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गुरुवार, 7 सितंबर 2017

बाज़ के पंख

तब एक बूढ़ा, एक युवा और उसकी दो पत्नियां, साथ में रहते थे ! युवा को अपने तीरों के लिये पंखों की ज़रूरत थी, उसे पता था कि दूर. ऊंचे पेड़ पर बाज़ का घोंसला हैं, वो वहां गया और पंख इकठ्ठा करने की गरज़ से पेड़ पर चढ़ने लगा, चूंकि बूढ़ा, युवा के प्रति जलन का भाव रखता था इसलिए उसने जादू से, पेड़ को बहुत ऊंचा कर दिया और पेड़ की छाल भी निकाल दी, जिसके कारण से पेड़ का तना बेहद चिकना हो गया ! युवा उस समय नग्न था अतः फिसलन भरे तने से होकर नीचे उतरना, उसके लिये असंभव हो गया था ! विवशतावश वो पेड़ के ऊपरी हिस्से में बना रहा और रात में अपने घर वापस नहीं लौट सका!उसकी अनुपस्थिति का लाभ उठा कर बूढ़े ने युवा की पत्नियों से कहा, हमें ये घर छोड़कर, कहीं और जाना होगा ! अगली सुबह वे सभी घर छोड़ कर निकल पड़े ! युवा की पत्नियों में से एक संतानहीन थी और उसे, बूढ़े का कहना मानने में कोई संकोच नहीं था किन्तु दूसरी पत्नि अपने शिशु को लेकर बूढ़े के साथ जाने के लिये तत्पर नहीं थी, खास कर तब, जबकि उसका पति पीछे छूट रहा हो !

अगली रात, दूसरी पत्नि ने बूढ़े से कुछ दूरी पर कैम्प बनाया और अलाव जलाकर अपने शिशु के साथ रुक गई जबकि निःसंतान पत्नि ने बूढ़े के साथ रात बिताई, अगले कई दिन और रात ऐसा ही होता रहा,इस दौरान युवा पेड़ के ऊपर ही अटका रहा ! उसके पास कपड़े नहीं थे इसलिए ठण्ड से बचने के लिये उसने अपने लंबे बालों से अपना तन ढांक लिया था, यही नहीं, उसने बाज़ के पंखों को भी अपने बालों में जहां तहां खोंस लिया था ताकि बालों और पंखों से, उसे कम्बल के जैसी सुरक्षा मिल जाए ! जिन छोटी चिड़ियों ने आस पास के पेड़ों की टहनियों पर घोंसले बनाए हुए थे, उन्होंने बहुत कोशिश की, कि युवा जैसे तैसे पेड़ के नीचे उतर सके पर...उनकी मदद युवा के किसी काम नहीं आई और वो बदस्तूर पेड़ पर अटका रहा ! अंततः एक दिन एक बूढ़ी स्त्री अपने दोनों हाथों में नुकीली छड़ी लिये हुए पेड़ के नीचे आई और पेड़ पर चढ़ने लगी ! वो युवक तक पहुंची और फिर मकड़ी में तब्दील हो गई, उसने ऊपर से नीचे तक जाल बुना, जिसकी सहायता से युवा धरती पर उतरने में सफल हुआ !

जब वो अपने घर पहुंचा तो उसने देखा कि घर उजाड़ पड़ा हुआ है, वहां उसे कुछ पद चिन्ह दिखाई दिये, जिनका पीछा करते हुए वो कई दिनों तक चलता रहा और फिर उसे अपनी दूसरी पत्नि और पुत्र दिखाई दिये ! बच्चा चिल्लाया, मेरे पिता, युवती ने कहा, लेकिन वो तो मर चुके हैं...तब तक युवा उनके निकट पहुंच चुका था ! पत्नि ने पति से पूरा अहवाल कहा ! उसने कहा कि बूढ़ा हम दोनों स्त्रियों को अपने साथ ले जाना चाहता था किन्तु मैं उसके साथ जाने के लिये इच्छुक नहीं थी इसलिए अलग ठहरी हुई हूं जबकि आपकी पहली पत्नि उस बूढ़े के साथ अगले कैम्प में ठहरी हुई है ! इसके बाद वो अपने पति को बड़ी सी टोकरी में छिपा कर बूढ़े के कैम्प तक पहुंची और उसने टोकरी अलाव के पास रख दी, जिसे बूढ़े ने हटा कर दूर रख दिया लेकिन वो, उसे फिर से अलाव के पास ले आई ! युवक तेजी से बाहर निकला और उसने बूढ़े तथा धोखेबाज़ पत्नि की हत्या कर दी, फिर अपनी सच्ची और अच्छी पत्नि के साथ शिशु को लेकर पुराने घर लौट आया, जहां वे सभी लंबे समय तक, सुखपूर्वक रहे !

इस आख्यान को बांचने से यह तो स्पष्ट नहीं होता कि बूढ़े और युवा के मध्य कोई रक्त सम्बन्ध था लेकिन उनके दरम्यान मौजूद किसी ना किसी प्रकार की स्वजनता की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे दोनों एक साथ रहते थे ! उस युवा की दो पत्नियां थीं, जिनमे से एक निःसंतान थी जबकि बूढ़ा संभवतः परित्यक्त अथवा विधुर रहा होगा ! कथा संकेत यह है कि बूढ़ा व्यक्ति, स्त्री सानिध्य / यौन सुख से वंचित व्यक्ति माना जाएगा, जिसमें अनिवार्य, नैसर्गिक, दैहिक लालसायें शेष रह गई हों, इसी प्रकार से दूसरी पत्नि, निःसंतान रह जाने के कारण कदाचित स्वयं को उपेक्षित / पति साहचर्य से वंचित मानने लगी हो ! स्पष्ट ये कि उस समूह में दो व्यक्ति, निश्चित रूप से ऐसे थे जिन्हें दाम्पत्य जीवन से बाहर का यौनाकर्षण प्रभावित कर सकता था, एक वो बूढ़ा, जो कि विधुर अथवा परित्यक्त था और दूसरी निःसंतान स्त्री ! ये अनुश्रुति प्रत्यक्षतः यौनाकर्षण की बात नहीं करती, किन्तु परिस्थितिजन्य साक्ष्य कहते हैं कि बूढ़े का अनुसरण करना पहली पत्नि की कर्तव्य पारायणता या बुज़ुर्ग के प्रति आदर की अभिव्यक्ति नहीं था बल्कि उन दोनों का साथ, एक प्रकार से वंचित द्वय का सहज गठबंधन था !

कथा मोटे तौर पर यह घोषित करती है कि युवक आखेटक था, उसे बेहतर शिकार के लिये अपने तीरों को दुरुस्त रखना ज़रुरी था इसलिए परिंदों के पंख उसकी पहली प्राथमिकता थे जबकि काम सुख वंचित बूढ़े को इस अवसर की तलाश थी कि युवा घर से बाहर जाए और सुरक्षित घर वापस ना लौट सके ! प्रतीकात्मक रूप से जादू का उल्लेख कर, पेड़ की ऊंचाई बढ़ाने और पेड़ के तने से छाल उतार देने का कथन संभव है कि पूर्णतः असत्य हो ! लेकिन यह भी संभव है कि वो युवा स्वयं ही अपने हथियार को अधुनातन / मारक / घातक और अचूक बनाए रखने की लालसा के अंतर्गत, बेहद ऊंचे पेड़ पर जैसे तैसे चढ़ तो गया हो पर उतरते समय उसका हौसला पस्त हो गया हो और उसने, उसी ऊंचाई पर सुस्ताने का निर्णय लिया हो या फिर बूढ़े ने उसे ऐसा करने के लिये प्रेरित किया हो ताकि वह रात में उसकी अनुपस्थिति का फायदा उठा कर, उसकी दोनों पत्नियों को लेकर किसी अपरिचित स्थान की ओर पलायन कर जाए और घर वापसी के बाद युवा उन्हें ढूंढ ना सके, हालांकि दूसरी पत्नि के असहयोगी रवैय्ये के कारण से बूढ़े की योजना निष्फल हो गई !

युवा की पहली पत्नि, बूढ़े व्यक्ति के लिये पुत्रवधु तुल्य थी, उनमें आयु का वैषम्य था पर...कामुकता, नैतिकता की चेरी नहीं होती, वे दोनों परस्पर असमान होकर भी देह सुख गठबंधन धर्मी माने जायेंगे ! कथा कहती है कि दैहिकता कभी भी, किसी भी जगह या समय में सामाजिकता के तट बंध तोड़ सकती है ! उसके लिये सामाजिक मूल्य / आदर्श मायने नहीं रखते ! यौनिकता से इतर, उजाड़ पड़े घर से मिले पद चिन्हों का अनुसरण करते हुए पहली पत्नि और संतान से मिलन तथा व्यभिचार के आरोपियों / विश्वासघातियों को दण्डित करने के उपरान्त, युवा की घर वापसी की कहन में कोई नयापन नहीं है किन्तु पेड़ की ऊंचाई पर अटके हुए उस युवा की मददगार, नन्हीं चिड़ियों और मकड़ी के उल्लेख का सांकेतिक अर्थ यह भी हो सकता है कि प्रकृति, यौन नैतिकता / देह शुचिता के पक्ष में खड़ी हुई है ! दिलचस्प बात ये है कि बूढ़ी स्त्री के हाथों में नुकीली छड़ियां थीं यानि कि बुनाई करने वाली तीलियों के समान या चिकने पेड़ में सहजता से चढ़ने के उपकरण जैसी कोई वस्तु !

झुक कर चलने वाली बूढ़ी स्त्री और मकड़ी का सांकेतिक साम्य अद्भुत है, बूढ़ी स्त्री के  हाथ की नुकीली छड़ियां, मकड़ी के नुकीले पंजों के जैसी ! कह नहीं सकते कि वो मकड़ी का जाला था या फिर बूढ़ी स्त्री के द्वारा फेंकी गई रस्सी / रेशे निर्मित कोई संरचना, जिसकी सहायता से युवा, पेड़ से नीचे उतर पाया हो ! यह भी संभव है कि नुकीली टहनियों और छाल के रेशों की मदद से चिकने पेड़ से उतरने का प्रतीकात्मक सुझाव, बूढ़ी स्त्री / मकड़ी के द्वारा उस युवा को दिया गया हो / मिला हो ! ...हो सकता है कि इस कहानी में बूढ़ी स्त्री का उल्लेख, विश्वासघाती बूढ़े के प्रतिकार स्वरुप / स्त्री मददगार बतौर किया गया हो ! विशेष कर समाज में अच्छे बुरे के काउंटर बैलेंस / संतुलन के दृष्टिकोण को ध्यान में रख कर ! बहरहाल यह स्वीकार करने में कोई कठिनाई नहीं है कि कथाकालीन समाज आखेटक समाज था और वहां पर बहु-विवाह / बहु-स्त्री गामिता प्रचलन में थे, जिसके पश्चातवर्ती प्रभाव / परिणाम, कहे गये आख्यान का मूल आधार बन गये हैं !  

रविवार, 11 जुलाई 2010

ओ देव...

कहते हैं यहां खर दूषण का राज था कभी , उनकी अपनी रक्ष प्रजा , अपनी रक्ष संस्कृति !  तब रक्ष कुल की युवतियां अपने पति का वरण अपनी मनमर्जी से कर पाने के लिये स्वतंत्र हुआ करतीं !  वेश भूषा...खान पान...रहन सहन के उनके अपने तौर तरीके थे !  देवताओं को यज्ञं भाग देने वाले ऋषि उनके परम शत्रु हुआ करते !  राजकन्या सूर्पनखा इन्हीं परम शत्रुओं के अभयार्थ आहूत देव पुरुषों के प्रेम में क्या पडी , अपने ही कुल के विनाश का कारण बन गई !  उस प्रेमातुर राजकन्या को इस सत्य का भान ही नहीं हुआ कि विजातीय संस्कृतियों में प्रेम और दैहिक संबंधों के स्वीकरण के नैतिक मानदंड भिन्न हैं अतः उसका प्रणय निवेदन ठुकराया जाना निश्चित है...शेष कथा इतिहास हुई !  इसके बाद शताब्दियों का लंबा अंतराल और ...अब तो ये तय कर पाना भी मुश्किल है कि सांस्कृतिक सहवास और सम्मिश्रण के परिणाम क्या हुए ?  कौन शुद्ध रक्ष कुलीन और कौन शुद्ध देव पूजक शेष रहा यहां  !  पर अब भी ... 

कहते हैं ये खर दूषण की धरती है यहां प्रेम से पहले संस्कृति...धर्म...भाषाओं और विजातीयताओं का ख्याल नहीं किया जाता , परिणाम चाहे कुछ भी हो ! पता नहीं वे लोग कौन होंगे जो ये सब पूछ परख करनें के बाद प्रेम करते होंगे पर यहां की स्त्रियां और पुरुष अब भी कैलकुलेटेड प्रेम नहीं कर पाते, बल्कि उन्हें तो प्रेम करना ही नहीं पड़ता , बस हो जाया करता है...ये देस प्रेम की परम स्वतंत्रता का देस है !  उत्तर दिशा से देवता अब भी आते जाते हैं यहां...पर वे किसी यज्ञं और संस्कृति की रक्षा के लिए नहीं पधारते और ना ही प्रेम की किन्हीं खास मर्यादाओं से बंधे हुए  होते हैं ! उनके अपने एजेंडे के पूर्ण होने तक वे राजकन्याओं के प्रणय निवेदन को बाकायदा स्वीकार भी करते हैं ,यहां तक कि उन्हें एक पत्नी व्रत से भी कोई लेना देना जरुरी नहीं रह गया शायद !...संभव है इंसानों के तौर पर अवतार लेते रहने की लंबी और एकरस प्रक्रिया के चलते कुछ इंसानी दुर्गुण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गये हों  ? 

ऋषि आश्रम का स्थाई सदस्य होने के नाते ऐसी कई प्रेम गाथाओं को रचते हुए देखा है मैंने...लगभग १६-१७ वर्ष पूर्व हमारे आश्रम में एक सुदर्शन देव पुरुष का आगमन हुआ वे काव्य रचते...उनकी ऋचायें , पाषाण खण्डों से टकरा कर अदभुत सम्मोहन संसार सृजित करतीं !  शीघ्र ही वे विवाहोत्सुक युवतियों के आराध्य की तरह स्थापित हो गये !  उनके प्रति युवतियों का प्रबल आकर्षण आश्रम के निकटवर्ती आवास क्षेत्रों के अन्य वाचाल युवकों के रागद्वेष का कारण बन गया !  बिगड़ती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए,  उन्होंने आश्रम का त्याग कर दिया और वापस उत्तर दिशा की ओर प्रस्थित हो गये किन्तु उनसे अशेष / सीमाहीन प्रेम करने वाली युवती रेत सम देव पुरुष को मुट्ठी में कैद करने की लालसा लिए इधर उधर भटकती रही !  उसकी मुट्ठी से फिसलती रेत के चिन्ह साफ़ नज़र आते और मैं किसी अनहोनी से आशंकित बना   रहता क्योंकि इस धरती का इतिहास...?

शायद समय किसी भी स्पर्श और उसके निशानों को खुरच कर फेंक देने में मददगार हो गया हो !  लिहाजा ताजातरीन घटनाक्रम की सूचना मैंनें खुद उस प्रस्थित प्रेमी को दे दी है और कहा कि ... ओ देव...राजकन्या तुम्हारे प्रेम पाश से मुक्त हो किसी साधारण मनुष्य से शादी कर रही है , फिलहाल इस प्रकरण में प्रेम के लिए कुल विनाश या फिर आनर किलिंग की संभावना समाप्त हुई...भले ही खर दूषण की धरती है ये ! 


सोमवार, 5 जुलाई 2010

हम हाले दिल सुनायेंगे...सुनिये कि ना सुनिये...सौ बार मुस्करायेंगे... ?

सेवा में छत्तीसगढ़ कैडर चुनते ही ये तय हुआ कि रिटायर होने से पहले ही अपने लिये एक अदद मकान का जुगाड़ कर लिया जाये !  मुनासिब जमीन खोजी तो भाव सुनकर पसीने आ गये...महसूस हुआ कि यही बात अगर कुछ बरस पहले सोची होती तो मामला अपनी औकात की हदों में रहता ! यहां जमीनों की रजिस्ट्री के लिये प्रचलित सामान्य अनुबंध अवधि तीन माह थी ! भूमि स्वामी से उसे छै माह करवाया गया ताकि इस समय में अपने जीपीएफ अकाउंट से पैसे का बन्दोबस्त कर लिया जाये ! शासन स्तर पर अपने ही पैसे की निकासी में होने वाले विलम्ब होने की सम्भावना बतौर जो अतिरिक्त तीन माह जुटाये गये थे, बड़े काम आये ! काम समय पर हो पाने / ना हो पाने की धुक धुक के बीच सर्वशक्तिमान दयानिधान ईश्वर भी याद आता रहा ! अक्सर सोचते कि उसने तो जानवरों तक के लिये निशुल्क कंदराओं / गुफाओं / बिलों / खोलों की व्यवस्था की है तो क्या हमें, हमारे पुरुषार्थ के दम पर एक झोपडा भी ना बनाने देगा ? ... पता नहीं क्यों ? अनादि अनंत ईश्वर को आलेख का हिस्सा बनाते वक़्त, जेहन में, ब्लागर.कॉम भी शिद्दत से, कौंध रहा है...पर है मामला उलट ! जहां ईश्वर फ़ोकट के स्पेस के लिये जानवरों का पक्षधर है, वहीं ब्लागर.कॉम केवल इंसानों को फेवर करता है, ये बात दीगर है कि कोई जानवर, इंसानों की खाल ओढ़ कर उसकी दरियादिली का फायदा उठा ले जाये ! क्या सच में, कंदराओं ...झोपडियों...और सुसज्जित बंगलों के भौतिक अंतर, मूलतः आभासी नहीं हैं ? जबकि सभी आश्रय स्थलों का मूल लक्ष्य एक है ! खैर...कुल मिलकर मामला लबों पर अटका रहा जब तक कि रजिस्ट्री ना हो गई ! यूं तो हम छै मित्रों ने मिलकर प्लाट्स लेने की योजना बनाई थी और हमारी तरह वे भी कामयाब हुए बस थोड़े बहुत अंतराल के साथ हम सब का पडोसी होना सुनिश्चित हुआ हालांकि जमीनों की कीमत का पूरा झटका बर्दाश्त करने में अगले पांच साल और गुज़रे !

ज़मीन की खरीदी के बाद मसला मकान बनवाने का आया तो नक्शा पास करवाने से लेकर आवास ऋण लेने और बाद में ठेकेदार से समय पर काम निकलवा पाने तक की स्ट्रगल में मित्रों से ज्यादा ईश्वर ही काम आया ! लिहाज़ा ईश्वर का अनुग्रहीत बने रहना स्वाभाविक ही था किन्तु ...?  हुआ ये कि हमारे आवास प्लाट के उत्तर में हमारे एक भूतपूर्व शिष्य ने पहले ही मकान खड़ा कर लिया था और उन्होंने बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की, कि अब उनके गुरुदेव भी मकान बनाने जा रहे हैं, कहना गलत नहीं है कि इससे थोड़ी सी ज्यादा प्रसन्नता हमें भी हुई ! लगभग अगले डेढ़ वर्ष तक हमें जमीनी यथार्थ का अहसास भी नहीं हुआ कि भविष्य के गर्भ में क्या है ? निर्माणाधीन परिसर में आते जाते ये जरुर लगा कि शिष्य महोदय घर में कम ही रहते हैं और उनकी पत्नी को गुनगुनाने का शौक है !  उनकी दो पुत्रियां बेहद शालीन , अपने पिता के गुरु को निर्माणाधीन साईट पर ही चाय पहुंचा देतीं !  उनसे पूछता 'बलि' कहां है वे कहतीं पापा ऑफिस चले गये, मुझे लगता ससुरा ऑफिस जाने का ये कोई समय है भला ! सुबह दोपहर शाम कभी भी घर पर मौजूद नहीं जनाब !  ऊपर से खिलखिलाती बच्चियां, अंदर से सहमी सहमी सी नज़र आतीं !  उधर बरखुरदार की पत्नी का गुनगुनाना ज़ारी रहा !  

परिजनों ने सलाह दी कि कोई अच्छा सा मुहूर्त देखकर गृह प्रवेश किया जाये हमने कहा ठीक है ! एक माह...दो माह...गुजरते गये हमारी चुप्पी से बीबी बच्चे परेशान, इशारों से टटोलने की कोशिश करते...बीबी कहती सम्बन्धियों को बुलाना होगा...सम्बन्धी फोन करते कब आना होगा ? हम बस इतना कहते बरसात थमने दो ! अक्टूबर महीने की शुरुआत होते ही सभी सम्बन्धियों को एक तारीख देकर आने का निमंत्रण दिया और कहा इस बाबत घर में फोन मत कीजियेगा वे समझ गये ! हाथ थोडा तंग था इसलिये गिने चुने मित्रों को भी रातो रात फोन किया कि कल दोपहर आ जाइये और जैसे ही उस रोज बीबी से कहा कि आज दोपहर का मुहूर्त है चलो काम निपटा लिया जाये, बीबी जी हत्थे से उखड गईं तैयारी कौन करेगा ? रिश्तेदार कैसे आयेंगें ? आज अचानक कैसे ? अपने ही घर का उदघाटन चोरी चोरी क्यों करें ? मैंने कहा बेगम अभी पैसों की दिक्कत है ! बाद में सबको पार्टी देते रहेंगे अभी तो बस चलो, नये घर में ईश्वर का नाम लें उसे धन्यवाद देकर आयें ! खैर चेहरे पर तल्खियां टिकाये बीबी और बच्चे मेरे साथ गंतव्य की ओर चल दिये...और वहां पहुंचकर कर...जो भी हुआ कैसे बताऊं ? बीबी का जन्म दिन उसे याद रहेगा हमेशा ! सारे सम्बन्धियों और मित्रों के बीच अपने शौहर की हरकत पर इतराती गर्वीली बीबी, ये घर उसका अपना है अब !   

सरकारी आवास को छोड़ कर जाने से पहले पैकिंग वगैरह में कुछ समय लगा पर महीने के आखिर में हम अपने नये घर में मौजूद थे और शिष्य के परिवार के बारे में ज्यादातर खुलासे यहां से शुरू हुए...शिष्य वधु अज्ञात कारणों से क्रिश्चियन हो चुकी थीं और दोनों बच्चियां भी मां के पक्ष में पिता के विरुद्ध खड़ी पाई गईं पर हैरानी की बात ये कि क्रिश्चियन मिशन के फादर / ब्रदर / सिस्टर ना तो इस घर में आते और ना ही इस घर के नव धर्मान्तरित चर्च जाते देखे गये !  शिष्य वधु गुनगुनाती तो क्या चिल्लाती ही हैं...रब्बा...होशना...आशीष...धन्यवाद प्रभु...ईसा का लहू...स्वनिर्मित भजन गाते हुए बीच बीच में चीख कर...हालेलूया कहना हमें भी अच्छा लगता है, किन्तु सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक लगातार किचन में जोकि हमारे आँगन से लगा हुआ है ! इन दिनों उनके भजनों के साथ एक नारा और जुड गया है 'हो रब्बा हाजी अली'...शायद हमारे पडोसी होने की वज़ह से ? कभी कभार पति से झगडा धक्का मुक्की और गाली गलौज भी सुनने को मिलती है ! मिलने जुलने वाले आते हैं और ये सब सुनकर प्रश्न वाचक चिन्ह से हमारे सामने खड़े रह जाते हैं ! मैं उन्हें और खुद को दिलासा देते हुए कहता हूं धार्मिक महिला हैं, क्या बुरा करती हैं जो ईश्वर को जोर जोर से पुकारती हैं ! पर वे मेरे जबाब से निराश हो कर लौट जाते हैं वे सब उस महिला को पागल कहना चाहते हैं किन्तु मैं जानता हूं सच क्या है ?  पिछले दिनों वे अपने मायके गई हुईं थीं सन्नाटा हमें भी अच्छा नहीं लगा ! एक आदत सी पड़ गई है उन्हें तेज आवाज में गाते हुए सुनने और चिल्ला चोट की ! उनकी बच्चियां कहती हैं कि मम्मी समझती हैं कि प्रभु ईसा उनपर मेहरबान हैं इसलिए फादर / ब्रदर / सिस्टर और चर्च उनके सामने कुछ भी नहीं...उन्हें लगता है कि उनकी शक्तियां देख कर लोग डर जाते हैं !  खैर वे जो भी करती हैं अपने घर में ! मित्रगण उन्हें कुछ भी कहें पर मुझे पता है कि उनकी इस हालत का जिम्मेदार मेरा शिष्य है पास के मोहल्ले में ही, उसकी एक और पत्नी, एक अलग घर है / कन्दरा है / खोल है / बिल है ! अब... अगर शिष्य वधु अपने ही  घर में कुंठायें विसर्जित करती  हैं तो मुझे तकलीफ कैसी ?