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रविवार, 31 दिसंबर 2017

ललमुंहे बंदर

जब ईश्वर ने धरती को बनाया तो उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो निर्माण सामग्री को अपनी विशाल कुंडली में संभाल कर रखे ! इस तरह से धरती को आकार मिला ताकि सभी तरह के लोग, परिंदे और जानवर, उस पर, अपनी ज़िन्दगी गुज़ार सकें ! उस समय प्राचीन सांप ने चार खम्बे, उत्तर, दक्षिण, पूरब,पश्चिम बनाए, जिन्हें अपनी कुंडली में जकड़ कर सीधा खड़ा रखा और  स्वर्ग इन्हीं खम्बों पर टिका हुआ है ! प्राचीन सांप की त्वचा काली, सुफैद और लाल रंग की थी जिसकी वज़ह से रात, दिन और सांझ बनी ! शुरू में धरती पर पानी ठहरा हुआ था इसलिए महाकाय सांप ने झरने और नदियाँ बनाईं, इसके कारण से जीवन चक्र प्रारम्भ हुआ ! इसके बाद जैसे जैसे महाकाय सांप, ईश्वर को नई दुनिया दिखाने लगा, उन सभी जगहों पर पर्वत बन गये, जहां पर ईश्वर ठहरा / चलते चलते रुक गया था !

सृजन का कार्य संपन्न होने पर ईश्वर ने देखा कि बहुसंख्य पर्वत, असंख्य वृक्ष, अनगिनत जीव, अकेली धरती पर बोझ बनने वाले हैं, तो उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो धरती की सहायता करे, सो महाकाय सांप ने खुद की पूंछ को अपने मुंह में दबा कर एक घेरा बना लिया ! इसके बाद ईश्वर ने लाल मुंह के बंदरों को निर्देश दिया कि जब भी अर्वाचीन सांप को भूख लगे, वे उसे खाना खिलाएं ! तब से लेकर आज तक अर्वाचीन सांप ने धरती को संभाल रखा है, हालांकि जब जब सांप करवट बदलता है या फिर खुजलाने अथवा दर्द से मुक्ति, के लिये अपने शरीर को हिलाता है, तब तब धरती पर भूकंप आते हैं ! अगर लाल मुंह के बंदर किसी दिन, सांप को खाना खिलाना भूल जायें और सांप, भूख से परेशान होकर अपनी ही पूँछ निगलने लग जाए, तो यह निश्चित है कि, उस दिन धरती का जीवन समाप्त हो जाएगा !

मध्य अफ्रीका के डाहोमी क्षेत्र के फ़ॅान जनजातीय समुदाय की ये कथा, उस ईश्वर को समर्पित है, जिसने अर्वाचीन सांप के माध्यम से धरती की निर्मिति की थी ! सांप महाकाय है, जिसकी कुंडलियों में धरती के निर्माण में प्रयुक्त सारी सामग्री, एकत्रित / संयोजित और सुरक्षित है ! चारों दिशायें उसके द्वारा खड़े किये गये सतूनों / स्तम्भों से निर्धारित हैं और तो और स्वर्ग भी इन्हीं खम्भों पर अवलंबित है ! कहने का आशय ये कि, स्वर्ग चारों दिशाओं में विस्तारित है ! सांप की चमड़ी के रंग, दिन की धूप, सांझ की लालिमा सह श्यामलता और रात्रि की कृष्णता को सुनिश्चित करते हैं ! उसने ठहरे हुए पानी को सचल किया, झीलों, तालों,  एवं समंदरों से नदियाँ और झरने बनाये, जिससे जीवन का प्रादुर्भाव हुआ ! सांप की कुंडली में बंधी हुई धरती को टिकाऊपन और सधी हुई / सुनिश्चित गति मिली ! ईश्वर के मनवांछित आकार की धरती, जैसा भी उसने चाहा था सांप ने वैसा ही कार्य किया !

जनश्रुति कहती है कि सांप की कुंडलियों में बंधी, सधी हुई धरती में मनुष्यों, परिंदों और जानवरों के रहने लायक परिस्थितियाँ मौजूद हैं ! ईश्वर, निर्दिष्ट सृजन कार्य के समापन के उपरान्त अर्वाचीन सांप ने, ईश्वर को निर्माण कार्य के अवलोकन करने का आमंत्रण दिया, ईश्वर जो धरती को, निरखता हुआ घूमा फिरा ! आदिम समुदाय की कल्पनाशीलता में, दिलचस्प बात ये कि ईश्वर जहां ठहरा, वहीं पर्वत बन गये ! धरती पर भ्रमण के दौरान, ईश्वर को ये अनुभूति हुई कि, नवजात धरती, असंख्य पर्वतों, वृक्षों और जीव जंतुओं का भार वहन करने में सक्षम नहीं हो पायेगी, इसलिए उसने महाकाय सांप को आदेश दिया कि वो अपनी पूंछ को मुंह में दबाकर धरती को बिखरने से बचाये, गौरतलब बात ये कि धरती, एकजुट और गोलाकार बनी रहे ! बहरहाल ईश्वर के आदेशानुसार, धरती रक्षण में सहायक अर्वाचीन सांप, अपने आप में बंध कर रह गया !

सांप द्वारा, दर्द से मुक्ति के लिये, करवट बदलने और उसकी, खुजलाहट जन्य दैहिक अस्थिरता की प्रतीकात्मकता से, धरती पर आने वाले भूकंपों की कल्पना मजेदार है ! ईश्वर जिसे, जीव जंतुओं, मनुष्यों, परिंदों, वृक्षों के जीवन की चिंता थी, जो धरती को टिकाऊपन और निर्धारित लय युक्त जीवन देना चाहता था, जो धरती के सृजन, विन्यास और निर्मिति में प्रयुक्त अभियांत्रिकी के लिये पर्याप्त सचेत था, जिसे दिन, रात, और सांझ का ख्याल था, जो स्वर्ग को हर दिशा में विस्तारित और स्थिर देखना चाहता था, वो भला अपने परम सेवक, सभी निर्देशों का अनुपालन करने वाले अर्वाचीन सांप को भूखा मरने के लिये कैसे छोड़ देता ? अब ये ललमुंहे बंदरों पर निर्भर है कि, सांप सलामत रहे और...धरती भी !     

बुधवार, 14 सितंबर 2016

माई री मैं कासे कहूँ पीर अपने जिया की...!

क्वाज़ल्टज़िन,अग्नि, ताप और दिन का देवता तथा ज्वालामुखियों का भी स्वामी है, वो मृत्यु के उपरांत जीवन, प्रकाश और अन्धकार, दुर्भिक्ष, बाढ़ तथा सर्दियों में ऊष्मा का भी देवता है ! उसे सभी देवताओं का अभिभावक माना जाता है, जो कि धरती के बीचो-बीच मौजूद कछुवे के रूप में भी मौजूद है, इसलिए एज़्टेक आदिवासियों के अर्वाचीन इतिहास में ज्वालामुखी परम पवित्र केन्द्र तथा देवताओं के प्रतीक हैं और उनकी जनश्रुतियों में विशिष्ट रूप से उल्लिखित हैं ! यानि कि उनके  लिए ज्वालामुखी बेहद महत्वपूर्ण हैं ! एज़्टेक जनश्रुतियों के अनुसार मेक्सिको शहर के निकट स्थित दोनों ज्वालामुखी, कभी जीवंत मनुष्य थे, एक युवती और एक युवा, गहन प्रेम निबद्ध ! कालांतर में वे ज्वालामुखी पर्वत के रूप में परिवर्तित हो गये और अब प्रेमी युगल के प्रणय प्रतीक के रूप में चीन्हे जाते हैं !

कहते हैं कि पोपोकेटपेट्ल एक बहादुर योद्धा और इज़्तासिहुआट्ल बेहद खूबसूरत राजकुमारी थी ! उन दोनों को पोपो और इज़्ता के संक्षिप्त नाम से जाना जाता था, राजकुमारी इज़्ता के पिता एक शक्तिशाली शासक थे ! उनका मानना था कि महावीर पोपो अगर राजकुमारी इज़्ता से विवाह करना चाहे तो उसे निकटवर्ती शक्तिशाली आदिवासी, शत्रु कबीले को युद्ध में पराजित करना और विजेता के तौर पर घर लौटना होगा ! युवा पोपो, राजकुमारी इज़्ता के इश्क में शिद्दत से गिरफ्तार था और उससे हर हाल में विवाह करना चाहता था, अतः उसने इज़्ता के पिता की चुनौती को स्वीकार किया और युद्ध में शत्रु कबीले को पराजित कर अपनी विजय के प्रमाण स्वरुप पराजित सेना प्रधान का कटा हुआ शीश लेकर अपने देश वापस लौटा !

युद्ध काल में इज़्ता, पोपो की सकुशल वापसी के लिए लंबे समय तक प्रतीक्षारत बनी रही ! उसके हृदय में प्रेमी से विरह की पीड़ा का समंदर हिलोरे मारता रहा ! अनुश्रुति ये है कि पोपो के प्रणय प्रतिद्वंदी ने इज़्ता से कहा कि समर निपुण पोपो युद्ध में वीरगति को प्राप्त हो गया है ! इस दु:खद समाचार को सुनकर इज़्ता का संसार जैसे कि स्तब्ध हो गया, वो प्रेमी के बिना, जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकती थी ! गहन दुःख में बेसुध होकर वो, भूमि पर गिर पड़ी, उसे प्राप्त समाचार पर शंका करने का अवसर ही नहीं मिला! दरअसल वो सोच भी नहीं सकती थी, कोई व्यक्ति, उससे इतना कठोर, क्रूरतम, असत्य कह सकता है ! परिणामतः टूटे हुए हृदय के साथ उसका निधन हो गया !

जब विजेता पोपो अपनी बस्ती वापस लौटा तो वो सबसे पहले अपनी भावी वधु इज़्ता को देखना चाहता था ! उसे बताया गया कि इज़्ता अब इस दुनिया में नहीं है ! पोपो को इस मर्मान्तक समाचार पर विश्वास ही नहीं हुआ और वह कई दिनों तक गहन दुःख और अविश्वास की स्थिति में लीन रहा, फिर उसने निर्णय लिया कि सूर्य के ठीक नीचे वो अपनी प्रेमिका का महान मकबरा बनाएगा ! ...अपने प्रेम को अपनी बांहों में समेटे, पोपो पहाड़ की चोटी पर जा पहुंचा, जहाँ उसने प्रियतमा के ओंठों को अंतिम बार चूमा और धुंआं उगलती चोटी पर प्रेयसी के निर्जीव शरीर के पास घुटनों के बल गिर पड़ा ! उसने इज़्ता की ओर देखा...गुज़रे पलों को याद किया और मुद्दतों तक उसी तरह बैठा रहा, जब तक कि बर्फ ने उन दोनों के शरीरों को ढँक नहीं लिया ! इस तरह से प्रेमी द्वय, ज्वालामुखी पर्वत के आकार वाले मकबरे में तब्दील हो गये ! जनश्रुति कहती है कि जब, जब पोपो, इज़्ता को याद करता है, उसके हृदय की धड़कने बढ़ जाती हैं और ज्वालामुखी से लावा फूट पड़ता है ! इसके बरक्स दूसरा ज्वालामुखी निरंतर सुषुप्त बना रहता है !

ये आख्यान दु:खांत है ! प्रेमी अपनी प्रेमिका के लिए अपना सर्वस्व दांव पर लगाकर शत्रु कबीले के मुखिया को ना केवल युद्ध में पराजित करता है, बल्कि उसका कटा हुआ शीश लेकर, प्रेयसी के पिता को अपने शौर्य का अकाट्य प्रमाण भी देना चाहता है ! गौर तलब है कि प्रेम कहानियों में रकीब / प्रतिद्वंदी की उपस्थिति, अनैसर्गिक नहीं हुआ करती, सो पोपो के प्रणय प्रतिस्पर्धी की मौजूदगी भी इस कथा को सहज बनाती है, प्रतिस्पर्धी को इज़्ता और पोपो के संबंधों में बाधायें खड़ी करना है ताकि वो स्वयं इज़्ता का सामीप्य हासिल कर सके ! अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसने इज़्ता को पोपो की मृत्यु की भ्रामक सूचना दी, संभवतः उसे अनुमान ही नहीं था कि इज़्ता, पोपो के बिना जीवन ही त्याग देगी,  ज़ाहिर है कि रकीब नौजवान का दांव उल्टा पड़ा !  वो अपनी संभावित प्रेयसी इज़्ता की असामयिक मृत्यु का कारण बना !

सामान्यतः आदिवासी समुदाय प्रकृति के नैकट्य से अपनी कथायें गढ़ता है ! इसी अनुक्रम में विलक्षण कहन ये है कि दिवंगत प्रेमिका निष्क्रिय ज्वालामुखी जैसी है...और दिवंगत प्रेयसी को अपनी बांहों में उठाये फिरता योद्धा पोपो, अपनी पीर, अपने दुःख, सक्रिय ज्वालामुखी की शक्ल में, लावे की तरह से उत्सर्जित करता रहता है ! उसकी पीड़ा सतत है , शास्वत है, अमर है ! आख्यान में पीड़ा के उबलते लावे जैसा होने का कथन, अद्भुत है ! समय की सुदीर्घ अवधि में, हिम शीतित पर्वत शिखर और पर्वत के अंतस से रह रह कर फूटता लावा, जेता प्रेमी की चिरंतन, निरंतर, स्थायी पराजय का उदघोष करता रहता है ! सक्रिय तथा निष्क्रिय ज्वालामुखियों से, प्रेमी और प्रेमिका की सादृश्यता का बयान, प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में, आदिम समुदाय के गहन अध्ययन और अवलोकन का परिणाम है !

कथा में प्रेम की जय के लिए शौर्य प्रदर्शन अथवा प्रेमिका से सामीप्य के लिए ईर्ष्या का प्रदर्शन, कोई नवीन घटनाक्रम नहीं है किन्तु पर्वत से निकलता धुंआं, अवसाद ग्रस्त प्रेमी के भ्रम और अनिश्चितता का प्रतीक है ! कथा में पर्वत के रूप में मकबरे की परिकल्पना नायाब है ! इस आख्यान के प्रेमी ने प्रेम खोया ! उसके दुःख अनन्त हो गये और उसकी यश कीर्ति भी ! जहाँ तक प्रणय प्रतिद्वंदी का प्रश्न है ! उसका हासिल ? प्रेमिका की असामयिक मृत्य का कलंक और सामाजिक अप्रतिष्ठा !

बुधवार, 13 जून 2012

दुआओं का अपनी असर ढूंढते हैं...!

स्टडी रूम जाने के लिए सीढ़ियां चढ़ते हुए कुछ ऐसा लगा कि सांसे तेज हो रही है ! उधर घर के बाहर वाले प्लाट पे उभर आये नये मकान की छत की ढ़लाई शिद्दत से ज़ारी है जोकि देर रात तक मुकम्मल भी हो जायेगी ! सुबह से 60-70 आदिवासी लडकियां और कुछ नौजवान रेत, सीमेंट और गिट्टियों के मिश्रण को घर की शक्ल में तब्दील कर रहे हैं!अनथक, लगातार, ऐन वैसे ही जैसे कि सालों पहले से करते आये हैं ! बदरंग खस्ताहाल कपड़े, दुबली पतली काया और हाड़ तोड़ मेहनत ! जल जंगल और जमीन के असली वारिस आज देर से घर, लौटेंगे सौ / पचास के नोटों की चिल्लर लेकर, अपनी नींद भरी आंखों और दिल में अगली सुबह फिर से खटने के लिए वापस लौटने की जिजीविषा लिए हुए ! इधर अपनी सांसे फूल रही हैं  सीढ़ियां  चढ़ते हुए !

तब शायद 1984 के साल की सर्दियों के आख़िरी दिन रहे होंगे, पड़ोसी मित्र आदिवासी कल्याण विभाग में सहायक नियोजन अधिकारी थे ! उन्होंने कहा अगर एक दिन का समय निकाल सकें तो मेरे साथ चलें ! हम इन्द्रावती नदी घाटी का सर्वे करेंगे जहां बांध बनने से गांव / देव स्थान और बेशकीमती जंगल डूबने की संभावना है ! हमने कहा ठीक है, कब चलना है ? उन्होंने कहा कल शाम को, रात वहीं गुजारेंगे परसों दिन भर पैदल मार्च और शाम तक घर वापसी हो जायेगी ! हमने कहा, हम परसों की छुट्टी ले लेंगे, लेकिन कल शाम आकाशवाणी में चिंतन रिकार्ड करने के बाद ही चल सकेंगे आपके साथ ! उन्होंने कहा, हम आपको वहीं से साथ ले लेंगे ! तयशुदा प्रोग्राम के मुताबिक हमने शाम की रिकार्डिंग से पहले कैनवास शूज पहने और लूज कपड़े धारण किये, ताकि पैदल मार्च में तकलीफ ना हो ! ठीक 3.30 पर मित्र की गाड़ी आकाशवाणी के गेट पर थी और हम लोग गंतव्य की ओर प्रस्थान कर चुके थे ! ड्राइवर के अलावा, गाड़ी में एक फोटोग्राफर, हम और हमारे मित्र ! हमने पूछा, तैयारी पूरी है ? उन्होंने कहा हां ! 

जगदलपुर से बारसुर तक पहुंचने में शाम गहरा गई थी, गाड़ी का ड्राइवर हमें नदी के किनारे एक गांव* के पास छोड़ कर वापस हो लिया ! चार लकड़ियों के सहारे खड़ी पैरे की छत वाली एक झोपड़ी ! जिसमें कोई दीवाल नहीं थी ! लगभग 50-60 फीट की दूरी पर बहती हुई नदी और उसपर सर्दियों का आख़िरी महीना ! दोस्त से पूछा कम्बल / चादर वगैरह लाये हैं ? उसने कहा नहीं ! गाड़ी वापस जा चुकी थी और पलटकर भागने की कोई गुंजायश भी शेष नहीं रह गई थी ! अठपहरिया** आते आते काफी देर हो गई, उसने तीन खाटों और उनके बीच एक अलाव की व्यवस्था कर दी थी जिसके सहारे सर्द रात काटनी थी ! ओढ़ने बिछाने का कोई सामान हमारे अधिकारी मित्र लेकर नहीं आये थे, इसलिए खाटों पर भी पैरा डलवा लिया गया ! रात चांदनी थी इसलिए मित्र से ये पूछने की हिमाकत नहीं की, कि टार्च लाये हो कि नहीं ? अठपहरिया ने रात के भोजन की व्यवस्था कर दी थी, पत्तों की प्लेट और पत्तों की कटोरियां, उबला हुआ मोटा चावल और उबली हुई साबुत मूंग के साथ हरी मिर्च और थोड़ा सा नमक ! पीने के लिए नदी का पानी था ही ! 

पैरे में दुबके हुए जैसे तैसे रात गुज़ारने के बाद सुबह 5 बजे नदी के ठंडे पानी के साथ निवृत्ति ने होश फाख्ता कर दिये, हिम्मत करके फ्रेश हुए...बहरहाल नींद हवा हो गई ! सुबह 5.30 के आसपास हम लोग पैदल मार्च के लिए तैयार थे, अगले गांव तक का रास्ता अठपहरिया को दिखाना था ! पता चला कि उसके बाद हर गांव से एक आदमी हमें अगले गांव तक खो करने के लिए तैयार किया गया था ! सूरज निकलते निकलते हमें पता चल चुका था कि हमारा मित्र और फोटोग्राफर बंधु ऊंची एड़ी के जूते पहने हुए थे और उन्हें पगडंडियों में चलने में भारी दिक्कत होने वाली थी !...खैर मित्र ने सरकारी निर्देशों के अनुसार सारी लोकेशंस के फोटोग्राफ्स लेते चलने की बात की, तो हम और भी ज्यादा सतर्क हो गये ! सुबह के 9 बजते बजते हमें यह जानकारी भी हो गई कि हमारे अधिकारी मित्र का थैला बिल्कुल खाली है ! कोई फल / सूखे नाश्ते की व्यवस्था करके यात्रा पर चलने की उन्हें सूझी ही ना थी ! उन्होंने हमें आकाशवाणी से उठाया था, हमने पूछा भी था कि तैयारी है ? जिस पर उन्होंने कहा था, कि हां ! अब ईश्वर जाने कौन सी तैयारी की थी उन्होंने !

फोटोग्राफर बंधु और अधिकारी मित्र जल्दी ही समझ गये के उनके जूते उनकी इज्जत उतार लेंगे ! यात्रा के बीच में किसी गांव में रुकने की कोई गुंजायश ना थी क्योंकि हमें तकरीबन 30 किलोमीटर दूर तक नदी के किनारे चलते रहने के बाद घाटी से ऊपर जंगल के बाहर पहुंचना था ! यात्रा के आख़िरी 5 किलोमीटर में हमारे पास कोई गाइड / ग्रामीण नहीं रहने वाला था इसलिए शाम ढ़लने से पहले 30 किलोमीटर पैदल चल चुकना अंतिम और एकमात्र विकल्प था ! दोपहर होते होते भूख और प्यास से बुरा हाल था ! खाने को कुछ था नहीं पर पीने के लिए नदी में पानी ही पानी, जितना चाहो पियो ! पगडंडियों पर अपने दुखते पैरों और तकलीफ देते हुए जूतों के बावजूद फोटोग्राफर बंधु अपने काम में कोताही नहीं कर रहे थे ! बांध बनने से डूब में आने वाले गांव, देव स्थान, सागौन के बेशकीमती जंगल, कैमरे में रिकार्डिंग, बराबर चालू थी पर हमारे खुद के चलने की गति, घोषित लक्ष्य से बहुत कम थी !

हमारा ख्याल था कि हमें कुल दूरी तय करने में 6 घंटे लगना चाहिये थे और फोटोग्राफी वगैरह में अगर 5 घंटे और भी लग जाते, तो भी हम 4.30 बजे शाम तक गंतव्य तक पहुंच जाते ! इस हिसाब से दिन डूबने तक हमारे पास कम से कम 1.30 घंटे का मर्जिन बचता ही था ! दिन तमाम भूख से बिलबिलाते हुए शाम तकरीबन 5 बजे हम बिन्ता गांव*** पहुंचे ! यहीं से हमें घाट के ऊपर चढ़ना था ! बिन्ता में अपने छात्रों को देखकर हम हैरान थे ! वे हमें रोकना चाहते थे ! हमने कहा फिर कभी, अभी घाटी के ऊपर ड्राइवर चिंता कर रहा होगा ! बच्चों के घर में 15-20 मिनट में पोहे और पानी का तात्कालिक घरेलू सत्कार स्वीकार कर हम घाट चढ़ने के लिए उतावले हो चुके थे ! घाट की खड़ी चढ़ाई मित्र और फोटोग्राफर बंधु पर इतनी भारी पड़ी कि वे ऊपर जाकर जमीन पर गिर पड़े और कहने लगे बस, अब यहां से आगे नहीं जा सकते ! गाड़ी की लोकेशन लगभग एक किलोमीटर दूर की थी, हौसला बढ़ाने पर वे गिरते पड़ते आगे बढ़े ! हम अपने तीस किलोमीटर का कोटा पूरा कर चुके थे पर गाड़ी का दूर दूर तक नामोनिशान नहीं था, तसल्ली ये कि जंगल का टुकड़ा पीछे छूट गया था ! अगले 5 किलोमीटर मुश्किल से गुज़रे ! तभी गाड़ी आते दिखाई दी ! देखते ही देखते वे दोनों गाड़ी में पसर चुके थे और हम वापस जगदलपुर की ओर...रात 8 बजे गर्म पानी से नहा चुकने के बाद बाकी के दोस्तों के सामने अधिकारी मित्र की तारीफ़ के पुल बांधते हुए हमने घोषित कर दिया था कि अब किसी भी अधिकारी के साथ फील्ड वर्क ? कभी नहीं ? 

रश्मि जी की फोन काल, हमें  अतीत से वापस वर्तमान में ले आई है ! सामने वाले घर की छत की ढ़लाई अभी भी पूरी नहीं हुई है, जल,जमीन, जंगल के असली वारिस, जो अब मजदूर हैं, ग्यारह बजे से पहले घर वापस नहीं लौट पायेंगे ! वे सन 1984 में भी मजदूर थे, उससे पहले भी और आज भी हैं, उनकी विरासत पे फैसले लेने का हक़, पहले दिल्ली फिर भोपाल को था और अब रायपुर के पास है... हम जहां रहते हैं, वो धरती रत्नगर्भा है पर उसी धरती की इंसानी बसाहटें निराश्रित...निर्धन, बेसहारा जैसी ! बेहतर मुस्तकबिल और सच्चे मेहरबानों की उम्मीद में...पीढ़ी दर पीढ़ी, देह दर देह खटती हुई...एक मुकम्मिल आबादी के लिए ...दो बोल सूझते हैं ...

किसी मेहरबां की नज़र ढूंढते हैं !
दुआओं का अपनी असर ढूंढते हैं !!

*नक़्शे में 2 नम्बर स्थान देखें !
**अठपहरिया गांव के महमानों की आठों प्रहर सेवा करने वाला व्यक्ति है ,उसके जीवन यापन की व्यवस्था गांव के लोग मिलकर करते हैं ! 
***नक़्शे में 3 नम्बर स्थान देखें यहां से घाटी चढ़कर पैदल चले और फिर 4 नम्बर स्थान से गाड़ी लेकर 1 नम्बर चित्रकूट होते हुए हम जगदलपुर वापस लौटे !
नक़्शे को तैयार करने के लिए छत्तीसगढ़ के नामचीन ब्लागर संजीव तिवारी जी का हार्दिक धन्यवाद !
गीत की धुन जेहन में थी पर उसे बोल दिये रश्मि रविजा साहिबा और जी.जी.शेख साहब ने , उन दोनों के लिए कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं  !
तीरों से सहेजा गया हिस्सा पैदल मार्च का है , जबकि शेष यात्रा गाड़ी से की गई !

रविवार, 28 जून 2009

मैं क्यों सोच रहा हूं उनके बारे में ...??? ... हुश्त !

मैं घर लौट रहा हूं ! इधर मानसून रूठा है सो चिलचिलाती धूप में सड़क पर तारकोल बिछाया जा रहा है, गरमा गरम पिघलता हुआ, स्याह झुलसा देने वाला तरल, गांव की लड़कियां, लड़कों के साथ मजदूरी कमाने की कोशिश में हैं ! हाड़ तोड़ मेहनत ! मैं सोच रहा हूं, देर शाम को जब हिसाब होगा तब लड़कों के हाथ 70/= और लड़कियों के हाथ 60/= रुपये रोजाना की दर से दी गई करेंसी होगी ! क्लांत शरीर मगर चेहरों पर मुस्कान लिए वो लौट रहे होंगे गांव की ओर झुंड बना कर गाते हुए, मन में अगली सुबह फ़िर से खटने के लिए लौटने का इरादा लिए हुए ! शायद यही जीवन है ! मेहनत , छुट्टी , गायन , उल्लास , थकान , थोड़ा आराम और फ़िर से मेहनत !

कुछ ही लम्हों के बाद, मैं अपने घर के द्वार पर हूं और सुनता हूं, थोड़ा शोर उठ रहा है ड्राइंग रूम से, देखा बच्चे, हंगामा टी.वी.चैनल में 'डोरेमोन' देख रहे हैं ! सामान्यतः बच्चों के साथ बच्चा होने का कोई भी मौका मुझे मिले तो छोड़ता ही नहीं हूं ! किसी दोपहर में अगर बच्चों की छुट्टी हो तो समझो बीबी और उनकी सहयोगी कामवाली, लाख सिर धुनते रह जायें, मगर एकता कपूर घर से बाहर ही इन्तजार करती है ! चिरौरी करो या धमकी दो सब व्यर्थ ! घर में बच्चे हों, तो हुकूमत भी उनकी ही चलती है ! पालकों की वत्सलता से अनुमोदित इस हुकूमत में प्रजा होने का मजा ही अद्भुत है ! बच्चों को उम्मीद है कि मैं उनके पास बैठ कर नोविता और जियान की हरकतों के मजे लूंगा पर थोडी देर बाद, मुझे आफिस भी जाना है, मैं कहता हूं बेटू टी.वी.का वोल्यूम कम करो, बीबी कहती है बच्चों से कहो चैनल बदलें, कामवाली बाई भी कहती है भैया, बहुत अच्छा सीरियल आने वाला है, इन्हें समझा दो ना ! मैं हँसता हूं , क्योंकि इस सल्तनत में प्रजा तो मैं भी हूं ना !

सामने टी.वी.स्क्रीन पर,डर कर भागता हुआ नोविता, उसके ठीक पीछे जियान और इस सबके फ़ौरन बाद केवल 35/=रुपये में...पित्ज्जा ! अब इन सब के पीछे मैं हूं और सोच रहा हूं, उन लड़कियों और लड़कों के बारे में एक बार फ़िर से ! दिन भर तन गला कर 60/70 रुपये कमाने वाले गांव के लोग...?...कितना सस्ता है ना पित्ज्जा..?... मेरा आफिस इंडिया में है, पित्जा वहीं बिकता है और वो सड़क...वो लड़के लड़कियां...? वो तो इंडिया में नहीं रहते हैं !... क्या बकवास है, मैं क्यों सोच रहा हूं उनके बारे में...??? ... हुश्त !

शनिवार, 7 मार्च 2009

स्याह चेहरे...उजले चेहरे !

परिद्रश्य १ :
पर्स रिक्शे या बस स्टेंड में छूटने के कनफ़्यूजन के बीच श्रीमती और श्री शैलेन्द्र कुमार जी के उजले चेहरे धूसर धूसर दिखाई दे रहे हैं ! पर्स में कीमती हार की मौजूदगी उनके दुःख और चिंता का मुख्य कारण हैं !...... लेकिन कुमार साहब की किस्मत बुलंद निकली और रिक्शे वाला उनका पर्स वापस लौटाने पहुँच गया हैं ! उसे भी चिंता थी कि पर्स में साहब का कीमती सामान हो सकता हैं ! साहब से उसने दस रूपये का इनाम भी नहीं लिया ! अमानत लौटा कर वह अपनी जिम्मेदारी से मुक्त और बेफिक्र हो गया है !
परिद्रश्य २ :
वो रिक्शे को बमुश्किल चला पा रहा है या शायद ? रिक्शा उसपर दया करके खुदबखुद सरक रहा है ! अब दोपहर काफी गर्म होने लगी हैं इसलिए उसके शरीर से पसीने की धार फूट पड़ी है ! फटे कपडों से झांकती निर्धनता उसे दूसरे इंसानों से अलग करती हैं तभी तो सूर्य देवता के कोप के सामने भी वह रोजी रोटी कमाने की जुगत में डटा हुआ हैं ! मेहनतकश लखमू के स्याह चेहरे की हड्डियां और गर्दन पर फूली हुई नसें उसकी बढती उम्र की गवाही दे रही हैं ! उधर रिक्शे के छायादार हिस्से में बैठे हुए जोड़े की सेहत काफी अच्छी हैं जिसकी वज़ह से रिक्शे वाले की मुश्किलें दोगुनी हो गई हैं ! मुसाफ़िर जोड़ा हो रही देरी के लिए रिक्शे वाले से बहुत नाराज़ हैं और उनका ख्याल हैं कि इस चटखती धूप में उनकी उजली काया स्याह हो सकती है ! बहरहाल मंजिल पर उतर कर उन्होंने , तयशुदा पारिश्रमिक में कटौती करके रिक्शे वाले को उसकी सुस्त रफ्तारी की सज़ा दे दी है !