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शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (7)

गतांक से आगे...

उरुक का राज-प्रासाद भी उनके साये में समा चुका था । हीबानी समझ गया कि अब देवता न्याय करेंगे । तूफ़ान भयानक था, बिजलियाँ सैनिकों की टुकडियों पर गिर रहीं थी, मूसलाधार बारिश सब कुछ बर्बाद करने पर तुली हुईं थीं । धरती पर ऐसा भयंकर दृश्य कभी नहीं देखा गया था । सैनिक चिल्लाये, स्वामी नाराम –सिन् अब भी मौका है, उरुक लौट चलें, देवता हमारी बलि / उपहार स्वीकार नहीं करेंगे । लेकिन राजा नाराम-सिन् इन्नाना मंदिर पहुंचने को उद्यत था । इधर नहर अपने बांध तोड़ कर सड़कों पर बहने लगी । वे लोग अब ना तो उरुक लौट सकते थे और ना ही इन्नाना के मंदिर पहुंच सकते थे । सड़कों पर जांघों तक पानी भर गया था । नाराम-सिन् चिल्लाया, मैं देवताओं का प्रिय, उरुक सिंहासन का राजा, सुमेरियंस में सबसे शक्तिशाली, अब अभिशापित हुआ । मुझे इससे पहले धरती और स्वर्ग से कोई प्रतिवाद नहीं हुआ ।  ना तो ईश्वर और ना ही मनुष्यों ने मेरा रास्ता रोका । तभी गहराइयों से आप्सू के सहयोगी अहहाजू दानव और सात भयंकर सर्प आत्माएं प्रकट हुईं –

बढ़ता तूफ़ान, वे शैतान देव थे, वे दया और अनुकम्पा नहीं जानते थे, प्रार्थनाओं और विनती को नहीं सुनते थे ।

उन सातों आत्माओं ने नाराम-सिन् और उसके सहयोगियों पर हमला किया । वे भाग भी नहीं सकते थे । बाढ़ का पानी बढ़ता जा रहा था । जब नाराम-सिन् ने अपनी तलवार उठाई तो मोटी चमड़ी वाले दैत्य पर उसका कोई असर नहीं हुआ । एक एक करके सारे मनुष्य / सैनिक, सर्पों द्वारा पानी में डुबा दिये गये, कुछ का दम उनकी कुंडली में फंस कर घुट गया । उन्होंने देवताओं से मदद की प्रार्थना की पर, उनकी मदद को कोई नहीं आया । देवता आप्सू की प्रलय योजना में कोई बदलाव नहीं आया । सैनिकों  की चीखें तूफ़ान, बादलों और बिजली की गर्जन तर्जन में डूब गईं । नाराम-सिन् का गर्वीला सिर पानी में समा चुका था, उसकी शक्तिशाली काया, सातों दिव्य सर्पों का आहार बन गई । संघर्ष थम चुका था । नरसंहार के बाद तूफ़ान भी थम गया। पानी फिर से नहर के अंदर बहने लगा और सड़कें खाली हो गईं । किसान / निर्धन लोग अपने छिपने के ठिकानों से बाहर निकलने लगे थे ।

देवता की चमत्कारिक शक्तियों की बदौलत हीबानी और एकत्रित किये गये जानवरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा । नाराम-सिन् के विनाश की पुष्टि होते ही, कृतज्ञता वश रोते हुए, उन्होंने रसातल के देवता आप्सू को धन्यवाद दिया । हीबानी ने जानवरों को मुक्त कर दिया ताकि वे अपने मूल स्थानों को लौट जायें और फलें फूलें । जब भी कोई सुमेरियन, इन जीवों को देखता है तो वह धरती और जल के नीचे मौजूद ईश्वर से यह प्रार्थना ज़रूर करता है कि वो ईश्वर के कहर और जल प्रलय से बचा रहे ।  हीबानी इन्नाना के मंदिर वापस लौटा लेकिन वहाँ विनाश के निशान थे । नाराम-सिन् की मृत्यु ने उसे संतोष दिया लेकिन किशोर किन्नरों की मृत्यु का जख्म अभी भरा नहीं था । इसके बाद बहुत समय तक वह, देवी इन्नाना का मंदिर देखने नहीं गया हालांकि धरती के लोगों ने उसे खोज लिया और सोचा कि वो उनके लिये देवी इन्नाना से पुनः प्रार्थनाएं किया करेगा किन्तु टूटे हुए दिल का स्वामी, छोटा किन्नर पुरोहित हीबानी मर गया ।              





गुरुवार, 5 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (6)

गतांक से आगे... 

स्वामी आप्सू, मैं इतने सारे जानवर उस जगह पर रखूंगा कैसे ? इनमें से हर एक हिंसक और लड़ाकू है । मैं एक साधारण किन्नर पुरोहित हूं, इन्हें आपसी सौहार्द्य के साथ कैसे रख पाऊंगा ? ना तो मुझे युद्ध का ज्ञान है और ना ही मैं शिकार करने में समर्थ मनुष्य हूं, मैं यह सब बिना सहायता के कैसे कर पाऊंगा ? हीबानी ने कहा । आप्सू ने कहा, तुम चिंता ना करो, ये सारे जानवर तुम्हें देखते ही पहचान लेंगे कि तुम आप्सू के पास होकर आये हो, वे सभी तुम्हारा नेतृत्व स्वीकार कर लेंगे । तुम जो टीला / किला बनाओगे, उसका आकार कम से कम 60*60 लाठी होना चाहिए, तब इसमें सारे जानवर आराम से रह जायेंगे । इसके बाद तुम पक्षियों के पंखों से शाही कंठा बनाना, जिसे अपने गले में पहन लेना, बालों से एक जाल बनाना, जिससे अपने बाल बाँध लेना, पंखों से एक मुकुट बनाना और अपने सिर में धारण कर लेना इसके बाद कहना-

राज घराने के सारे प्रतीक नोच कर आग में फेंक दिये गये हैं, सो मेरा बदला, मेरे दुःख दर्द और कठिनाई, मेरे शरीर की निर्बलता / व्याधि पूर्णतः समाप्त हो जाए 

और ऐसा कहते हुए सारे प्रतीक उतार कर आग में झोंक देना । यह कार्य पूर्ण होने के बाद धीरज के साथ मेरे आने की प्रतीक्षा करना । मैं लंबे समय तक वहाँ नहीं रहूंगा पर सारे संकेत तुम्हें स्पष्ट दिखाई देंगे, कालान्तर में सुमेरियन गल्पों में कहा  जायेगा, हीबानी, जो देवता आप्सू के सामने अकेला जीवित खडा रहा...और फिर आप्सू अपने सरीसृप रूप में भयावह फुफकार मारते हुए समुद्र में लौट गया । हीबानी के वापस लौटते समय मूल निवासियों ने, उसका मजाक नहीं उड़ाया, हीबानी चिल्लाया कुत्ते के समान मुख वालो, आओ मेरा मजाक उड़ाओ । उरुक लौट कर हीबानी ने वैसा ही किया जैसा कि देवता आप्सू ने कहा था । मिट्टी का निर्माण कार्य पूर्ण होते ही, हीबानी सूकर ढूँढने जंगल गया जो उसे देखते ही उसका अनुगमन करने लगे, ठीक ऐसे ही कुत्ते और कलहंस भी हीबानी के पीछे हो लिये ।  

हीबानी ने इसके बाद राजघराने के प्रतीकों की निर्मिति की और उन्हें निर्धारित कथन के साथ आग्नि में झोंक दिया । इसके बाद केवल प्याज और पानी को खाद्य सामग्री मान कर वो आप्सू का इंतज़ार करने लगा । प्रतीक्षा में दिन, हफ्ते, महीने गुज़रे, अंततः आप्सू आया । एक दिन नाराम-सिन् देवी इन्नाना के मंदिर आया वो किन्नर किशोरों की हत्या के बाद भी उदास था क्योंकि उन्होंने उसके ढ़ोलों को बर्बाद कर दिया था, उसकी सुरक्षा टुकड़ी बड़ी थी । वह अगले तीन दिन, इन्नाना मंदिर परिसर में रहने वाला था । तभी गहरे काले बादल आसमान पर छा गये, एक सैनिक ने कहा, यह अपशगुन है, हम वापस उरुक चलें, किसी अन्य शुभ समय में आकर देवी इन्नाना को बलियाँ प्रस्तुत कर देंगे । राजा ने कहा, ये साधारण बादल हैं, पानी बरसेगा तो धरती उर्वर हो जायेगी । अपने मिट्टी के टीले से हिबानी ने देखा कि पूरी धरती में काले बादल छा गये हैं...                                                                                                                                                                                       ...क्रमशः 

बुधवार, 4 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (5)

गतांक से आगे...

हीबानी की आंखों में आंसू थे उसने कहा जीवन मृत्यु की चिंता नहीं, मुझे मेरी परवाह नहीं । मैं केवल, मेरे नन्हों का बदला चाहता हूं । उसने, धरती की आयु जितने पुराने, उन दोनों सरीसृपों को अपनी व्यथा कथा सुनाई, जिसे सुनकर उन्हें हीबानी पर दया आ गई । उन्होंने कहा, तुम खुद को खजूर, ताड़ के भूसे की नीचे छिपा लो, जब आप्सू दिलमुन समुद्र से वापस आएगा तो उसकी दृष्टि भयावह होगी । अगर उसे तुम्हारी गंध आ जाए तो बाहर आकर सपाट शब्दों में अपना कष्ट उसे सुना देना यदि उसे तुम पर दया आ गई तो तुम्हारे आयोजन की सफलता सुनिश्चित है । उन्होंने कहा, महाकाय लहरों को ध्यान से गिनना आठवीं लहर के साथ ही देवता आप्सू यहां आ जाएगा ।

ऐसा ही हुआ ठीक आठवीं लहर के साथ, रसातल का देवता प्रकट हो गया, उसका रूप भयानक था । उसकी त्वचा ऐसे फडफडा रही थी जैसे कि उरुक योद्धाओं के कवच बजते हों । उसकी फुफकार गोया वह आक्रमण करने वाला हो । उसने महा-सांड की तरह से अपना माथे का सींग ऊपर उठा लिया और सिर इधर उधर घुमाया । भय से हीबानी की आंखें बंद हुई जा रहीं थी, तभी उसने देखा आप्सू समुद्री सर्प से एक शांत मनुष्य में बदल गया । हीबानी बाहर निकलने ही वाला था कि उसे क्रोधित स्वर सुनाई दिया, यहां मनुष्य की गंध क्यों आ रही है । सरीसृप रक्षकों ने कहा, स्वामी हम तो यहां सतर्क खड़े थे, कोई नहीं आया । नहीं, तुम गलत बोल रहे हो, देव ने कहा, यहां मानव गंध है । आप्सू ने भूसे के ढेर में मुंह डाला और किन्नर हीबानी को दबोच लिया ।  

हीबानी चिल्लाया शक्तिमान देव पहले मुझे सुन लीजिए बाद में भले ही खा लीजियेगा । देव ने कहा, जल्दी कहो वरना मैं तुम्हें खा जाऊंगा । सो हीबानी ने अपनी दुःख भारी गाथा उसे सुना दी, जिसे सुनकर आप्सू का हृदय मानवीय संवेदनाओं से भर गया और उसके आंसू बहने लगे । उसने सूकर की बलि स्वीकार कर ली और कहा छोटे किन्नर तुम्हारे यहां आने का उद्देश्य सफल हुआ। मैं निश्चित रूप से उरुक के राजा नाराम-सिन् को दंड दूंगा । आप्सू ने कहा तुम वापस उरुक जाओ और शहर के बाहर क्षेत्र में रहना । वहाँ मिट्टी का एक टीला बनाना, फिर टीले के चारों ओर मिट्टी की दीवाल बनाना ताकि कोई उसे देख ना सके । उसके हर कोने में देवता आप्सू का प्रतीक चिन्ह बना देना, जिसके कारण से कोई मनुष्य इस टीले तक नहीं आएगा । वो समझेगा कि यह भूमि पवित्र है और इसे छिपा रहना चाहिए । इसके बाद चार सौ काले सूकर, चार सौ गंदे कुत्ते, चार सौ कलहंस जिनके सीने में तीन लाल पट्टियाँ बनी हों, एकत्रित कर लेना...                                                                                                                                                                                                                     ...क्रमशः 

मंगलवार, 3 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (4)

गतांक से आगे...                                                                                                                                            
वहाँ पहुंचने के बाद सेवक गाड़ी लेकर वापस लौट आया । इसके बाद हीबानी सूकर को अपने कांधों में लाद कर मूल निवासियों के घरों के सामने से गुज़रा । यह गांव उरुक जैसा शक्तिशाली शहर नहीं था । यहां किले की कोई प्राचीरें नहीं थी, जहां से सैनिक, निगरानी कर सकते हों, ठीक वैसे ही जैसे कि पक्षी ऊपर घोसले में बैठ कर करते हों । यहां वैभवशाली महल, ठाठ बाट वाले सामंत नहीं थे । यहां निचले दर्जे की गंदी बस्तियां, अस्वच्छ बच्चे, कुत्तों की तरह के छोटे छोटे घर थे । यहां कोई मंदिर नहीं था जहां, कोई हीबानी देवी इन्नाना को पूजता हो । कोई अट्टालिकाएं नहीं, बल्कि मिट्टी के ऊबड़ खाबड टीले तथा पत्थरों की बेढब रक्तरंजित वेदियाँ थीं ।  

जब स्थानीय मूल निवासियों ने सूकर को काँधे पर लादे हीबानी को देखा तो वे उसका उपहास करने लगे, वे चिल्लाये, ओ किन्नर तुम अपने अभ्यारण्य से बाहर कैसे निकले, क्या मादा पक्षी ने अपने अस्वस्थ चूजे को घोसले से बाहर फेंक दिया है, हीबानी ने उनकी ओर ध्यान नहीं दिया । वह बलि वेदी तक सूकर को ले आया । तभी मूल निवासियों का मुखिया सामने आया, उसने कहा, यहां तुम्हारे द्वारा दी गई बलि अकारथ होगी । नीचे जल में बनी हुई, गुफाओं में जाओ । देवता आप्सू कभी वहाँ आये तो उसके सामने यह बलि चढ़ा देना । हीबानी ने वैसा ही किया जैसा कि मुखिया ने बोला था । वो दिलमुन समुद्र के किनारे, पानी में स्थित गुफाओं में जा पहुंचा । 

गुफा के द्वार पर खड़े होकर, उसने समुद्र की ओर देखा, जहां सुमेर गल्पों में वर्णित देव प्रहरी महाकाय ड्रेगन / सरीसृप मौजूद थे। वे अपने देवता के शक्तिशाली रक्षक थे । वे देवता की अनुपस्थिति में उक्त कन्दरा की देखभाल करते थे । हीबानी ने सूकर को जमीन में रख कर कहा, यह तुम्हारे देव आप्सू के लिये । सरीसृप फुफकारते हुए बोले, नहीं सुमेरियन मनुष्य नहीं । रसातल का देवता तुम लोगों के उपहारों की परवाह नहीं करता क्योंकि उन्होंने, उसके प्रिय, स्थानीय मूल निवासियों का दमन किया है । वो तुम लोगों से घृणा करता है, यहां तुम्हें केवल मृत्यु मिल सकती है । अगर आप्सू तुम्हें यहां पर देख लेगा तो सूकर के साथ तुम्हें भी खा जाएगा...                                                                                                                                                                                                                                                                             ...क्रमशः 

सोमवार, 2 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (3)

गतांक से आगे...

यह सुनकर सारे पैगम्बरों / धार्मिकों ने कहा, हम तुम्हारी सहायता करेंगे...लेकिन उनमें से किसी की भी प्रार्थना काम नहीं आई राजा नाराम-सिन् जीवित बना रहा । हीबानी के पास राजा को क्षति पहुंचाने वाले साधनों की कमी थी, वो रोया, उसे अपने जीवन की परवाह नहीं थी, वो नहर के किनारे पहुंचा और उसने सोचा कि पानी में कूद कर आत्महत्या कर लूं । तभी उसे एक नाव / बजरा आता हुआ दिखाई दिया । यह नाव असाधारण थी । ये, नहर के प्रहरियों के द्वारा उपयोग में लाई जाने वाली सभी नावों से आलीशान थी । वो सूर्य की रौशनी में सोने जैसी चमक रही थी । उसमें बेशकीमती धातु और पत्थर जड़े हुए थे । नाव में एक अद्वितीय महिला खड़ी हुई थी । उसके सिर पर त्रि-मुकुट था और उसने मोर तथा शुतुर्मुग के पंखों वाला परिधान पहन रखा था । उसके साथ, कोई परिचारक नहीं थे, केवल छै इथोपियाई दास नाव को खे रहे थे ।  

उसने हीबानी से कहा, तुमने सीधे मुझसे मदद क्यों नहीं माँगी ? तुमने दूसरों से मदद चाही जबकि मैं हरदम तुम्हारे साथ थी । हीबानी समझ गया ये देवी इन्नाना थी वो अवाक उसे ताकता रह गया । उन दिनों देवता मनुष्यों से सीधे संवाद नहीं करते थे । उसने शीश झुका कर देवी की उपासना की । इन्नाना ने फिर से कहा, सौम्य हीबानी, मेरे सेवकों में सर्वाधिक प्रिय, तुमने सही कहा, मैं दया / कृपा की देवी हूं ।  इसलिए मैं जो अब कह रही हूं, उसे ध्यान से सुनों, अगर तुम्हें राजा नाराम-सिन् के विरुद्ध न्याय चाहिए तो तुम अंधेरे के देवता आप्सू की सहायता मांगो जोकि धरती के नीचे पानी में रहता है । हीबानी ने आप्सू नाम की ध्वनि को ध्यान से सुना, उसे पता था कि स्वर्ग के राजा ने सृष्टि के आरम्भ में आप्सू को मृत्यु देव चुना था । सुमेरियन गल्प में उसे भयावह देव मानते हैं और कृतज्ञता वश उसकी प्रार्थना करते है ।

देवी इन्नाना कहती रही, तुम देव आप्सू के पास जाओ, गहराइयों में उसके मंदिर जाओ, वो महाकाय सर्प दिलमुन समुद्र के दक्षिण में रहता है । वहाँ बचे हुए स्थानीय मूल निवासी भी रहते हैं । आप्सू को सूकर की बलि प्रिय है, रीछ के जैसा सूकर जिसके काले बाल सीधे खड़े हों, उसे समर्पित करो, हालांकि यह तुम्हारी सफलता की गारंटी नहीं है किन्तु तुम्हारे पास अन्य कोई मार्ग भी नहीं है । हीबानी ने श्रृद्धा पूर्वक इन्नाना के समक्ष सिर झुकाया, वो जा चुकी थी । उसे देवी का कहा अक्षरशः याद रहा । हीबानी ने सेवक को सूकर पकड़ने के लिये जंगल भेज दिया । जब सेवक सूकर पकड कर लाया तो दोनों उसे बैलगाड़ी में लाद कर उरुक के दक्षिण दिशा वाले दलदली क्षेत्र की ओर निकल पड़े, जहां राजा नाराम-सिन् के हमले से शेष बचे स्थानीय मूल निवासी पनाह लिये हुए थे...                                                                                                                                                                                                                                                                   ...क्रमशः 

रविवार, 1 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (2)

गतांक से आगे...                                                                                                                                            
अन्य किन्नर पुरोहित ढ़ोल की आवाज़ सुनकर आतंकित हो गये, उन्हें पता था कि राजा नाराम-सिन् उस दिन अपने कक्ष में नहीं था । वे जानते थे कि ढ़ोल की अजीब आवाज़ नाराम-सिन् के ढ़ोल बजाने का परिणाम नहीं है । उन्होंने राजा नाराम-सिन् को घटनाक्रम की खबर भेज दी । खबर मिलते ही राजा मंदिर परिसर में वापस आया और ढ़ोल को फटा देखकर शेर की तरह से गरजा क्योंकि उसके बिना उसकी प्रार्थना पूर्ण नहीं हो सकती थी । उसने दोनों शैतान, किन्नर किशोरों को पकड़ा और खींच कर देवी की वेदिका में, उनकी बलि चढ़ा दी, कंठ नाल कट जाने से उन दोनों का खून पूरी वेदी में फ़ैल गया । यही उनके अपराध का प्रायश्चित्त था । शाम को हीबानी के वापस मंदिर परिसर में लौटने पर अन्य किन्नर पुरोहितों ने, उसे सारा किस्सा बयान किया । हीबानी उन किशोरों को अत्यधिक स्नेह करता था सो उसके हृदय में अथाह दुःख और बदले की भावना घर कर गई ।

वह एक सौम्य शालीन किन्नर पुरोहित था इसलिए उसने देवी की पूजा की और राजा की सैन्य शक्ति के विषय में चिंतन किया । उसके मन  में पहली बार हिंसा की भावना पनप रही थी । वो जानता था कि राजा नाराम-सिन् से मुआवजे की मांग राजा को और भी क्रोधित कर देगी, यहां तक कि राजा अपने सैनिकों को किन्नर पुरोहितों के भगवा परिधान और आभूषण उतारने के आदेश दे देगा, आभूषण जिन पर लिखा था, ना स्त्री और ना ही पुरुष और उन सभी किन्नर पुरोहितों को दर दर भटकने की नौबत आ जायेगी । हीबानी यह भी जानता था कि उन्हें संगसार भी किया जा सकता है ।  स्वर्ग के राजा पिता एन ने धरती का संविधान बनाते समय तय किया था कि जब तक किन्नर देवताओं के पवित्र चंवर डुलाते रहेंगे,उन्हें दैवीय संरक्षण प्राप्त होता रहेगा अन्यथा देवता और मनुष्य उन्हें, अप्राकृतिक कौतुक में, गिनने लग जायेंगे यहां तक कि उन्हें मत्स्य दैत्य प्रदेश में मृत्यु दंड के लिये भेज दिया जाएगा ।

हीबानी एक एक करके, मंदिर परिसर में रहने वाले सभी पैगम्बरों / धार्मिकों के पास गया । उसने उनसे कहा, कि वे सभी राजा के विरुद्ध ईश्वर से न्याय की मांग में, उसकी सहायता करें । उन्होंने कहा, तुम स्वयं देवी इन्नाना के कृपापात्र हो अतः उनसे यह मांग तुम ही करो । इस पर हीबानी ने कहा, इन्नाना एक सौम्य देवी है, वो सम्पूर्ण मानवता को पोषित करती है इसलिए बदले की प्रार्थना को स्वीकार नहीं करेगी ।उसके न्याय में आंख के बादले आंख, दांत के बदले दांत, जीवन के बादले जीवन, सम्मिलित नहीं है इसीलिए मैं आप सब से सहायता मांगने आया हूं । क्या आप युद्ध में सहायक देवता निनुर्ता या एंलिल से प्रार्थना नहीं कर सकते या फिर पिता एन से दुआ नहीं कर सकते कि उनके द्वारा दिये गये आदेश को कोई अन्य कैसे संशोधित कर सकता है?  स्वर्ग के राजा एन, जो न्याय को तौलते हैं। ...                                                                                                                                                                                                                                                 ...क्रमशः   

शनिवार, 30 जून 2018

किन्नर - 32 (1)


वे सभी किन्नर पुरोहित अपने मुखिया हीबानी के साथ, स्वर्ग की रानी, देवी इन्नाना के पिरामिड मंदिर परिसर में रहते थे । सुमेरियन कहते हैं कि देवता ने किन्नरों को पिरामिड युग में अस्तित्वमान किया । वे ना तो नर हैं और ना ही नारी । देवी इन्नाना के पुजारी बतौर हीबानी बहुत ख्यातनाम था, गर्भवती महिलाए उससे मंदिर में, पूजा करवाती ताकि उनका गर्भ फूले फले । यही नहीं उरुक का राजा नाराम-सिन् भी हीबानी से प्रार्थनाएं करवाता ताकि उसका राज्य दैवीय कृपा से समृद्ध रहे । हीबानी के संरक्षण में दो बालक थे, जिन्हें वो, किन्नर पुरोहित बनाने के लिये प्रशिक्षण दे रहा था ।  दस वर्ष की आयु में उन दोनों का बंध्याकरण कर दिया गया, जिससे कि वे ‘ना स्त्री और ना ही पुरुष की’ जाति में सम्मिलित हो गये । वे अन्य किन्नरों की तरह से देवी के पुजारी बन गये, अब उनमें अन्य सामान्य युवाओं सी अभिलाषाएं शेष नहीं रहीं । हीबानी उन्हें अन्य सभी की तुलना में अधिक प्रेम करता था, बिलकुल अभिभावक की तरह से, हालांकि यही प्रेम, उसकी गलती साबित हुआ ।  

राजा नाराम-सिन् देवी का भक्त होने के कारण से मंदिर परिसर में ही निजी कक्ष बनाये हुआ था ।  वो जब भी राज काज से थक जाता इन्हीं कक्षों में आराम करता ।  उन कमरों में दो बड़े ढ़ोल रखे थे, जिन्हें वो बहुत शौक से बजाया करता था ।  उसके कारीगरों ने इन ढोलों पर स्थानीय मूल निवासियों के राजा की खाल मढ़ दी थी ।  राजा नाराम-सिन् ने मूल निवासियों को दक्षिण के दलदली क्षेत्र में धकेल दिया था और फिर पराजित राजा की खाल से ढ़ोल की निर्मिति हुई । कहते हैं कि मूल निवासियों का राजा एक शक्तिशाली जादूगर था इसलिए मृत्यु के बाद भी ढोलों में लगी हुई उसकी खाल जादुई कृत्यों के उपयुक्त बनी रही । नाराम-सिन ढ़ोल बजाने में इतना दक्ष था कि उसके ढ़ोल की थाप / ध्वनि से पहाड़ी में मौजूद भेड़ और गडरिये मुग्ध हो जाते , खेतों में किसान, नहरों की मछलियां भी, उसे सुनतीं, लेकिन ढ़ोल वादन का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि उससे वो सन्देश ध्वनित होते जो नाराम-सिन् पुजारियों से कहना चाहता था सो पुजारी भी उसके ढ़ोल वादन का इंतज़ार करते रहते ।

एक दिन नाराम-सिन् राजकाज निपटाने के लिये उरुक स्थित महल में चला गया तो किन्नर हीबानी के पालित किन्नर किशोरों ने राजा नाराम-सिन् के कक्ष में घुस कर ढ़ोल बजाने का निर्णय ले लिया । वे राजा की तरह से उन ढोलों को बजाना चाहते थे । वैसे तो हीबानी उन्हें कभी दण्डित नहीं करता था फिर भी उन्होंने तय किया कि वे ढ़ोल बजाने तब जायेंगे जबकि हीबानी भी उरुक चला गया हो । एक दिन जब हीबानी, वजीर की बड़ी लड़की की शादी में सम्मिलित होने के लिये उरुक गया तो उन्होंने ढ़ोल बजाने के लिये राजा नाराम-सिन् के कक्ष में घुसने का निर्णय  लिया । यह स्वभाविक था कि किन्नर किशोर, राजा की तरह से ढ़ोल नहीं बजा पाते, क्योंकि ढ़ोल की धुन की विलक्षणता मूल निवासियों के दिवंगत राजा की खाल से सम्बन्ध रखती थी । इसके बावजूद किशोर किन्नर ढ़ोल पीटने लगे । उनके पीटने से ढ़ोल से कोई सार्थक आवाज नहीं निकली सो उन्हें और जोर से कोशिश की, जिसका नतीजा यह हुआ कि ढ़ोल फट गया । बहरहाल कार्य योजना में असफल और हतोत्साहित किशोर किन्नर चुपचाप अपने कमरों में लौट गये ...                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                    ... क्रमशः