बस कुछ महीने पहले की ही बात है तब अपने सरकारी आवास की सड़क पर खुलती खिडकी से सटे दीवान पर अधलेटे होकर न्यूज पेपर / मैग्जीन / किताबें पढते हुए कभी कभार बाहर टहलते हुए जोड़ों पर नज़र दौड़ा लिया करते , पुरानी सी कालोनी के दोनों तरफ गर्ल्स हास्टल बन जाने के बाद , ऍन चौराहे पर बसा हमारा मकान सैंडविच सा नज़र आता ! सुबह से देर रात तक तेज दौड़ती मोटर बाइक्स और कारों में भागमभाग करते युवा पता नहीं इतनी रफ़्तार से गुजरते हुए, चंद सेकंड्स में हास्टलस के अंदर क्या देख पाते होंगे ? मुमकिन हैं उनके लिए अपनी हाजिरी लगाने के अलावा इस भागदौड का और कोई मकसद भी ना हुआ करता हो ! तब दोपहर और शाम का वक़्त अमूमन पैदल चाल जोड़ों की घुमक्कड़ी के लिये सबसे मुनासिब हुआ करता ! यहां कई अफ़साने बनते और बिगड़ते देखे ! अगर गलती से घर से बाहर निकल जाऊं तो एक दो जोड़े कजिन से मिलने आये हैं, जैसी भदेस बहाने बाज़ी में मुब्तिला हो जाते ! प्रेमियों से कजिन हो जाने वाली बात खटकती जरूर पर इससे अपना क्या लेना देना था ! ज़ाहिर बात ये कि अपना इरादा कुदरत की सबसे हसीन हरकतों पर बंदिश या खलल का कभी रहा भी नहीं , सो देखते रहे लुत्फ़ अन्दोज होते रहे !
आगे अहवाल ये कि रोमांस कर रहे जोड़ों ने सोचने...समझने के नये ढंग...नये मौके फराहम किये ! खुल्लमखुल्ला घूम रहे आशिकों का अंदाज़ कुछ ऐसा होता कि जैसे आजू बाजू के वाशिंदों की आंखों में खुदा ने पट्टी बांध दी हो ! युवतियां अमूमन हौले हौले कोई बात कहतीं, गोया शब्द , उनके लबों से फुसफुसाहट की बंदिशों...कायदों से बंधे हुए हों, हालांकि युवकों तक पहुंचने पर यही बात कलफ की तासीर रखती , ऐसा लगता कि जैसे उनके जिस्म अकड़ से गये हों ! युवतियों के बर-अक्स युवक लफ़्ज़ों को तेज तेज ध्वनियों में लपेट कर हवा में उछालते ! कभी मुस्कराहट / सलज्जता / कभी आंसू / नाराजगी,कितनी ही भावनायें, हवा में तिरतीं और आशिकों के जिस्मों में कहीं गहरे पैठ जाया करतीं ! ये कहानियां हर दिन नये रंग नये तेवर लेकर आतीं , कभी मौन , कभी देह भाषा और कभी ध्वनियों पर आरूढ़ शब्द !
अब मैं उस कालोनी में नहीं रहता पर कहानियां अब भी लिखी जाती हैं उस सड़क पर ! जीवन में इन कथाओं का अपना महत्त्व है ! ये जिस्म और भावनाओं के विशेष विशेष समय की अभिव्यक्तियां हैं ! दीगर समय में जरुर ये अभिव्यक्तियां किसी और शक्ल में होती होंगी ! खेलते वक़्त , बुढ़ापे में या अपने बच्चों को नैतिकता के पाठ पढाते हुए, शायद अपनी बहन के बारे में सोचते हुए या फिर अपनी बेटी के ब्याह की चिंता करते हुए , वर्ना बच्चों के अपने पैरों में खड़े हो पाने जैसी चिंता भी अलग तरह की अभिव्यक्ति हुआ करती होगी ! मजाल है जो ये सारी अभिव्यक्तियां शब्दहीन हो पाती हों ! फिलहाल मैं सोचता हूं कि जीवन में अभिव्यक्त होने के लिए शब्दों का होना किस कदर जरुरी है, फिर चाहे वे मौन हों या मुखर ! इन दिनों एक अजीब सा ख्याल कौंध रहा है, दिल-ओ- दिमाग पर...माशूक के लबों पर फुसफुसाते हुए शब्द, हवा में रक्स करते हुए दहाड़ते हैं...पूरी शिद्दत से, तेजतर ध्वनियों के साथ , अगर वे इसी शक्ल में मेरे अंतर्मन में इकठ्ठा होने लगते तो क्या मैं एक नार्मल इंसान रह पाता ? और अगर मेरे अंतर्मन में अवाक हो चुके शब्द, हवा से लेकर माशूक तक अवाक ही बने रहते तो क्या होता ? पता नहीं कैसे इन शब्दों को मौन से फुसफुसाहट, फुसफुसाहट से ध्वनि और उसके बाद फिर से मौन में तब्दील हो जाने का हुनर आता है ! लेकिन ये तो तय है कि इनके बिना मैं कुछ भी नहीं हूं ...