ummaten

गुरुवार, ३ दिसम्बर २००९

आदमी कैसा भी हो काग़ज सही होना चाहिए ?

पिछले कुछ दिनों से अपनी कम्पनी घनघोर वित्तीय संकट से गुज़र रही है , सोचा बैंक से मदद ली जाये , इसी उपक्रम में आज दोपहर बाद बैंक जा धमका ! कुछ चर्चा कुछ कागजी कार्यवाही , समय तो लगना ही था ! मूक दर्शक बना लिखा पढ़ी देखता रहा ! ख्याल था कि बैंक की नौकरी , ठाठ की नौकरी है , पर शाखा प्रबंधक मित्र की मेहनत देख कर , बैंकिंग सेवाओं के मुताल्लिक सारे रोमानी ख्याल काफूर हो चले हैं ! लगता है अपनी नौकरी ही भली है , जो थोड़ी बहुत जुबान चलाई और पगार पक्की ! इसके बाद भी , अगर खाली पगार से काम ना भी चले तो 'ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत' के दर्शन की पुष्टि के लिए बैंकिंग सेवायें और मेहनत के लिए मित्रगण हैं ही ! ओफ्फोह ...लगता है मैं मूल मुद्दे से भटक चला हूँ , चलिये वापस , मुद्दे पर आता हूँ , दरअसल वहां एक सज्जन अचानक आ धमके और अपने वित्तीय संकट का हवाला देते हुए , शाखा प्रबंधक से ऋण प्रदाय में सहायता की अनुनय करने लगे , बातचीत के दरम्यान मुझे लगा कि उन सज्जन की ख्याति से मित्र ( शाखा प्रबंधक ) भली भांति परिचित हैं , सो उन्हें टरकाने की कोशिश करते हुए तरह तरह के दस्तावेजों को लेकर आने की बात कह रहे हैं ! लेकिन वो सज्जन भी मंजे हुए खिलाडी , आसानी से कहां मानते डटे रहे ! थक हार कर मित्र नें कहा.......अरे भाई ...मैं क्या मदद करूं , बैंक केवल एक ही बात मानता है "आदमी कैसा भी हो कागज सही होना चाहिए" आप सही कागज लाइये काम हो जायेगा ! उस वक्त मित्र नें ये बात किसी भी मंतव्य से कही हो पर मैं फ़िक्र में हूँ ......भला हमारे देश .....में कागजों की बनिस्बत आदमी की औकात क्या रह गई है ? आदमी कैसा भी हो कागज सही होना चाहिए ?
जनाब मधु कोड़ा के काग़ज बराबर सही थे , जिनकी दम पर वे पहले विधायक और फिर मुख्यमंत्री बन सके पर आदमी ....? वे ही क्यों इस महालोकतंत्र में हजारों ऐसे बन्दे हैं , जिनके कागज सही हैं इसलिए वे सांसद हैं .... विधायक हैं ..... मंत्री हैं .... बड़े अधिकारी हैं पर आदमी .... ?
हे ईश्वर.......मैं भारी फ़िक्र में हूँ .......इस देश को क्या चाहिए ....सही कागज ......या ......सही आदमी ?

शनिवार, २८ नवम्बर २००९

तुम चलो हम चलें सावन की घटा चले......

पिछ्ले कई दिनों से वन्दे मातरम पर घमासान है , उस पर मुतवातिर इसरार और इंकार , मुझे तो दोनों ही पक्ष पूर्वाग्रही लगते हैं , देखा जाये तो राष्ट्रवाद को नागरिकों के सच्चे भावनात्मक समर्पण (दिली ताईद ) की जरुरत है , क्या फर्क पड़ेगा अगर मैं किसी सांकेतिकता या प्रतीकवाद के आगे सर न भी झुकाऊं तो ? ....और अगर बेमन से ही सही किसी प्रतीकात्मकता का अनुगमन कर भी लूं तो यह मेरी राष्ट्र के प्रति निष्ठा का पर्याय कैसे हुआ ? बचपन से लेकर अब तक वन्दे मातरम गाते हुए कभी नहीं सोचा कि मैं उसे खाना पूर्ति / रस्म अदायगी के लिए गा रहा हूँ या दिल से ? ऐसा सोचने का औचित्य भी नहीं था ! पर पिछले दिनों इस बारे में जितना पढ़ा ,जितना सुना उससे लगा कि , वन्दे मातरम गाते हुए मेरे दिल में कोई ख्याल भी कहाँ था कि मैं इसे देशभक्ति के प्रमाण पत्र के लिए गाकर अच्छा कर रहा हूँ या फिर इसे गाते हुए खुदा की जात में किसी और को शरीक कर बुरा कर रहा हूँ ! यानि कि अब तक जितना भी गाया क्या वह देश भक्ति के प्रमाणपत्र के लिए गाया ? और अगर गा भी दिया तो उससे मेरा खुदा मुझसे नाराज क्योंकर हुआ होगा ? कहने का मकसद ये है कि अगर मेरा अपना दिल साफ है तो मुझे किसी और से सर्टिफिकेट की दरकार कहाँ है और अगर मेरे अन्दर कोई बदनीयती है तो उसे कोई दूसरा पकड़ेगा कैसे ? बात दिल की है ...जज्बात की है ....जेहनी समर्पण की है इसमें सांकेतिकता / दिखावा कहाँ से घुस गए और इससे बढ़कर ये कि मैं कौन होता हूँ किसी बन्दे को देशभक्त या देश द्रोही करार देने वाला ? इसी तर्ज पर कोई दूसरा कौन होता है मुझे देशभक्त या देशद्रोही करार देने वाला ? मान लीजिये कोई व्यक्ति अपने मन में देश के प्रति कुत्सित विचार रख कर वन्दे मातरम गा रहा हो तो उसकी पहचान कैसे की जाएगी और ये कि वन्दे मातरम गाने वाले हर व्यक्ति के ख्यालात नेक हैं इसकी क्या गारंटी है ? उदाहरण के तौर पर हमारे देश में बड़ों की इज्जत / प्रतिष्ठा की एक सांकेतिक परंपरा है कि उनके पैर छुए जायें लेकिन परंपरा का परिपालन बलपूर्वक तो नहीं करवाया जाता ना ? आशय ये कि लोग दिल से इज्जत करें दिखावे में पैर छुएँ या ना छुयें ! उम्मीद है कि आप भूले नहीं होंगे कि इसी नेक परम्परा की आड़ में राजीव गाँधी की जान ले ली गई थी ! चरण स्पर्श की सांकेतिकता के पीछे , धानु के मन इज्जत थी या हत्या का विचार ये तो बाद में पता चला !
इस मिसाल को देने का अर्थ ये नहीं है कि चरण स्पर्श की सांकेतिकता बुरी है बल्कि ये कि 'सांकेतिकता' उसका परिपालन करने वाले की नेक चलनी का प्रमाण नहीं हुआ करती ! मैंने अपने आलेख में लिखा कि मैं वन्दे मातरम गाता रहा हूँ पर उसके गायन को देशभक्ति और देशद्रोह से जोड़ने के बारे में कभी सोचा नहीं इसलिए अगर कोई ये कहने लग जाये कि आप वन्दे मातरम गाने वाले राष्ट्रभक्त मुसलमान हैं तो मेरे लिए डूब मरने की बात हो जाएगी क्योंकि इसे गाते हुए मैंने किसी सर्टिफिकेट की अपेक्षा नहीं की है और विशेषकर इसे गाते हुए किसी दूसरे व्यक्ति से तो बिलकुल भी नहीं जबकि मुझे पता ही नहीं कि उसके मन में क्या है ? मेरे लिए देश भक्ति और राष्ट्रवाद , राष्ट्र के प्रति मेरा मानसिक समर्पण है तथा वह किसी दिखावे किसी प्रतीकात्मकता का मोहताज नहीं है ! मेरे ख्याल से ये बेहद फ़िल्मी अंदाज है कि मुस्लिम / पर्सियन / हिन्दू की पहचान जताने के लिए टोपियों लुंगियों और तिलक जैसे संकेतों का प्रयोग किया जाये प्रेमी और प्रेमिका के प्रेम को तोता मैना या फूलों की डालियों के आसरे अभिव्यक्त किया जाये ! मुझे तो यह प्रदर्शन काफी भोंडा लगता है ! मैं सोचता हूँ कि धर्म /आस्था/ प्रेम का वास्ता दिल से है ! अगर ये दिल के अन्दर नहीं तो संकेतों का क्या मतलब ..........बस ऐसे ही राष्ट्र वाद और देश प्रेम मेरे दिल का मामला है .....मैं रहूँ या न रहूँ देश का इकबाल बुलंद हो ...तुम रहो या न रहो देश का इकबाल बुलंद हो , हम रहे या न रहें देश का इकबाल बुलंद हो ! मेरा देश मेरे कपड़ों , मेरे आभूषणों , जिस्म पर लगे गोदने वगैरह वगैरह में नहीं मेरे दिल में बसता है !
फिलहाल दिल से मजबूर होकर गा रहा हूँ ....तुम चलो हम चलें सावन की घटा चले .....

शुक्रवार, २० नवम्बर २००९

यहां नहीं पिलाई तो पक्का समझ ले जन्नत में तुझे पीने नहीं दूंगा !

आज भाई अनिल पुसदकर नें अंडे के बहाने , फ़ूड हैबिट्स को लेकर पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी की सोच के अंतर और फिर एक बढ़िया तालमेल की ओर ध्यान आकर्षित किया है ! उनके संस्मरण को पढ़ते हुए , दिलचस्प लगा कि दादी के लिए अंडा सर्वथा त्याज्य है फिर भी डाक्टर के सुझाव और बच्चे की सेहत को ध्यान में रख कर उन्होंने एक स्पेस दिया कि , घर के अन्दर नहीं चलेगा लेकिन बाहर खिला देना ! इधर बच्चे के पिता नें भी कितनी शालीनता से घर से बाहर जो भी व्यवस्था की , उस पर पर्देदारी की गुंजायश रखी ताकि पुरानी पीढ़ी की भावनायें हर्ट ना हों ! दरअसल ये किस्सा दोनों पीढ़ियों के पारस्परिक एडजस्टमेंट का शानदार उदाहरण है और समाज में अमूमन ऐसा ही होता है , यानि कि परिवर्तनों की अपरिहार्यता और किंचित ना नुकुर के साथ उनकी संस्वीकृति ! ..... और हाँ इस तरह के सभी किस्सों में भांडा फोड़ का संयोग , ज्यादातर बच्चों , यानि कि तीसरी पीढ़ी के हिस्से में ही आता है ! संस्मरण पढ़कर सुखद अनुभूति हुई और एक पुराना वाकया याद आ गया !
हुआ यूं कि ....एक मजहबी मित्र कुछ फिक्रमंद से , मेरे पास आये और बोले डाक्टर नें कहा है सर्दियाँ हैं , बच्चे को हर दिन एक ढक्कन ब्रांडी पिलाओ ! ये ब्रांडी तो शराब हुई ना जी ? मैंने कहा बच्चा कमजोर है...बीमार है , डाक्टर नें कहा है तो पिला दे ना भाई ! वे हिचकिचाये और बोले लेकिन शराब.....? मैंने कहा वो तो तुम भी पीते हो , फिर बच्चा पी ले तो क्या फर्क पड़ेगा ! वो नाराज होने लगे बोले क्या वाहियात बात करते हो मैं कब शराब पीता हूँ ? मैंने पूछा तो परसों शाम क्या पी रहे थे ? वे बोले 'कफ़ सिरप' , लेकिन कफ़ सिरप तो दवा हैं ना जी ! मैंने कहा भाई मेरे , इस दवा में भी अल्कोहल है और ब्रांडी में भी ! अब आगे तू तय कर ले कि बच्चे को दवा मान के पिलायेगा या शराब ! ......... और हाँ यहां नहीं पिलाई तो पक्का समझ ले जन्नत में तुझे पीने नहीं दूंगा !

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