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रविवार, 31 दिसंबर 2017

ललमुंहे बंदर

जब ईश्वर ने धरती को बनाया तो उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो निर्माण सामग्री को अपनी विशाल कुंडली में संभाल कर रखे ! इस तरह से धरती को आकार मिला ताकि सभी तरह के लोग, परिंदे और जानवर, उस पर, अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकें ! उस समय प्राचीन सांप ने चार खम्बे, उत्तर, दक्षिण, पूरब,पश्चिम बनाए, जिन्हें अपनी कुंडली में जकड़ कर सीधा खड़ा रखा और  स्वर्ग इन्हीं खम्बों पर टिका हुआ है ! प्राचीन सांप की त्वचा काली, सुफैद और लाल रंग की थी जिसकी वज़ह से रात, दिन और सांझ बनी ! शुरू में धरती पर पानी ठहरा हुआ था इसलिए महाकाय सांप ने झरने और नदियाँ बनाईं, इसके कारण से जीवन चक्र प्रारम्भ हुआ ! इसके बाद जैसे जैसे महाकाय सांप, ईश्वर को नई दुनिया दिखाने लगा, उन सभी जगहों पर पर्वत बन गये, जहां पर ईश्वर ठहरा / चलते चलते रुक गया था !

सृजन का कार्य संपन्न होने पर ईश्वर ने देखा कि बहुसंख्य पर्वत, असंख्य वृक्ष, अनगिनत जीव, अकेली धरती पर बोझ बनने वाले हैं, तो उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो धरती की सहायता करे, सो महाकाय सांप ने खुद की पूंछ को अपने मुंह में दबा कर एक घेरा बना लिया ! इसके बाद ईश्वर ने लाल मुंह के बंदरों को निर्देश दिया कि जब भी अर्वाचीन सांप को भूख लगे, वे उसे खाना खिलाएं ! तब से लेकर आज तक अर्वाचीन सांप ने धरती को संभाल रखा है, हालांकि जब जब सांप करवट बदलता है या फिर खुजलाने अथवा दर्द से मुक्ति, के लिये अपने शरीर को हिलाता है, तब तब धरती पर भूकंप आते हैं ! अगर लाल मुंह के बंदर किसी दिन, सांप को खाना खिलाना भूल जायें और सांप, भूख से परेशान होकर अपनी ही पूँछ निगलने लग जाए, तो यह निश्चित है कि, उस दिन धरती का जीवन समाप्त हो जाएगा !

मध्य अफ्रीका के डाहोमी क्षेत्र के फ़ॅान जनजातीय समुदाय की ये कथा, उस ईश्वर को समर्पित है, जिसने अर्वाचीन सांप के माध्यम से धरती की निर्मिति की थी ! सांप महाकाय है, जिसकी कुंडलियों में धरती के निर्माण में प्रयुक्त सारी सामग्री, एकत्रित / संयोजित और सुरक्षित है ! चारों दिशायें उसके द्वारा खड़े किये गये सतूनों / स्तम्भों से निर्धारित हैं और तो और स्वर्ग भी इन्हीं खम्भों पर अवलंबित है ! कहने का आशय ये कि, स्वर्ग चारों दिशाओं में विस्तारित है ! सांप की चमड़ी के रंग, दिन की धूप, सांझ की लालिमा सह श्यामलता और रात्रि की कृष्णता को सुनिश्चित करते हैं ! उसने ठहरे हुए पानी को सचल किया, झीलों, तालों,  एवं समंदरों से नदियाँ और झरने बनाये, जिससे जीवन का प्रादुर्भाव हुआ ! सांप की कुंडली में बंधी हुई धरती को टिकाऊपन और सधी हुई / सुनिश्चित गति मिली ! ईश्वर के मनवांछित आकार की धरती, जैसा भी उसने चाहा था सांप ने वैसा ही कार्य किया !

जनश्रुति कहती है कि सांप की कुंडलियों में बंधी, सधी हुई धरती में मनुष्यों, परिंदों और जानवरों के रहने लायक परिस्थितियाँ मौजूद हैं ! ईश्वर, निर्दिष्ट सृजन कार्य के समापन के उपरान्त अर्वाचीन सांप ने, ईश्वर को निर्माण कार्य के अवलोकन करने का आमंत्रण दिया, ईश्वर जो धरती को, निरखता हुआ घूमा फिरा ! आदिम समुदाय की कल्पनाशीलता में, दिलचस्प बात ये कि ईश्वर जहां ठहरा, वहीं पर्वत बन गये ! धरती पर भ्रमण के दौरान, ईश्वर को ये अनुभूति हुई कि, नवजात धरती, असंख्य पर्वतों, वृक्षों और जीव जंतुओं का भार वहन करने में सक्षम नहीं हो पायेगी, इसलिए उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो अपनी पूंछ को मुंह में दबाकर धरती को बिखरने से बचाये, गौरतलब बात ये कि धरती, एकजुट और गोलाकार बनी रहे ! बहरहाल ईश्वर के आदेशानुसार, धरती रक्षण में सहायक अर्वाचीन सांप, अपने आप में बंध कर रह गया !

सांप द्वारा, दर्द से मुक्ति के लिये, करवट बदलने और उसकी, खुजलाहट जन्य दैहिक अस्थिरता की प्रतीकात्मकता से, धरती पर आने वाले भूकंपों की कल्पना मजेदार है ! ईश्वर जिसे, जीव जंतुओं, मनुष्यों, परिंदों, वृक्षों के जीवन की चिंता थी, जो धरती को टिकाऊपन और निर्धारित लय युक्त जीवन देना चाहता था, जो धरती के सृजन, विन्यास और निर्मिति में प्रयुक्त अभियांत्रिकी के लिये पर्याप्त सचेत था, जिसे दिन, रात, और सांझ का ख्याल था, जो स्वर्ग को हर दिशा में विस्तारित और स्थिर देखना चाहता था, वो भला अपने परम सेवक, सभी निर्देशों का अनुपालन करने वाले अर्वाचीन सांप को भूखा मरने के लिये कैसे छोड़ देता ? अब ये ललमुंहे बंदरों पर निर्भर है कि, सांप सलामत रहे और...धरती भी !     

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

लोई

ईश्वर ने कीचड़ से कुछ मनुष्यों को बनाया, लेकिन वे लोग बहुत मुलायम तथा पिलपिले थे और गीले होने पर खड़े भी नहीं हो सकते थे ! वे देख नहीं सकते थे पर...बोल सकते थे हालांकि जो कुछ भी बोलते सब अर्थहीन हुआ करता ! ईश्वर समझ गया कि वे लोग किसी काम के नहीं हैं, उसने उन्हें तोड़ डाला और कहा, मैं फिर से कोशिश करूँगा ! इसके बाद ईश्वर ने लकड़ी से मनुष्य बनाये, जो पहले से बेहतर थे, ये, बोलना और चलना जानते थे ! लकड़ी से बने मनुष्यों ने घरों का निर्माण किया और उनके बच्चे भी पैदा हुए, उनकी संख्या बढ़ने लगी, लेकिन ये लोग सूखे, पीले और भावहीन चेहरों वाले थे क्योंकि इनके पास दिल, दिमाग और आत्मा नहीं थी ! लकड़ी से बने मनुष्य, अपने पशुओं को पीटते, उनके बर्तन अक्सर जल जाते पर...उन्हें समझ में नहीं आता कि नये बर्तन कैसे बनायें, इतना ही नहीं, उन्हें ईश्वर का कोई एक नाम तक, याद नहीं रहता ! 
  
ईश्वर ने कहा, ये लोग भी ठीक नहीं है, मैं इन्हें नष्ट कर दूंगा और उसने धरती पर महान बाढ़ लाई, जिसके कारण से लकड़ी के मनुष्य और उनके घर बह गये ! इस कठिन समय में पशुओं, जिन्हें वे पीटते थे, बर्तनों, जिन्हें वो जला डालते थे और पेड़ों, जिनकी शाखें वे काट डालते थे, ने उनकी कोई मदद नहीं की ! कहते हैं कि महा-बाढ़ में जो, थोड़े से लोग बच गये, उनके वंशज बंदर हुए  जो आज तक नीचे नहीं उतरते ! ईश्वर सच्चे मनुष्य बनाना चाहता था, जब सूर्योदय हुआ तो उसने मकई के पीले भुट्टे और सुफैद भुट्टों के दाने पीस कर मिला दिये, इस खाद्य सामग्री के साथ, उसने नौ तरह की शराब बनाई ताकि उससे, मनुष्य को ऊर्जा और शक्ति मिले, इसके बाद ईश्वर ने इसकी लोई से चार सुंदर और शक्तिशाली पुरुष बनाये जिन्हें, घातक हंसी, लापरवाह, कालिमा और रात का जादूगर कहा गया ! ईश्वर ने उन्हें बुद्धिमत्ता और समझ, उपहार स्वरुप प्रदान की ! 

जब ये चारों पुरुष सो रहे थे तो ईश्वर ने बहुत सावधानी  के साथ चार स्त्रियां बनाईं ! जब वे जागे तो उन्हें अपने पहलू में सुंदर पत्नि मिली ! वे समझ गये कि वे, चहुँ दिश घटित को देख सकते हैं, यहां तक कि आकाश का मेहराब और पृथ्वी का गोल चेहरा भी, उन्होंने कहा, हमारे जीवन के लिये धन्यवाद ! हम, देख, सुन, बोल और चल सकते हैं ! हम, धरती और आकाश पर घटित, सब जान सकते हैं, अनुभव कर सकते हैं...ओ पिता, इसके लिये धन्यवाद ! ये सुनकर ईश्वर को बड़ी चिंता हो गई कि ये मनुष्य तो बहुत ज्यादा और बड़ी दूर तक देख सकते हैं ! ये लोग, मनुष्य के बजाये देवता तुल्य हो गये हैं ! ईश्वर को लगा कि, थोड़ा बदलाव ज़रुरी है सो, उसने नीचे झुक कर, उनकी आंखों में धुंध फूंक दी और उनकी दृष्टि में थोड़े से बादल भी, जैसे कि किसी आईने में भाप फूंक दी जाए, अब वे ज्यादा दूर तक साफ़ साफ़ नहीं देख सकते थे !

उन चारों स्त्री पुरुषों ने पहाड़ से नीचे उतरने के लिये, सुबह का इंतज़ार किया, उन्हें सबसे पहले भोर का तारा नज़र आया,फिर सूरज, जिसकी धूप ने तीन उपहारों के बाहरी आवरण जला दिये / खोल दिये ! तब पहाड़ी बिलाव और तेंदुआ गुर्राये और सभी परिंदों ने अपने पंख फैलाये तथा चहचहाने लगे, उनके साथ ही साथ, चारों पति पत्नि, आनंद विभोर होकर नृत्य करने लगे ! सूरज आकाश पर चढ़ने लगा था...  
  
इस जनश्रुति का सम्बन्ध,प्रख्यात क्यिचे माया सभ्यता से है, जिसका आद्योपांत विवरण १५०० ईसा पूर्व से लेकर १६ वीं शताब्दी के मध्य सिमट कर रह जाता है, माया समुदाय में प्रचलित सृष्टि सृजन, विशेष कर मनुष्यों की निर्मिति, संबंधी बयान इस कथा के माध्यम से प्रकटित होते हैं ! वे मानते हैं कि ईश्वर ने सबसे पहले कीचड़ से मनुष्य को रचा था, ऐसे में उक्त मनुष्य की देह रचना का मुलायम तथा पिलपिला होना और भीगने पर खड़े नहीं हो पाना अस्वभाविक कथन नहीं है, इसके इतर उनका अंधत्व और वाचिक अर्थहीनता, उनके नष्ट हो जाने का कारण बनी ! कालांतर में ईश्वर ने काष्ठ से मनुष्यों का निर्माण किया, जिनके चेहरे, काष्ठ की तरह पीले और भावहीन थे, यह कथन बेहद दिलचस्प है ! उनमें बुद्धि, हृदय और आत्मा का अभाव था, अतः वे क्रूर थे !

उनकी स्मरण-हीनता का आलम ये कि वे ईश्वर का कोई एक नाम भी याद नहीं रख सकते थे, अतः उन्हें जल समाधि दे दी गई ! रोचक बयान ये कि उनमें से कुछ के वंशज बंदर हुए, जोकि ऊंचाइयों में चढ़कर जीवित बचे, सो आज भी नीचे नहीं उतरते ! ध्यान रहे कि काष्ठ मनुष्यों के आपात समय में पशुओं, बर्तनों और पेड़ों की शाखाओं ने, साथ नहीं दिया क्योंकि वे सभी काष्ठ मनुष्यों द्वारा प्रताड़ित किये गये थे, यह विशुद्ध सामाजिक व्यवहार है, जैसा बोया, वैसा ही काटोगे की, तरह से ! ईश्वर सच्चे मनुष्य के सृजन में दो बार चूका था, इसका मतलब ये हुआ कि चूक, ईश्वर से भी हो सकती है ! तीसरी बार मनुष्य का सृजन करते हुए ईश्वर ने मकई के आटे के साथ ही साथ, नौ तरह की उत्तेजक और शक्तिवर्धक शराब का इस्तेमाल भी किया ! आटे की लोई से बने मनुष्य में वो सभी खूबियाँ थीं जोकि ईश्वर चाहता था पर...इस बार भी उससे एक गलती हुई !

कथा से प्राप्त, यह संकेत मजेदार है कि आटे के मिश्रण और भिन्न शराबों से, मनुष्य बनाने वाला ईश्वर, देवता बना बैठा ! आटे और शराब के गठजोड़ से देवत्व प्राप्ति संबंधी यह विवरण, अप्रत्यक्ष रूप से देवताओं के साथ परिहास करने जैसा है या फिर मनुष्यों द्वारा शराब पीने को न्यायोचित ठहराने के उद्धरण के जैसा ! बहरहाल चारों मनुष्यों को अनायास ही प्राप्त देवत्व से वंचित करने के लिये ईश्वर द्वारा मनुष्य की आंखों में धुंध फूंकने और दृष्टि में भाप के जैसे बादलों को आरोपित करने का कथन सांकेतिक रूप से मनुष्य को मनुष्य बनाए रखने के जतन के तौर पर स्वीकार किया जाना चाहिए ! इस सम्बन्ध में आईने में भाप पड़ जाने वाली कहन अदभुत है ! ईश्वर ने मनुष्य को उपहार स्वरुप पत्नियां दीं, पशु दिये, परिंदे दिये और उल्लास की अभिव्यक्ति के लिये नृत्य निपुणता भी !  

गुरुवार, 28 दिसंबर 2017

कांच का चाकू...

कहते हैं कि एज़्टेक कबीले के सृजन की कहानी देवी क्वाटिलिक्वे से शुरू होती है, जोकि सर्पों का परिधान पहनती और जिसके गले में नरमुंडों की माला पड़ी रहती...जो गहन आत्मविश्वास की प्रतिमूर्ति है ! देवी क्वाटिलिक्वे, प्रथम बार, लावा निर्मित कांच के चाकू से गर्भवती हो गई थीं और फिर उन्होंने, चंद्रमा की देवी क्वोयोलशाऊकी तथा पुरुष वंशजों के एक समूह को जन्म दिया जोकि तारे बन गये थे ! एक दिन देवी क्वाटिलिक्वे को पंखों का एक गोल पुलंदा मिला, जिसे उन्होंने अपनी सीने में लपेट लिया लेकिन दोबारा देखने पर उन्होंने पाया कि पंखों का गोल पुलंदा गायब हो चुका है और वो पुनः गर्भवती हो गई हैं, हालांकि उनकी पुत्री देवी चन्द्रमा और पुत्र तारों को अपनी मां क्वाटिलिक्वे की इस कहानी पर ज़रा भी विश्वास नहीं हुआ और वे लोग लज्जित अनुभव करने लगे, उन्होंने तय किया कि वे सभी मिलकर अपनी मां को मार डालेंगे !

वे लोग, यही मानते थे कि कोई देवी, केवल एक बार ही संतान को जन्म दे सकती है, जोकि उसके सच्चे देवत्व का प्रमाण होता है ! बहरहाल जब वे लोग अपनी मां की हत्या की योजना बना रहे थे, तब, देवी क्वाटिलिक्वे ने अग्नि सर्प की सहायता से, युद्ध के अग्नि देवता ह्यूइटज़िलीह्यूइटल को जन्म दिया, जिसने क्रोध में आकर अपने सभी भाइयों और बहन क्वोयोलशाऊकी को मार डाला ! उसने बहन का सिर, धड़ से अलग करके, पर्वतों के मध्य गहरे खड्ड में फेंक दिया, जहां वो सदा सर्वदा के लिये विखंडित पड़ा रहा ! ठीक उसी समय, स्वर्ग लगभग टुकड़ों में तब्दील हो गया और धरती मां नीचे गिर गई थीं, जिनके निषेचित बच्चों को, भ्रातघाती द्वारा टुकड़े टुकड़े कर के पूरे अंतरिक्ष में बिखेर दिया गया था ! इस तबाही के उपरान्त मूल अमेरिकन इंडियंस का प्राकृतिक ब्रह्माण्ड जन्मा,तब सर्वोच्च देवता ओमेटेकूटली और उसकी पत्नि ओमेसिहाउटल ने पूरे विश्व में जीवन का सृजन किया...

एज़्टेक, अर्वाचीन कबीले के लोग हैं, अन्य आदिम जातीय समूहों की तरह से सृष्टि की रचना को लेकर,उनकी अपनी परिकल्पनायें हैं ! उनके ब्रह्माण्ड की रचना भले ही देवत्व धारी व्यक्तित्व करते हों पर...उन सभी देवी देवताओं में मनुष्यगत, संवेदनाओं, भावनाओं, कल्पनाशीलता, सृजनशीलता, ईर्ष्या, द्वेष और कलह प्रियता जैसे, लक्षणों का विवरण मिलना आम बात है जैसे कि इस कथा में देवी क्वाटिलिक्वे नरमुंड की माला पहनने वाली तथा सर्पों को परिधान बतौर लपेटने वाली पारलौकिक शक्ति है, किन्तु वो ज्वालामुखीय लावे से निर्मित कांच से गर्भवती होकर देवी चंद्रमा और तारों को जन्म देती है ! आख्यान में उल्लिखित, इस देवी के, चमचमाते / रौशन रौशन / आलोकित, पुत्रों और पुत्री के जन्म के लिये, चमकदार कांच के चाकू को उत्तरदाई ठहराना प्रातीतिक है, रुचिकर है ! कांच के चाकू के...चांद सितारे जैसे बच्चे !

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि अपनी मां को पुनः गर्भवती देखकर देवी चन्द्रमा और पुत्र तारे क्षुब्ध हैं, उन्हें विश्वास  ही नहीं होता कि उन्हें, जन्म देने वाली दिव्य शक्ति,पुनः गर्भवती हो सकती है, वे इसे दिव्यता पर कलंक मानकर लज्जित हैं और अपनी कलंकित मां की हत्या का निर्णय ले लेते हैं, प्रतीत होता है कि मां के दोबारा गर्भवती होने का मुद्दा वास्तव में, गर्भवती होने के कलंक से कहीं अधिक, दिव्यता के प्रथम उत्तराधिकारियों तथा संभावित अतिरिक्त उत्तराधिकारी के मध्य, दिव्यता की विरासत के, बटवारे का मुद्दा रहा होगा ! विरासत के बटवारे के निषेध के लिये, गर्भवती मां को रास्ते से हटाने का निर्णय, ईर्ष्या जनित लगता है, बिलकुल मनुष्यों के स्वभाव और व्यवहार के अनुकूल होने जैसा...सो कथा संकेत यही हैं कि झगड़े का मूल कारण विरासत थी, किन्तु उसे कांच के चाकू बनाम पंखों के पुलंदे से गर्भ धारण करने वाली यौन अनैतिकता बतौर हवा दे दी गई !

कथा के अनुसार देवी क्वाटिलिक्वे सर्पों को परिधान बतौर लपेटती थी सो उसने, अग्नि सर्प की मदद से, पंखों के पुत्र, युद्ध के अग्नि देवता ह्यूइटज़िलीह्यूइटल को जन्म दिया, जिसने दिव्यता की विरासत के दावेदार उन सभी लोगों को मार डाला जो कि उसके जन्म का विरोध कर रहे थे, अतः एक ही मां की संतानों के मध्य वैमनस्य, ब्रह्माण्ड की बर्बादी और पुनर्जीवन का आधार बना ! नरमुंडों और सर्पों वाली दिव्यता तथा विनाश के बाद पुनर्सृजन के संकेत हमें अपनी पारलौकिक गाथाओं में भी मिलते हैं, किन्तु महत्वपूर्ण तथ्य यह कि प्रस्तुत कथा मनुष्यों की प्रातीतिक परछाईं के जैसे बहुदेवतावाद को समर्पित है, जिसमें सृष्टि के विनाश का कारण कोई एक देवता है, तो सृजन के लिये उत्तरदाई कोई और...  

बुधवार, 27 दिसंबर 2017

कम्बल

पुराने दिनों की बात है जब निद्रालीन यूट पर्वत, महान योद्धा देव हुआ करता था और मनुष्यता को कष्ट देने वाले, दुष्ट दैत्य से युद्ध लड़ने के लिये धरती पर आया था ! उस समय महान योद्धा देव और दैत्य के मध्य भयंकर संघर्ष हुआ, युद्ध के दौरान वे दोनों ही धरती पर, मजबूती के साथ अपने पैरों को जमाये रखने की चेष्टा करते रहते, सो उनके पैरों तले रौंदी गई धरती में, जगह जगह घाटियां और पर्वत बन गये और इस तरह से युद्ध क्षेत्र की भू-आकृति निर्मित हुई ! युद्ध में दैत्य पर विजय प्राप्त करने तक, योद्धा देव बहुत थक गये थे और...उन्हें गंभीर चोटें भी आईं थी, इसलिए वे वहीं लेट कर आराम करने लगे ! थकान के कारण से उन्हें गहरी नींद आ गई, हालांकि उनके जख्मों से रक्त बहता रहा, जो पानी में बदल गया और धरती के जीवधारियों के पीने के काम आया !

कहते हैं कि निद्रालीन महादेव / यूट पर्वत के ऊपर धुंध छाने, वर्षा होने, शीत अथवा  गर्मी पड़ने का मतलब है कि, सुप्त महादेव ने अपना कम्बल / ओढा हुआ वस्त्र बदला है, यानि कि निद्रालीन महादेव के कम्बल बदलने के साथ ही साथ ऋतुएं बदलती हैं ! जब भी मूल अमेरिकन इन्डियन लोग, यूट पर्वत के ऊपर हरा कम्बल देखते हैं, तो वे समझ जाते हैं कि ये वसंत का मौसम है, एन इसी तरह से गहरा हरा कम्बल गर्मियों, पीला और लाल वर्षा तथा सफ़ेद कम्बल सर्दियों की ऋतु लेकर आता है ! अमेरिकन इंडियंस को विश्वास है कि जब भी यूट पर्वत के ऊपर बादल घिरते हैं तब, महान देवता, स्थानीय आबादी पर प्रसन्न होता है और देवता की प्रसन्नता के कारण से क्षेत्र में बारिश होती है ! उन्हें यह भी विश्वास है कि एक दिन महान देवता फिर से उठकर, बुराई से लड़ने में उनकी मदद करेगा !

दुनियां में ऐसे ईश्वरीय पूजा स्थल / आस्था केन्द्र बहुत कम होंगे, जिन्हें भू सतह के नीचे, गहरे खड्ड अथवा गर्त में स्थापित किया गया हो, ध्यातव्य है कि आस्थागत / अधिप्राकृतिक शक्तियों की उपासना के केन्द्र, बहुतायत से ऊंचे पर्वतों / पठारों में स्थापित किये जाने का चलन काफी पुराना है, बहुत संभव है कि इसकी पृष्ठभूमि में, मानवेत्तर शक्तियों को आदर देने / स्वयं से ऊंचा स्थान देने की धारणा कारगर रही हो ! मूल अमेरिकन इंडियन समुदाय का ये आख्यान भी विश्वव्यापी धारणाओं के अनुरूप कथन करता है, यहां सत्य और न्याय के पक्ष में लड़ने के लिये एक महान देवता अवतरित होते हैं और उनका उद्देश्य मूल निवासियों को बुराई/ असत्य/ दुष्टता के दैत्य से बचाना है ! दुनियां में प्रचलित अन्य धर्म सत्य रक्षण कथाओं की तरह से इस कथा का खलनायक दैत्य भी महा बलशाली है और वो देवता को कड़ी टक्कर देता है यानि कि यहां भी सत्य की विजय आसानी से नहीं होती !

देवता के आहत हो जाने और थक कर आराम करने / निद्रालीन हो जाने के, कथन से स्पष्ट होता है कि दुष्टता, सज्जनता को क्षत विक्षत करने की हद तक लड़ती है, कहने का तात्पर्य ये कि दुष्टता और सज्जनता के मध्य बेहद बारीक शक्ति संतुलन है...सो सज्जनता की पूर्व घोषित / निर्धारित विजय, गहरी चोट खाए बिना संभव नहीं होती ! महादेव तथा दैत्य के युद्ध को मल्ल युद्ध की तरह से देखें तो भू-आकृति के निर्धारण में उन योद्धाओं के क़दमों / पैरों का योगदान, कम-ओ-बेश वैसा ही नज़र आता है, जैसे कि अखाड़े की भुरभुरी मिट्टी, अस्त व्यस्त / ऊबड़ खाबड़ और किंचित सपाट हो जाए, यानि कि भू-भौतिक विन्यास, घाटी, पर्वत और मैदान, मल्ल योद्धाओं की शक्तिमत्ता एवं शौर्य प्रदर्शन का परिणाम हैं ! बहरहाल यूट पर्वत वो देवता है, जो कि युद्ध से थका हारा आराम कर रहा है और एक दिन फिर से जागेगा, बुराई पर पुनर्विजय के लक्ष्य के साथ !  

आख्यान में रोचक किन्तु प्रतीकात्मक कहन ये कि देवता के घावों से होने वाले रक्त स्राव से स्थानीय आबादी को पीने का पानी मिला, इसके मायने ये कि जब देवता स्वयं निद्रालीन पर्वत हो जाए, तो पर्वत शिखर के हिमाच्छादन / ग्लेशियरों से मैदानी बसाहटों को पेय जल मिलना स्वभाविक है !  सोये हुए / आराम कर रहे, देवता के कम्बल बदलने से, साल में चार बार मौसम बदलने का कथन भी मज़ेदार है ! यूट पर्वत की ऊंचाइयों में बदलते परिदृश्य और रंगों से ऋतु परिवर्तन को भांप लेना आदिम समुदाय के यथार्थपरक जीवन अनुभवों का प्रतीक है, चूंकि ये जनश्रुति दैविक आस्था और आस्थागत कर्मकांडों के प्रतिसाद स्वरूप, अपेक्षित पारलौकिक सहायता की धारणा पर आधारित है अतः कथा कालीन समुदाय में भी, विश्व के अन्य धर्मभीरू समाजों की तरह से, आपात सहायता के लिये ईश्वर / देवताओं का ही आसरा है !

भविष्य में ईश्वर फिर से जागेगा / अवतरित होगा और बुराई से लड़ने में मानव समुदाय की सहायता करेगा, नितांत भाग्यवादी धारणा है ये ! हमें स्वीकार करना होगा कि आदिम समुदाय, हमारे पूर्वज समुदाय है / सूत्र समाज हैं सो...उनका देवतावाद / उनकी पारलौकिकतावाद / उनका नियतिवाद, हमें विरासत में मिला है ! हमने इसे लेशमात्र भी खोया नहीं है, बल्कि ईश्वरीयता के फटे कम्बल / काल्पनिक विचार को और भी शिद्दत से पकड़ा है / अपनाया है ! नि:संदेह जनश्रुति का समय धर्म की अपरिपक्व / कच्ची उत्पत्ति का समय था और आज हम धार्मिक पुनरुत्थानवाद के बीहड़ समय से गुज़र रहे हैं...

शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

इश्क दे हत्थों गर्म लहू विच डूबियां लक्ख बरातां...!

उसके छोटे से कबीले की शिकारगाह थी वो अंतरीप, उस बड़ी झील में घुसपैठिया सा ज़मीन का एक टुकड़ा ! उसका अपना नाम अवाशान्क्स था और वो बेहद क़ाहिल / निठल्ली तथा बेवकूफ किस्म की लड़की थी, यहां तक कि कई कई दिनों तक बेकाम बैठे रहना उसकी आदत में शामिल था ! उसके बदसूरत चेहरे और अगढ़ जिस्म के चलते गांव के लड़के उससे शादी का ख्याल तो दूर, दोस्ती तक की ख्वाहिश नहीं जतलाते थे ! मरियल काया, लम्बोतरे और सिकुड़ से गये चेहरे के अलावा उसकी लंबी और कूबड़नुमा नाक, उसके हुक जैसे टेढ़े मेढे दांत और मुर्गाबी की चोंच जैसी तीखी ठोड़ी, हिरणों की तरह से बड़े बड़े कान, कुल मिलाकर अजीब, बेढब और भद्दी सी दिखने वाली लड़की ! वो लोगों के उपहास का विषय थी, उसके असौंदर्य को लेकर ग्राम्यजन हँसने का कोई भी मौका नहीं छोड़ा करते थे !

बहरहाल उसकी जिस्मानी बदसूरती के इतर उसमें एक अदभुत गुण भी था, जिस मामले में कबीले की तमाम लड़कियां, उसका पासंग भी नहीं थीं ! उसकी आवाज़ के मीठेपन, उसके सुरों में बसी रूहानियत के मुकाबिल शायद, देव संसार में ही कोई हो तो हो वर्ना धरती पर कोई उसकी गायकी की कोई दूसरी मिसाल ही नहीं थी ! वहां झील से मिलने वाली नदी के किनारे की छोटी सी पहाड़ी पर घने दरख्तों के नीचे बैठ कर वो अपने सुरों का जादू बिखेरती रहती ! उसके सुरों पर डालियाँ झूम उठतीं, परिंदे घंटों बेसुध होकर लुत्फंदोज़ होते, परिंदों के बोझ से लचकती शाखें उसका माथा चूम लेतीं ! उसके चारों तरफ की झाड़ियाँ चौपायों के झुंडों से भर जातीं, मीनिका से लेकर सूंस, बगुलों से लेकर बाज़, घोंघों से लेकर समुद्री झींगे, चूहों और छछूंदर और ना जाने कितने जीव जंतु उसके सुर माधुर्य का आस्वादन करने इकठ्ठा हो जाया करते !

झील का किनारा लहरों से आन्दोलित हो उठता, जब कि मछलियाँ भी उसे सुनने किनारों तक आ धमकतीं, खास कर सलमन मछलियों का मुखिया वहां बेचैन होकर घूमता फिरता, उसे इन गीतों से बेपनाह लगाव था, उसका बस चलता तो वो पानी से निकल कर धरती पर आ पहुँचता ! सलमन मछलियों का मुखिया एक लंबे अरसे तक अपनी नाक जमीन में घुसा कर उस दिशा में बढ़ने की कोशिश करता रहा जहाँ से सुर लहरियां बिखरतीं थी ! धीरे धीरे उसने धरती पर काफी दूर तक पानी का एक गलियारा बना डाला ! उसकी सारी मेहनत उस सुरीली लड़की के निकट पहुँचने के वास्ते थी, जिसके सुरों से उसमें आह्लाद भर भर भर जाया करता ! अचरज ये कि कुछ समय बाद वो अपने  आनंद की अनुभूति को बयान करने के काबिल हो गया ! उसके खुद के सुर जो अनुराग, प्रेम और मित्रवत संदेशों से भरे पड़े थे !

उस लड़की के जीवन में यह एक नई तरह की घटना थी जबकि कोई जीव उसे खूबसूरत कह रहा था, उससे प्रणय निवेदन कर रहा था, उसकी मित्रता चाह रहा था ! उसे लगता कि प्रणय याची सलमन मुखिया की आवाज़ दुनिया की मधुरतम आवाज़ है, खुद उससे भी बेहतर ! वो उसे सुनना चाहती हर पल हर क्षण ! उसे प्रेम हो गया था ! लेकिन मुश्किल यह थी कि वो पानी में रहकर जीने के काबिल नहीं थी और उसका प्रेमी पानी से बाहर धरती पर आकर नहीं जी सकता था ! आगे के दिन उनके अनिवार्य बिछोह और दुःख के दिन थे ! वे प्रणय लीन होकर भी दूर रहने के लिये अभिशापित जैसे, परम संताप में अपने अपने ठिकानों के छोर पर डटे रहते पर...उनके मिलन की कोई सूरत नज़र नहीं आती ! ...लेकिन एक दिन एक अजनबी इंसान, उस प्रेमी युगल के पास प्रकट हुआ और उसने, उनके दुःख का कारण पूछा !

सलमन मुखिया ने उस अजनबी से अपनी, भिन्न भिन्न परवरिशों और पर्यावासीय मजबूरियों का हाल कहा, जो बाधायें थीं उनके मिलन में ! आगंतुक ने कहा, दुखी मत होओ, हौसला रखो, हर मसले का हल होता है, बाधायें दूर की जा सकती हैं, देखो ना मैं खुद भी मछलियों की परम आत्मा हूं, लेकिन तुम्हें मछली से इंसान बनाने की शक्ति मुझमें नहीं है , हालाँकि मैं लड़की को मछली ज़रूर बना सकता हूं, फिर उसने अवाशान्क्स को घुटनों तक पानी में उतरने की सलाह दी और मन्त्र पूरित आशीष का हाथ उसके सिर पर फेरा, आहिस्ता अहिस्ता अवाशान्क्स एक सलमन मछली में बदल गई और सलमन मुखिया के साथ गहरे पानी में चली गई ! कहते हैं कि अपने प्रेम की सफलता के बावजूद, अवाशान्क्स अपनी जन्म भूमि, अपने गांव को नहीं भूल पाई है , वो हर साल अपने प्रेमी के साथ एक खास मौसम में उस जगह, बार बार वापस लौटती है !

उसकी वापसी, खुद उसके अपने जीवन को खतरे में डाल के, जबकि वो अच्छी तरह से जानती है कि मनुष्य जाति, धरती की आत्माओं की परवाह नहीं करती और उसके अपने कबीले के लोग भी उसकी मृत्यु का कारण बन सकते हैं ! उसने प्रेम किया, सो वो उसे आज भी उसे निबाह रही है, अपने प्रेमी से, उस पर्यावास से जहां वो पली बढ़ी, धरती के उस टुकड़े से, जहां वो अक्सर बैठा करती थी ! बहरहाल कीट पतंगों, परिंदों, इंसानों, जीव जंतुओं को, सलमन मछलियों के अपनी जन्म भूमि में वापस लौटने के उस मौसम में, वो स्वस्थ, सुडौल, प्रणय लीन मत्स्य जोड़ा, उस खास मौसम में जल क्रीड़ायें करता दिखाई देता है !

ये अदभुत बात है कि इस आख्यान में, सलमन मछलियों के, समुद्र / झील से मिलने वाली नदी में जल प्रवाह के विरुद्ध तैरते हुए अपनी प्रजनन स्थली तक के, नियमित वार्षिक प्रवास को, जागतिक प्रणय संबंधों के ईश्वरीय सम्मति प्राप्त होने की पुष्टि तथा भ्रांत दैहिक धारणाओं के खंडन, का दृष्टान्त बनाया गया है ! सामान्यतः हम विश्वास करते हैं कि कबीलों का नितांत प्राकृतिक पर्यावास उन्हें इस तरह की कल्पनायें करने अवसर देता होगा, किन्तु लड़की की अगाध दैहिक असामान्यताओं की तुलना में एक मात्र सद्गुण, सुर प्रावीण्यता भी प्रणय की सफलता का कारण बन सकता है और उसे ईश्वर तक का आशीष प्राप्त होगा, जैसा कथन/ दर्शन नि:संदेह असाधारण है ! कथा की नायिका अपने स्वजनों के उपहास और तिरस्कार को भूलकर तथा अपनी जान को जोखिम में डालकर बारम्बार जन्म भूमि की ओर इसलिए लौटती है , क्योंकि उसका हृदय केवल और केवल प्रेम से परिपूर्ण है !

ग्राम्य परिवेश में प्रणय निवेदन और मित्रताओं को शारीरिक सौंदर्य से जोड़कर देखना एक सामान्य प्रचलन है...पर कथा में निहित दर्शन, शारीरिक असौंदर्य को प्रणय के लिये अनुपयुक्त नहीं ठहराता, बल्कि प्रणय के विरुद्ध बाधक दैहिक बेडौलपन की भ्रांत धारणाओं का खंडन ही करता है, इतना ही नहीं वो, प्रणय के इस दर्शन के पक्ष में ईश्वर को भी खड़ा कर देता है ! कथा के नायक ने नायिका को देखा ही नहीं है पर वो उससे प्रेम करता है ! अपने जलीय पर्यावास को धरती के उस टुकड़े तक पहुंचाने की उसकी कोशिशें, किसी भी सूरत, शीरीं फरहाद के पहाड़ काटो उद्धरण से कमतर नहीं हैं, खासकर तब, जबकि वो जलीय नाले का विस्तार करने के लिये मिट्टी को अपनी नाक से खोद कर नायिका की नजदीकियां हासिल करना चाहता है ! कथा में दैहिक असौंदर्य को हाशिये में रखकर प्रेम की संस्वीकृति है,किन्तु प्रेम के भौतिक साफल्य को स्पेसीज का साम्य चाहिए जैसा कथन भी !

सलिल वर्मा का ख्याल है कि, रचयिता ने नायिका में कायनात की सारी बदसूरतियाँ भर दी थीं...लेकिन उसमें एक सिफत ऐसी भी थी जोकि, हर सूरत, जिस्मानी ख़ूबसूरती से बढ़कर थी...ईश्वर सचमुच कृपा निधान है, जो अपने बन्दों के साथ ऐसे संतुलन बनाये रखता है...लड़की की आवाज़ में ज़रूर कोई रूहानी ताकत रही होगी, जिसने उस सलमन मछली को भी सुंदर गायक बना दिया ! मोहब्बत एक ऐसा ज़ज्बा है, जिसमें इंसान, इबादत या समाधि की स्थिति में होता है, जैसे नायक का गाना सीख लेना और सबसे बड़ी बात तो ये कि उसने ज़मीन को काट कर रास्ता बनाया...यानि कि इश्क सच्चा हो तो चट्टानें भी रास्ता दे देती हैं ! इस आख्यान का एक आध्यात्मिक पहलू भी है...ये इश्क बंदे और खुदा के इश्क जैसा है ! कहने को बेशक्ल (बदशक्ल) है वो, लेकिन उसकी आवाज़, जो सुनता है, उसे सुनाई देती है...और फिर उस बंदे के अंदर ईश्वर बोलता है...दोनों एकाकार हो जाते हैं ! कथा में उल्लखित, जन्म स्थान की ओर वापसी को दरअसल ज़मीनी कशिश माना जाये ! मसलन केरल में राजा बलि की पाताल लोक से हर साल वापसी, यही कशिश है , अपने देश वापसी का जश्न, एक उत्सव !  


( टीप : इस आख्यान का शीर्षक मशहूर ब्लॉगर श्री सलिल वर्मा द्वारा सुझाया गया है )

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

कुहासा...!

उसके जीवन में दुखों के पहाड़ टूट पड़े थे और कोई राह भी नहीं सूझती थी ! कमसिनी में ही अपनी आखिरी उम्मीद, अपने पति को खो चुकने के बाद उस लावण्यमयी युवती के सामने एक ही रास्ता शेष था सो उसने अपनी नाउम्मीदी के इस दौर में, एक दिन अपनी छोटी से किश्ती, नदी की धार में छोड़ दी और आहिस्ता आहिस्ता मृत्यु गीत गाते हुए ,चप्पू चलाने लगी ! वह झरने के ऐन नीचे जाना चाहती थी ताकि उसके त्रासद जीवन का अंत हो जाये,उसकी किश्ती धीरे धीरे प्रचंड / उत्ताल, अगाध लहरों की आगोश में पहुंच चुकी थी और उसका संतुलन बिगड़ने लगा था ! युवती पानी में गिरने ही वाली थी कि उसे गर्जन के देवता हेनो ने आहिस्ता से अपनी बांहों में उठा लिया और गरजते झरने की ओट में ले गये, उनका घर वहीं था !

देवता हेनो और उनके युवा पुत्र ने उस युवती की सुश्रुषा की और समय के साथ उसके हृदय के घाव भरने लगे ! युवती को सामान्य होते देख कर देवता के पुत्र ने युवती के प्रति अपनी आसक्ति के भाव प्रकट किये और फिर उन दोनों ने देवता हेनो को प्रसन्न करने के ख्याल से शादी कर ली !  कालांतर में उनके घर एक पुत्र का जन्म हुआ जो अपने दादा के आगे पीछे घूमता फिरता ताकि वह यह समझ और सीख सके कि गर्जन के देवता होने का मतलब क्या है और उसके दायित्व क्या हैं ? जीवन में दोबारा लौटी खुशियों के दरम्यान उस युवती के मन में अब एक ही ख्वाहिश / एक ही रंज शेष था कि वह कम से कम एक बार अपने बिछड़े परिजनों को फिर से  देख पाये !  संयोगवश उसकी ये लालसा एक दिन नितान्त अप्रत्याशित और अवांछित ढंग से पूरी हुई !

उस दिन एक शक्तिशाली तथा महाकाय सांप नदी में उतरा और उसने , युवती के ग्राम्य परिजनों के लिये उपलब्ध पेय जल के एकमात्र स्रोत , पूरी की पूरी नदी को विषाक्त कर दिया !  ग्राम्य परिजनों के समक्ष अनायास ही आ खड़े हुए , भीषण महामारी और मृत्यु के इस संकट को स्वयं हेनो ने समझा और उसने युवती को इसकी खबर दी ! युवती की याचना पर हेनो ने स्वयं युवती को उसके परिजनों के पास पहुंचा दिया ताकि वह अपने परिजनों को अल्पावधि में इस गंभीर खतरे से आगाह कर सके , युवती ने ऐसा ही किया , अस्तु उसके परिजन समय रहते , अन्यत्र सुरक्षित स्थानों पर पलायन कर गये और उनका जीवन बच गया ! इसके बाद हेनो युवती को उसके पति के पास , अपने घर वापस ले आया !

कुछ दिनों के बाद वो महाकाय सांप इस उम्मीद से गांव वापस आया कि उसे विषाक्त जल पीने से मर गये लोगों की लाशें खाने का अवसर मिलेगा , किन्तु वीरान गांव देख कर वह बहुत क्रोधित हुआ और उसने जोर की फुफकार के साथ नदी की जल धारा के ऊपरी हिस्से की ओर बढ़ना शुरू कर दिया !  हेनो को इसका अनुमान पहले से ही था , सो उसने धुंध के सहारे जलप्रपात के ऊपर चढ़कर उस विराट सांप के ऊपर भयावह वज्र चला दिया , जिससे वह सांप एक विस्फोट के साथ मर गया ! सांप की मृत देह जल प्रपात के ऊपर अर्ध चंद्राकार रूप में बहते बहते अटक गई , जिसके कारण से होने वाले विशाल जल जमाव से एक नया संकट खड़ा हो गया , आगे चल कर , पानी वहीं गिरने वाला था , जहां हेनो का अपना घर था !

देवता हेनो के सामने अकस्मात आ खड़ी हुई , विपदा की इस घड़ी में अपने घर को बचाने का कोई तात्कालिक विकल्प भी मौजूद नहीं था , क्योंकि उसके पास समय बहुत कम था , इसलिये उसने अपने पुत्र , पुत्रवधु और पोते को शीघ्रता से घर छोड़ कर, अपने पीछे आने को कहा...और फिर उन सबको , अपने साथ लेकर ऊंचे आकाश की ओर प्रस्थान कर गया तथा वहीं अपना नया घर बना लिया ! अब वे सभी अपने नये घर से धरती के लोगों को देखा करते हैं !  देवता हेनो इन दिनों बादलों में उसी तरह से गर्ज़न करता है , जैसे कि पहले वो जलप्रपात की धुंध में गरजता था !  नियाग्रा के महा-जलप्रपात से गिरती हुई , अथाह जलराशि में से आज भी हेनो के गर्जन की प्रतिध्वनि सुनायी देती है !

ओनियाग्रा कबीले की इस कथा को बांचने और उसमें निहित सन्देश को बूझने से पहले यह जानना उचित होगा कि नियाग्रा शब्द संभवतः ओनियाग्रा से ही जन्मा है ! इस आख्यान में दो अलग अलग कबीलों के बयान मिश्रित होकर एक नया सा रूप ले बैठे हैं !  कहते हैं कि ओनियाग्रा और इरोक्वोइज़ कबीलों में पारस्परिक प्रतिद्वन्दिता थी और यह आख्यान उन दोनों के गल्प का समवेत संस्करण जैसा है , जिससे स्पष्ट होता है कि मौखिक परम्परायें किस तरह से अपना रूप बदलती रहती हैं !  कथा के मूल ओनियाग्रा संस्करण में उक्त युवती प्लेग की महामारी को रोकने के लिये देवता हेनो के पुत्र से विवाह के लिये सहमत होती है , जबकि इरोक्वोइज कथा के अनुसार वज्र स्वामी पक्षी ने विषधर हेनो को पराजित किया था !

बहरहाल संशोधित कथा के अनुसार युवती का अल्पकालिक वैवाहिक जीवन अपने पति की आकस्मिक मृत्यु के कारण दुखदाई हो गया था...और वो गहन अवसाद के चलते आत्महत्या करने पर उतारू हो गई थी , हालाँकि देवता हेनो अथवा किसी जल क्षत्रिय / मल्लाह ने उसके जीवन की रक्षा की थी , उसे झरने में डूबने से बचाया था ! देवता हेनो का पानी अथवा निकटस्थ क्षेत्र में निवासरत होना, सांकेतिक रूप से युवती के आश्रयदाता के जल आधारित व्यवसाय में संलग्न होने जैसी प्रतीति कराता है ! इस कथा में यदि उसे गर्जन का देवता कहा गया है , तो भी वह जलप्रपात के ऐन निचले क्षेत्र में मौजूद अथवा जीवन यापन कर रही जनसंख्या का अभिजात्य / कुलीन प्रतिनिधि / सदस्य हो सकता है !
 
युवती जल-नद क्षेत्र की किसी अन्य बस्ती की निवासी थी ! जल प्रदूषण / प्लेग अथवा विषाक्तता से अपने ग्राम्य परिजनों की प्राण रक्षा का संकल्प एक महत्वपूर्ण संकेत है कि , एक युवती जो स्वयं अवसाद का शिकार हो कर मृत्यु की कगार पर खड़ी हो , वो अपने परिजनों के जीवन के लिये स्वयं को दांव पर लगा देती है !  जीवन दाता का पुत्र ही सही...पर शोक ग्रस्तता के समय में एक विजातीय से , विवाह की स्वीकृति से कम से कम यही अर्थ ध्वनित होता है ! कहने का आशय यह है , कि जहां एक ओर,युवती अपने आश्रय दाता का उपकार चुकता करती है , वहीं दूसरी ओर अपने ग्राम्य परिजनों के लिये व्यावहारिक धरातल पर फिक्रमंद भी दिखाई देती है ! मृत्यु और गहन दुःख के काल में पुनः नवजीवन का संकल्प उसकी सामाजिक प्रतिबद्धता का प्रतीक है !

इस आख्यान से तत्कालीन समाज में विधवा पुनर्विवाह अथवा अंतरजातीय विवाह के चलन अथवा स्वीकार्यता के संकेत भी मिलते हैं ! बादलों में बसने वाले गर्जन देवता के नये घर को आपदा के चलते विस्थापन और फिर नई बसाहट से जोड़कर देखा जाना चाहिये , ठीक वैसे ही जैसे कि युवती के ग्राम्य परिजनों ने आपदा के संकेत मिलते ही नयी बसाहटों की ओर प्रस्थान कर दिया था ! बादलों की गड़गड़ाहट और जलप्रपात के शोर में ध्वनि साम्य भले ही सांकेतिक माने जायें पर यह साम्य अंतत: दो भिन्न जलीय दैहिकी में मौजूद जल तत्व की समानता और उनमें सन्निहित ऊर्जा की समानता से वास्ता रखते हैं ! लोक कथाओं में प्राकृतिक शक्तियों और मानवीय जीवन के समेकित अनहद नाद के सिवा और कोई दूजी बात भला मिलना भी क्यों चाहिए? 

बुधवार, 6 जून 2012

अखरोट के छिलके ...!

एक दिन सर्वोच्च देव ‘प्रामजिमास’ ने स्वर्ग की खिड़की से धरती पर झांक कर देखा , तो उसे हर ओर ईर्ष्यालु , झगड़ालू तथा एक दूसरे पर अन्याय करते हुए मनुष्य नज़र आये , अपनी धरती की ये हालत देखकर उसे क्रोध आ गया और उसने धरती से इंसानों को नष्ट करने के लिए ‘वांडू’ और ‘वेजास’ नाम के दो देव भेजे ! वांडू यानि कि जलदेव और वेजास अर्थात वायु देव ! अगले बीस दिन और रात लगातार , इन दोनों के कोप से धरती पर भयंकर विनाश हुआ ! इक्कीसवें दिन ‘प्रामजिमास’ धरती पर ‘वांडू’ और ‘वेजास’ को सौंपे गये काम की प्रगति देखने निकला ! प्रामजिमास को अखरोट खाते रहने की आदत थी और वो अखरोट के छिलके नीचे फेंकता जाता था , जिनमें से एक छिलका धरती की सबसे ऊंची पर्वत चोटी पर गिरा जहां , जल और वायु के कोप से बचने के लिए कुछ मनुष्यों और अन्य पशु जीवों ने शरण ले रखी थी ! वे सभी बाढ़ से बचने के लिए अखरोट के छिलके पे लटक गये / चिपक गये / उसे कसकर पकड़ लिया !

इस बीच सर्वोच्च ईश्वर का क्रोध कुछ कम हो चला था ! उसने वांडू और वेजास से ठहर जाने को कहा ! धीरे धीरे जलस्तर कम हुआ और अखरोट के छिलके से लटक कर प्राण बचा पाये मनुष्य तथा अन्य पशु जीव धरती पर इधर उधर बिखर गये ! एक वृद्ध जोड़ा इस आपाधापी में बहुत थक चुका था ! अतः वो थोड़ा आराम करने की नियत से वहीं रुक गया जहां , अखरोट के छिलके ने धरती को स्पर्श किया था ! प्रामजिमास ने इस वृद्ध जोड़े को सलाह देने के लिए और उनकी सुरक्षा के इरादे से इंद्र धनुष को भेजा ! इंद्र धनुष ने वृद्ध दंपत्ति से कहा कि धरती की हड्डियों के ऊपर से नौ बार कूदो ! दंपत्ति ने ऐसा ही किया ! इसके फलस्वरूप नौ अन्य जोड़े उत्पन्न हुए ! कालांतर में ‘लिथुआनियां’ की नौ जनजातियां इन्हीं जोड़ों की वंशज हुईं !

जल प्रलय के अन्य आख्यानों की तरह इस ‘लिथुआनियाई आख्यान’ में भी , ईश्वर दुष्ट मनुष्यों पर क्रोधित होता है और उन्हें नष्ट करने के लिए जल और वायु देव को आदेश देता है !  वह धरती को , ईर्ष्यालु / झगड़ालू तथा एक दूसरे पर अन्याय करने वाले मनुष्यों से मुक्त करना चाहता है !  कहने का आशय यह है कि ईश्वर को इस कोटि के मनुष्य पसंद नहीं हैं  !  जलप्रलय की दूसरी कथाओं की तरह से इस कथा में भी मनुष्य और अन्य पशु जीव किसी ऊंचे पर्वत की चोटी पर अपनी प्राणों की रक्षा के लिए शरणागत होते हैं , किन्तु इस कथा के किसी भी पात्र को जलप्रलय की भविष्यवाणी और उससे बचने के लिए नाव बनाने का कोई पूर्व दैवीय संकेत नहीं मिलता है !  ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर उन सभी से रुष्ट था अतः उसने किसी भी मनुष्य को पात्र मानकर भावी आपदा की पूर्व सूचना नहीं दी ! यद्यपि बचे हुए अनेकों जीवित मनुष्यों के प्रति उसकी सदाशयता , संभवत: उसके क्रोध के कम हो जाने का परिणाम थी  !

इस कथा में , पहाड़ की चोटी पर अपनी प्राण रक्षा के लिए मौजूद मनुष्यों और अन्य पशु जीवों को , ईश्वर के एक प्रिय शगल / उसके खाने के शौक के कारण , अकस्मात / एक अयाचित , सहायता प्राप्त हो जाती है  !  बाढ़ से बचने के लिए उन्हें इसकी आवश्यकता भी थी !  कह नहीं सकते कि , ईश्वर ने ऐसा जानबूझकर किया था या कि अनजाने में , बहरहाल उसके खाये हुए अखरोटों में से एक का छिलका , जीवन के लिए संघर्ष कर रहे मनुष्यों और अन्य पशु जीवों के लिए नाव का काम करता है !  वे जल प्रलय से बचने के लिए नाव नहीं बना सके थे क्योंकि उन्हें इस घटना का पूर्वाभास नहीं हुआ था , किन्तु ईश्वरीय अखरोट का एक छिलका , जोकि निश्चित रूप से बड़े आकार का रहा होगा , एन मौके पर उनकी इस आवश्यकता को पूरा कर देता है  !   बाढ़ थमने पर जहां सारे मनुष्य और पशु जीव अन्यत्र / धरती पर बसने के लिए तत्काल प्रस्थित हो जाते हैं  ! वहीं एक बूढ़ा जोड़ा अपनी असहायता / अपनी थकान के चलते वहीं अकेला ठहर जाता है  !

वर्षा के समय इंद्र धनुष का दिखना एक स्वाभाविक घटना है , किन्तु संकेत यह कि ईश्वर उसे , वृद्ध दंपत्ति की सहायता के लिए भेजता है , इसका एक मतलब यह भी हुआ कि ईश्वर सदैव उनके साथ है , जो असहाय हैं  ! ईश्वर वृद्ध दंपत्ति की सुरक्षा के लिए फ़िक्र मंद है , अतः वो इंद्र धनुष के माध्यम से , उस एकाकी / असहाय जोड़े से एक प्रतीकात्मक कृत्य करवा कर नौ अन्य जोड़ों को उत्पन्न कराता है तथा उसे एक बड़ा सा परिवार देता है , जिसकी वंश बेल बाद में लिथुआनियां क्षेत्र की नौ जनजातियों के रूप में पल्लवित होती दिखाई देती है  !  धरती / मिट्टी की नौ हड्डियां संभवतः एक सांकेतिक प्रतीक है अथवा कीचड़ में दबे हुए नौ जीवित जोड़ों को बचाने का कोई उपक्रम  !  कुल मिलाकर यह कथा मनुष्यों की दुष्टता के प्रति ईश्वरीय कोप , कोप कम होने पर उसके अनुग्रह , विशेष कर असहायों के प्रति ईश कृपा का कथन करती है  ! ...और इस आख्यान का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि , ईश्वर सृष्टि के पुनर्सृजन के समय अन्य जन समुदायों की तुलना में , जनजातीय समुदायों की निर्मिति को प्राथमिकता देता है  !

गुरुवार, 31 मई 2012

परमात्मा का ब्याह ...!

एक दिन परमात्मा ने आकाश से धरती पर देखा तो पाया कि दो बहने , सेम की फलियां तोड़ रही थीं ! वो आकाश से उतर कर उनके पास आया और पूछा कि तुम लोग क्या कर रही हो ? छोटी बहन जिसका नाम फुकान था , उसने कहा , हम लोग सेम इकट्ठा कर रहे हैं , लेकिन इसमें बहुत समय लग रहा है ! परमात्मा ने बड़ी बहन से कहा , मुझे एक फली दो ... और उसने फली लेकर , टोकरी में डाल दी , टोकरी फ़ौरन ही फलियों से भर गई ! फुकान यह देख कर हंसी तो परमात्मा ने उससे कहा , मुझे एक फली तुम भी दो , फिर परमात्मा ने फुकान की टोकरी भी फलियों से भर दी ! इसके बाद परमात्मा ने फुकान से कहा कि घर जाकर तीन खाली टोकरियां और ले आओ ! घर पहुंच कर फुकान ने तीन खाली टोकरियों की मांग की तो उसकी मां ने कहा , वहां तो ज्यादा सेम नहीं हैं तुम्हें टोकरियों की ज़रूरत नहीं पड़ेगी , इस पर फुकान ने कहा कि वहां एक नवयुवक आया है जो एक फली से पूरी टोकरी भर देता है ! यह सुनकर फुकान के पिता ने कहा , उन्हें घर ले आओ वो ज़रूर देवता होंगे !

फुकान , पूर्व की तरह , तीनों खाली टोकरियां , सेम की फलियों से भरवाकर अपनी बड़ी बहन और परमात्मा के साथ घर वापस लौटती है  ! जहां परमात्मा द्वारा पीने का पानी मांगने पर फुकान के पिता उसे नारियल पानी देते हैं , जिसे देखकर वो कहता है , कि अगर मैं आप लोगों के साथ रह जाऊंगा तो बहुत शक्तिशाली हो जाऊंगा ! अगली सुबह परमात्मा दड़बे में एक मुर्गी और कुछ चूजों को देखता है , जिस पर फुकान का पिता , उसे आश्वस्त करता है , कि सारे चूजे उनके अपने और पालतू हैं  !  तब परमात्मा चूजों को चावल के दाने देता है , जिसे खाकर चूजे तेजी से बड़े होकर मुर्गी और मुर्गे बन जाते हैं  !  फुकान का पिता , परमात्मा से अपने पालतू सूकरों की लघु काया का दुखड़ा रोता है , जिस पर परमात्मा सूकरों को एक बाल्टी भर शकरकंद की पत्तियां खाने को देता है , जिसके परिणाम स्वरूप सूकर तेजी से बड़े और विकसित हो जाते हैं  !

यह सब देखकर फुकान का पिता परमात्मा को अपना बड़ा दामाद बनाने की इच्छा व्यक्त करता है किन्तु परमात्मा , बड़ी बहन के बजाये फुकान से ब्याह करने को सहमत होता है  !  परमात्मा अपने ब्याह में भोज देना चाहता है , यह जानकर फुकान का मामा अत्यन्त क्रोधित होकर परमात्मा से पूछता है , यहां चावल नहीं  , सूकर मांस नहीं  , यहां तक कि चिकन भी नहीं हैं , तो तुम भोज कैसे दोगे ?  किन्तु परमात्मा उसे भोज के लिए आश्वस्त करता है ! अगली सुबह गांव के लोग परमात्मा के अनुरोध पर पेड़ों की छोटी छोटी टहनियां लाते हैं , लेकिन इससे असंतुष्ट परमात्मा स्वयं जंगल से दो बड़े पाइन वृक्ष काटकर लाता है और आग जलवाकर दस बर्तनों में पानी उबलने के लिए रखवा देता है  ! यह देखकर मामा उसका उपहास करता है कि चावल कहां हैं  ? जिस पर परमात्मा एक छोटी सी टोकरी भर चावल से आग पर चढ़े पांच बड़े बर्तन भर देता है  ! 

इसके बाद परमात्मा उदघोष करता है...‘यिष्टजाओ’ जिसे सुनकर जंगल से कुछ हिरन भागते हुए आते हैं , पर वे परमात्मा के काम के नहीं थे ! अतः वो फिर से उदघोष करता है , जिसे सुनकर जंगल से कुछ सूकर भागते हुए आते हैं ! परमात्मा उन्हें पकड़ने का आग्रह गांव वालों से करता है  !  वे सभी एक एक सूकर पकड लेते हैं  , किन्तु मामा बड़ा सूकर पकड़ने की लालच में भाग दौड़ कर थक जाता है , परमात्मा यह देखकर हंसता है और फिर उसे वह सूकर पकड़ कर देता है , जिसे मामा यह कहते हुए छोड़ देता है कि मैंने इसे दौड़ा दौड़ा कर थका दिया था इसलिए तुम इसे पकड़ पाये हो !  यद्यपि परमात्मा उसे फिर से पकड़ लेता है और फिर खाने पीने का दौर चलता है तथा आत्माओं को भेंटें चढाई जाती हैं  ! लेकिन अब वे सभी प्यासे थे ! मामा , परमात्मा से पानी उत्पन्न करने के लिए कहता है  ! गांव के लोग प्यास से परेशान होकर लड़ने लगते हैं , किन्तु परमात्मा उन्हें शान्ति से बैठने की सलाह देता है और अपने भाले से एक चट्टान में छिद्र कर देता है , जहां से पानी का स्रोत फूट पड़ता है  !  परमात्मा मामा को पहले पानी नहीं पीने देता बल्कि गांव के लोगों को प्यास बुझाने देता है और अंत में मामा को यह कहकर चट्टान में धंसा देता है कि तुमने मुझे बहुत परेशान किया है ! अब तुम यही रहो और फिर गांव के सभी लोग वापस गांव लौट आते हैं  !

कुछ दिनों बाद परमात्मा वापस आकाश लौटना चाहता है  , लेकिन इससे पहले वो अपनी पत्नि की परवाह करते हुए उसके लिए लकड़ी का एक ताबूत तैयार करता है  और  फुकान को उसमें बंद करके नदी में प्रवाहित कर देता  है तथा गांव के लोगों से कहता है कि इसे कोई टिंगलियान तक पहुंचने से पहले ना तो रोकेगा और ना ही खोलेगा  !  टिंगलियान में एक विधुर मछलियां पकड़ने आया हुआ था , उसने ताबूत को रोका और उसे खोला ! चूंकि उसकी पत्नी नहीं थी इसलिए उसने फुकान से ब्याह कर लिया !

जैसा कि ,दक्षिण पूर्व एशिया प्रशांत क्षेत्र की यह कथा परमात्मा के चमत्कारों से भरने वाली टोकरियों और चूजों तथा सूकरों के संपुष्ट होने से शुरू होती है , तो मेरा अभिमत यह है कि परमात्मा के अवतार पर विश्वास के साथ ही यह कथा सांकेतिक रूप से इस बात पर बल देती है कि परमात्मा ने एक नवयुवक के रूप मनुष्यों को वनस्पतियों / सब्जियों के अच्छे उत्पादन की तकनीक सिखाई होगी और साथ ही मुर्गी और सूकर पालन के बेहतर गुर भी सिखाये होंगे ! परमात्मा ने फुकान के परिवार को समझाया कि मुगियों और सूकरों के लिए कौन से खाद्य पदार्थ बेहतर हैं  ! स्वयं की प्यास के नाम से परमात्मा , नारियल के पानी के शक्तिवर्धक होने का सन्देश भी उस परिवार / समाज को देता है  !   इस आख्यान को बांचते हुए यह कहना मुश्किल है कि परमात्मा ने छोटी लड़की को पत्नि के रूप में क्यों पसंद किया पर इस तरह की घटना प्रायः आज के समाज में भी घटते हुए देखी जाती है  !

दूल्हे के रूप में , अपने ब्याह के भोज का सारा भार स्वयं वहन करके , परमात्मा लड़की के परिजनों को व्यय भार से मुक्त रखता है और एक बड़ा सन्देश देता है कि वर पक्ष को क्या करना चाहिये ! गौर तलब है कि इससे पहले के मुर्गियों और सूकरों के पालन प्रसंग से स्पष्ट होता है कि , लड़की के पिता के पास भोज के लिए सूकर और चिकन उपलब्ध थे , किन्तु वर अपने ससुर की इस सामग्री का उपयोग नहीं करता  ! वह गांव वालों को धरती से पानी निकालना सिखाता है और प्यास जैसे प्राण लेवा / कठिन संकट के समय में शांत और संयत बने रहने की शिक्षा देता है  ! परमात्मा के ब्याह में अन्य ग्रामीणों की तुलना में मामा का कार्मिक योगदान शून्य रहता है और वह एक निठल्ला तथा केवल उपहास उड़ाने वाला व्यक्ति सिद्ध होता है अतः प्रतीकात्मक रूप से उसे गांव से बाहर छोड़ आने / निष्काषित करने का दंड भी ध्यान देने योग्य है  ! अपने आकाश गमन / अपनी मृत्यु से पूर्व , परमात्मा अपनी पत्नि के पुनर्विवाह की व्यवस्था करता है ! जिससे यह स्पष्ट होता है कि वैधव्य / विधुरता और पुनर्विवाह को लेकर उस समाज को कितना महत्वपूर्ण सन्देश दिया गया है !

रविवार, 20 नवंबर 2011

हुस्न को तेरे क्या कहूं , अपनी नज़र को क्या करूं ?

उसने कहा ध्यान करो, उस ईश्वर का जो सृष्टि का रचयिता है, जिसके कोई माता पिता नहीं और जो अजन्मा है, अनादि और अनन्त है, सारे  ब्रम्हांड उसमें  हैं, जीवन और मृत्यु...पुनर्जन्म और मोक्ष जिसके इशारों पर तिरते हैं ! मैंने कहा...मेरे ध्यान में केवल तुम हो !

उसने कहा...मैं तो नश्वर हूं, तुम ध्यान करो उस ईश्वर का जो शाश्वत है, सनातन और चिर नवीन, अदभुत, अप्रतिम सौन्दर्य और भयंकर असौन्दर्य का स्वामी है जो ! वही जिसकी करुणा और क्रोध का कोई छोर नहीं, तुम्हें  केवल उसे ही साधना है !  मैं कहता हूं...मैं बस तुम्हें ही साधना चाहता हूं ! 

नहीं मुझे क्यों ? तुच्छ अंश को छोड़ कर तुम ध्यान करो उस परम अंश का, जो हम सबमें है और एक दिन हम सब को उसमें ही विलीन हो जाना है ! सारी प्रकृति, सारे रंग, सुबह की ओस, दोपहर की सारी ऊष्मा और रात्रि की नीरवता उसकी ही है ! सुर ताल और नृत्य उससे ही हैं !  गेय सब उसका और अगेय भी ! ध्वनियां और जो ध्वनियां नहीं भी हैं वे सब उसके कारण से अस्तित्व में है ! मैं कहता हूं...मेरे लिए इन सब का कोई मोल नहीं जो तुम ना होओ तो  ! 

उसने कहा तुम भटक रहे हो, सत्य के मार्ग से, ईश्वर सत्य है और मुक्तिदाता भी, हमें माया से मुक्त होना है और भौतिक जगत के उस पार की अलौकिकता के लिए तैयार भी होना है ! अपने सारे भ्रमों को त्यागो और ध्यान करो उस ईश्वर का जो इहलौकिक जागतिक असत्य  से इतर  परम सत्य है ! सारे सुख और दुखों का चक्रव्यूह उसने ही रचा है ! सारे रस, विषाद और आल्हाद उसने ही गूंथे हैं हमारे संबंधों के छल में ! सो ध्यान करो ! मैं कहता हूं...मुझे छला जाना प्रिय है अगर उसमें तुम्हारा अहसास भी हो तो !

तुम समझ नहीं रहे हो, हर यात्री को गंतव्य की सोचना चाहिये ! भटकाव का कोई अंत नहीं यदि तुम ना चाहोगे तो ! इसलिये ध्यान करो ! ईश्वर गंतव्य है ! मैं कहता हूं...नहीं ये ध्यान मुझसे ना होगा क्योंकि मेरी भटकन तुमसे है और मेरा गंतव्य भी तुम ही हो ! 

उसने कहा...बहुत हुआ अब तुम शांत होकर अपनी आंखें बंद करो और ईश्वर का ध्यान करो ! मैंने कहा छोडो भी...मैं समझ गया कि तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें ना देखूं...तो फिर यह जान लो कि आंखें बंद करके भी मैं केवल तुम्हें ही देख पाता हूं ! 

ईश्वर...उसे कभी देखा ही नहीं पर तुम...हर क्षण मेरे ठीक सामने का सत्य हो, इसलिये मेरा सारा प्रेम और जितनी भी श्रद्धा मेरे अंदर बसती हो यहां तक कि थोड़ी बहुत घृणा भी यदि शेष रह गई हो मेरे मन के किसी कोने में ! यह सब केवल तुम्हारा है...


मंगलवार, 25 जनवरी 2011

तू ही तू : तेरा ज़लवा दोनों जहां में है तेरा नूर कौनोमकां में है !


वो जानती हैं कि उनके पसंदीदा सीरियल्स मुझे पसंद नहीं ! उनकी कोशिश ये कि अगर ऐसे वक़्त में , मैं घर में होऊं तो स्टडी में बना रहूं ! नतीज़ा ये कि फायदे में हम दोनों...वो सुकून से सीरियल्स देख पाती हैं और मैं ब्लागिंग का शौक पूरा कर डालता हूं ! एक अलिखित सा करार हमारी परसोना के अलग रंगों में निबाह कर गुज़रता है ! अमूमन स्टडी तक टी.वी. की आवाज़ बहुत ही मद्धम सी आती है गोया मैं कोई अहम काम कर रहा होऊं और ज़रा से शोर से मेरा तप  भंग हो जाने वाला है ! पिछले दो दिनों से एक धुन बार बार मुझे अपनी ओर खींच रही है, मैं बीबी को आवाज़ देता हूं सुन कर बताओ क्या है ये ? वो कहती है स्टार टी.वी. का एंथम बज रहा है ! मेरा ध्यान अब उधर ही है...दोबारा बजे तो मुझे बुलाना ! बेहद मानीखेज, शब्द शब्द आह्लाद भरता हुआ...तू ही तू...स्त्री गौरव को सलाम करता हुआ ये गीत, किसने गाया ? पता नहीं ?... कम्पोजर कौन ? मालूम नहीं ?...लिखा किसने ? क्या पता ?...मैं बस उसे सुनता हूं ! एक अलौकिक आनंद...अदभुत अहसास...पत्नी और पुत्री सामने हैं और दूर कहीं बैठी मां भी !

पहली बार किसी टी.वी. चैनल के लिए साफ्ट से ख्याल लिए सोचता हूं कि शिष्टाचार के तकाजों के इतर 'आप' से दूर' तू' भी अनिवर्चनीय आनंद का कारण हो सकता है ! शायद 'तू' शब्द के विविध व्यापक प्रयोग पे इससे पहले कभी विचार नहीं किया मैंने ! कबीर कब के कह गुजरे 'तू बाह्मण मैं काशी का जुलाहा'...'जो तू तुरक तुरक्क्नी जाया'...पर मैंने 'तू' को छोड़ कर सबका नोटिस लिया ! इतना ही नहीं...बिहारी की राधा भी कमोबेश इसी ट्रीटमेंट से गुजरीं...'तू मोहन के उर बसी, है उरबसी समान' ! सामाजिक / धार्मिक / जातिगत पाखंड में लिप्त इंसानों से लेकर कृष्ण प्रिया भी 'तू' से संबोधित ! पता नहीं क्यों ये लगता रहा कि उस ज़माने के रिश्तों में 'आप' का चलन / दस्तूर ना रहा होगा ? तू तड़ाक के ज़माने की पैदावार हम 'तू' को बोलचाल के गंवारु अर्थ में जीते रहे !

अभी कुछ ही रोज पहले ही कहीं पढ़ रहा था कि पोलीनेशियाई द्वीपों के वासी अपनी प्रार्थनाओं में जिस ईश्वर को पूजते हैं , उसका नाम ही 'तू'  है ! वहां वार्षिक उत्सव की सुबह पुजारी वृक्षों में फलों की अच्छी उपज के लिए देवता का आह्वान करता है और उसे उत्सव में आमंत्रित करते हुए कहता है कि ...' देखो, यह है घोषणा...एक घोषणा , बहुत कुछ करने के लिए ! 'तू' के आह्वान के लिए ! बाहरी आकाश का 'तू', जन भक्षक 'तू' ! 'तू' जो जमीन के ऊपर तैरता है' ! सच कहूं तो भाषाई लिहाज़ से इस 'तू' को हमारी मातृभाषा के 'तू' से कोई लेना देना नहीं है पर उच्चारण की समानता और ईश्वर के लिए उसका अनुप्रयोग अनायास ही आकर्षित करता है ! एक अरसा गुज़रा जो सुना था कि 'तेरा जलवा दोनों जहां में है, तेरा नूर कौनोंमकां में है, यहां तू ही तू वहां तू ही तू , तेरी शान जल्लेजलालहू ! 

फिर नुसरत साहब को सुना, कभी यहां तुम्हें ढूंढा, कभी वहां पहुंचा, तुम्हारी दीद की खातिर, कहां कहां पहुंचा, यही नहीं अभी हाल की ही किसी फिल्म में राहत फ़तेह अली खान साहब गा गये...'तू ना जाने आस पास है खुदा' ! यहां तू का इस्तेमाल खुदा के लिए और वहां...'तू ही तू सतरंगी रे' एक खूबसूरत सी नायिका के लिए ! 'तू' एक आवारागर्द तबियत सा शब्द सामाजिक कुरूपताओं पे प्रहार करते वक़्त, कबीर को रास आया और उसने बिहारी के श्रृंगार में भी जान डाल दी ! आप की खाप से बाहर, विजातीय सा शब्द 'तू' खुदा के लिए और फिर आधी दुनिया के गौरव गान के तौर पर स्टार टी.वी. के एंथम बतौर बजता हुआ, कहीं भी खटकता नहीं ! ख्याल ये कि तू तड़ाक की रफ टफ कम्पोजीशन के अलावा उसे मुहब्बत की नर्मख्याल बंदिशों और अर्ज़-ओ-बंदगी की बहर में सहज ही शामिल देखना...अच्छा लगता है !      



बुधवार, 26 मई 2010

इनकी रामायण, उनका पारायण : हमारे नारायण ! अजित वडनेरकर के लिये सस्नेह समर्पित पोस्ट

हमेशा की तरह आज भी अजित भाई के ब्लाग शब्दों का सफर में पहुंचा  !  वहां उनकी ताज़ा तरीन प्रविष्टि "इनकी रामायण, उनका पारायण"  देखते ही दिमाग मे एक ख्याल बिजली की तरह से कौंधा कि... " आपने जो भी लिखा वो तो सब ठीक है अजित भाई पर इस आलेख से "हमारे नारायण" कहां गुम हो गये ? फिर सोचा कि टिप्पणी करूं और एक 'मुस्कारहट फेंकू संकेत' डाल कर आगे बढ लूं ...पर ...पर वे भाषाई संस्कार सम्पन्न व्यक्तित्व हैं सो दिल नही माना कि टरकाऊ टिप्पणी से काम चलाया जाये !  हुआ ये कि उनकी आज की प्रविष्टि मे मुझे कुछ कमी सी महसूस हो रही थी इसलिये नेट बन्द किया और बाद मे फुर्सत से टिपियाने का ख्याल दिल मे लिये घर से निकल लिया... लेकिन जहां भी जाऊं ...बस एक ही ख्याल कि "हमारे नारायण" कहां गये और अगर अजित भाई रामायण और पारायण की तर्ज़ पर नारायण लिखते तो अर्थ क्या होता ? चैन नही मिला तो तुरत फुरत घर वापसी और फिर से नेट कनेकशन आन हो गया ...ओह नारायण !

यूं तो शब्दों का सफर एक शानदार ब्लाग है पर उससे अपना जुडाव केवल प्रतिक्रिया देने वाले पाठक जितना ही है ...अब हम पाठक कैसे हैं ये तो ब्लाग स्वामी जाने पर खुद से सोचें तो लगता है कि ठीक ठाक ही होंगे  :) ... हाँ  तो बहुत मशक्कत के बाद भी आलेख की तर्ज़ पर 'नारायण' के अर्थ निकालने का जतन किया पर संतुष्टि नही हुई थक हार कर सोचा कि अगर मै ज्योतिषी होता तो क्या करता  ? ...बस कमाल हो गया ...यक़ीन जानिये  रास्ते  खुद ब खुद  खुल गये !

ख्याल आया कि हिन्दू समय मापक बतौर अक्सर "अयन" शब्द प्रयुक्त होता है  !  एक वर्ष यानि कि दो अयन  और एक अयन बराबर तीन ऋतुओं का काल ... अब 'काल' बोले तो क्षण की बडी इकाई माने समय भी और देवता भी !

एक पल को लगा 'नर के रूप मे देवता'  नारायण शब्द के सबसे निकट है (  नर + अयन  /  नर + काल  /  नर +  देवता  )  अब ज़रा आगे गौर फर्माइये राम + अयन  बराबर राम का समय / राम का युग / राम का कल्प सही है कि नहीं ...मेरे विचार से  राम कथा /  वृत्तांत  के लिये सबसे उपयोगी शीर्षक "रामायण" ही हो सकता था और यही हुआ भी होगा  !  इसी तरह से 'पार' यानि  कि   'दूसरे किनारे' जाने मे लगने वाले समय के लिये पारायण सबसे बेह्तर शब्द है !  किसी स्थान को छोड भी दीजिये तो ग्रंथ के प्रथम श्लोक / सर्ग / अध्याय  से अंत ( पार ) तक ...आद्योपांत वही भाव है ! अजित जी के आलेख मे  अयनम / अयणम शब्द का एक अर्थ गति के साथ अवधि भी बताया गया है किंतु उसे राम और पार के साथ जोड्कर नही देखा गया है और ना ही काल रूप देवता के तौर पर नर से ही इसे जोडा गया !

मै नही जानता कि मुझे ऐसा क्यों लगता है कि अयन के बिना....  इनकी रामायण ,  उनका पारायण : हमारे नारायण अधूरे से हैं  !  मुमकिन है कि मेरी  दृष्टि  भाषा शास्त्र  के लिहाज़  से किसी भी लायक ना हो तो भी   "एक दृष्टि " ....सोचने का एक नज़रिया  तो है  ! 

अजित जी भाषा शास्त्र के उदभट विद्वान हैं ...वे वर्ष तो हम अयन भी नहीं ...वे अयन तो हम क्षण भी नहीं !  इस  यथार्थ का ज्ञान हमें भली भांति  है किन्तु उम्र का तकाज़ा है सो पोस्ट उन्हें सस्नेह समर्पित है ! 






गुरुवार, 11 जून 2009

लोक कथा के बहाने : ईश्वर नौसिखिया है या खून का प्यासा ?

मेरी स्पष्ट मान्यता है कि इंसानी सभ्यता और संस्कृति के विकास के शुरुवाती दौर में अनुभवों को लिपिबद्ध किये जाने का तंत्र विकसित नहीं हुआ था इसलिए अनुभवों से प्राप्त ज्ञान को पीढी दर पीढी हस्तांतरित करने के लिए वाचिक परम्परा का सहारा लिया गया ! यही परम्परा आगे चलकर इंसानी संस्कृति / सभ्यता और तकनीकी उन्नति का आधार बनी ! सच कहूं तो वाचिक परम्परा / लोककथायें ज्ञान को लिपि बद्ध किये जा सकने वाले कालखंड में भी उतनी ही प्रभावशील हैं जितनी कि वह पूर्व में हुआ करती थीं ! मगर इन्सान तो इन्सान है उसने अपने स्वार्थ के लिए लोककथाओं में भी 'पंक्चर जोडाई ( पैबंद टांकने ) के अलावा मनमाफिक लोककथायें गढ़ने के यत्न किये हैं जिससे लगता है कि ईश्वर या तो नौसिखिया है या कि खून का प्यासा !
अभी कल ही आदरणीय सुब्रमणियन जी का आलेख पढ़ रहा था"अम्बर किले से जुडा बंगाली समाज " ! आलेख के दो ही स्रोत हो सकते हैं एक लिपि बद्ध इतिहास और दूसरा जनश्रुतियां ! जहां तक राजा मान सिंह की जय पराजय और राज्य विस्तार का सम्बन्ध है इसका सीधा साधा सरोकार इतिहास से है ! लेकिन राजतन्त्र के पोषकों नें बड़ी ही चतुराई से इसमें वाचिक परम्परा की कड़ी ठूंस दी कि राजा की विजय को देवी का आशीर्वाद प्राप्त है और उनके द्वारा किया गया नरसंहार ( पहले युद्ध में /बाद में पराजितों के साथ ) ग़लत नहीं है ! यानि कि ईश्वर ( देवी ) को नरबलि चाहिए ! अब आप ख़ुद ही तय करें कितना मासूम ? तरीका था अपने विरोधियों को निपटाने और अपने राज्य के विस्तार तथा शासन के स्थायित्व की लालसा को पूरा करने का ! अगर गहराई से देखा जाए तो इस जनश्रुति का स्रोत ख़ुद राजा मान सिंह ही दिखाई देता है जिसे देवी व्यक्तिगत रूप से यह सब करने के निर्देश प्रदान करती है ! यहां बस्तर में भी राजा द्वारा माई दंतेश्वरी के समक्ष नरबलि चढाये जाने की कहानियां कुछ इसी तर्ज पर प्रचलित रही हैं जैसे कि राजा मान सिंह को प्राप्त ईश कृपा !
भला ईश्वर एक इन्सान को दूसरे इन्सान की बलि चढाने का निर्देश कैसे दे सकता है ? क्या ईश्वर खून का प्यासा है ? अब आप ही कहें या तो उक्त जनश्रुति /लोककथा राजतन्त्र के निज स्वार्थ के लिए 'पंक्चर जोडाई' जैसा कूट कार्य है या फ़िर वाकई में ईश्वर खून का प्यासा है !
चलिए चतुर इंसानों की चतुराई का एक और नमूना देखें जिसमे एक इंसानी समुदाय दूसरो की तुलना में स्वयं की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए ईश्वर को नौसिखिया सिद्ध कर डालता है ! कई वर्षों पहले सांस्कृतिक मानव शास्त्रियों के हवाले से पढ़ी हुई एक लोककथा का संक्षिप्त किस्सा दर्ज करना चाहूंगा ! एक आदिम समुदाय (विदेशी ) कहता है कि सृष्टि की रचना के बाद ईश्वर नें मनुष्य की रचना करने के लिए आटे से तीन पुतले बनाये और पकने के लिए आग में डाल दिए ! अपनी कृति को देखने के लिए ईश्वर इतना उतावला था कि उसने जल्दबाजी में एक पुतला बाहर निकाल लिया , यह कच्चा पुतला ( ज़रा रंग मिलान कीजिये ) अंग्रेज हुए ! इसके बाद अच्छी तरह से पक कर लाल हुए पुतले को ईश्वर नें निकाला , जिससे इस समुदाय के लोग बने ! दूसरा पुतला इतना सुंदर था कि ईश्वर मुग्ध हो गया और उसे देखते हुए तीसरे पुतले को समय पर निकालना भूल गया जोकि जल गया जिससे नीग्रो बने ! अब आप सीधे सीधे कहें तो यह कथा बहुत अच्छी लगती है लेकिन गौर से देखे / पढ़े तो पाएंगे कि दो समुदायों की तुलना में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने और सौन्दर्य का बखान करने के लिए इस कथानक की रचना की गई है ! तो क्या इंसानों का रचयिता ईश्वर इस कदर नौसिखिया था ? कि वो पुतलों को समय पर पका भी नहीं सका ! अब आप ही कहें ये मासूमियत है या शातिरानापन ? एक वाजिब लोककथा या पंक्चर जोड़ाई ?
जैसा कि मैंने पहले ही कहा है कि" इंसानी संस्कृति /सभ्यता और तकनीकी विकास में 'जनश्रुतियों' /लोककथाओं द्वारा सहेजे गए ज्ञान का आधारभूत योगदान है " लेकिन मेरे कथन में संशोधन ये है कि 'पंक्चर जोडाई ' को छोड़कर !
और ये भी कि मेरा ईश्वर ना तो रक्त पिपासु है और ना ही नौसिखिया !