मुझे पता नहीं पंजाबियों से मेरे क्या रिश्ते हैं, पंजाबी जुबान कभी पढ़ी नहीं...फिर ये जुबान और इसका सूफियाना संगीत क्यों कर मेरे सिर चढ़ कर बोलता है ? रब जाने ? इस जनम में कभी पंजाब गया नहीं, जरुर पिछले जनम का लेन देन बाकी रहा होगा ! यूं तो मुझे संस्कृत ऋचायें और उनका गायन भी बहुत भाता है पर बाबा फरीद, बुल्ले शाह...गोया रूहानियत सी तारी कर जाते हैं ! पंजाबी लोक संगीत और कथायें आह...कैसे कहूं कितनी अपनी सी लगती हैं ! पता नहीं क्यों आज सुबह से कुछ सूफियाना सुनने का दिल कर रहा है ऐन इसी वक्त दिनेश राय द्विवेदी जी ने राठौर बनाम उत्सव के बहाने मुझे छेड़ दिया है और जब मैंने कल्पना करना चाही कि आस्ट्रेलियाई नस्लभेदी कैसे दिखते होंगे तो यकीन जानिये ठाकरों के चेहरे कौंध गए! बेचैन था सो नेट पर पंजाबी लोक और सूफियाना संगीत की खोज कर डाली ! मुझे ये तो पता नहीं की सूफी संत रब के साथ आशिक-ओ-माशूक की तर्ज पर बातें क्यों किया करते हैं और क्या ये तरीका सही भी है ? कौन जाने रब है भी कि नहीं ? पर मुहब्बत...वो तो है ही ! डरता हूं कि मैं मुहब्बत की बात करूं और साइंस ब्लागर्स असोसिएशन मेरे ज़ज्बात...मेरे अहसासात को गैर साइंसदाना मान कर डस्टबिन के हवाले कर दे पर आज अन्दर कुछ है जिसे बाहर आना जरुरी है, बेहद जरुरी ! भले ही इसकी कीमत कुछ भी हो ! पता नहीं मैं क्या बकवास कर रहा हूँ...पुनर्जन्म...रब...आशिक-ओ- माशूक ! कितना सही हो ग़र मैं तर्कपूर्ण ढंग से सोचूँ और इन सब ख्यालातों को झटक कर फेंक दूं ...मगर नहीं...इन दिनों मेरी दुनिया...मेरा मुल्क मुसीबत में है ! परवाह नहीं कि रब होने का अहसास निहायत ही अतार्किक और गैर साइंसदाना है ! यू ट्यूब पर राहत फ़तेह अली खान और हंसराज हंस...इधर अपने डेस्क टाप के की बोर्ड पर मैं...झूम रहे हैं मस्त...एक नशा सा तारी है ! मेरा मुल्क...ओ रब...मेरा मुल्क...मेरी मुहब्बत ! मुझसे सुर नहीं सधते पर उनके सुरों के साथ मेरे ज़ज्बात सध गये हैं ! मैं गा रहा हूँ "होर की मंगणा मैं रब कौलों ..इक खैर मंगां तेरे दम दी...नित खैर मंगां सोणियां मैं तेरी दुआ ना कोई होर मंगदी ! अब मेरा रोम रोम पुलकित है मेरे मुल्क...मेरे महबूब ...नित खैर मंगां ...!
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बुधवार, 10 फ़रवरी 2010
रविवार, 12 अप्रैल 2009
कुछ लोग ......
कुछ लोग अखिल ब्रम्हांड के सभी जीवों में, ईश्वर का वास देखते हैं और सर्वव्यापी ईश्वर से प्रेम, केवल प्रेम करते हैं ! ...कुछ लोग सर्वव्यापी ईश्वर की अपेक्षा , केवल मनुष्यों से प्रेम करते हैं ! ...जबकि कुछ लोग ईश्वर को मानने का दावा तो करते हैं पर वे ईश्वर और मनुष्यों से चीन्ह चीन्ह कर प्रेम और घृणा का व्यवहार करते हैं !
कुछ लोग बहुत अच्छे ! कुछ अच्छे ! और कुछ नहीं होने के बराबर , होते है !
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अली एम सैयद,
उम्मतें,
सूफीवाद
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