शुक्रवार, 21 जुलाई 2017

स्त्रियों को भगवान भी...

चेरोकी कहते हैं कि जिस दिन ईश्वर ने प्रथम पुरुष का सृजन किया, उसी दिन, उसकी संगिनी का सृजन भी कर दिया, फिर...वो दोनों लंबे समय तक सुखपूर्वक, एक साथ रहे, हालांकि बाद में उनमें, झगड़े भी होने लगे ! एक दिन, पत्नि ने नाराज होकर पति का घर छोड़ दिया और पूर्व दिशा में, सूर्य की धरती की ओर चल पड़ी ! पत्नि त्यक्त, एकाकी और शोकाकुल पति, रूठी हुई पत्नि के पीछे पीछे चलने लगा, लेकिन वो...अनवरत आगे बढ़ती रही, उसने एक बार भी पीछे, मुड़कर नहीं देखा ! सृजनहारे / ईश्वर को दु:खी पति पर दया आ गयी, सो उसने पति से पूछा, क्या तुम अब भी अपनी पत्नि से नाराज हो ? पति ने कहा, नहीं, बिलकुल नहीं ! सृजनहारे ने फिर से पूछा, क्या तुम उसे वापस पाना चाहते हो ? पति ने बेताबी के साथ कहा, हां, ज़रूर !  

तब सृजनहारे ने, स्त्री के रास्ते के दोनों ओर हकलबेरीज की शानदार फसल उगा दी, पर वो हकलबेरीज की तरफ ध्यान दिये बगैर आगे बढ़ गयी, फिर सृजनहारे ने ब्लेकबेरीज की फसलें उगाई, लेकिन स्त्री ने उन पर भी ध्यान नहीं दिया ! स्त्री को आकर्षित करने के लिये सृजनहारा, एक से बढ़ कर एक फलों वाले दरख़्त उगाता गया, यहां तक कि उसने खूबसूरत सुर्ख बेरियों से लदे फंदे झाड़ीनुमा दरख़्त भी लगाये पर...स्त्री इन सब को देखे बिना आगे बढ़ती गयी ! अचानक स्त्री ने अपने सामने स्ट्रॉबेरीज की लहलहाती फसल देखी, पहली बार, वो रुक गयी ! उसने कुछ स्ट्रॉबेरीज खाईं और फिर कुछ स्ट्रॉबेरीज तोड़ते हुए, उसका मुंह पश्चिम दिशा की ओर घूम गया...उसे अपने पति का ख्याल आया !

वो वहीं बैठ गयी, उसे आगे बढ़ने की इच्छा ही नहीं हुई ! उस जगह, बैठे बैठे, पति के साहचर्य के लिये, उसकी अभिलाषा  बलवती ‍‌‌‌होती गयी, अंततः उसने पति की खातिर स्ट्रॉबेरीज के कुछ बेहतरीन गुच्छे तोड़े और वापस चल पड़ी घर की ओर ! पति लगभग सामने ही था, वो उससे मिला विनम्रता के साथ, प्रेमपूर्वक जैसे कि उनमें कोई झगड़ा हुआ ही नहीं था और फिर वे दोनों एक साथ बढ़ चले, अपने घर की ओर...   

वर्तमान समय में पति और पत्नि के संबंधों में प्रेम और झगड़े के सह अस्तित्व जैसी ये गाथा, सृष्टि के प्रथम पुरुष और प्रथम स्त्री के मध्य भी ठीक ऐसे ही संबंधों का बयान करती है, यानि कि प्रेम, सुख, झगड़े और फिर मान मनौव्वल ! संबंधों की स्थायी टूट का कथन इस अनुश्रुति में नहीं मिलता, जिससे प्रतीत होता है कि कथाकालीन समाज में स्त्रियों और पुरुषों के मध्य असहमतियां अथवा झगड़े होने के बाद पारस्परिक संवाद / पुनर्विचार, तदुपरांत एकात्म हो जाना, अनिवार्य सामुदायिक मान्यता रही होगी तथा स्थाई अलगाव को निषिद्ध माना गया होगा ! यह भी संभव है कि संबंधों की टूट को हतोत्साहित करने की गरज से आख्यान में ईश्वरीय हस्तक्षेप का कथन, सायास जोड़ा गया होगा !

आख्यान में नवदम्पत्ति के लंबे समय तक सुखपूर्वक साथ रहने और फिर सतत असहमत हो कर, परस्पर झगड़ने का उल्लेख किया गया है, जिसके कारण पत्नि, पति का घर त्याग देती है, यानि कि यह पुरुष प्रधान समाज था, जहां संपत्ति / घर पति का था ! उस दिन पति और पत्नि के झगड़े के दौरान पत्नि आहत (मनः) हुई, फिर उसने अपना गार्हस्थ्य जीवन त्यागने का निर्णय ले लिया और पूर्व दिशा स्थित कथित सूर्य देश की ओर चल पड़ी ! वो दु:खी / कुपित, इतनी कि, पीछे मुड़कर भी नहीं देखती ! बहरहाल पति अपने जीवन में पत्नि की अनुपस्थिति और उसके साहचर्य के मोल को समझ, पत्नि के पीछे पीछे चलने लगता है ! निःसंदेह ये उसका अपराध बोध है कि, वो दौड़ कर, पत्नि को रोक नहीं पाता या कि आवाज देकर वापस बुलाने का हौसला नहीं जुटा पाता !

संभवतः पति के ग्लानि बोध को महसूस कर ईश्वर उसकी सहायता करना चाहता है, लेकिन सहायता से पूर्व, वो अपनी दया अनुभूति की पुष्टि के लिये पति से सवाल पूछता है ! आख्यान में उदास पति के मददगार ईश्वर का चित्रण एक नौसिखिये के जैसा है जो कि यह भी नहीं जानता / समझता / बूझता कि उसके ही द्वारा रची गई प्रथम स्त्री के मान मनौव्वल के लिये प्रथम उपहार क्या होना चाहिए ? कहन ये कि सृजनहार होकर भी, रूठी स्त्री के मन से, ईश्वर के, अपरिचय का हाल ये है कि वो तरह तरह के वानस्पतिक टोटकों को आजमाता रहता है और अन्ततोगत्वा उसका एक तुक्का निशाने पर लग भी जाता है !

इस कथा को बांचते हुए, प्रतीत ये होता है कि ईश्वर चाहता है कि, रूठी हुई पत्नियों को उपहार देकर, विनम्रता से पेश आकर तथा सफल सुफल दाम्पत्य संबंधों के लिये पत्नियों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने का दायित्व पतियों का है !