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शनिवार, 23 दिसंबर 2017

मेमना


मुद्दतों पहले गरज़ और विद्युत धरती पर रहते थे, गरज़ मां भेड़ थी जबकि विद्युत उसका पुत्र मेमना, वे दोनों पड़ोसियों में बहुत अलोकप्रिय थे, अगर कोई गलती से उस मेमने को छेड़ देता तो वो आवेश में आकर, अपने सामने पड़ने वाली सभी वस्तुओं को  जला डालता, झोपड़ियाँ, मकई के भुट्टे और बड़े पेड़ भी ! कभी कभार फसलों और खेतों को नुकसान पहुंचा देता, यहां तक कि किसान भी मारे जाते ! जब गरज़ को अपने पुत्र की करतूतों का पता चलता तो वो उसे जोर से चिल्लाकर डांटती, जिससे उसके पड़ोसी और भी दुखी हो जाते, उनके लिये, पहले पुत्र मेमने द्वारा किया गया नुकसान फिर मां भेड़ की भयावह आवाज़ को बर्दाश्त करना, दूभर हो गया था !

गांव वालों ने इस मुद्दे पर राजा से कई बार शिकायतें कीं, जिसके बाद राजा ने उन दोनों को गांव के बाहर रहने का हुक्म दे दिया और कहा कि वे लोग गांव के लोगों से मेलजोल बढाने की कोशिश ना करें, उनसे दूर रहें, हालंकि इससे कोई फायदा नहीं हुआ क्यों कि विद्युत आसानी से गांव की गलियों में चलते फिरते लोगों को देख सकता था इसलिए उनके दरम्यान झगड़े, आगे भी होते रहे ! इसके बाद राजा ने माता और पुत्र से कहा कि मैंने तुम्हें बेहतर जीवन के कई अवसर दिये, लेकिन ये सब व्यर्थ हुआ इसलिए आज के बाद से तुम दोनों इस गांव से दूर निकल जाओ और जंगल झाड़ियों में जाकर रहो, हम दोबारा तुम लोगों की शक्ल भी नहीं देखना चाहते ! भेड़ और मेमने ने राजा के आदेश का पालन किया लेकिन वे ग्राम वासियों से नाराज बने रहे !      
   
गांव से निष्कासित हो जाने के कारण से मेमना गांव वालों के प्रति बैर भाव रखता था इसलिए उसने सूखे मौसम के दौरान सारी झाडियाँ और पेड़ जला डाले, जिससे गांव के लोगों के कष्ट और भी बढ़ गये ! जंगल की आग की लपटें, गांव के खेतों और घरों तक पहुंच गईं ! मां अपने पुत्र को इस तरह के कार्य से रोकने की कोशिश करती और तेज आवाज में डांटती रहती लेकिन इससे पुत्र को कोई फर्क नहीं पड़ता था ! घटना क्रम से नाराज़ राजा ने अपने दरबारियों से सलाह माँगी, उन सभी ने एकमत होकर कहा कि माता पुत्र को धरती से बेदखल कर आकाश भेज दिया जाए ! राजा ने हुक्मनामा ज़ारी कर दिया और वे दोनों आकाश में जा बसे हालांकि, उद्दंड मेमना अब भी धरती को झुलसा डालता है और उसकी मां की भयंकर गर्जना हम आज भी सुनने को विवश हैं !

आदिम सामुदायिक जीवन में यह निष्कर्ष निकाल लेना कि विद्युत के कारनामें प्रथम और आवाज़ की उपस्थिति द्वैतीयक है, ग्राम वासियों के सफल पर्यवेक्षणीय अनुभवों का प्रतीक है, अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों / आधुनिक ज्ञान के इस दौर में, हम सभी जानते हैं कि विद्युत की गति, ध्वनि की गति से तीव्र होने के कारण से ही, आकाशीय विद्युत पहले चमकती / दिखती है और उसकी गर्जना बाद में सुनाई देती है, ऐसे में आख्यान के पात्रों का यह ज्ञान / कथन अदभुत है कि, मेमना पहले शरारत करता है और उसकी मां भेड़, उसे बाद में गरज़ कर डांटती है ! हमारा अभिमत यह कि इस विषय में आदिम जगत के पर्यवेक्षणीय अनुभव और विज्ञान युग के सत्य निष्पादन / सत्योद्घाटन में लेश मात्र भी अंतर नहीं है !

कथाकालीन समाज भले ही राजतान्त्रिक है किन्तु वहाँ पर उद्दंडता / वाचालता / आपराधिक कृत्यों के विरुद्ध सुनवाई का अवसर और सहज न्याय उपलब्ध है, इस कहन में महत्वपूर्ण तथ्य ये कि उद्दंड पुत्र मेमने के साथ उसकी मां को भी दण्डित किया जाता है जबकि वह अपने पुत्र को निरंतर डांटती रहती है और कोशिश करती है कि उसका पुत्र सुधर जाए ! प्रतीत होता है कि पुत्र की आपराधिक प्रवृत्ति के लिये माता के पालन पोषण को उत्तरदाई मान कर ही ये दंड दिया जाता रहा होगा अन्यथा मां का व्यवहार, ग्राम वासियों के पक्ष में / उनके हितों के अनुकूल था, इसलिए पुत्र की शरारतों का निरंतर निषेध करती हुई मां को मिले दंड के लिये, पालन पोषण की त्रुटि के इतर, आवाज़ की तीव्रता को, उत्तरदाई मानना संभवतः उचित नहीं होगा !

जनश्रुति में उल्लिखित न्याय व्यवस्था में घोषित दंड क्रमिक और सुधारात्मक है, दोषी मेमने और उसकी पालक मां को पहले गांव के बाहरी हिस्से में रहने का निर्देश, फिर गांव छोड़कर जंगल चले जाने का निर्देश और अंततोगत्वा धरती त्याग आकाश में बस जाने का आदेश, सुधार की अपेक्षाओं के विफल होते जाने के साथ ही, दंड की बढ़ती हुई कठोरता के स्पष्ट प्रमाण हैं ! मेमने के द्वारा की गई गतिविधियों को, आकाशीय विद्युत द्वारा पहुंचाई गई, जान माल की क्षति के साथ जोड़ कर देखा जाना प्रतीकात्मक है, बहरहाल कथा सार ये है कि मेमना अपनी आपराधिक प्रवृत्ति का दास है और वो सुधारात्मक उपायों से सुधर नहीं सकता भले ही उसके शक्ति उन्माद / कारनामों का दुष्परिणाम उसकी मां / स्वजन को भी भुगतना पड़े...  


शुक्रवार, 16 सितंबर 2011

वे सूरज को स्पेस नहीं देते !


यूं तो सुबह को जागे हुए अरसा हो गया ... पर घने स्याह बादल आहिस्ता आहिस्ता लपकते टपकते हुए माहौल को गहरी स्याह रंगत में जकड़े हुए , गोया उन्हें एक जिद सी  कि सूरज को स्पेस नहीं देंगे  !  अभी कल ही गरजकर दो इंसानी जान लील चुके हैं वे   !  मैं डरता हूं ...कहीं वे मेरे कम्प्यूटर को मेरी दिलजोई के वास्ते हौसलामंद होने की सजा ना दे डालें  !  बादलों की इस हरकत पर उस पार के  सूरज की प्रतिक्रिया क्या होगी ये जानना दुश्वार है लेकिन इस छोर पर मैं और मेरा कम्प्यूटर बादलों की दैहिक दबंगई का शिकार हैं  !  घर के अंदर और बाहर ...बेहद धूसर और कुम्हलाया सा माहौल मेरे ख्यालों  को बेढब और बेतरतीब होने के दायरे से बाहर आने ही नहीं देता !  मेरे ख्याल ,गीले पिचपिच गहरे दलदल में फंस गये हों जैसे ...बाहर निकलने की हर कोशिश लगभग उतना ही अंदर धकेलती हुई  ! 

उधर इराक ...अफगानिस्तान ...पाकिस्तान में ...आत्मघाती हमले हुए  !  इबादतगाहों को युद्ध के मैदानों... कत्ल खानों में तब्दील कर दिया गया इधर हमारे खुद के बाज़ार...इन्साफ के मंदिर और गली मोहल्लों में यही बादल गरजते  लपकते  टपकते और  फिर मासूम इंसानी जानों को लीलते हुए  ! धरती के हर हिस्से की सुबह के ऐन आगे , जबरिया अड़े हुए ...जाइए , हम आपको स्पेस नहीं देंगे की तर्ज़ पर  !  बादल बादल दुनिया , बादल बादल ज़िन्दगी और बादल बादल मौत की गड्डमड्ड में लाशें...खून...गीले पिचपिच गहरे दलदल में फंस गयी सुबह  !

गहरे धूसर गरजते बादल हम सब के ठीक बीचोबीच गहरी पैठ लिए  प्रेम तक को पैर पसारने का स्पेस नहीं देते  !  यौन आकर्षण... वैवाहिक जीवन के विरूद्ध और फिर पति पत्नी को भाई बहन हो जाने के फतवे पर अड़े हुए बादल ! हम सबके अपने अपने बादल अपने अपनों  की सांसों पर बंदिशें लगाते ...लगाम खींचते और दम घोंटते  हुए  ! रस्सी के फंदों , छोटे बड़े धारदार नाखूनों , आग बरसाते कैप्स्यूल्स की दम पर प्रेम और जीवन को खून खून करने पर अड़े हुए बेहद जिद्दी बादल  !  असहिष्णुता के गीले पिचपिच गहरे दलदल में फंस गयी ज़िन्दगी  !

मैं खुद भी इस माहौल से उबरने की फिराक में हूं  और सोचता हूं कि पहले पहल हम सभी किसी एक 'विचार' से दुश्मनी की हद तक असहमत होते हैं और फिर किसी एक 'देह' को इसकी सजा दे डालते हैं   !

मंगलवार, 22 मार्च 2011

डुबोया मुझको होने ने , ना होता मैं तो क्या होता ?


उधर देर रात लीबिया पर भारी बमबारी शुरू हो चुकी है  ! अपने ही हमवतनों  पर  कहर  गुज़ार रहे  कर्नल गद्दाफी की जान अब पश्चिम के निशाने पर है  !  मसला आज़ादी का है  याकि राजनीतिक  स्पेस  का  ख्याल  या फिर  ऊर्जा संसाधनों  पर  कब्ज़े  की नीयत ? गद्दाफी से मुक्ति चाहते लीबियाई नागरिक ? उसके समर्थन में खड़े हथियारबंद दस्ते ? कबीलों की आपसी रंजिशें ? अफ्रीकी अरब देशों के परम्परागत वैमनस्य ?  मानवाधिकार और स्वतंत्रता के पक्षधर होने के नाम पर अमेरिकी अगुवाई में यूरोपीय बिरादरी का विशेष सैन्य अभियान ?  अरब लीग के बैनर तले सुविधाभोगी शेखों और धनकुबेरों का जुंटा ?  सब सवाल दर सवाल हैं ,  कोई जबाब अगर है भी तो वो  है , इन सबके बीच लहुलुहान आम आदमी  !  आप दुनिया के किसी भी कोने में निगाह डाले कमोबेश यही नज़ारा आम है !   जिस आदमी की हैसियत एक अदना सी गोली के सामने कुछ भी नहीं उसे टाम हाक क्रूज मिजाइल से मौत  बा आसानी मयस्सर है !  मौत के मामले में इतनी दरियादिली ?  काश जिंदगियों के काम आती ! 

वहां जापान तरक्की की मिसालें गढता हुआ , अपने नागरिकों के राष्ट्रीय चरित्र और नागरिकता बोध से मालामाल होकर भी तबाही और बर्बादी का उदाहरण बन गया !  भला क्या ज़रूरत थी उसे भूकम्पीय धरती पर एटामिक रिएक्टर्स बनाने की  ?ज़िंदा बमों पर बैठ कर विकास की योजनायें बनाने की मिसाल बन गया है वो  !  सुनते हैं कि उसने अपने एटामिक रिएक्टर्स सात रेक्टर स्केल तक के भूकंप को बर्दाश्त करने लायक बनाये थे पर कुदरत के आगे उसकी गणना फेल हो गई !  पहले पहल अमेरिका ने उसका जीना हराम किया और अब उसने खुद अपनी जिंदगी नर्क कर ली  !  मुमकिन है कि जापानी लोग अपनी जिजीविषा के चलते एक बार फिर से सरपट दौड़ने लगें पर हुक्काम का क्या ? अपना पैर अपनी कुल्हाड़ी...आगे की विकास यात्रा में दोबारा कोई अदनी सी  चूक नहीं होगी इस बात की क्या गारंटी है ?

इधर हम भी एटामिक एनर्जी के सुपर पावर कहलाने की होड में सांसदों के सौदे करते हैं ! बाजार में खड़े , बिक जाने /  गिरवी हो जाने को तैयार जनप्रतिनिधि देश की तरक्की में दिल-ओ-जान से मुब्तिला हुक्काम , कब देश बेच चुकेंगे पता भी नहीं चलेगा ! गांधीवाद  के रास्ते , गांधीवादियों की सरकार में , अस्पताल से होकर गुज़रते हैं ,शर्मिला इरोम दस साल से भूख हड़ताल करके भी जीवित है  !  जनता फिर से वोट डालेगी और नोट अपना कमाल दिखायेंगे , संसद में अपनी आवाज़ ,धरती पर जीवन रहते तक , संभवतः अमेरिकन दूतावास की अनुज्ञा से बुलंद हुआ करेगी , सौ रुपये रोजी कमाने वाले जनगण महारैलियों के लिये सुलभ होते रहेंगे !  जम्मू काश्मीर , उत्तर पूर्व की सातों बहने और आदिवासियों के परम्परागत भूक्षेत्र बारुद से धुंधवाते रहेंगे ! कौन कहता है यहां खेतियों की जमीने पानी की कमी से सूख जायेंगी ?  अपना लहू तो है ही धरती को तर रखने के लिये !   

यहां गुणी और धर्मी लोग कहते हैं क़यामत ज़रूर आयेगी , ईश्वर के कोप से बचने के लिए हमारे तम्बू में शरण ले लो पर वो लोग ये क्यों नहीं समझते कि क़यामत लाने के लिए अब किसी खुदा की ज़रूरत नहीं !  हम इंसानों के होते हुए कोई खुदा...? कोई क़यामत ? ...चलों देखें चौथा विश्व युद्ध कब होता है ?  अभी कुछ रोज पहले ही मेरे एक आलिम दोस्त कह रहे थे कि क़यामत के रोज सूरज धरती से सवा नेजे की दूरी पर आ जायेगा पर मेरा ख्याल ये है कि हम पर सूरज के अति- ताप की कृपा से पहले ही हमारी असहिष्णुता इस धरती का बड़ा गर्क कर देगी !

रविवार, 15 अगस्त 2010

ग़ुरबत के हिस्से की चिल्हर धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...!

कल शाम से सरकारी महकमों की इमारतें जगमग कर रही है...सुबह ध्वजारोहण पर जाने से कब्ल नहाना चाहता हूं , हल्की सी ठण्ड है सो पड़ोसी का सुझाव है कि मुंह हाथ धोकर निकल चलो...कौन सा नमाज़ पढ़ने जा रहे हो  ?  सोचता हूं जन गण मन की शान में पहले कभी बे नहाया गया नहीं ,  तो फिर आज कैसे ?  इधर खब्ती शौहर की फ़िक्र में बीबी गर्म पानी का इंतजाम पहले ही कर चुकी  है  !  दूर किसी  इमारत  में सरकारी आदेश से तैनात लाउड स्पीकर शिद्दत से चीख रहा है और उसके साथ बाथरूम  में , मैं  भी...अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद है ,रूह गंगा की हिमाला...

वक्त कम है गाड़ी तेजी से सड़क पर मोडता हूं , सामने स्कूल के बच्चे भागते नज़र आ रहे हैं , उन्हें भी देर हो गई लगती है , वे सब मेरे घर के दक्षिणी छोर वाले स्कूल में पढते हैं  !  हुई देरी से उनके पिटने के ख्याल से मेरे अंदर बैठा मुकम्मल आज़ादी का फरिश्ता सहम सा जाता है  !  मुझे उत्तर दिशा में जाना है वर्ना मैं... !   उनकी प्रिंसिपल को फोन करता हूं...सिस्टर कुछ बच्चे देर से पहुंचेंगे खुदा के लिए उन्हें पनिश मत करियेगा कम से कम आज के दिन  !  दो बाथरूम वाले घर में आश्रम की तर्ज़ पर रहने वाले बीसियों बच्चे समय पर तैयार कैसे हो पायंगे  ?  ये वो भी जानती हैं  ! ...पता नहीं कैसे  ?  ख्याल कौंध सा जाता है...नौनिहाल आते हैं...को किनारे कर दो मैं जहां था , इन्हें जाना है वहां से आगे...

चंद नारे और त्योहार खत्म , दोस्त बतला रहा था कि आज उसका क्लब अस्पताल में फल...फल माने , केले...बांटेगा  !  ना चाहते हुए भी मन ही मन में गाली देता हूं...सा...sss ढोंगी , केले बांटेगे और न्यूज पेपर में उससे ज्यादा अपनी समाज सेवा का ढिंढोरा पीटेंगे ! तुम्हारी...समाज सेवा का बिजनेस क्या मैं जानता  नहीं?अंतिम आदमी के लिए सरकारी मदद को रास्ते में हाइजैक करने वाले समाज सेवी ............ कहीं के  !  वो पूछता है चलोगे क्या  ?  मैं कहता हूं , बिलकुल नहीं  ! ...अभी चुप क्यों थे  ?  बस यूं ही तुम्हें गरियाने का दिल किया इसलिए  !  वो बेशर्मी के साथ हंसता है उसे पता है कि मुझे धन पिशाच पसंद नहीं  हैं  !  मैं एक बार फिर से उसे अपनी सर्द निगाहों से टटोलता हूं  !  क्या देख रहे हो वो पूछता है ?  तुम्हारे जिस्म की बनावट देख रहा हूं ...कल्पना कर रहा हूं कि इसपर लदी फंदी चर्बी किस किस बंदे का हक मार कर जुटाई होगी तुमने  !  वो फिर से हंसते हुए कहता है ...ओ यू आउट डेटेड मैन... घर चलें ?  मै सहमति में सिर हिलाता हूं  ! 

इधर टीवी चैनल्स आजादी के परवानों के भाषणों के टुकड़े सुनवाये जा रहे हैं , पर मेरे कान बंद हो चुके है...कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा !  मै सिर्फ देख पा रहा हूं देश के लिए भाग रहे अधिकारी , नये जूते...नई कैप , नई टीशर्ट , बमुश्किल छुपती हुई सेहत , उपदेश देते नेता , खादी के कलफदार कुर्तों से झांकती उनकी विराट देहयष्टि ,मेरा जेहन जानवर खरीदने  गये ग्राहक  सा , उनके बदन की चर्बी टटोलता है  !  कल ही किसी अधिकारी  के लॉकर से  कुछ करोड की चिल्हर बरामद होने की खबर थी , कुछ  किलो सोना  भी  !  लगता है जैसे सोना...रुपया...चर्बी सब गडमड हो रहे हों  !  स्वतंत्रता दिवस अमर रहे , कहता तो हूं पर आवाज गले से बाहर नहीं आती , मेरा दाहिना हाथ बेदम सा हवा में उठा हुआ  !  मुझे लगता है कि आज़ाद भारत के इन आबाद जिस्मों में जमा चर्बी बाहर निकालने से पहले तेज चाकू से इनकी खाल खींचना होगी  !  मै क्रूर होना चाहता हूं पर आंखें साथ नहीं देतीं...वहां कुछ भीगा हुआ खारापन सा है !  फिलहाल तो ग़ुरबत के हिस्से की धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...उनके लहलहाने के दिन हैं  !   

रविवार, 4 जुलाई 2010

पार: पार: हुआ पैराहने जां : अ'रीना में निओ - ग्लेडिएटर्स ?

अपने प्रोफाइल में पसंदीदा फिल्मों का ज़िक्र करते  वक़्त ग्लेडिएटर्स  टाइप करते हुए मेरी  अंगुलियां कांप रहीं थीं...धड़कने औसत से ज्यादा रफ़्तार पर...और  बेहद  ज़ज्बाती  तौर पर  मैं उन परिजनों के बारे में सोच रहा था,जिनके बच्चे विषम  परिस्थितियों का शिकार होकर सरे बाज़ार बेचे गये होंगे...तब के हालात ,बिकने वाली शय भी इंसान और खरीदार भी ! उन  दिनों प्राचीन रोमन एम्पायर ही क्यों सारी की सारी दुनिया गरीब  इंसानों की मंडी में तब्दील हो चुकी थी  !  वे  बिकते  इंसानों  का क़त्ल करने  के लिये...या फिर इंसानों से क़त्ल हो जाने के लिये ! तमाशाई भी इंसान हुआ करते और तमाशेबाज़ भी !  बारहा सोचता हूं कि तब के हालात ऐसे थे कि पूंजी इंसानों के लिये नहीं बल्कि इंसान पूंजी के लिये बा-आसानी मयस्सर हुआ  करते थे !...शायद पूंजी का आविष्कार ही उन्हें , उनकी औकात दिखाने के  लिये हुआ होगा ? ...कहते हैं वो बर्बरियत का दौर  था जो गुज़र गया ! 

आहिस्ता आहिस्ता नव-सभ्यतायें विकसित हुईं और इंसानियत का  इकबाल बुलंद हुआ ! दुनिया के नक्शे में जुग्राफियाई /  प्रजातीय / धर्माधारित / भाषाई या फिर भिन्न राजनैतिक विचारधाराओं पर आधारित राष्ट्रीयतायें जन्मीं, जिन्होंने पारस्परिक  तुलना में खुद को इंसानियत का सबसे बड़ा अलम्बरदार घोषित करना अपना परम लक्ष्य बना लिया...भले ही अंदरूनी  वास्तविकतायें  कुछ  और  बनी  रही  हों  !  निजी तौर  पर  मुझे  ये  बदलाव  बहुत  बड़ा  दिखता  है , जहां रोमन सम्राटों के  पसंदीदा अ'रीना , बड़े बड़े राष्ट्रों में तब्दील गये हों और 'एम्परर' 'लोकशाहों' का मुखौटा पहन कर अभिनय कर रहे हों ! तब के  परिजनों के बच्चे दासों की शक्ल में बिकते और अब के बच्चे , नौकर / कर्मचारियों की शक्ल में ! खरीदार तब भी इंसान थे,  खरीदार अब भी इंसान हैं ! कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ चिल्लर और कुछ थोक व्यापारी !  व्यापार की टर्म्स एंड कंडीशन्स में  बड़ा फर्क दिखता है अभी...तब माल की कीमत एकमुश्त चुकाई जाती थी अब रकम माहवाराना किश्तों में तय होती है ! जिस  तरह से बर्बरियत के उस युग में सभी दास ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते थे लगभग उसी तर्ज़ पर आज भी सभी नौकर  ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते  ! 

वक़्त का फर्क बहुत लंबा है और सभ्यतायें भी विकसित हुई हैं इसलिए ग्लेडियेटर्स के साज़-ओ-सामान में भी भारी बदलाव  नज़र आता है मसलन तलवार के बदले ए.के.४७ , कलम, टाइपराइटर,कम्प्यूटर्स वगैरह वगैरह और जिरह बख्तर की जगह  वर्दियां / यूनिफार्म वगैरह वगैरह ! मुमकिन है मेरी सोच , मेरा चिंतन उन 'दासों' को मजाक लगे जो बैंकों ,शिक्षण संस्थानों  जैसे शालीन अपेक्षाकृत निरापद  खरीदारों के पास बिके हैं , पर उन दासों का क्या ? जिन्हें रक्षा संस्थानों जैसे रफ एंड टफ  खरीदार नसीब हुए हैं !  बुरा मत मानिये...इंसान तब भी बिकता था और इंसान आज भी बिकता है...पेट के लिये ? अस्तित्व के  लिये ? परिजनों के लिये ? आपको क्या लगता है ?  दुनिया में अ'रीना कहां नहीं हैं ?  ग्लेडियेटर्स कहां नहीं हैं ? तब सम्राट दिलजोई के लिये ग्लेडियेटर्स के तमाशे करते थे आज राष्ट्रीयतायें ,विचारधाराओं और इंसानियत की आज़ादी के नाम से तमाशे  करती हैं ! दिलजोई करने वाला भी इंसान...दिलजोई के लिये शहीद होने वाला भी इंसान ! राष्ट्रीयताओं और विचारधाराओं का  राग अलापने वाला भी इंसान और इस राग पर कुर्बान होने वाला भी इंसान ! शताब्दियों बाद बहाने भले ही बदल गये हों पर  रिज़्क ( रोजी रोटी ) के लिये ग्लेडियेटर्स होना और ग्लेडियेटर्स के परिजनों की पीड़ा शाश्वत है !    

मेरी धरती.. माफ कीजिये...हम सबकी धरती...लहूलुहान, क्षत विक्षत धरती के लिये 'स्लेव' अली गाते रहेंगे "पार: पार:  हुआ पैराहने जां" वे सब गाने के लिये अभिशप्त  हैं ,क्योंकि उनके दिल में रोमान हैं , माशूकायें हैं , बीबियां हैं ,बच्चे हैं , परिजन हैं ,  अस्तित्व की आरजूएं हैं , जिम्मेदारियां हैं !...और हैं...शिद्दत से नफरतें भी ,खरीदारी के ज़ज्बे के साथ ! मैं खुद थक चुका हूं  सोच सोच कर कि दुनिया में अ'रीना कहां पर नहीं है यहां , जहां मैं रहता हूं ,बस्तर भी तो...? हमेशा की तरह अपने अस्तित्व /  अपने परिजनों के लिये मंडियों में बिकते इंसान...शहीद होते...परिजनों को बिलखता छोड़ कर जाते निरंतर...अ'रीना में निओ ग्लेडियेटर्स  ?

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

नित खैर मंगां सोणियां मैं तेरी दुआ ना कोई होर मंगदी !

मुझे पता नहीं पंजाबियों से मेरे क्या रिश्ते हैं, पंजाबी जुबान कभी पढ़ी नहीं...फिर ये जुबान और इसका सूफियाना संगीत क्यों कर मेरे सिर  चढ़ कर बोलता है ? रब जाने ? इस जनम में कभी पंजाब गया नहीं, जरुर पिछले जनम का लेन देन बाकी रहा होगा ! यूं  तो मुझे संस्कृत ऋचायें और उनका गायन भी बहुत भाता है पर बाबा फरीद, बुल्ले शाह...गोया  रूहानियत सी तारी कर जाते हैं ! पंजाबी लोक संगीत और कथायें आह...कैसे कहूं कितनी अपनी सी लगती हैं ! पता नहीं क्यों आज  सुबह से कुछ सूफियाना  सुनने का  दिल कर रहा है  ऐन इसी वक्त दिनेश राय द्विवेदी जी ने राठौर बनाम उत्सव के बहाने मुझे छेड़ दिया है और जब मैंने कल्पना करना चाही कि आस्ट्रेलियाई  नस्लभेदी कैसे दिखते होंगे तो यकीन जानिये ठाकरों के चेहरे कौंध गए! बेचैन था सो नेट पर पंजाबी लोक और सूफियाना संगीत  की खोज कर डाली ! मुझे ये तो पता नहीं की सूफी संत रब के साथ आशिक-ओ-माशूक की तर्ज पर बातें क्यों किया करते हैं और क्या ये तरीका सही भी है ? कौन जाने रब है भी कि नहीं ? पर मुहब्बत...वो तो है ही ! डरता हूं कि मैं मुहब्बत की बात करूं और साइंस ब्लागर्स असोसिएशन मेरे ज़ज्बात...मेरे अहसासात को गैर साइंसदाना मान कर डस्टबिन के हवाले कर दे पर आज अन्दर कुछ है जिसे बाहर आना जरुरी है, बेहद जरुरी ! भले ही इसकी कीमत  कुछ  भी हो  !  पता नहीं मैं क्या बकवास कर रहा हूँ...पुनर्जन्म...रब...आशिक-ओ- माशूक ! कितना सही हो ग़र मैं  तर्कपूर्ण ढंग से सोचूँ और इन सब ख्यालातों को झटक कर फेंक दूं ...मगर नहीं...इन दिनों मेरी दुनिया...मेरा मुल्क मुसीबत में है !  परवाह नहीं कि रब होने का अहसास निहायत ही अतार्किक और गैर साइंसदाना है ! यू ट्यूब पर राहत फ़तेह अली खान और हंसराज हंस...इधर  अपने डेस्क टाप के की बोर्ड  पर मैं...झूम रहे हैं मस्त...एक नशा सा तारी है ! मेरा मुल्क...ओ रब...मेरा मुल्क...मेरी मुहब्बत ! मुझसे सुर नहीं सधते  पर उनके सुरों के साथ मेरे ज़ज्बात सध गये हैं ! मैं गा रहा हूँ "होर की मंगणा  मैं रब कौलों ..इक खैर मंगां तेरे दम दी...नित खैर मंगां सोणियां मैं तेरी दुआ ना कोई होर मंगदी ! अब मेरा रोम रोम पुलकित है मेरे मुल्क...मेरे महबूब ...नित खैर मंगां ...! 

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दारोगा - ऐ - जिन्दान इनके 'पंख कलम' कर दो !

सुबह से मन में था कि चाहे जो भी हो जाए आज तस्लीम वालों की सारी की सारी टिप्पणियों का क़र्ज़ चुका कर ही लौटूंगा , फ़िर चाहे उन्होंने समीक्षा लिखी हो , आलेख लिखा हो या कि पहेली पूछी हो ~ टिप्पणी करूं या पहेली हल करूं ~ खाली हाथ तो क़तई भी नहीं लौटूंगा ! मगर .... पहुंचते ही वहां जो कुछ देखा , मेरे हौसले पस्त हो गये ! लगा ज़ाकिर भाई ने पहेली पूछ तो ली मगर मुझे मुसीबत में डाल दिया ! पहेली में दिखाई देने वाली तस्वीर पहले नंगी आँखों से , फ़िर चश्मा लगा कर देखी ! कई .....कई बार देखी ! मुझे तो ये 'मासूम' परिंदा ही लगा !
शायद आपको अंदाज नहीं कि , आसमान में परवाज़ करते परिंदे , दरख्तों की शाखों पर बैठे परिंदे , शाम को घोंसलों की सिम्त डैनों का रुख मोड़ते परिंदे ...और उनकी चहचहाहट का , मेरे लिए एक ही मानी हुआ करता था कि पूरा आसमान....पूरे दरख़्त , सारे परिंदों ....सारे के सारे परिंदों का अपना है !
मेरे ख्याल से इन परिंदों के आसमान का अपना कोई राजनैतिक भूगोल नहीं , वहां कोई सरकारें नहीं , छल प्रपंच में लिप्त राजनेता / गुंडे / मवाली / उन्मादी / फसादी नहीं , कोई फ़तवा / कोई निषेधाज्ञा भी नहीं ! धर्मान्धता और भाषाई पाखंड से मुक्त / अक्षत / मासूमियत भरे परिंदों का आसमान !
कभी लगा ही नहीं कि परिंदे कौन सी जुबान बोलते होंगे ? कभी नमाज पढ़ते या भजन कीर्तन भी करते होंगे ? उन्होंने अपने लिए आसमान के छोटे छोटे टुकड़े भी कर रखे होंगे कि नहीं ? और क्या.... कोई उनकी चहचहाहट को भी 'डिक्टेट' करता होगा ?
परिंदे......मासूम परिंदे , पूरे आसमान में बेलौस , बेख़ौफ़ , परवाज़ के हकदार परिंदे ! आसमान..... सारा का सारा आसमान , परिंदों का और परिंदे आसमान के ! अब तक तो ऐसा ही लगता आया है ! मगर क्या पता ऐसा लगना ग़लत हो ? सिरे से ही ग़लत ?
ज़ाकिर भाई आपकी पहेली का जबाब देने से डरता हूँ ! मुझे भले ही लगता है कि ये एक मासूम परिंदा है और पूरा का पूरा आसमान भी इसका है लेकिन परिंदे की "जात / जुबान और वल्दियत" वगैरह वगैरह तय करने से पहले मुझे बुजुर्गवार का फ़तवा तो सुनना ही होगा और शायद मानना भी होगा ?
अब ये मत कहियेगा कि बाला साहब बीमार हैं याकि बुजुर्गवार बढती उम्र में सठिया गये हैं ! .....खैर आप जो भी कहें हमारा संविधान कहता है कि बुजुर्गवार को परिंदों को डांटने डपटने / पीटने पिटवाने का पूरा पूरा हक़ है !
मासूम परिंदे...... ऊँ....हूँ ....कमबख्त परिंदे , पिंजरे की सरहद से बाहर आसमान में उडनें की ख्वाहिश रखते हैं ! दारोगा - ऐ - जिन्दान इनके 'पंख कलम' कर दो !

रविवार, 19 जुलाई 2009

...नक्सलवाद ... युद्धोन्माद और ...जानम समझा करो !

कल रात उसने टी.वी.पर समाचार देखा और सुबह...सुबह प्रिंट मीडिया की सुर्खियाँ भी, लिहाजा वो बहुत उत्साहित है कि सरकार और पुलिस ने मदनवाडा के अनुभव से सबक लिया है इसलिए रक्षा बलों की त्वरित तैनाती / मूवमेंट, की गरज से हेलीपैड की तात्कालिक व्यवस्था के साथ ही साथ रणनीतिक मोर्चे पर भी विचार मंथन का दौर चल रहा है ! इतना ही नहीं सरकार के नेक दिल मुखिया नें भी नक्सलियों के विरुद्ध आर पार युद्ध की घोषणा कर दी है ! उस पर खुशी ये भी कि हताहतों* के परिजनों को समकक्ष पदों पर अनुकम्पा नियुक्ति देने का फ़ैसला कर लिया गया है !

(*हताहत इसलिए लिख रहा हूँ कि इसमें आगे चल कर वो इंसान भी शामिल किए जा सकें जो पुलिस में नहीं थे परन्तु इस विभीषिका का शिकार हुए हैं ! )

मैं भी उसकी खुशियों के गुब्बारे को बेवक्त पंक्चर करने के मूड में नहीं हूँ, भला क्यों...?...जरा सोचिये...क्यों नहीं ? अरे भाई वो भी तो मेरी जिन्दगी की दुआएं मांगती है...जैसे कि उन हताहतों की पत्नियां मांगती रही होंगी ! अब कौन जाने कि अपना ईश्वर अधिक क्रूर है याकि नक्सली या फ़िर सरकार, जो जीवन माटी के मोल हो चला है ! पता नहीं कब कौन परिवार अनुकम्पा नियुक्तियों के लिए कतार में खड़ा होने को मजबूर हो जाए !... र अगर घर का मुखिया अपने अकाल स्वर्गारोहण से पूर्व सरकारी नौकरी में ना हों तो...?...तो ?

फिलहाल तो मेरी पत्नी नक्सलियों के विरुद्ध सरकारी युद्धघोष और हताहतों के परिजनों के प्रति उसकी करुणा से गदगद है ! मैं नहीं जानता कि रणक्षेत्र में तैनात अन्य सरकारी अधिकारी / कर्मचारियों में से अगली बारी किसकी होगी ? शायद मैं ? या फ़िर कोई और ?...या फ़िर कोई और...! क्या उस दिन भी मेरे परिजन / मेरी पत्नी समकक्ष पदेन करुणा के मुआवजे से संतुष्ट हो जायेंगे / जायेगी ? क्या मुझ जैसे किसी भी हतभागे के परिजन अपने प्रियजन के असामयिक विछोह के उपरांत सहज जीवन जी सकते हैं ! वो खुश है ! मैं सोच रहा हूं और मेरा सिर दर्द कर रहा है ! अख़बारों की सुर्खियाँ , शब्दों से ध्वनियों में बदलती हुई !...तेज दर तेज होती हुई, मेरे कानों में हथोडों सी बज रही हैं ! मुझे अहसास दिलाती हुई कि एक दिन तुम भी सुर्खियाँ बन सकते हो तुम्हारे परिजन भी तुम्हारे बिना...अमां...लाहौल बिला कुव्वत ! मैं भी...क्या अगड़म बगड़म सोचे चला जा रहा हूं !

आवाज देता हूं मुझे चाय चाहिए ! पत्नी खुश है, उसे इस क्षण, मेरी ब्लागिंग से कोई शिकायत नहीं ! वाव...आज चाय में अदरक भी... ?...और कोई वक़्त होता तो कहता बेहतरीन, मजा आ गया ! लेकिन अभी तो मुंह कसैला हो चला है ! अकाल मृत्यु की परिकल्पना के दरम्यान कौन सी चाय जायकेदार लगेगी भला ? कोशिश कर रहा हूं, कि दिमाग सोचना छोड़ दे, फिलहाल मुझे और मुझ जैसे शान्तिकामी लोगों को इसकी सख्त जरुरत है कि दिमाग सोचना बंद कर दे क्योंकि...?

मध्यप्रदेश के ज़माने में स्वर्गीय भास्कर दीवान के परिजनों को भी समकक्ष पदेन अनुकम्पा नियुक्ति दी गई थी ! अब स्वर्गीय चौबे के परिजनों को दी जायेगी बाद में शायद...कोई और...फ़िर से...नये हैलीपैड, नई रणनीतियां, नये युद्धघोष ?...नई मृत्यु...नई अनुकम्पा, नई सुर्खियाँ...सब कुछ नया और निरंतर ! तब शायद किसी और की नई नवेली पत्नी खुश हो रही होगी ? जैसा का तैसा ! मानव जीवन को अकारथ / व्यर्थ करता हुआ !

मेरा दिमाग, क्या करूं मैं इसका ! कमबख्त सोचना बंद क्यों नहीं करता...हैलीपैड, नये अस्त्रों की दौड़, रक्षा बलों का तीव्र मूवमेंट ! थाने पक्के बंकरों से सुरक्षित ! पुलिस चौकियां फोर्टीफ़ाइड़ फ़िर लाखों करोड़ों जनगण अपनी अपनी झोपड़ पट्टी के पास बने बंकरों /फोर्टीफ़ाइड़ थानों के, अहसास मात्र से सुरक्षित ! अब मैं बडबडा रहा हूं और पत्नी भौंचक मेरा मुंह ताक रही है ! उसे लगता है कि रात मेरी नींद पूरी नहीं हुई या फ़िर काम का तनाव है ! अरे नहीं ये शब्द मेरे नहीं हैं !

हैलीपैड...अनुकम्पा नियुक्तियां, युद्धघोष...बंकर, जंगल, गाँव, पुलिस, मंत्री, संतरी, आदिवासी, जनगण, झोपडे, जीवन, मृत्यु...अनाथ...विकलांग...शहीद...भूखे...नंगे...आह मैं मरा !
कौन सी शान्ति ?... काहे की शान्ति ?

यहाँ नक्सलवाद...युद्धोन्माद और...शान्ति की कब्रगाह है... जानम समझा करो ! फिलहाल , पत्नी मेरे माथे पर हाथ रख कर, हरारत को महसूस करने की कोशिश कर रही है ! वैसे मेरे लिए , उसके हाथ में सिर दर्द और नींद, दोनों की गोली है !

बुधवार, 6 मई 2009

इक शम्मा है दलीले सहर सो ख़मोश है !

सुबह सुबह औघड़ चाय* का वक़्त है ! दर-ओ- दीवार पे हर सिम्त जगजीत भाई की पुर- नूर आवाज़ अनहद से अनगढ़ रिश्ते का सबब बनी हुई है ~~ ज़ुल्मतकदे में ................ इक शम्मा है दलीले सहर सो ख़मोश है ~~
बीबी किचन में , बच्चे नींद की आगोश में और मैं ख़ुद चाय की उम्मीद के साथ ग़ालिब ,जगजीत और अनहद की सोहबत में हूं ! सामने टेबिल पर पड़ा अख़बार अपनी सुर्खियों के साथ अंगडाइयां लेते हुए मुझे दुनियाये फ़ानी की आगोश में ढकेलने की फिराक़ में है ! फ़िर क्या... हर दिन की तरह आज भी अख़बार आहिस्ता आहिस्ता अपनी गिरफ्त मज़बूत करता जा रहा है और फिजाओं में गूंज रहे अल्फाज़ अपने मानी खोने लगे हैं ~~
सत्र न्यायाधीश बस्तर नें , अल्फ्रेड महरा निवासी आवास प्लाट करकापाल ,जगदलपुर को अपने साले मंगलू के कत्ल के जुर्म में , उम्र कैद की सजा सुना दी है ! रिक्शा चलाकर गुज़ारा करने वाले अल्फ्रेड को अपने बेटे सुहेल के जन्मदिन के लिए सिर्फ़ १०० रुपये उधार की दरकार थी ! ताकि बच्चा नए कपड़े पहन सके ! साला मंगलू एक दिन पहले सीमेंट खरीद चुका था सो उधार दे ना सका ! अल्फ्रेड नें गुस्से में साले को पीटा और वह मर गया ! अब मेरे दिल -ओ -दिमाग में अल्फाज़ अपनी शिद्दत से गूंज रहे हैं ~~
अल्फ्रेड ... मंगलू ... सुहेल ... जन्मदिन ... मृत्यु ... बेटा ... साला ... सौ रूपये ... उधार ... सीमेंट... सजा ... रिक्शा ... उम्रकैद... नए कपड़े ... जेल... इक शम्मा ... सरकार ... समाज ... गरीबी ...दलीले सहर... आज़ादी ... विकास ...विश्वगुरु... विकसित देश... भारत... लोकतंत्र ... नेता ...अम्बानी ... मित्तल...फोर्ब्स... विधवा ... पितृहीन ... अनाथ... परिवार ...सो ख़मोश है !

बुधवार, 11 मार्च 2009

पूरे जिस्म पर ......

एक समाचार लेखक की आप बीती :
होली से पहले :
उनकी उम्र ज्यादा नहीं लिहाज़ा ख्यालात भी रूमानी हैं और उन्हें ईश कृपा से एक अदद लैला भी दस्तेयाब है सो जनाब पिछले साल भर से राह तक रहे थे कि होली आएगी तो कौन कौन से रंग किस किस तरह से और कहाँ कहाँ लगायेंगे ! मगर सत्यानाश हो ऑफिस वालों का , फरमान ज़ारी कर दिया , इस साल तिलक होली से गुज़ारा करो , मानवता को विश्व युद्ध से बचाना है ! इसलिए तिलक होली को जन आन्दोलन बना डालो ! अब बेचारा खादिम भला अपने मालिक से कैसे कहे जनाबे आली ख़ुद की होलियाँ तो भले से गुज़ार लीं अब पैर कब्र में क्या लटके , हमारी होली का दहन करने पे उतारू हो गए ! खैर ........मालिक का हुक्म सिर माथे की तर्ज़ पर भाई साहब , पिछले कई दिनों से तिलक होली के तराने गाने पर मजबूर थे !
होली के दिन :
आज भाई साहब नें सारी फिक्रें छोड़ कर होली को होली की तरह से मना डाला है और अपनी तमाम हसरतें खुलकर पूरी कर डाली हैं ! लेकिन दोस्त , दुश्मनी पर उतारू हैं और धमका रहे है कि मालिक को बता देंगे कि तुमने नाफ़रमानी की है ! जन-आन्दोलन की पीठ पर छुरा भोंका है ! ..... अब भाई साहब को कल की फ़िक्र है !
कल क्या होगा :
भाई साहब ने तय कर लिया है कि कह देंगे ! हुजूर हमने इस आन्दोलन को मजबूती देने के ख्याल से ज़्यादा से ज़्यादा जगह पर ज़्यादा से ज़्यादा तिलक लगाये हैं !