बुधवार, 7 जुलाई 2010

लबों पर फुसफुसाते...हवा में दहाड़ते और अंतर्मन में अवाक हो जाते शब्द !

बस कुछ महीने पहले की ही बात है तब अपने सरकारी आवास की सड़क पर खुलती खिडकी से सटे दीवान पर अधलेटे होकर न्यूज पेपर / मैग्जीन / किताबें पढते हुए कभी कभार बाहर टहलते हुए जोड़ों पर नज़र दौड़ा लिया करते , पुरानी सी कालोनी के दोनों तरफ गर्ल्स हास्टल  बन जाने के बाद , ऍन चौराहे पर बसा हमारा मकान सैंडविच सा नज़र आता ! सुबह से देर रात तक तेज दौड़ती मोटर बाइक्स और कारों में भागमभाग करते युवा पता नहीं इतनी रफ़्तार से गुजरते हुए,  चंद सेकंड्स में हास्टलस के अंदर क्या देख पाते होंगे ?  मुमकिन हैं उनके लिए अपनी हाजिरी लगाने के अलावा इस भागदौड का और कोई मकसद भी ना हुआ करता हो ! तब दोपहर और शाम का वक़्त अमूमन पैदल चाल जोड़ों की घुमक्कड़ी के लिये सबसे मुनासिब हुआ करता ! यहां  कई अफ़साने बनते और बिगड़ते देखे ! अगर गलती से घर से बाहर निकल जाऊं तो एक दो जोड़े कजिन से मिलने आये हैं, जैसी भदेस बहाने बाज़ी में मुब्तिला हो जाते ! प्रेमियों से कजिन हो जाने वाली बात खटकती जरूर पर इससे अपना क्या लेना देना था ! ज़ाहिर बात ये कि अपना इरादा कुदरत की सबसे हसीन हरकतों पर बंदिश या खलल का कभी रहा भी नहीं , सो देखते रहे लुत्फ़ अन्दोज होते रहे !    

आगे अहवाल ये कि रोमांस कर रहे जोड़ों ने सोचने...समझने के नये ढंग...नये मौके फराहम किये ! खुल्लमखुल्ला घूम रहे आशिकों का अंदाज़ कुछ ऐसा होता कि जैसे आजू बाजू के वाशिंदों की आंखों में खुदा ने पट्टी बांध दी हो ! युवतियां अमूमन हौले हौले कोई बात कहतीं, गोया शब्द , उनके लबों से फुसफुसाहट की बंदिशों...कायदों से बंधे हुए हों, हालांकि युवकों तक पहुंचने पर यही बात कलफ की तासीर रखती , ऐसा लगता कि जैसे  उनके जिस्म अकड़ से गये हों ! युवतियों के बर-अक्स युवक लफ़्ज़ों को तेज तेज ध्वनियों में लपेट कर हवा में उछालते ! कभी मुस्कराहट / सलज्जता / कभी आंसू / नाराजगी,कितनी ही भावनायें, हवा में तिरतीं और आशिकों के जिस्मों में कहीं गहरे पैठ जाया करतीं ! ये कहानियां हर दिन नये रंग नये तेवर लेकर आतीं , कभी मौन , कभी देह भाषा और कभी ध्वनियों पर आरूढ़ शब्द ! 

अब मैं उस कालोनी में नहीं रहता पर कहानियां अब भी लिखी जाती हैं उस सड़क पर !  जीवन में इन कथाओं का अपना महत्त्व है ! ये जिस्म और भावनाओं के विशेष विशेष समय की अभिव्यक्तियां हैं ! दीगर समय में जरुर ये अभिव्यक्तियां किसी और शक्ल में होती होंगी !  खेलते वक़्त , बुढ़ापे में या अपने बच्चों को नैतिकता के पाठ पढाते हुए, शायद अपनी बहन के बारे में सोचते हुए या फिर अपनी बेटी के ब्याह की चिंता करते हुए , वर्ना बच्चों के अपने पैरों में खड़े हो पाने जैसी चिंता भी अलग तरह की अभिव्यक्ति हुआ करती होगी !  मजाल है जो ये सारी अभिव्यक्तियां शब्दहीन हो पाती हों ! फिलहाल मैं सोचता हूं कि जीवन में अभिव्यक्त होने के लिए शब्दों का होना किस कदर जरुरी है, फिर चाहे वे मौन हों या मुखर !  इन दिनों एक अजीब सा ख्याल कौंध रहा है, दिल-ओ- दिमाग पर...माशूक के लबों पर फुसफुसाते हुए शब्द, हवा में रक्स करते हुए दहाड़ते हैं...पूरी शिद्दत से, तेजतर ध्वनियों के साथ , अगर वे इसी शक्ल में मेरे अंतर्मन में इकठ्ठा होने लगते तो क्या मैं एक नार्मल इंसान रह पाता ? और अगर मेरे अंतर्मन में अवाक हो चुके शब्द, हवा से लेकर माशूक तक अवाक  ही बने रहते तो क्या होता ? पता नहीं कैसे इन शब्दों को मौन से फुसफुसाहट, फुसफुसाहट से ध्वनि और उसके बाद फिर से मौन में तब्दील हो जाने का हुनर आता है ! लेकिन ये तो तय है कि इनके बिना मैं कुछ भी नहीं हूं ...

22 टिप्‍पणियां:

  1. एक बार मैंने, पता नहीं कहां पढ़ा था - A friend is someone, whom you could be silent with... शायद शब्द यही मित्र हैं जिनके लिए आवश्यक नहीं कि उन्हें उच्चारित भी किया ही जाए...

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  2. Khamoshi mebhi shabd hamesha hamare saath rahte hain...apne manse ham ek samvaad sthapit karte hain...bahut achha laga aapka yah aalekh...ek tarah se ye bhi aapka apne khudse samvaad hai..

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  3. 'Bikhare Sitare'aapke comment ka jawab: Poojaki mangni kaa hashr agali kadi me aayega...yah kadi bahut lambi ho gayi...wajah rahi,kayi ghatnayon eksaath ghatna.
    Achha lagta hai,jab aap istarah samras hoke padhte hain. Lekhan saarthak lagta hai.

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  4. महराज ! इस शृंखला में कुछ लिखिए न !

    http://girijeshrao.blogspot.com/2009/12/blog-post.html
    http://girijeshrao.blogspot.com/2009/12/blog-post_21.html
    http://girijeshrao.blogspot.com/2010/01/blog-post.html
    http://girijeshrao.blogspot.com/2010/01/blog-post_08.html

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  5. सच है यह विशेष समय की अभिव्‍यक्ति है. मौन से फुसफुसाहट , फुसफुसाहट से ध्वनि और उसके बाद फिर से मौन यह प्रेम में ही संभव है.

    विचार प्रवाह को कविता के रूप में प्रस्‍तुत किया है भईया आपने, धन्‍यवाद.

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  6. शब्द प्रवाह मौन से मुखर होने और फिर मौन होने तक ...पूरी कायनात इसं शब्द प्रवाह के बीच ही तो सिमटी है ...

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  7. @ गिरिजेश जी
    मैंने पहले भी कहा है कि आप अपने इर्द गिर्द जो भी है / जो भी घट रहा है , उसके प्रति गिने चुने सचेत बन्दों में से एक हैं ! श्रृंखला का चौथा पेज खुला नहीं केवल तीन बांच सका ! अफ़सोस मैं वहां देर से पहुँचाया गया इस शानदार चिंतन श्रंखला को तात्कालिक आभार मिलना ही चाहिये था ! कई बार शब्दों...अभिव्यक्तियों और इंसानीं सभ्यताओं की विकास यात्रा को गलबहियां डाल घूमते देखना अच्छा लगता है ! इन आलेखों में दार्शनिक गिरिजेश उभर उभर कर आह्लादित करते रहे पर मैं समय अंतराल के कारण, उनके शब्द टंकणकर्ता हाथों के बोसे ले पाने से महरूम रहा !

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  8. @ जनदुनिया , काजल भाई , क्षमा जी , समीर भाई ,भावना जी ,समीर लाल जी ,संजीव भाई ,वाणी जी ,आचार्य उदय जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए बहुत आभार !

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  9. शब्दों का अनोखा चित्र पेश किया है, अली साहब. मौन,फुसफुसाहट,ध्वनि...और फिर मौन तक के सफर की जो मंजर कशी की है, शब्दों के ब्रुश से ज़हन के केनवास पर एक आकृति सी बना गयी.

    --
    mansoorali hashmi

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  10. @ मंसूर अली साहब
    शुकिया !

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  11. These lines have evoked some nostalgia feelings in me....
    beutifully written....

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  12. वाह अली, बहुत खूब लिखा है। शब्द चर्चा में शब्द पर चर्चा हो रही है। यह शब्द ही तो जादू है, तब भी जब हम निःशब्द होते हैं।
    घुघूती बासूती

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  13. @ जय भाई
    सन्नाटे को थपकियां देना अच्छा लगता है :)

    @अरविन्द जी
    शुक्रिया !

    @ घुघूती बासूती ,
    कल आपसे चर्चा हुई थी :)

    @ज़ाकिर भाई
    तीन खूबसूरत /खूबसीरत अलफ़ाज़ पहले ही...चौथे आप खुद फिर और कितने ढूंढियेगा :)

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  14. Ali ji pahli bar aapko padhne ka mouka mila han esse pahle aapke bare me suna jaroor tha, jo suna tha use sach sabit hote aaj dekh bhi liya, sabdheen hun es post ko padhne ke bad, viswas kariye ek bar me hee bina ruke puri post prwah me padh dala, shabdo ka chyan lajwab raha, bahut hee lajwab likha hai aapne. Badhai

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  15. @प्रिय मिथिलेश जी
    स्नेह सहित कहना है कि अरविन्द जी से आपके विषय में अक्सर चर्चा हुई है ! इसलिये आप मुझे पूर्व परिचित मानिये ! आपको आलेख पसंद आया ये जानकर अच्छा लगा !
    और हां शायद आपको यह जानकर आश्चर्य हो कि मैं आपके ब्लॉग का नियमित पाठक हूं :)

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  16. इस पोस्ट से न जाने क्यूँ, कभी बहुत पहले पढी रशियन लेखक इवान तुर्गशेव की एक अनुवादित पुस्तक का स्मरण हो आया. जिसका शीर्षक था..."शिकारी के शब्द चित्र" :)

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  17. @ दिनेश भाई
    स्मृतियों की कुण्डी खटखटाने की मेरी इच्छा पूरी हुई :)

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