बृहस्पतिवार, 15 मार्च 2012

बांके पिया कहो हां दगाबाज़ हो ...


ये सिलसिला सन 2006 की भीषण गर्मियों के दरम्यान शुरू हुआ था ! वैसे वो दोनों एक ही गांव में जन्मे और पले बढ़े थे पर यह साल कुछ खास साबित हुआ कि , जब दोनों ने एक दूसरे को चाहने जैसे नज़रिये से देखा ! स्कूल से छुट्टियों और जिस्मानी नजदीकियों वाले इस मुबारक मौके का इंतज़ार लम्हा लम्हा जवां होते हर बंदे का ख्वाब होता है ! उन दिनों ज़ोया को बारहवीं जमात पास होने के बाद के अपने कैरियर का ख्याल था जबकि अहसान , हाहाकारी पारिवारिक दिक्कतों और ग़ुरबत से जूझते हुए अपने मेडिकल कोर्स को पूरा करने ही वाला था ! दोनों के समाजी हालात यकसां थे और क़बीलाई पृष्ठभूमि से धार्मिक होते हुए परिवारों के पालन पोषण की समानता के साथ उम्र के नाज़ुक दौर ने दोनों को प्रेमपाश में बांध डाला ... फिर तय ये हुआ कि ज़ोया उसी शहर के वोमेन्स पोलीटेक्निक से फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करेगी , जहां के मेडिकल कालेज से अहसान  अपनी डिग्री , मुकम्मल करने ही वाला था !

तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक़ दोनों अपने अपने हास्टल्स से बाहर निकल पाने के हर मौके का इंतज़ार करते और उसका फायदा उठाते ! आने वाली जिंदगी के तमाम ख्वाब , जिस्मानी यकजिहतियों के साथ परवान चढ़ते ... बनते ... बिगड़ते और फिर से बनते रहे  !  वक़्त अपनी रफ़्तार चलता रहा  !  कहते हैं ये दुनिया तन और मन के बीमारों से अटी पड़ी है सो डाक्टरों की क़िल्लत ने गोया अहसान की लाटरी निकाल दी और वह सरकारी डाक्टर के तौर पर उसी इलाके में  तैनात हुआ ! इधर प्रेमपगी ज़ोया का जी पढ़ाई में लगा ही नहीं सो वह अपनी डिग्री से बेनियाज़ बनी रही और अहसान से उसके ताल्लुकात मुतवातिर गहरे से और भी ज्यादा गहरे होते चले गए ! अहसान की सांवली रंगत के मुक़ाबिल ज़ोया का सुफैद रंग हुस्न-ओ-ज़माल कहर ढ़ाता रहा ! अपने रिश्ते को शादी में तब्दील करने का कोई प्लान फिलहाल इस जोड़े के सामने मौजूद नहीं था !

सुहेल , अहसान का करीबी दोस्त उसके राजदार की हैसियत से , अक्सर सलाह देता कि अब उन्हें  शादी कर लेना चाहिये पर...जोड़े को इसकी फ़िक्र ही नहीं थी ! रिश्ता बदस्तूर चलता रहा ! सुहेल को अहसान से ज़ोया ने ही मिलवाया था और इस हिसाब से वो इन दोनों का पारिवारिक मित्र   हमदर्द , सलाहकार और शुभचिंतक पड़ोसी भी था  !  ज़ोया और अहसान की जिंदगी शादी के बिना भी सुर ताल में बजती रही लेकिन एक दिन उन्हें मजबूर होकर शादी का फैसला करना पड़ा ज़ोया पिछले छै माह से हामिल: थी सो शादी के तीन महीने के बाद ही उन्हें एक बेटा भी हो गया ! जुलाई 2011 को पैदा होने वाले इस बच्चे की वज़ह से दोनों ने अपने रिश्ते को एक नाम दिया , शादी की !  बच्चा बेहद खूबसूरत और गोल मटोल उन दोनों के पारिवारिक जीवन का आधार बना !

कल शाम ये जोड़ा फिर से उसी शहर लौटा , जहां पर उन्होंने अपनी तालीम के आख़िरी साल गुज़ारे थे ! अब उन्हें एक नज़ूमी की तलाश थी जो उनके बच्चे के जनम के बाद की तनाव भरी जिंदगी से निजात दिला सके ! शहर के मशहूर नज़ूमी ने कहा कि वो उनकी दिक्क़तें दूर तो कर सकता है पर इसके लिए उन्हें बीस हज़ार रुपये खर्च करना होंगे ! इस पर उन्होंने एक और करीबी डाक्टर दोस्त से सलाह मशविरा किया और उसके बताये हुए नज़ूमी के पास पहुंचे जिसने उन दोनों की कुंडलियां बनाई और आसान शर्तों पर मदद का वादा भी किया !  नज़ूमी का ख्याल था कि नवजात बेटा अहसान का हो ही नहीं सकता और अहसान को भी यही शक था कि बेटा उसका है ही नहीं ! जोड़े के दरम्यान तनाव की असल वज़ह भी यही थी ! ज़ोया कहती कि तुम बिना वज़ह शक कर रहे हो और अहसान कहता कि बच्चे की शक्ल उससे नहीं मिलती !

वो दोनों पिछले सात माह के आपसी झगड़े , मारपीट और ज़हन्नुम हो गई जिंदगी को आसान करने के ख्याल से नज़ूमी तक पहुंचे थे ! अहसान का ख्याल था कि ज़ोया के हामिल: होने के शुरुवाती तीन महीनों में वो डिपार्टमेंटल कोर्स के सिलसिले में ज़ोया से दूर था इसलिए ज़ोया उसकी वज़ह से हामिल: हो ही नहीं सकती थी ! उसपर तुर्रा ये कि बच्चे की शक्ल भी अहसान के बनिस्बत सुहेल से मिलती है  ! घरेलू झगडों के दौरान अहसान ने एक बार खुदकुशी भी करने की कोशिश की पर ज़ोया ने उसके शक को हमेशा बेबुनियाद ही कहा ! इधर नज़ूमी अहसान के इस नज़रिये के पक्ष में था कि बेटा उसका नहीं है और फिर ज़ोया टूट गई उसने माना कि पिछले दो साल से उसके नज़दीकी ताल्लुकात सुहेल से बन चुके थे और यह बच्चा सुहेल का है ! ज़ोया के कुबूलनामे के साथ ही अब नज़ूमी के सामने सवाल यह है कि क्या इस जोड़े को आगे भी साथ में बना रहना चाहिये ? अहसान और ज़ोया ऐसा करने के लिए तैयार भी हैं बशर्ते उनके मन किसी आध्यात्मिक जुगत से शांत कर दिये जायें वे एक दूसरे को अब भी प्रेम करते हैं पर तनाव की मुक्ति और रिश्ते की सहजता को लेकर फिक्रमंद हैं !

उनका साथ बने रहना या अलग हो जाना नज़ूमी की सलाह और अमल पर निर्भर है ! मुश्किल ये है कि इस मसले में नज़ूमी को मुझसे बहुत उम्मीदें हैं पर मैं इतनी ज़ल्दी किसी नतीजे पर पहुंचने से पहले जोड़े की पिछली समाजी / रोमानी जिंदगी को अच्छी तरह से पढ़ लेना चाहता हूं ! मुझे लगता है कि मैं उस जोड़े की काऊंसलिंग के लिए अभी तैयार नहीं हूं पर जोड़ा और नज़ूमी दोनों ही ज़ल्दी में हैं !  प्रेम के रिश्ते हम इंसानों को जोड़ते और तोड़ते हैं ! हम नफरतों के साथ भी जी सकते हैं बशर्ते , हमारा विवेक सलामत बना रहे ! इस जोड़े के मुद्दे पर मैं खुद ही अनिर्णय की स्थिति में हूं !  मुझे वक़्त चाहिये पर जोड़े के पास वक़्त की भारी कमी है ! नज़ूमी आध्यात्मिक अमल कर ही लेगा पर मैं प्रेम और जिंदगी को लेकर अनिश्चितता के संसार में डूबता जा रहा हूं ! नज़ूमी के पास अपने तयशुदा नियम कायदे हैं ... पर मेरे पास इश्क का कोई एक सिद्धांत नहीं !  शायद इश्क और जिंदगी सीधी राह नहीं चलते !





विशेष टीप  : 
पात्रों के नाम बदल कर लिखी गई इस संस्मरणात्मक कथा का अंत चाहे जो भी हो पर... प्रेम , एक और प्रेम , खुदकुशी का ख्याल , नजूमियात , डाक्टर्स और नजूमियात , टूट के बाद भी साथ बने रहने का ख्याल , जीवन को एक और अवसर , शायद अलगाव या फिर अंततः तनावजन्य मृत्यु  !  इंसान , उसके ज़ज्बात और रिश्ते बेहद कन्फ्यूज करते हैं मुझे !