन स्वामी उसी बूढ़े की आवाज़ थी, जो कह रही थी कि योद्धा का समय अभी पूरा नहीं हुआ है, सो उसे वापस लौट आना चाहिए ! योद्धा सावधानी से वैसे ही वापस लौटा जैसे कि आगे बढ़ा था ! वहां से घर लौट कर वह एक महान मुखिया बना क्योंकि उसे मालूम था और वह आश्वस्त था कि कुछ समय वो बाद पुनः अपनी प्रेयसी से मिल / देख पायेगा !
अल्गोनक्यिन आदिवासियों की ये किंवदंती मूलतः जीवन और मृत्यु के दार्शनिक पक्ष को संबोधित है, कथा में नायक समर निपुण है किन्तु प्रेयसी की आसमयिक मृत्यु उसे जीवन के प्रति उदासीन बना देती है, प्रेयसी की कब्र के निकट बैठ कर  सतत शून्य / आकाश को निहारना उसकी मन:स्थिति का संकेत देती है, उसके जीवन में आई रिक्तता का विवरण देती है ! उसके लिये यह समय मृत्यु के बाद की परिस्थितियों के आकलन का समय है ! वो अनुभवी लोगों / वृद्धजनों से मृत्यु लोक के विवरण / दिशा ज्ञान आदि लेकर घर से निकल पड़ता है ! प्रवास के समय, गंतव्य स्थल के निर्धारण की अनिश्चितता इस आख्यान का महत्वपूर्ण कथन है !
जंगल के भटकाव की प्रतीकात्मकता के उपरान्त खुले सपाट मैदान में अनुभवी बूढ़े / ज्ञानी की उपस्थिति और मृत्यु लोक विषय विशेषज्ञ बतौर उसके साधारण से झोपड़े का संकेत / विवरण बेहद महत्वपूर्ण है ! जीवन समृद्धियों / विलासिताओं के उपरान्त ऐन मृत्यु के द्वार पर एक सहज सरल झोपड़ा, भारतीय परम्परा के उन ऋषियों / सिद्ध पुरुषों के वानप्रस्थी / सन्यस्त होने के जैसा, जो कि गार्हस्थ्य जीवन से मुक्ति यात्रा के दौरान इहलोक और परलोक की संधि रेखा में अभ्यास काल से गुज़र रहे हों ! अमेरिकन इन्डियन और भारतीय समाज के मध्य की भौगोलिक दूरियों के बावजूद मृत्यु के दर्शन का यह साम्य अद्भुत है, सम्पूर्ण विश्व में पसरी / व्यापी मानव जातियों के एक्य का प्रतीक !
बूढ़े ने मन्त्र पढ़े, दु:खी दिग्भ्रमित योद्धा की आत्मा को शरीर से मुक्त कर आत्माओं के संसार में भेजा जहां योद्धा की प्रेयसी अपनी मोक्ष यात्रा का अंतिम चरण पार करने वाली है ! एक आत्मा के लिये एक डोंगी जिसे स्वयं ही खेना है, तूफ़ान में बुरी आत्माओं के विनष्ट हो जाने, आसमान के बादल हीन होने और मृत्यु लोक के हमेशा वासंती बने रहने, मौसम साम्य तथा जल की पारदर्शिता जैसे कथन मृत्यु लोक की स्तुति के कथन हैं ! ये सारे इस आश्वस्ति के कथन हैं कि जीवन के बाद भी, भले लोगों के अनहद सुख और आह्लाद का एक संसार है ! अतः मृत्यु का शोक व्यर्थ है ! मृत्यु वास्तव में जीवन के उपरान्त का जीवन होने जैसी है, दैहिकता से आत्मिकता के सत्य की ओर ! 
कथा का नायक, जीवन और मृत्यु की इस दार्शनिक व्याख्या से संतुष्ट होकर, मृत्यु जनित प्रणय नैराश्य से मुक्त होकर, अपने समुदाय में अच्छे मुखिया की तरह से दायित्वों का निर्वहन करता है, क्योंकि उसे यह विश्वास हो गया है कि उसकी प्रेयसी और वो, अंततः मिलेंगे...हमेशा हमेशा के लिये, एक बेहतर और सुखकर दुनिया में ! 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2014

धुन के राही...!

उस दिन आदि देव अपनी गुफा के मुहाने पर लगे दरख़्त की छाया में बैठा था, जबकि अनेकों वर्ण के लोग उसके सामने हाज़िर हुए, उसने रक्त वर्ण लोगों से पूछा, मुझे अपना नज़रिया / दृष्टिकोण बताओ ? रक्त वर्ण लोगों ने कहा, हम केवल अपने बुजुर्गों द्वारा बताये गये तरीके से ही प्रार्थना करते हैं, हमारे लिये, उनकी विरासत, उनका नज़रिया, उनका तरीका ही महत्वपूर्ण है ! रक्त वर्ण लोगों का उत्तर सुनकर आदि देव ने गहरी सांस ली, हूंsss...फिर उसने कृष्ण वर्ण लोगों से भी यही सवाल किया, कृष्ण वर्ण  लोगों ने कहा कि, हमारी माताओं ने हमें जिन जिन भवनों में आने जाने के लिये जैसे जैसे तरीके समझाये और हमारे पिताओं ने जिस विधि से झुकना और प्रार्थना करना सिखाया, हमारे लिये केवल उसका ही अनुसरण करना महत्वपूर्ण है और हम यही करते हैं,  कृष्ण वर्ण लोगों के उत्तर को सुनकर आदि देव ने पुनः गहरी सांस ली, हूंsss...

इसके बाद उसने, पीत वर्ण लोगों से कहा कि तुम लोग, मुझे अपना नज़रिया / दृष्टिकोण बताओ ? पीत वर्ण लोगों ने कहा, कि हमारे पूर्वजों / शिक्षकों ने उठने बैठने, बात चीत करने तथा पूजा के जो तौर तरीके बताये हैं,हमारे लिये केवल वे ही महत्वपूर्ण हैं ! आदि देव ने यह उत्तर सुनकर फिर से गहरी सांस ली, हूंsss... फिर उसने श्वेत वर्ण लोगों से भी यही सवाल दोहराया ! श्वेत वर्ण लोगों ने कहा कि, अपने नित्य जीवन व्यवहार और प्रार्थनाओं के लिये, हमारी किताबों में जो जो लिखा है और जैसा भी लिखा है, हम केवल उसका ही पालन करते हैं, यही हमारे लिये सर्वाधिक महत्वपूर्ण दृष्टिकोण है ! श्वेत वर्ण लोगों के उत्तर को सुनकर आदि देव ने एक बार फिर से गहरी सांस ली, हूंsss...! भिन्न वर्ण के लोगों से संवाद के बाद आदि देव ने धरती से पूछा, क्या तुमने इन सब लोगों को कोई नज़रिया / कोई दृष्टिकोण नहीं दिया ?

धरती ने कहा, हां दिया, इन सभी को एक विशेष उपहार की तरह से, पर...ये सब अपने अपने पूर्वजों के तरीकों को सर्वश्रेष्ठ ठहराने की कवायद में ही लगे रहे और इन्होने मेरे उपहार की तरफ ध्यान ही नहीं दिया ! अब आदि देव ने यही सवाल, पानी, आग, हवा, पशु, पक्षी, कीट पतंगों, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और तारों, यहाँ तक कि, अन्य सभी आत्माओं से भी पूछा, उन सभी ने वो ही जबाब दिया, जोकि धरती ने दिया था, मनुष्यों के इस व्यवहार के बारे में सुनकर आदि देव को बेहद दुःख हुआ ! उसने रक्त वर्ण, कृष्ण वर्ण, पीत वर्ण, श्वेत वर्ण, के लोगों से कहा, तुम लोग अपने बुजुर्गों, माता पिताओं, शिक्षकों और उनकी किताबों का अनुसरण करते हो, सम्मान करते हो, उनकी विधियों को अच्छा मानते हो, ये तो ठीक है, पर...स्मरण रहे कि अब वे सब इस धरती पर जीवित नहीं हैं, उनके तरीके उनके लिये, उनके समय के लिये, सर्वश्रेष्ठ रहे होंगे, लेकिन...!

इन सबमें तुम्हारा अपना नज़रिया / अपना दृष्टिकोण कहाँ है ? तुम्हारा अपना नज़रिया, जोकि तुम्हारे समय में तुम्हारे लिये सर्वश्रेष्ठ हो, उचित हो ! सच तो ये है कि तुम सब अपना नज़रिया भूल चुके हो, अतः बेहतर है कि तुम सब अपने नज़रिये के लिये प्रयत्न करो ! पूर्वजों / अतीत की तुलना में तुम्हारे अपने वर्तमान का अपना नज़रिया ही, तुम्हारे लिये सर्व श्रेष्ठ होगा ! यह कठिन ज़रूर है, पर यही तुम्हारे लिये बेहतर है ! तुम अपने पूर्वजों को दिल में रखो, उन्हें सम्मान दो, उनके अनुभवों, उनके तरीकों को दिल से चाहो पर...आज के लिये, तुम्हारे अपने लिये, तुम्हारा अपना स्वयं का नज़रिया होना ही चाहिये !

इस लोक आख्यान को बांचते हुए, प्रजातीय / दैहिक लाक्षणिकता के आधार पर भिन्न दिखाई दे रहे लोगों में एक अदभुत व्यवहार  साम्य दिखाई देता है कि, उनमें से किसी के भी पास, वर्तमान समय का अपना स्वयं का कोई विजन / नज़रिया मौजूद नहीं है, वे सभी अतीत के पदचिन्हों पर जस का तस चलने वाले यात्री हैं, पूर्वजों के समय की आनुभाविकता को विचारहीन तरीके से अनुसरित करने वाले / यथास्थितिवादी लोग हैं, कमोबेश सबके सब ‘स्टीरियो टायप’ अतीत की धुन के राही हैं ! इस लोक आख्यान में अतीत के तरीकों को स्मृत रखने तथा हृदय से सम्मान देते रहने की नसीहत के साथ ही वर्तमान के अनुकूल, स्वयं की वैचारिक / बौद्धिक धार को तेज करने का आह्वान ‘असाधारण’ है ! ये कथा सभी वर्ण के लोगों पर अतीत का अनुसर्ता होने तथा दैहिक गोलबन्दियों पर आधारित पूर्वजों की सीख की श्रेष्ठता की अवांछित बहस में लिप्त बने रहने का आरोप लगाती है !   

प्रतीत होता है कि इस आख्यान में उल्लिखित आदि देव, ईश्वर होने की बजाये उक्त काल खंड का सबसे अनुभवी तथा आदरणीय बुज़ुर्ग व्यक्ति है, जो सभी वर्णों, भिन्न जनसँख्या समूहों के लिये समादृत है !  वो एक गुफा में निवास करता है और अपने ही आंगन में पारस्परिक संवाद के लिये चौपाल लगाता है, किसी एक दिन की चर्चा के दौरान भिन्न प्रजातीय समूहों ने उसे इस आशय में निराश कर दिया है कि उन सबके पास अपना स्वयं का विजन नहीं है और वे सभी अपने अतीत की कथित श्रेष्ठता का अंधानुकरण करने में लगे हुए हैं ! आदि देव धरती, पानी, आग, हवा, पशु, पक्षी, कीट पतंगों, आकाश, चंद्रमा, सूर्य और तारों, यहाँ तक कि, अन्य सभी आत्माओं से संवाद करने की सांकेतिकता के आधार पर यह स्पष्ट संकेत देता है कि भिन्न वर्ण के लोगों ने अपनी प्रकृति का पर्यवेक्षण, स्वयं करने की अपनी क्षमता, अपने कौशल, अपने बौद्धिक सामर्थ्य का विकास करना आवश्यक नहीं समझा है ! 

आदि देव से संवाद करते हुए प्रकृति के अंश धरती, हवा, पानी वगैरह वगैरह ,मनुष्य को नैसर्गिक तौर पर एक उपहार देने की बात कहते है, इसका आशय स्पष्टत: मनुष्य की बौद्धिक क्षमता से है, जिसे कि वह लेश मात्र भी इस्तेमाल / परिमार्जित किये बिना, पूर्वजों की पूजा करने और उनकी सिखाई हुई विधियों का अंधा अनुसरण करने में लगा हुआ है, आख्यान में आश्चर्यजनक रूप से भिन्न वर्ण के लोगों को अपने अपने समुदाय की अतीत कालिक श्रेष्ठता को स्थापित करने की पारस्परिक बहसों में लिप्त तथा व्यर्थ में समय नष्ट करने वाला बताया गया है ! ये लोग प्रकृति प्रदत्त क्षमताओं का परिष्कार किये बिना उच्चता और हीनता के ‘युद्ध’ में संलग्न हैं ! आदि देव भिन्न वर्णीय लोगों को समय के साथ चलने की नसीहत देता है किन्तु सावधानी ये कि वो उन्हें अतीत के अनुभवों को स्मृत बनाये रखने का सुझाव भी देता है, उसकी कोशिश, अंधानुकरण मुक्त सजग समाज की स्थापना की !

सोमवार, 22 जुलाई 2013

हरित वर्ण रेशमी परिधान...!

वो गर्मियों के दिन थे , जबकि नौजवान अध्येता ‘यू’ शांतिपूर्वक अध्ययन कर पाने के ख्याल से पहाड़ी वाले मंदिर में जा पहुंचा, वहां उसने कई दिन और रात लगातार सुकून भरे माहौल में अध्ययन करते हुए गुज़ारे...अब वो थकने लगा था ! एक रात वह अपनी टेबिल पर ही हाथों का सिरहाना बना कर सो गया...असावधानी वश थोड़ी सी स्याही उसकी टेबिल पर बिखर गई थी ! वह गहरी नींद में था , सो ज़ल्द ही , उसके ख्वाब जाग उट्ठे ! उसे लगा कि हरित वर्ण के शानदार रेशमी परिधान पहने हुए एक खूबसूरत युवती , उससे मदद की गुहार कर रही है ! वो युवती ‘यू’ पर झुकते हुए गिड़गिड़ाई , कृपया मेरी मदद करो, शायद...खतरे में फंसी हुई युवती की आखिरी चीख सुनकर वह जागा और उसने अपने चारों तरफ देखा , वहां कुछ भी नहीं था !

बस एक भिनभिनाहट...जो खिड़की के बाहर मकड़ी के जाले में फंसी हुई मधुमक्खी कर रही थी ! मधुमक्खी के जीवन के ये अंतिम क्षण ही रहे होंगे , मकड़ी बस उसे अपना आहार बनाने ही वाली थी कि ‘यू’ ने खिड़की खोल कर , उस जाले के ऊपर झूलती हुई शाख से एक पत्ता तोड़ कर मकड़ी को दूर झटक दिया...और फिर उसी पत्ते के सहारे उस मधुमक्खी को अपनी टेबिल पर ले आया,मधुमक्खी लगभग बेसुध थी ! कुछ लम्हे के बाद वह हिली और लड़खड़ाते हुए , टेबिल पर बिखरी हुई स्याही के ऊपर चलने लगी , उसके बाद वह नौजवान ‘यू’ के कागजों के ऊपर कदमताल सा करती हुई हवा में उड़ गई ! ‘यू’  हैरत के साथ यह सब देखता रहा , उसने पाया कि उसके तालपत्र में आड़े टेढ़े कांपते थिरकते से नन्हें नन्हे से हर्फों में धन्यवाद लिखा हुआ साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था !

इस आख्यान के हवाले से पहली बात , स्पष्ट यह कि ज्ञानोत्सुक को एकांत की आवश्यकता होती है, जहां वह बिना व्यवधान अपने चिंतन मनन और अध्ययन का कार्य कर सके ! कथा कालीन समाज नि:संदेह आध्यात्मिक प्रकृति वाला समाज रहा होगा जहाँ पूजा और साधना के स्थल को सामान्य बसाहट से इतर पहाड़ की ऊंचाई में स्थापित किया गया होगा !  कहने का आशय यह है कि उक्त समाज में मंदिर / उपासना स्थल ज्ञान अर्जन के लिए उपयुक्त स्थल माना गया होगा ! संभव है कि चीनी पृष्ठभूमि के इस आख्यान में उल्लिखित मंदिर कोई बौद्ध पगोड़ा ही रहा हो जहां ‘यू’ नाम का साधक अपने बौद्धिक तोष के लिए उपस्थित हुआ हो...हालांकि चीनी मूल के किसी धर्म के उपासना स्थल के रूप में भी , उसका आशय , ज्ञान केन्द्र वाला ही माना जायेगा !

अध्येता ‘यू’ प्रकृति के निकट , धार्मिक उन्मुखता वाले स्थल में ज्ञानार्जन का यत्न करते हुए थककर सो जाता है और उसे ख्वाब में किसी युवती का आर्तनाद , सहायता की याचना का स्वर साफ़ सुनाई देता है , वह उसे हरे  रेशमी धागे वाले लिबास में देखता है , नि:संदेह मंदिर के चहुँ दिश की हरितिमा के आलोक / सन्दर्भ में यह रेशमी लिबास मकड़ी के द्वारा बुना गया जाला ही हो सकता है, धागों में फंसी हुई मधुमक्खी का रेशमी हरा लिबास एक गज़ब की अनुभूति है, मकड़ी के बुनाई कौशल की अदभुत प्रशंसा है !साधक ‘यू’ ख्वाब में आभासी तौर पर एक नन्हे से जीव को भी स्त्री रूप में देखता है , जोकि सुंदर है और उससे दया की याचना कर रही है ! अतः प्रतीति यह कि एकांतिक साधक होने के बावजूद उसका अंतर्मन सुन्दर ‘स्त्री’ की लालसा से मुक्त नहीं है !

‘यू’ अनजाने में ही एक सुंदर युवती का स्वप्न देखते हुए यह सिद्ध करता है , कि या तो उसके ज्ञान मार्ग में स्त्रियों का निषेध है ही नहीं अथवा उसकी साधना , उसे स्त्रियों के प्रति उसके नैसर्गिक लगाव से दूर नहीं कर सकी ! बहरहाल इस कथा का एक अन्य आयाम यह भी है कि किसी अच्छे साधक के लिए मधुमक्खी जैसा नन्हा कीट भी उतना ही अधिक महत्वपूर्ण है, जितना कि उसके स्वयं के स्वजन स्वरुप मनुष्य अथवा उसकी प्रियतम-सह-सर्वोपरि अभिलाषा स्त्री ! वह आक्रामक मकड़ी की जान नहीं लेता बल्कि उसे, हरे कोमल पत्ते की सहायता से मधुमक्खी से दूर कर देता है और मधुमक्खी की जान बचाता है ! अतः लगता है कि सर्व-जीव समभाव की सांकेतिकता लिये हुए यह कथा मांसाहार के विरुद्ध और अहिंसा / दया / करुणा के पक्ष में खड़ी हो गई हो !

इस कथा के अनुसार मधुमक्खी अपने जीवन रक्षक के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए अपने पैरों का उपयोग करती है , वह टेबिल पर बिखरी हुई स्याही से अध्येता के तालपत्र पर धन्यवाद लिखती है , नि:संदेह कथा का ये धन्यवाद अंश ध्वन्यात्मक , शाब्दिक , भाषाई दृष्टि से कीट समाज और मनुष्य समाज के मध्य पारस्परिक संवाद के लिए अनुपयुक्त ही माना जायेगा ! हमें मधुमक्खी के धन्यवाद ज्ञापन को उसकी प्रतीकात्मकता में स्वीकारना होगा और यह भी कि साधक / ज्ञानी / बुद्ध  के लिए भाषाई असाम्यता संचार को बाधित नहीं करती ! आशय यह कि जो भी व्यक्ति ज्ञानी / ज्ञानोत्सुक हो उसके लिए विविध भाषायें / भिन्न देह आकृतियां और सांसारिक विविधतायें मायने नहीं रखतीं , वह हर तरह के भेद भाव से मुक्त हो जाया करता है ! 

बुधवार, 10 जुलाई 2013

बांसुरी बजैया : उइगुर अनीस

मुद्दतों हुईं जब कि उइगुर जमींदार ने अनीस नाम के बालक को बतौर चरवाहा काम पर रखा था ! अनीस को बांसुरी बजाने का बेहद शौक था ! उसकी छोटी सी बांसुरी, साधारण से बांस से बनी हुई थी, लेकिन उसके नन्हें हाथों में वह एक शानदार वाद्ययंत्र बन गई थी ! उसके बांसुरी वादन को बहुतेरे लोग पसंद करते, वे लोग उसके चारों तरफ बैठ कर लुत्फंदोज़ हुआ करते, लेकिन जमींदार को यह बात सख्त नापसंद थी ! जमींदार बात बात पर अनीस को डांटा करता, तुम घटिया लड़के, क्या मैं तुम्हें बांसुरी बजाने के लिए पैसे देता हूं ? हालांकि सच बात ये थी कि अनीस के बांसुरी बजाने की वज़ह से ज़मींदार के काम का ज़रा भी हर्ज़ा नहीं होता था !  

एक दिन ज़मींदार ने अनीस की जम कर पिटाई की और उसकी बांसुरी को टुकड़ों में तब्दील कर दिया ! अनीस अपनी आँखों में आंसू लिए ज़मींदार का घर छोड़ने को मजबूर हो गया ! संयोगवश, सड़कों पर बिलखते, भटकते अनीस को एक बूढ़ा व्यक्ति मिला जिसने अनीस के सिर पर हाथ फेरते हुए, उसके रोने का कारण पूछा ! अनीस ने कहा, दादा जी, मैं एक चरवाहा हूं, मुझे, मेरे जमींदार मालिक ने मार पीट कर घर से बाहर निकाल दिया और उसने मेरी बांसुरी भी तोड़ डाली है ! बूढ़े व्यक्ति ने अनीस को सांत्वना देते हुए कहा कि, तुम मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें स्वयं को बदलने की राह दिखाऊंगा और वो अनीस को अपने घर ले गया !

बूढ़े व्यक्ति ने अनीस को उसकी पुरानी बांसुरी की तुलना में एक अच्छी बांसुरी बना कर दी और उसे बांसुरी बजाने की बेहतर शिक्षा भी दी ! उस बूढ़े व्यक्ति की संगीत शिक्षा और उसके सानिध्य में अनीस पहले से कहीं ज्यादा शानदार बांसुरी बजाने लगा, यहां तक कि इंसानों के अलावा जानवर और परिंदे भी उसके बांसुरी वादन पर सम्मोहित होने लगे थे ! वे सभी उसके मित्र बन गये थे ! उधर ज़मींदार ने एक दिन अपने पुत्रों  को बुलाकर कहा कि मैंने आज रात सपने में एक खरगोश देखा है, जो कि बर्फ की तरह से सफेद रंगत वाला है और उसके माथे पर एक काला टीका है ! तुम लोग जाओ और जंगल से,उसे मेरे लिए ढूंढ कर लाओ !

पुत्रों ने कहा, पिता जी ऐसे खरगोश के बारे में हमने कभी नहीं सुना और ना ही कभी देखा है, हम उसे कैसे ढूंढ पायेंगे ? ये सुनकर ज़मींदार गुस्से से चिल्लाया, अरे मूर्खो, मैंने जो कहा है, वो ही करो, तुममे से जो भी ये काम पूरा करेगा वो ही मेरा वारिस बनेगा ! सबसे बड़े पुत्र ने वारिस बनने के ख्याल से, अपने भाइयों से कहा कि मैं आगत के किसी जोखिम से भयभीत नहीं हूं, सो पिता को खुश करने के लिए मुझे जाने दो...और फिर बड़ा भाई खरगोश की खोज में निकल पड़ा, रास्ते में उसे एक बूढ़ा मिला जिसने, उसके प्रवास कारण जान कर उसे सलाह दी कि वह जंगल की ओर जाये, जहां अनीस नाम का चरवाहा बूढ़े के जानवरों की देखभाल करता मिलेगा !

बूढ़े ने कहा कि अनीस, उसकी मदद ज़रूर करेगा, अतः बड़ा पुत्र, अनीस को खोजते हुए जंगल के अंदर जा पहुंचा जहाँ अनीस से मिलते ही, उसने खरगोश की खोज में अनीस की मदद मांगी ! अनीस मुस्कराया, उसने कहा, अगर तुम मुझे एक हज़ार रुपये दोगे तो मैं तुम्हारी मदद ज़रूर करूँगा !  ज़मींदार के बेटे ने विरासत में मिलने वाली संपत्ति की तुलना में एक हजार रुपये की रकम की तुच्छता को ध्यान में रख कर कहा, ठीक है , वो अपने घर गया और वहां से रुपये लेकर वापस लौटा तो उसने देखा कि अनीस पेड़ की एक शाख में बैठा बांसुरी बजा रहा था और जंगल के सारे जानवर, परिंदे उसके चारों ओर बेसुध से, बांसुरी की तानों में खोये हुए थे !

वहां वह खरगोश भी था जो उसके ज़मींदार पिता ने स्वप्न में देखा था ! अनीस ने बांसुरी धरती पर रख दी और उस खरगोश को पकड़ कर, उसके हवाले करते हुए कहा संभाल कर पकड़ो, अगर यह छूट गया तो फिर मेरी कोई जिम्मेदारी नहीं होगी ! उसने कृतज्ञतापूर्वक खरगोश को अनीस के हाथों से ले लिया और अनीस को रुपये देकर घर की ओर वापिस चल पड़ा ! जब वह जंगल से बाहर निकलने ही वाला था तो अनीस ने पुनः बांसुरी बजाना शुरू कर दिया ! बांसुरी की धुन सुनते ही खरगोश उसके हाथों से फिसल कर भाग निकला फिर उसने खरगोश की खोज में बहुत समय बर्बाद किया पर वो कहीं भी मिला ही नहीं !

वह वापस अनीस के पास पहुंचा तो, अनीस ने उससे कहा, मैंने तुम्हें पहले ही आगाह कर दिया था, अब मैं क्या कर सकता हूं ? मुझे बेवजह दोष देने से कोई फायदा नहीं होगा ! निराश पुत्र खाली हाथ घर वापिस लौटा और उसने घर वालों को सारा किस्सा बयान किया ! इसके बाद ज़मींदार के दोनों छोटे बेटों के साथ भी यही घटनाक्रम दोहराया गया ! अपने बेटों के हाथों हुए तीन हज़ार रुपये के नुकसान से बौखलाये, ज़मींदार ने कहा, तुम सब नाकारा हो अब मैं खुद ही जाऊंगा उस खरगोश को लाने ! अपनी आँखों में नफरत के अंगार लिए वह अनीस के पास जा पहुंचा...इससे पहले कि वो कुछ बोलता कि अनीस ने फिर से बांसुरी बजाना शुरू कर दिया !

लेकिन इस बार अनीस के बांसुरी बजाते ही, जंगल के तमाम जानवरों, खरगोश, भालू, भेड़ियों, लोमड़ियों, साँपों और तरह तरह के पशु पक्षियों ने जमींदार को चारों तरफ से घेर लिया, डर के मारे ज़मींदार का चेहरा सफेद पड़ चुका था, वो अनीस के पैरों पर गिर पड़ा और चिल्लाया, मेरे स्वामी, मेरी जान बचा लो !  अनीस ने उससे कहा, तुम्हें मेरी याद है ? मेरी बांसुरी के एक संकेत ( सुर ) मात्र से ये सब तुम्हें जिंदा खा जायेंगे !  थरथर कांपता हुआ जमींदार अनीस के चरणों में लोटने लगा, उसने बिलखते हुए कहा, आप जो कहोगे मैं करूँगा पर...मेरे स्वामी, मेरे साथ वो व्यवहार मत करो जो मैंने आपके साथ किया था !

जमींदार ने कहा, मैं वादा करता हूं कि मैं अपनी निकृष्ट प्रवृत्ति का त्याग कर दूंगा !  अनीस ने कहा, ठीक है, मैं तुम्हें एक जीवन अवसर ज़रूर दूंगा, लेकिन ध्यान रहे, यहां से लौटने के बाद तुम अपनी संपत्ति का आधा हिस्सा गरीबों में बाँट दोगे और भविष्य में कभी भी किसी गरीब पर अत्याचार नहीं करोगे ! ज़मींदार कांपते हुए अपने पैरों पर खड़ा हुआ और उसने अपनी प्राण रक्षा की एवज वह सब करने का वचन दिया जो भी अनीस ने उससे कहा था ! गांव वापिस जाकर उसने अनीस को दिये, अपने वादे को निभाया ! कहते हैं कि इस घटना के बाद से जन सामान्य के मध्य अनीस और भी लोक प्रिय हो गया था !

शिनझियांग प्रान्त की यह उइगुर लोक कथा, मूलतः संगीत की शक्ति को आख्यायित करती है ! एक साधारण से बांस से बनी बांसुरी के सुर को साध कर एक साधारण सा चरवाहा, समाज में व्याप्त वर्ग विभेद, संपत्ति वैषम्य को कम करने का सामर्थ्य पा जाता है ! इस आख्यान का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि कथा में उल्लिखित ज़मींदार और चरवाहा पात्र मूलतः इस्लाम धर्म के अनुयाई है यानि कि चीन के उइगुर मुसलमान, अतएव उनके धर्माचरण के अनुसार संगीत के प्रशिक्षण और प्रसरण का कार्य सामान्यतः निषिद्ध होना चाहिए था फिर भी अनीस बांसुरी वादन से प्रेम करता है ! यही नहीं समाज के बहुतेरे लोग भी उसके बांसुरी वादन से प्रेम करते हैं !

इस कथा से यह स्पष्ट होता है कि ज़मींदार को छोड़कर शेष जन साधारण पक्ष भी संगीत के प्रति मोहासिक्त है, भले ही वे सभी घोषित तौर पर इस्लाम के अनुयाई हों ! मुझे लगता है कि धर्मान्तरण से पूर्व के किसी एक लोक समाज के लिए धर्मान्तरण के बाद की सारी शर्ते यथावत मान्य हों, ऐसा होना ज़रुरी नहीं है, नि:संदेह लोक जीवन के सांस्कृतिक सामाजिक तत्व शताब्दियों के मानवीय अनुभवों का संचय हुआ करते हैं, अतः उन्हें किसी नवीन दार्शनिक धार्मिक प्रणाली, को स्वीकार करते ही / में स्विच ओवर होते ही समूल नष्ट नहीं होना होता है !  इसी आलोक में उइगुर चरवाहे और जनसामान्य पक्ष के बांसुरी प्रेम को भी देखा जाना चाहिए !

अनीस अपने शौक को लेकर अपने मालिक से दण्डित है और बांसुरी के टूट जाने से दुखी भी ! निर्धन होने के कारण दरबदर भटकने के सिवा उसके पास कोई विकल्प नहीं है, ऐसे में एक बूढ़े के रूप में एक अनुभवी व्यक्ति, अनीस की सहायता करता है, वह संभवत: कथा का अलौकिक / चमत्कारिक पात्र रहा होगा ! इसे एक सांकेतिक कथन माना जा सकता है ! वह अनीस को संगीत समृद्ध करता है, ताकि अनीस जागतिक मनुष्यों और जीवित पशु पक्षियों में एक समान रूप से मौजूद सांगीतिक अभिरुचि की अभिव्यक्ति / प्रकटन का सहायक / माध्यम बने !

अनीस शोषित वर्ग का प्रतिनिधि है और वह अपने सामर्थ्य का उपयोग अपने वर्ग की समुचित सहायता मात्र के लिए करता है, कुल मिलाकर सामान्य सी दिखने वाली यह कथा, आर्थिक वर्ग भेद के विरोध में खड़े सांगीतिक सम रूचि के एक व्यक्ति बनाम व्यक्तियों तथा अन्य जीवित प्राणियों के सहज व्यवहार की कथा है ! इस कथा का नायक अपने सामर्थ्य और बूढ़े /अनुभवी / संभवतः अलौकिक व्यक्तित्व से प्राप्त , अनुग्रह का दुरूपयोग नहीं करता ! संगीतज्ञ  के रूप में अनीस मनुष्यों का ही नहीं बल्कि अन्य जीव जंतुओं का भी प्रतिनिधि है क्यों कि वे सब उसके ही माध्यम से अपनी अभिरुचि / पसंद को उजागर करते हैं !

( यह कथा इस्लाम धर्म के उइगुर लोगों तक पहुँचने से पूर्व की कथा लगती है जोकि हमारे अपने देश के श्री कृष्ण आख्यान से किंचित मिलती जुलती सी प्रतीत होती है )