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मंगलवार, 26 जून 2018

किन्नर - 28

गल्प कहती है कि शिखंडी महाभारत का किन्नर पात्र है जोकि आदि देव शिव के आशीर्वाद से महाराज द्रुपद के घर में जन्म लेता है और अपने भाई और पिता के साथ पांडवों की ओर से युद्ध में भाग लेता है । यह माना जाता है कि पुनर्जन्म से पूर्व वो, काशी राज की बड़ी पुत्री अम्बा थी, जिसे भीष्म ने स्वयंबर स्थल से बलपूर्वक अपहरण कर लिया था ।  भीष्म, काशीराज की पुत्रियों से अपने भाई विचित्रवीर्य का विवाह करवाना चाहते थे, किन्तु भीष्म को जैसे ही पता चला कि राजकुमारी अम्बा किसी अन्य राजपुरुष पर अनुरक्त है, तो वे उसे मुक्त कर देते हैं लेकिन अम्बा का प्रेमी उसे भीष्म द्वारा अपहृत किये जाने के आधार पर अपनाने से मना कर देता है ।
अम्बा इसके लिये भीष्म को दोषी मानती है और कहती है कि भीष्म उससे ब्याह करें परन्तु भीष्म अपने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की शपथ का हवाला देते हुए अम्बा से ब्याह करने से मना कर देते हैं ।  इसके बाद अम्बा भीष्म के गुरु परशुराम से न्याय मांगती है लेकिन उसका मनोरथ गुरु शिष्य के मध्य भीषण युद्ध के उपरान्त भी सफल नहीं होता अतः वो प्रतिशोध की अग्नि में जलती हुई आदि देव शिव की आराधना / तपस्या करती है जहां उसे मनोकामना पूर्ति का वरदान मिलता है और वो पांचाल नरेश द्रुपद के घर एक कन्या के रूप में जन्म लेती है, जिसका पालन पोषण दैव घोषणानुसार पुत्र के रूप में किया जाता है ।  उसे युद्ध कौशल की शिक्षा दीक्षा मिलती है ।
इसके बाद उसका विवाह भी कर दिया जाता है किन्तु उसकी पत्नि प्रथम रात्रि में ही उसका सत्य जान कर अपमानित करती है । तब शिखंडी आत्महत्या के विचार से पांचाल त्याग देता है किन्तु एक यक्ष उसे बचा लेता है और उसे, अपना पुरुषत्व दे देता है । जिसके उपरान्त शिखंडी बतौर पुरुष अपनी पत्नि और बच्चों के साथ सुखी जीवन व्यतीत करता है ।  शिखंडी की मृत्यु के उपरान्त यक्ष को अपना पुरुषत्व वापस मिल जाता है । महायुद्ध के समय भीष्म पहचान जाते हैं कि शिखंडी वास्तव में अम्बा है और तो वो अपने अस्त्रों का परित्याग कर देते हैं ।  ये शिखंडी ही है जिसके कारण से अर्जुन अपराजेय भीष्म को पराजित कर पाता है और अम्बा का संकल्प भी पूरा होता है कि वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेगी ।  

सोमवार, 25 जून 2018

किन्नर - 27

जेन द जुंग मध्य चीन का शक्तिशाली सम्राट था । उसके महल के चारों ओर परिंदे, फूल और कुदरत के शानदार नज़ारे थे, किन्तु उसे साम्राज्य विस्तार और युद्धों से फुर्सत नहीं थी, हालांकि उसके मंत्रिमंडल और सलाहकारों में विद्वतजनों की कोई कमी नहीं थी, चूंकि सम्राट ने अपना अधिकतम समय राज काज को दे रखा था अतः उसे ब्याह के लिये उपयुक्त स्त्री चुनने का समय नहीं मिला सो उसने अपने रनिवास में मादाम ल्यू और मादाम ली नाम की दो स्त्रियों को अपनी रखैलों की तरह से रख छोड़ा था । जहां सम्राट, मादाम ली के रूप सौंदर्य का शैदाई था वहीं मादाम ल्यू का वाक् चातुर्य उसे बाँध कर रखता । लंबे समय बाद सम्राट को उत्तराधिकारी की चिंता हुई तो उसने अपनी पत्नियों से कहा कि मुझे साम्राज्य का उत्तराधिकारी चाहिए, मादाम ली ने सिर झुका कर कहा, जो आप चाहें । मादाम ल्यू ने कहा मैं भी आपकी इच्छा पूर्ति के लिये तत्पर हूं । सम्राट ने कहा चूंकि मैं तुम दोनों से समान प्रेम करता हूं अतः तुममे से किसी एक को चुनना कठिन है, इसलिए तुममे से जिसे भी पुत्र प्राप्त होगा वही मेरी साम्राज्ञी बनेगी । सम्राट ने यह सोचा भी नहीं था कि उसके शब्द उसकी पत्नियों के मध्य बैर भाव और ईर्ष्या की दीवार खड़ी कर देंगे । 

कुछ ही दिनों में पता चला कि मादाम ली गर्भवती है और शाही भविष्यवक्ता के कथनानुसार उसे पुत्र रत्न प्राप्त होने की सम्भावना थी । सम्राट प्रसन्न था और उसने मादाम ली को स्वर्ण आभूषणों सहित बेशकीमती तोहफे दिये किन्तु मादाम ल्यू इस घटनाक्रम से दुखी थी वो अलग थलग रहती और मादाम ली के विषय में सोचा करती थी । फिर एक दिन उसने महल में उसके प्रिय और विश्वस्त किन्नर गुओ हुआ ई से अपनी चिंता साझा करते हुए सलाह माँगी । गुओ हुआ ई बचपन से ही महल में रहता था,उसने मादाम ल्यू से कहा कि मैं भी दुखी हूं और आपकी चिंता मेरी भी है । महल परिसर में वे दोनों ऊपरी तौर पर प्रसन्नचित्त होने का दिखावा करते लेकिन अंदर ही अंदर षड्यंत्र रचते । गुओ हुआ ई की सहानुभूति पाकर मादाम ल्यू का हौसला बढ़ा किन्तु अगले कुछ दिन चिंता जनक थे । मादाम ली ने एक स्वस्थ शिशु को जन्म दिया जिसे नर्म कपड़े में लपेट दिया गया मादाम ली पिछले दिनों की थकान से चूर थी अतः उसे गहरी नींद आ गई। 

शाम को जागते ही उसने अपने शिशु को देखने की इच्छा व्यक्त की तो महिला सेविका ने उसके बाजू में कपड़े में सख्त बंधा हुआ एक शिशु रख दिया जोकि पिलपिले मांस के लोथड़े जैसा था, उसके छोटे कान और बिल्ली जैसी आंखें थीं । मादाम ली को विश्वास ही नहीं हुआ वो जोर जोर से चिल्लाने और रोने लगी । महल में अफवाह फ़ैल गई कि मादाम ली ने राक्षस को जन्म दिया है । सम्राट यह सुनकर क्रोधित हो गया और उसने आदेश दिया कि मादाम ली को तत्काल महल से निकाल कर नौकरों के कमरों में विस्थापित कर दिया जाए । दूसरी ओर नर्म कपड़े में लिपटा हुआ सुंदर शिशु मादाम ल्यू के कक्ष में मौजूद था । मादाम ल्यू ने बुदबुदा कर गुओ हुआ ई से पूछा, यह यहां क्या कर रहा है, इसे यहां रख कर मैं फंस जाऊंगी, किन्नर गुओ हुआ ई ने सर्द लहजे में कहा, यह बहस का वक्त नहीं है, मैंने इसकी जगह बिल्ली के बच्चे को मारकर, मादाम ली के कक्ष में रख दिया था । वह आत्म संतुष्ट था और मुस्कराया मादाम ल्यू समझ गई कि वह अनावश्यक झमेले में फंस चुकी है ।   

मादाम ल्यू के पास ज्यादा विकल्प शेष नहीं थे, उसने मजबूर होकर अपनी दासी पर्ल को बुलाया और आदेश दिया कि नवजात शिशु को टोकरी में रखकर नदी में बहा दे और किसी को कान-ओ-कान खबर भी नहीं होनी चाहिए वर्ना उसे मृत्यु दंड दे दिया जाएगा ।  सेविका पर्ल डर गई लेकिन उसे मादाम ल्यू का आदेश मानना ही पड़ा, वो चुपचाप शिशु को टोकरी में लेकर नदी की ओर चल पड़ी, उसकी आंखों में आंसू थे और उसका जिस्म थरथरा रहा था ।  वो थोड़ी देर तक नदी के किनारे हतप्रभ / उदास बैठी रही, अचानक ही उसने अपने बगल में चिन लेन को खडा पाया, चिन लेन जोकि सम्राट का विश्वस्त किन्नर था, उसके उच्च आदर्शों और नैतिक चरित्र के कारण महल में सभी उसकी इज्जत करते थे, वो सम्राट के चचेरे भाई सामंत जा ऊ को फलों की टोकरी पहुचाने जा रहा था, किन्तु पर्ल को देख कर, वहीं रुक गया और उसने पर्ल से पूछा तुम क्यों रो रही हो ? पर्ल चुप रही । उसने सख्त हाथों से पर्ल की टोकरी पकड़ी और कहा चुप हो जाओ और मुझे बताओ, बात क्या है ? पर्ल फंस चुकी थी और चिन लेन की सहृदयता पर विश्वास करने के अतिरिक्त उसके पास और कोई चारा भी नहीं था, उसने सारा घटनाक्रम चिन लेन को बता दिया ।

चिन लेन अवाक होकर सुनता रहा, फिर उसने कहा बच्चे को मुझे सौंप दो मैं इसे सामंत जा ऊ को सौंप दूंगा वे भी निःसंतान हैं, तुम मादाम ल्यू से झूठ बोल देना कि तुमने उनके आदेश का पालन करते हुए शिशु को नदी में बहा दिया है । पर्ल ने सहमति में सिर हिलाया । संयोगवश सामंत जा ऊ के घर जाते हुए चिन लेन को गुओ हुआ ई ने देख लिया, वह टोकरी देख कर सशंकित था, उसने चिन लेन से पूछा यह क्या है ? चिन लेन ने कहा कि मैं सम्राट की ओर से फलों का उपहार सामंत जा ऊ को पहुंचाने जा रहा हूं , गुओ हुआ ई टोकरी खोल कर देखना चाहता था किन्तु चिन लेन ने उसे ऐसा नहीं करने दिया, उसने कहा यह टोकरी स्वयं सम्राट द्वारा सील बंद की गई है सो तुम इसे नहीं खोल सकते । इसके बाद वह सामंत जा ऊ के घर पहुंचा और घटनाक्रम विवरण देते हुए कहा कि आप इस बच्चे को गोद ले लें क्यों कि यह राज्य का उत्तराधिकारी है । सामंत जा ऊ और उसकी पत्नि इस हेतु सहर्ष तैयार थे और फिर समय बीतता गया...एक वर्ष होते ही शिशु अपने पैरों पर थिरकने लगा । 

अक्सर उसके सुंदर मुख पर वही मुस्कान होती जोकि उसकी मां मादाम ली से उसे विरासत में मिली थी, वह उद्यान में भागता फिरता और झींगुर / तितलियों को पकड़ने की कोशिश करता । इसी दौरान मादाम ल्यू ने एक पुत्र को जन्म दिया, सम्राट ये खबर पाकर बहुत खुश हुआ और उसने मादाम ल्यू को साम्राज्ञी घोषित कर दिया हालांकि दो तीन महीने के बाद यह शिशु बीमार होकर काल के गाल में समा गया । सम्राट ने कहा मैं निःसंतान रह गया । शोक संतप्त होकर उसने स्वयं को एक कक्ष में सीमित कर लिया और राजकाज मादाम ल्यू देखने लगी । दु:खी सम्राट को याद आया कि बचपन और नौजवानी के दिनों में वो अपने चचेरे भाई जा ऊ के साथ दिन गुज़ारा करता था । उसने सोचा कि दुःख को कम करने के लिये भाई से मिलकर बातें करना उचित होगा सो वह सामंत जा ऊ के घर जा पहुंचा । सामंत जा ऊ ने उसका स्वागत किया । वे दोनों खूबसूरत बागीचे में बैठकर गर्म चाय के घूँट लेते हुए गपशप करने लगे । तभी नन्हा शिशु बागीचे में आ पहुंचा जिसे देखकर सम्राट चौंक गया उसने सामंत जा ऊ से कहा, भाई मैं निःसंतान ही रहा ।  क्या तुम मुझे यह बच्चा सौंप सकते हो । 

सामंत जा ऊ के लिये सम्राट की इच्छा आदेश के समान थी उसने कहा ठीक है , हालांकि हम इसकी कमी महसूस करेंगे पर यह बच्चा आपका हुआ । आपकी इच्छा का मान रखते हुए हम पति पत्नि स्वयं को गौरान्वित महसूस कर रहे हैं । बच्चा साम्राज्ञी मादाम ल्यू को सौंप दिया गया, वो प्रथम दृष्टया दु:खी सम्राट के उत्तराधिकारी को पाकर खुश हुई फिर उसे लगा कि शिशु का चेहरा मादाम ली से साम्य रखता है । यूं समझिए कि उसे दु:स्वप्न आने लगे, महल में इस साम्य की चर्चा होने लगी थी । मादाम ल्यू ने गुओ हुआ ई से सलाह माँगी । सच का पता कैसे चलेगा ?  गुओ हुआ ई को चिन लेन के हाथों वाली टोकरी याद आ गई उसे हालात चिंता जनक लगे, उसने आज्ञा दी, दासी पर्ल और चिन लेन को उसके सामने हाज़िर किया जाए । गुओ हुआ ई ने पर्ल से पूछा कि क्या तुमने सच में शिशु को नदी में बहा दिया था ? उसने कहा हां, गुओ हुआ ई ने कहा, यह सच नहीं बोल रही है, इसकी बेंत से पिटाई की जाये तब मुंह खोलेगी । मादाम ल्यू को पिटाई वाला विचार पसंद नहीं था पर वो सच जानने के लिये चुप रही ।

चिन लेन, पर्ल को कष्ट में नहीं देखना चाहता था । हालांकि पर्ल, बेदम पिटाई की ताब ना ला सकी और वो वहीं मर गई । चिन लेन समझ गया कि अब उसकी और शायद बाद में मादाम ली की जान खतरे में पड़ने वाली है, वह नौकरों के घर की तरफ भागा और मादाम ली से निवेदन किया कि सब कुछ छोड़कर भागने का समय आ चुका है, किसी समय, सम्राट की चहेती रही, मादाम ली अब महल से बाहर, भिखारियों जैसे हालात में दिन गुज़ारने को मजबूर थी ।उनके पलायन के बाद मादाम ल्यू और गुओ हुआ ई सत्य जान ही नहीं सके । इसके बाद सम्राट दस साल तक जीवित रहा पर...उसे भी पता नहीं चला कि उसका पालित पुत्र वास्तव में उसका अपना जैविक पुत्र है ।  सम्राट की मृत्यु के बाद उसे ससम्मान मकबरे में दफन कर दिया गया और इतने ही सम्मानजनक तरीके से किशोर हो चले शिशु का राज्याभिषेक कर दिया गया । कुछ समय बीता...उन दिनों एक चतुर न्यायाधीश था जिसने कई कठिन प्रकरण सुलझाए थे, अकस्मात ही उसके सामने एक गंदी वेशभूषा वाली स्त्री चिल्लाने लगी, न्याय नहीं हुआ, न्याय नहीं हुआ । सम्राट मेरा पुत्र है ।

न्यायाधीश को उत्सुक्ता हुई । उसने स्त्री से अकेले में बात की, स्त्री ने कहा कि मैं मादाम ली हूं और उसने सम्पूर्ण घटनाक्रम न्यायाधीश को बताया, चूंकि घटना क्रम शाही परिवार से जुड़ा हुआ था सो न्यायाधीश ने गरिमापूर्ण ढंग से सुनवाई करने और मामले की जांच करने का निर्णय लिया । किन्नर गुओ हुआ ई बयान देते समय सभी बातों से मुकर गया । उसने कहा कि एक गंदी स्त्री के कल्पित आरोप के आधार पर आप मुझ पर कोई आरोप प्रमाणित नहीं कर सकेंगे ।  न्यायाधीश ने कहा जब तक कि स्त्री का आरोप गलत सिद्ध नहीं हो जाता तब तक तुम हिरासत में रहोगे । न्यायाधीश ने योजनानुसार अपनी जेल के किनारे स्थित एक कक्ष को नर्क की शक्ल दे दी और कर्मचारियों को जानवरों के वेश में तैयार किया । इसके बाद आधी रात को जेल में शराब और मांस के भोज्य पदार्थों  साथ किन्नर गुओ हुआ ई को एक सन्देश दिया गया कि इसे मादाम ल्यू ने भेजा है ।  गुओ हुआ ई ने सोचा कि रानी उसे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके बचा लेगी । अच्छा खाना खाकर गुओ हुआ ई खर्राटे भरने लगा । तभी उसकी कोठरी के बगल वाले कमरे से नर्क जैसा शोर उठा, आवाजें तेजतर होती जा रही थीं ।

गुओ हुआ ई डर गया उसे लगा यह सच है । ढोलों की गूँज जानवरों के शोर के बीच आवाज आई, यह न्याय का दिन है । तुम्हें अपने किये का अंजाम भुगता पड़ेगा । जंजीरों से बंधे हुए गुओ हुआ ई को बगल के कक्ष में लाया गया, जहां का माहौल देख कर उसे विश्वास हो गया कि वो नर्क में है, शैतान के राज्य में ।  तभी आवाज गूंजी पर्ल को लाया जाय । लबादे में लिपटी पर्ल (वास्तव में अन्य स्त्री) बुदबुदा रही थी । उसने गुओ हुआ ई के कारनामों के बारे में बयान देना शुरू कर दिया । गुओ हुआ ई, दिवंगत हो चुकी पर्ल को बयान देते देख कर आतंकित हो गया और चिल्लाया मुझे नर्क में मत भेजो । यह सब मादाम  ल्यू की गलती है मैंने जो भी किया उनके आदेश पर किया । वो घुटनों के बल जमीन पर गिर गया, उसकी स्वीकृति के साथ ही नाटक का पटाक्षेप हो चुका था और गुओ हुआ ई को मृत्यु दंड दिया गया । मादाम ल्यू को एकांतवास दे दिया गया, जहां उसने भोजन का परित्याग कर के अपने प्राण त्याग दिये...किशोर सम्राट ने अपनी मां मादाम ली को साम्राज्ञी घोषित कर दिया, यह पुनर्मिलन सुखद था । 

रविवार, 24 जून 2018

किन्नर - 26

विश्व के अन्य देशों की तरह से भारत में भी लैंगिक दुविधा की धारणा अर्वाचीन है, हालांकि आदि देव ने इसका सम्मानजनक विकल्प अर्धनारीश्वर के रूप में दिया था । उल्लेखनीय है कि वैदिक साहित्य में किन्नर समुदाय के बारे में अनेकों ब्योरे दर्ज हैं परन्तु यहां हम उन विवरणों / सूत्रों की पड़ताल करने के बजाये भारतीय हिंदू किन्नरों की आराध्य देवी माता बहुचरा का ज़िक्र करना चाहेंगे । उनके सम्बन्ध में प्रचलित गल्प कहता है कि वो चारण बापल दान देथा की पुत्री थी, जिन्हें, उनकी बहन के साथ,बापैया नामक दस्यु ने, कारवां से लूट लिया था । पहले तो कारवाँ के लोग, दस्यु समूह से वीरता पूर्वक लड़े परन्तु संख्या बल की कमी के कारण दस्यु दल से परास्त हो गये । उन दिनों चारण समुदाय के पुरुषों और स्त्रियों में यह बात सामान्य रूप से प्रचलित थी कि शत्रु द्वारा मारे जाने / परास्त किये जाने से पूर्व ही आत्म घात कर लिया जाना उचित होता है । गौर तलब है कि उस कालखंड में चारणों का खून बहाना, घिनौना कृत्य माना जाता था ।
दस्युओं द्वारा बंदी बना ली गई बहनों ने तिरागु / आत्मबलिदान की घोषणा की । उन्होंने अपने वक्षों को काट डाला । इसके बाद बहुचरा ने बापैया को श्राप दिया कि वह आगत समय में, नपुंसक का जीवन जियेगा, स्त्रियों की तरह से कपड़े पहनेगा और श्रृंगार करेगा तथा तिरागु करने को बाध्य हुई बहुचरा की पूजा करेगा । अस्तु गल्प सन्देश स्पष्ट है कि लैंगिक उत्परिवर्तन बहुचरा माता की कथा से जुड़ा हुआ है । फिलहाल देवी बहुचरा का मंदिर मेहसाना जिले के बेचरा में स्थित है, जहां लाखों श्रृद्धालु संतान मांगने के लिये आते हैं । इस सम्बन्ध में प्रचलित एक गल्प यह भी है कि, किसी जन्मजात, नपुंसक राजा ने देवी बहुचरा से संतान की कामना की थी ।  एक अनुश्रुति ये भी कि राजकुमार जेठो ने स्वप्न में देखा, कि देवी बहुचरा ने उसे, अपना जननांग काट लेने और स्त्रियों के कपड़े धारण करने तथा देवी का सेवक हो जाने का आदेश दिया है ।
कहते हैं कि प्रत्येक किन्नर को देवी की उपासना का आदेश है अन्यथा उसकी सात पीढियां को नपुंसक हो जाने का श्राप है । दस्यु दल से मुठभेड़ के घटनाक्रम के बाद जैसे जैसे समय बीतता गया वैसे वैसे देवी के उपासकों की संख्या बढ़ती गई और इस तरह से किन्नर समुदाय वृहताकार होता गया । प्रचलित कथाओं में यह संकेत भी निहित हैं कि किन्नर समुदाय के आत्म विचारण  के मूल में शरीर और आत्मा के संघर्ष की धारणा है । एक अन्य गल्प में बहुचरा को राजकुमारी बताया गया है, जिसका पति बहुचरा से शारीरिक संसर्ग स्थापित करने के बजाये बचता फिरता था । वह रात को अक्सर घर से बाहर निकल जाता और सुबह घर वापस लौटता । चूंकि ये घटनाक्रम अत्यंत रहस्यमयी था सो राजकुमारी बहुचरा ने अपने पति के रात्रि कालीन पलायन के कारणों को जानने का निश्चय कर लिया, फिर एक रात्रि को उसने अपने पति का पीछा किया और देखा कि उसका पति जंगल में किसी अन्य पुरुष के साथ पत्निवत / स्त्रीवत व्यवहार कर रहा है ।
वो यह देख कर अत्यंत क्रोधित हो गई और उसने, पति का बंध्याकरण कर दिया तथा श्राप दिया कि उसके पति के जैसे सभी पुरुष, पुनर्जन्म के बाद नपुंसकता मुक्त किये जायें । इसलिए किन्नर समुदाय के लोग देवी के पुनर्जन्म वाले आश्वासन की पूर्ति के लिये वर्तमान जन्म में उसकी उपासना करते हैं । कुल मिलाकर कथनाशय ये है कि देवी बहुचरा किन्नरों को संरक्षण प्रदान करने वाली शक्ति है और उसके उपासक अहिंसा में विश्वास रखते हैं । 

शनिवार, 23 जून 2018

किन्नर - 25


एनकी / इया ने मृत देवात्मा पर जीवन जल छिड़कने के लिये अजीब सा जीव पैदा किया । सुमेरियन कथा के अनुसार उन्होंने दो जीव सृजित किये एक जीवन जल के लिये और दूसरा भोजन आपूर्ति के लिये । जबकि इसी कथा का अकाडियन संस्करण कहता है कि इया ने अपने पवित्र हृदय में उसकी छवि को धारण कर किन्नर पैदा किया, यह एक परिष्कृत निर्मिति थी । किन्नर का नाम असुशुनामिर था जोकि प्रतिभाशील दिखाई देता था, शुभ्रता / उजाले से आया हुआ । अच्छा दिखने वाला ।  

रानी इरेश्किगाल उसके आगमन पर बहुत प्रसन्न हुई और उसे वार देने को तत्पर हो गई , रानी इरेश्किगाल को उससे प्रेम हो गया । रानी को इससे फ़र्क नहीं पड़ता था कि वह किन्नर था क्योंकि वो स्वयं बांझपन और मृत्यु की देवी थी । जीवन और मृत्यु के मध्य, उर्वरता और अनुर्वरता का तथ्य महत्वपूर्ण है ।  रानी इरेश्किगाल को यह बाद में समझ में आया कि किन्नर असुशुनामिर जीवन जल से मृत देवात्माओं को जीवित करने का इच्छुक था, सो उसने क्रोध में आकर असुशुनामिर को बुरी नियति का श्राप दिया ।  

गल्प के सुमेरियन संस्करण के अनुसार किन्नर असुशुनामिर के सृजन कर्ता, एनकी / इया थे और गल्प संकेत यह है कि देवात्मायें मृत हो चुकीं थीं तथा उन्हें जीवित करने के लिये जीवन जल छिड़कने का कार्य किन्नर असुशनामिर द्वारा किया जाना था, अतएव उसे, एनकी / इया द्वारा सृजित किया गया ।  इस कथा में उसे अजीब सा जीव कहा गया है यानि कि असामान्य जीव, जोकि वो था, ना तो केवल स्त्री और ना ही सम्पूर्ण पुरुष ।  गौर तलब है कि एनकी / इया ने भोजन आपूर्ति के लिये किसी दूसरे जीव का सृजन भी किया किन्तु यहां पर, उसका उल्लेख करना विषयान्तर करने जैसा होगा ।  

बहरहाल कथा का अकाडियन संस्करण कहता है कि एनकी / इया ने, अपने पवित्र हृदय में उसकी छवि धारण कर के, उसे पैदा किया था इसलिये वो शुभ्रता से आया हुआ, अच्छा दिखने वाला और प्रतिभाशील दिखाई देता था । गल्प के इस संस्करण में, उसके जन्म से, बांझपन और मृत्यु की देवी इरेश्किगाल की आसक्ति और प्रसन्न होने का बयान अदभुत है । रानी इरेश्किगाल बांझपन और मृत्यु की देवी थी और असुशुनामिर स्वयं, किन्नर / बंध्याकृत / नपुंसक / अनुर्वर, तरह का जीव, सो गुण साम्य के आधार पर पारस्परिक अनुराग का कथन दिलचस्प है, सहज है, स्वभाविक है ।

लोक मानस में व्यापित इस गल्प में, देवी देवताओं के साथ किन्नरों की जागतिक उपस्थिति तथा जीवन बनाम मृत्यु को उर्वरता एवं अनुर्वरता से जोड़ा जाना बेहद महत्वपूर्ण है । इसके अतिरिक्त किन्नरों की दुर्दशा के लिये भी, इस कथा में प्रातीतिक संकेत मौजूद हैं यथा, रानी इरेश्किगाल को गुण साम्यता के आधार पर असुशुनामिर से प्रेम है और...प्रेम अपेक्षाएं जगाता है, जैसा कि इरेश्किगाल को असुशुनामिर से थीं ।

मृत्यु के लिये एक साथ, बांझपन के लिये एक साथ, अनुर्वरता के लिये एक साथ, किन्तु उस किन्नर को एनकी / इया ने रचा था, अपनी पवित्र आत्मा से, अनुर्वरता से उर्वरता के लिये, मृत देवात्माओं पर जीवन जल छिड़क कर, जीवन दान के लिये, अतः टूटती प्रणय अपेक्षाओं के साथ, रानी इरेश्किगाल का क्रुद्ध होना / मोहभंग, स्वभाविक था । सो किन्नर... सारे के सारे असुशुनामिर, प्रेम से अभिशापित हैं, आज भी ।      



शुक्रवार, 22 जून 2018

किन्नर - 24

किन्नर मा शान बा ओ मूलतः झेंग परिवार से नहीं था बल्कि वह चीनी मुस्लिम मा खानदान का चिराग था, उसके पिता का नाम मा हा था और उसे, मा हे नाम दिया गया था । वे लोग, स्वयं को दक्षिणी पश्चिमी चीन के युन्नान प्रान्त के मंगोल गवर्नर का वंशज मानते थे । उसका कुल नाम मा संभवतः अरेबिक नाम मुहम्मद का चीनी संस्करण था । उसके पिता, देश विदेश की यात्रायें करते रहते और फिर यात्राओं से लौट कर बालक मा हे को बाहरी दुनिया की कथाएं सुनाया करते थे,सो शिशु मा हे भी बाहरी दुनिया के प्रति सतत जिज्ञासु बना रहने लगा, उसे समुद्री यायावरी भाने लगी थी । यहां यह तथ्य उल्लेखनीय है कि उसके घर के पास कुंग यिंग झील थी, जिसमें वो प्रतिदिन स्नान किया करता और जिसके परिणाम स्वरुप, एक कुशल तैराक बन गया था । कहते हैं कि जब बालक मा हे दस साल का था, तो मिंग सम्राट ने चीन पर मंगोलों के आधिपत्य के विरुद्ध युद्ध छेड़ दिया था । युद्ध में मंगोलों की पराजय के उपरान्त बंदी बनाये गये अनेकों किशोरों में से, एक मा शान बाओ भी था ।
यही समय था, जबकि विजेता चीनियों ने सभी बंदी किशोरों सहित, मा हे का भी बंध्याकरण कर दिया था और फिर उसे उन्नीस वर्ष (सामान्य काल 1390) की आयु में राजकुमार यान के नेतृत्व वाली सैन्य टुकड़ी में साधारण अर्दली के पद पर तैनात कर दिया गया । यहां उसने अपनी पहचान एक  कुशल योद्धा और कूटनीतिज्ञ कनिष्ठ अधिकारी के तौर पर बना ली थी । इस समय तक शाही दरबार में कई लोगों से उसके मित्रवत सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे । सामान्य काल 1400 में राजकुमार यान ने अपने भतीजे सम्राट जियानवेन के विरुद्ध विद्रोह कर दिया और सामान्य काल 1402 में स्वयं सम्राट बन बैठा । उसके कार्यकाल (1402-1424) में युद्ध में ध्वस्त हुई चीनी अर्थव्यवस्था पुनः पटरी पर लौट आई थी, सो उसने, दक्षिणी पूर्व एशिया पर नौसैन्य दबदबा स्थापित करने के प्रयास तेज कर दिये थे । इसके बाद, बाह्य दुनिया से चीन के संपर्क बढ़ गये थे । व्यापार के इतर तकनीकी, जहाजरानी निर्माण आदि क्षेत्रों में मिंग साम्राज्य की तूती बोलने लगी । यही कालखंड था जब कि शान बाओ को पहले मा हे फिर झेंग हे के नाम से जाना गया।  
दरबार में मौजूद प्रभावपूर्ण किन्नर के तौर पर उसे, उसके मूल कुल-नाम मा के स्थान पर झेंग (राज-कुलीन उपनाम) रखने का परामर्श दिया गया और फिर उसे, झेंग हे के रूप में नई पहचान मिली । इसके बाद सम्राट यान ने उसे पश्चिमी समुद्र में चलने वाले महत्वपूर्ण अभियान की कमान सौंप दी । उसके बेड़े में 62 जहाज और 27800 नौसैनिक सम्मिलित थे । समद्री यायावरी के दौर में उसने सात महत्वपूर्ण समुद्री यात्रायें की थीं । उसने 1405 में दक्षिणी वियतनाम की यात्रा की, फिर थाईलैंड, मलक्का, जावा, केरल, श्रीलंका की यात्रायें पूर्ण कीं और 1407 में वापस चीन लौट आया । 1408-09 में वो पुनः दक्षिण भारत और श्रीलंका गया,इसी समय उसने श्रीलंका के राजा अलागोनक्कारा की धोखेबाजी से निपटते हुए श्रीलंका की सेना को हराया और राजा अलागोनक्कारा को बंधक बना कर चीन ले आया । सामान्य काल  1409-1411 में उसने तीसरी बार यात्राओं की शुरूआत करते हुए होर्मुज जल डमरू मध्य, पर्सियन समुद्र और उत्तरी सुमात्रा की यात्राएं सफलता से पूर्ण कीं  ।
सामान्य काल 1413 में उसका चौथा अभियान अरब, ओमान, यमन, मिस्र, सोमालिया, कीनिया, मोजाम्बीक आदि देशों पर केंद्रित था । सामान्य काल  1417-19 के दरम्यान उसने पर्सिया की खाड़ी और अफ्रीका के पूर्वी तट की ओर पांचवीं बार सफलता पूर्वक नौ-वहन किया । सामान्य काल 1421 में उसने छठवीं बार दक्षिणी एशिया, अरबिया और अफ्रीका की यात्राएँ कीं । सन 1424 में उसे अपना सातवाँ अभियान स्थगित करना पड़ा, क्योंकि सम्राट की मृत्यु हो गई थी और उत्तराधिकारी सम्राट होंग झी ने उसे नानजिंग की रक्षक सेना का कमांडर बना दिया था तथा उसे सेनाओं को पुनः नियोजित एवं  तैयार करना था । झेंग हे ने 1431-33 में अपनी सातवीं समुद्र यात्रायें प्रारम्भ कीं, जिसके अंतर्गत उसने दक्षिणी पूर्वी एशियाई देशों, फारस की खाड़ी, लाल समुद्र , पूर्वी अफ्रीकी देशों तक नौ-वहन किया किन्तु वापसी में कालीकट भारत में वसंत के मौसम में उसकी मृत्यु हो गई और उसका बेड़ा चीन वापस लौट आया ।  वास्तव में वो चीनी योंगली सम्राटों का कूटनीतिक प्रतिनिधि था ।  

गुरुवार, 21 जून 2018

किन्नर - 23

सुंग साम्राज्य के सम्राट शेन सुंग (सामान्य काल  998-1022) और एक गर्भवती महिला फू चिंग, नाव से लोयांग नदी पार कर रहे थे, तब सांप और कछुवे की आत्मा ने बड़ी लहरें और तेज हवाएं भेज दीं ताकि नाव डूब जाए किन्तु उसी समय आकाशवाणी हुई कि नाव में प्रोफेसर त्साई मौजूद हैं इसलिए हवा और लहरें शांत हो जायें और फिर ऐसा ही हुआ । तूफ़ान शांत हो गया किन्तु नाव में सवार यात्रियों को हैरानी हुई कि, नाव में उनके तथा सम्राट और गर्भवती महिला के सिवाय कोई अन्य नहीं था तो प्रोफेसर त्साई कहां थे ? चूंकि फू चिंग, त्साई परिवार की बहू थी, इसलिए लोगों ने तूफ़ान थमने के लिये उसे बधाई दी । फू चिंग ने कहा यदि मुझसे पुत्र का जन्म हुआ और वह प्रोफेसर बना तो मैं उसे लोयांग नदी में पुल बनाने के लिये तैयार करूंगी ।
कालांतर में फू चिंग ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम त्साई ह सियांग रखा गया जोकि लगभग सामान्य काल 1025 में प्रोफेसर बन गया । माता फू चिंग ने पुत्र को, उसके जन्म से पूर्व हुए नाव, नदी और तूफ़ान संबंधी घटनाक्रम की जानकारी दी और कहा कि तुम नदी में पुल बनाओगे, त्साई ह सियांग आज्ञाकारी पुत्र था सो उसने कहा कि ठीक है किन्तु समस्या यह थी कि तत्कालीन चीनी साम्राज्य में अधिकारी अपने गृह क्षेत्र में तैनात नहीं किये जाते थे, चूंकि त्साई ह सियांग, फूकिन का स्थानीय निवासी था इसलिए वो चुवान-चोऊ का गवर्नर नहीं बन सकता था । संयोगवश प्रोफेसर त्साई ह सियांग का एक मित्र मुख्य किन्नर था जिसने इस कार्य हेतु एक अदभुत योजना बनाई ।  
जब किन्नर को पता चला कि सम्राट शेन सुंग उद्यान में घूमने आयेंगे तो उसने शहद, शक्कर घुले पानी से केले के पत्तों पर लिखा कि “त्साई ह सियांग को अपने गृह क्षेत्र का गवर्नर अवश्य बनाया जाए” । शहद की गंध पा कर चींटियाँ, लेख पर एकत्रित हो गईं, उत्सुक्तावश सम्राट ने चींटियों द्वारा निर्मित आकृति को देखा और फिर उस वाक्य को पढ़ा जोकि आकृति में लिखा हुआ दिख रहा था, इसी समय मुख्य किन्नर ने सम्राट द्वारा पढ़े गये / उच्चरित शब्दों को बारम्बार दोहराया तथा इसके बाद स्थानीय गवर्नर के तौर पर त्साई ह सियांग की नियुक्ति का आदेश लिख दिया, जिसे देख कर सम्राट बहुत रुष्ट हुआ और उसने मुख्य किन्नर को दण्डित करना चाहा, तो किन्नर ने कहा कि सम्राट ने जो उद्यान में कहा था, वो मजाक तो नहीं था । यह सुन कर सम्राट ने उसे क्षमा करते हुए आदेश पर हस्ताक्षर कर दिये और इस तरह से त्साई ह सियांग अपने ही क्षेत्र का गवर्नर बना और उसने लोयांग नदी पर पुल निर्माण का कार्य पूर्ण किया ।  
इस कथानक को बांचते हुए यह प्रतीत होता है कि प्रोफेसर त्साई ह सियांग का जन्म दैव निर्धारित था और उसकी गर्भवती मां तथा अन्य सहयात्रियों को तूफ़ान के शांत हो जाने से यही अनुभूति हुई थी ।  संभव है कि इस गल्प में, तूफ़ान की शांति को लेकर हुई कथित आकाशवाणी के अंश नितांत काल्पनिक हों और अनावश्यक रूप से जोड़े गये हों ।संभव यह भी है कि भीषण तूफ़ान में जीवित बच जाने के उपरान्त गर्भवती मां और अन्य सहयात्रियों ने लोयांग नदी पर एक पुल की निर्मिति की आवश्यकता शिद्दत से महसूस की हो ? और उन्हें गर्भस्थ शिशु के इह लोक आगमन, उसकी शिक्षा दीक्षा, अर्जित नव ज्ञान से सकारात्मक भविष्य के प्रति आश्वस्ति जागृत हुई हो ?
कहने का आशय यह है कि गर्भवती मां और अन्य सहयात्री गण आयु के उस पड़ाव पर पहुंच चुके थे, जहां नव ज्ञान अर्जन की संभावनाएं लगभग समाप्त प्राय: / न्यूनतम होने लगती है, ऐसे में नई पीढ़ी, नव ज्ञान अर्जित करे और भविष्य की सुदृढ़ता का आधार बने, जैसी कामना सहज और स्वभाविक ही मानी जायेगी । इसलिए लगता यह है कि जीवित बचे यात्रियों ने शिशु जन्म के उपरान्त / आगत पीढ़ी, को लेकर एक स्वप्न देखा होगा जोकि नव ज्ञान अर्जनोपरांत पुरानी पीढ़ियों की समस्याओं का निदान करने वाली / उनकी भौतिक बाधाएं हर लेने वाली होगी । सो माता ने अपने पुत्र को वही शिक्षा दीक्षा दी / दिलवाई जोकि हाहाकारी नदी में पुल निर्मिति की अभियांत्रिकी से सम्बंधित मानी जायेगी ।     

बुधवार, 20 जून 2018

किन्नर - 22


यह एक सोमालियाई परिवार, जहां कर्रावीलो यानि कि धरती धारिणी का जन्म हुआ था वो बेहद बुद्धिमान और साहसी लड़की थी उसके युवा होते ही अनेकों पुरुष उसके अभिभावकों से याचना करने लगे कि कर्रावीलो का हाथ उनके हाथ में दे दिया जाए । कर्रावीलो के अभिभावकों ने उसका ब्याह उस युवक से कर दिया, जिसने सबसे अधिक दहेज / वधु मूल्य विशेषकर, पशुधन उन्हें दिया । हालांकि वो घर और बच्चों तक सीमित रहने वाली युवती नहीं थी । वो चाहती थी कि उसे पंचायत की न्यायार्थ बहसों में शामिल किया जाए और वो पुरुषों के समतुल्य चर्चा में भाग ले तथा ऐसी ही अन्य, यहां तक कि युद्ध गतिविधियों में भी लिप्त बनी रहे ।

गांव की वृद्धजन परिषद ने कहा यह उचित नहीं है कि कर्रावीलो पुरुषों की तरह से व्यवहार करे उनके मंतव्य से कर्रावीलो को अन्य स्त्रियों की भांति घर द्वार सँभालना चाहिए । कर्रावीलो ने कहा मूर्खो, स्त्रियां भी पुरुषों की तरह से बाह्य गतिविधियों के योग्य होती हैं, उन्हें इसका अवसर मिलना चाहिए । कर्रावीलो का पति, अपनी पत्नी की इस मांग पर आश्चर्य चकित था किन्तु वह अपनी पत्नि का विरोध नहीं कर सका । कर्रावीलो ने सभी स्त्रियों से कहा कि तीन दिन तक घर के कोई काम मत करो ताकि पुरुष घर के कामों में व्यस्त हो जायें और उन्हें कुछ सोचने का मौक़ा ना मिले । इसी बीच हम सब स्त्रियां मिलकर उनके हथियारों पर कब्ज़ा कर लेंगे और दुष्ट पुरुषों को हटा कर इस धरती पर स्त्रियों की सत्ता स्थापित करेंगे ।   
   
स्त्रियों ने ऐसा ही किया, पुरुषों को कुछ सोचने समझने का अवसर ही नहीं मिला, वे घर के काम करने में व्यस्त हो गये और सत्ता पर अधिकार जमाने की, कर्रावीलो की योजना, सफल हो गई, वो उस भूभाग की मुखिया बन गई । अब सारी सत्ता, स्त्रियों के हाथ में थी ।  कर्रावीलो को भय था कि पुरुष कभी ना कभी पलटवार करने की कोशिश करेंगे सो उसने आदेश दिया कि सारे पुरुषों का बंध्याकरण कर दिया जाए , जिन पुरुषों ने बंध्याकरण का विरोध किया, उन्हें मृत्यु दंड दे दिया गया ।  

कहते हैं कि, कर्रावीलो अपने हाथों से अपनी पीठ की सफाई नहीं कर सकती थी, उसके पास एक हज़ार ऊंटनियां थीं, जिनका दूध पी पी कर वो और भी मोटी हो गई थी, अतः नहाने के समय ठीक से सफाई नहीं कर पाने के कारण से, उसकी देह से दुर्गन्ध आने लगी थी, जिसके कारण से लोग उससे दूर दूर भागने लगे थे हालांकि कोई भी व्यक्ति ये सच कहने का साहस नहीं जुटा पाता था ।  

एक दिन कर्रावीलो ने अपने अनेकों किन्नर दासों में से एक से कहा, मैं तुम्हें एक बछड़ा इनाम में दूंगी अगर तुम बिना कुछ कहे, मेरी पीठ की सफाई कर दोगे । उसने अपने स्नान कक्ष में कपड़े उतारते हुई सफाई के लिये दास को बुलाया जोकि दुर्गन्ध की ताब ना ला सकता और उसके मुंह से उफ़ निकल गई । कर्रावीलो चिल्लाई, अब तुम्हें बछड़े का एक अंश भी नहीं मिलगा और वो, वापस भागते हुई दास को दण्डित करने की जुगत में लग गई ।  

गौरतलब है कि कर्रावीलो के वृत्तान्त का प्रथम संस्करण विशुद्ध रूप से स्त्रीवादी है, जहां पुरुषों को सत्ता से बेदखल करने वाली नायिका के रूप में कर्रावीलो का उल्लेख किया गया है जोकि अवसर मिलते ही पुरुषों से, उनका दंभ छीन लेती है, उन्हें पौरुषहीन कर देती है, यानि कि इस संस्करण में उसे, पुरुषों को निस्तेज कर देने वाली, शौर्यशाली महिला के तौर उद्धृत किया गया है जबकि कथा के दूसरे संस्करण में कर्रावीलो को, अनायास ही प्राप्त हुई, सुख / समृद्धि / विलासिता के गर्त में डूब कर मोटी हो गई महिला के तौर पर दर्शाया गया है । प्रतीत होता है कि गल्प का दूसरा संस्करण कर्रावीलो का उपहास उड़ाने की गरज़ से जोड़ा गया / प्रसरित किया गया है ।