सोमवार, 5 जुलाई 2010

हम हाले दिल सुनायेंगे...सुनिये कि ना सुनिये...सौ बार मुस्करायेंगे... ?

सेवा में छत्तीसगढ़ कैडर चुनते ही ये तय हुआ कि रिटायर होने से पहले ही अपने लिये एक अदद मकान का जुगाड़ कर लिया जाये !  मुनासिब जमीन खोजी तो भाव सुनकर पसीने आ गये...महसूस हुआ कि यही बात अगर कुछ बरस पहले सोची होती तो मामला अपनी औकात की हदों में रहता !  यहां जमीनों की रजिस्ट्री के लिये प्रचलित सामान्य अनुबंध अवधि तीन माह थी !  भूमि स्वामी से उसे छै माह करवाया गया ताकि इस समय में अपने जीपीएफ अकाउंट से पैसे का बन्दोबस्त कर लिया जाये !  शासन स्तर पर अपने ही पैसे की निकासी में होने वाले विलम्ब होने की सम्भावना बतौर जो अतिरिक्त तीन माह जुटाये गये थे , बड़े काम आये !   काम समय पर हो पाने / ना हो पाने की धुक धुक के बीच सर्वशक्तिमान दयानिधान ईश्वर भी याद आता रहा !  अक्सर सोचते कि उसने तो जानवरों तक के लिये निशुल्क कंदराओं / गुफाओं / बिलों / खोलों की व्यवस्था की है तो क्या हमें, हमारे पुरुषार्थ के दम पर एक झोपडा भी ना बनाने देगा ? ... पता नहीं क्यों ? अनादि अनंत ईश्वर को आलेख का हिस्सा बनाते वक़्त , जेहन में , ब्लागर.कॉम भी शिद्दत से, कौंध रहा है...पर है मामला उलट !  जहां ईश्वर फ़ोकट के स्पेस के लिये जानवरों का पक्षधर है , वहीं ब्लागर.कॉम केवल इंसानों को फेवर करता है , ये बात दीगर है कि कोई जानवर ,  इंसानों की खाल ओढ़ कर उसकी दरियादिली का फायदा उठा ले जाये !  क्या सच में , कंदराओं ...झोपडियों ...और सुसज्जित बंगलों के भौतिक अंतर, मूलतः आभासी नहीं हैं ?  जबकि सभी आश्रय स्थलों का मूल लक्ष्य एक है  !   खैर...कुल मिलकर मामला लबों पर अटका रहा जब तक कि रजिस्ट्री ना हो गई !  यूं तो हम छै मित्रों नें मिलकर प्लाट्स लेने की योजना बनाई थी और हमारी तरह वे भी कामयाब हुए बस थोड़े बहुत अंतराल के साथ हम सब का पडोसी होना सुनिश्चित हुआ हालांकि जमीनों की कीमत का पूरा झटका बर्दाश्त करने में अगले पांच साल और गुज़रे !

ज़मीन की खरीदी के बाद मसला मकान बनवाने का आया तो नक्शा पास करवाने से लेकर आवास ऋण लेने और बाद में ठेकेदार से समय पर काम निकलवा पाने तक की स्ट्रगल में मित्रों से ज्यादा ईश्वर ही काम आया !  लिहाज़ा ईश्वर का अनुग्रहीत बने रहना स्वाभाविक ही था किन्तु ...?  हुआ ये कि हमारे आवास प्लाट के उत्तर में हमारे एक भूतपूर्व शिष्य ने पहले ही मकान खड़ा कर लिया था और उन्होंने बड़ी प्रसन्नता व्यक्त की, कि अब उनके गुरुदेव भी मकान बनाने जा रहे हैं , कहना गलत नहीं है कि इससे थोड़ी सी ज्यादा प्रसन्नता हमें भी हुई !  लगभग अगले डेढ़ वर्ष तक हमें जमीनी यथार्थ का अहसास भी नहीं हुआ कि भविष्य के गर्भ में क्या है ?  निर्माणाधीन परिसर में आते जाते ये जरुर लगा कि शिष्य महोदय घर में कम ही रहते हैं और उनकी पत्नी को गुनगुनाने का शौक है !  उनकी दो पुत्रियां बेहद शालीन , अपने पिता के गुरु को निर्माणाधीन साईट पर ही चाय पहुंचा देतीं !  उनसे पूछता 'बलि' कहां है वे कहतीं पापा ऑफिस चले गये, मुझे लगता ससुरा ऑफिस जाने का ये कोई समय है भला ! सुबह दोपहर शाम कभी भी घर पर मौजूद नहीं जनाब !  ऊपर से खिलखिलाती बच्चियां , अंदर से सहमी सहमी सी नज़र आतीं !   उधर बरखुरदार की पत्नी का गुनगुनाना ज़ारी रहा !  

परिजनों ने सलाह दी कि कोई अच्छा सा मुहूर्त देखकर गृह प्रवेश किया जाये हमने कहा ठीक है !  एक माह...दो माह...गुजरते गये हमारी चुप्पी से बीबी बच्चे परेशान , इशारों से टटोलने की कोशिश करते...बीबी कहती सम्बन्धियों को बुलाना होगा...सम्बन्धी फोन करते कब आना होगा ?   हम बस इतना कहते बरसात थमने दो !  अक्टूबर महीने की शुरुआत होते ही सभी सम्बन्धियों को एक तारीख देकर आने का निमंत्रण दिया और कहा इस बाबत घर में फोन मत कीजियेगा वे समझ गये !  हाथ थोडा तंग था इसलिये गिने चुने मित्रों को भी रातो रात फोन किया कि कल दोपहर आ जाइये !  और जैसे ही उस रोज बीबी  से कहा कि आज दोपहर का मुहूर्त है चलो काम निपटा लिया जाये ,बीबी जी हत्थे से उखड गईं तैयारी कौन करेगा ?  रिश्तेदार कैसे आयेंगें ?  आज अचानक कैसे ? अपने ही घर का उदघाटन चोरी चोरी क्यों करें ? मैंने कहा बेगम अभी पैसों की दिक्कत है !  बाद में सबको पार्टी देते रहेंगे अभी तो बस चलो , नये घर में ईश्वर का नाम लें उसे धन्यवाद देकर आयें !  खैर चेहरे पर तल्खियां टिकाये बीबी और बच्चे मेरे साथ गंतव्य की ओर चल दिये...और वहां पहुंचकर कर...जो भी हुआ कैसे बताऊं ? बीबी का जन्म दिन उसे याद रहेगा हमेशा !  सारे सम्बन्धियों और मित्रों के बीच अपने शौहर की हरकत पर इतराती गर्वीली बीबी , ये घर उसका अपना है अब !   

सरकारी आवास को छोड़ कर जाने से पहले पैकिंग वगैरह में कुछ समय लगा पर  महीनें के आखिर में हम अपने नये घर में मौजूद थे और शिष्य के परिवार के बारे में ज्यादातर खुलासे यहां से शुरू हुए...शिष्य वधु अज्ञात कारणों से क्रिश्चियन हो चुकी थीं और दोनों बच्चियां भी मां के पक्ष में पिता के विरुद्ध खड़ी पाई गईं पर हैरानी की बात ये कि क्रिश्चियन मिशन के फादर / ब्रदर / सिस्टर ना तो इस घर में आते और ना ही इस घर के नव धर्मान्तरित चर्च जाते देखे गये !  शिष्य वधु गुनगुनाती तो क्या चिल्लाती ही हैं ...रब्बा...होशना...आशीष...धन्यवाद प्रभु...ईसा का लहू...स्वनिर्मित भजन गाते हुए बीच बीच में चीख कर ...हालेलूया कहना हमें भी अच्छा लगता है , किन्तु सुबह पांच बजे से रात के ग्यारह बजे तक लगातार किचन में जोकि हमारे आँगन से लगा हुआ है ! इन दिनों उनके भजनों के साथ एक नारा और जुड गया है 'हो रब्बा हाजी अली'...शायद हमारे पडोसी होने की वज़ह से ?  कभी कभार पति से झगडा धक्का मुक्की और गाली गलौज भी सुनने को मिलती है  !  मिलने जुलने वाले आते हैं और ये सब सुनकर प्रश्न वाचक चिन्ह से हमारे सामने खड़े रह जाते हैं !  मैं उन्हें और खुद को दिलासा देते हुए कहता हूं धार्मिक महिला हैं  , क्या बुरा करती हैं जो ईश्वर को जोर जोर से पुकारती हैं ! पर वे मेरे जबाब से निराश हो कर लौट जाते हैं वे सब उस महिला को पागल कहना चाहते हैं किन्तु मैं जानता हूं सच क्या है ?  पिछले दिनों वे अपने मायके गई हुईं थीं सन्नाटा हमें भी अच्छा नहीं लगा ! एक आदत सी पड़ गई है उन्हें तेज आवाज में गाते हुए सुनने और चिल्ला चोट की !  उनकी बच्चियां कहती हैं कि मम्मी समझती हैं कि प्रभु ईसा उनपर मेहरबान हैं इसलिए फादर / ब्रदर / सिस्टर और चर्च उनके सामने कुछ भी नहीं ...उन्हें लगता है कि उनकी शक्तियां देख कर लोग डर जाते हैं !  खैर वे जो भी करती हैं अपने घर में !  मित्रगण उन्हें कुछ भी कहें पर मुझे पता है कि उनकी इस हालत का जिम्मेदार मेरा शिष्य है पास के मोहल्ले में ही , उसकी एक और पत्नी ,  एक अलग घर है  /  कन्दरा है  /  खोल है  /  बिल है !  अब... अगर शिष्य वधु अपने ही  घर में कुंठायें विसर्जित करती  हैं  तो मुझे तकलीफ  कैसी  ?  



14 टिप्‍पणियां:

  1. किसी बेघर को एक अच्छा सा घर मिल गया मगर मुझ बेसहारा को तो वह भी मयस्सर नहीं --मतलब आप बहुतों से बेहतर हैं ...और अब असुविधाओं का रोना रोयेगें तो कहने वाले यही कहेगें न कि देखो बन्दा दिखावे के लिए कितना मादेस्त बन रहा है,सुविधाओं को असुविधाओं का नाम दे रहा है ताकि सर्वहारा यही समझें कि अब भी वह उन्ही का साथी है ...जबकि बच्चू मंद में बैठ दहाड़ रहे हैं -
    बहरहाल पञ्च लाईन यह है -
    "वहीं ब्लागर.कॉम केवल इंसानों को फेवर करता है , ये बात दीगर है कि कोई जानवर , इंसानों की खाल ओढ़ कर उसकी दरियादिली का फायदा उठा ले जाये !"
    ऐसा इंसान इन दिनों एक ब्लॉग पर अक्सर देखा जा रहा है !

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  2. Uff! Janti hun,ek adad ghar banana kya hota hai! Aapka to phirbhi jald bana...ham to barson atke rahe!

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  3. ओह !
    " निर्माणाधीन परिसर में आते जाते ये जरुर लगा कि शिष्य महोदय घर में कम ही रहते हैं.." समझ तो तभी जाना चाहिये था पर धराप्रवाह इतना अच्छा था ब्रेक अंत में ही आकर लगी...
    ख़ैर..अपने घर आने की बधाई, भले ही देर से ही सही :)

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  4. अपने परिवार के लिए एक अदद घर पाने आदमी कितना जुगाड़ तोड़ करता है, मेहनत करता है, स्‍वप्‍न संजोता है इसको अनुभव कर रहा हूं भईया. आपकी धुक धुक के साथ ही आपके छै मित्रों का पडोसी होना सुनिश्चित हुआ यह खुशी की बात है.

    ब्‍लॉगर डाट काम में ब्‍लागरों को और कंदराओं में जानवरों को मुफ्त और सुलभ स्‍पेस मिल जाते हैं पर अपने घर के लिए स्‍पेस तलाशने की बारी आती है तब पता चलता है कि वह स्‍पेस तो अपनी आय से उतनी ही दूर है जितनी आज से दस साल पहले दूर थी, ये अलग बात है कि दस साल पहले स्‍पेस की कीमत कम थी और अब हमारी आय अधिक है पर स्‍पेस नें भी अपनी कीमत बढ़ा दी है. ... इन चिंताओं से परे हमने मस्‍ती में हमने अपनी व्‍यथा यहां बयां की है.

    भाभी जी की जन्‍मदिन के दिन आपने नूतन गृह प्रवेश किया यह बड़ी खुशी की बात है, आखिर गृह, गृह लक्ष्‍मी से शोभित होता है. ... और आप भाभी श्री को इतराती गर्वीली कह रहे हैं ... ये ठीक नहीं है भईया, शुक्र है भाभी जी आपका ब्‍लॉग नहीं पढ़ती हैं :):):)

    आपका शिष्‍य, वधु और उर्वशी-रंभा-मेनका सब के लिए अलग घर/कन्दरा/खोल/बिल का इंतजाम कर लेते हैं यह महा पुरषार्थ की बात है लोग एक घर को बनाने में जिन्‍दगी निकाल देते हैं. मुझे आपके शिष्‍य वधु के प्रति सहानुभूति है.

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  5. कल शाम से ही नैट की स्थिति कुछ डावांडोल सी चल रही थी...अब जाकर हालात सुधरे हैं.
    सबसे पहले तो नए घर की बधाई कबूल फरमायें...आज के जमाने में सर ढाँपने को एक अदद छत मयस्सर हो जाना भी कोई कम सौभाग्य की बात नहीं...सो, आप इस मामलें में मुकद्दर के धनी सिद्ध हुए.
    बाकी पास पडोस का भी कुछ हद तक तो प्रभाव इन्सान पर पडता ही है, फिर वो बन्धु आपके तो पडोसी कम शिष्य भी हैं, सो यहाँ तो प्रभावित होने के चांसेज भी कुछ ज्यादा ही हैं. ध्यान रखिएगा :)

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  6. शिष्य वधु की कुंठा का कारण तो पता चला...उनके प्रति पूरी सहानुभूति है ...

    अपनी छत या मकान होने का सुख आत्मसंतुष्टि देता ही है ...और पत्नी को जन्मदिन पर ऐसा तोहफा मिला तो गर्वीली तो हुई ही ...

    रोचक संस्मरण ...!

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  7. सबसे पहले खेद व्यक्त करना चाहूंगा कि आप सभी टिप्पणीकारों को समय पर रिस्पोंस नहीं दे पाया क्योंकि नेट कनेक्शन में भारी दिक्कते हैं यहां पर ! कमबख्त पेज ही नहीं खुल पाए !

    @ अरविन्द जी
    खाल ओढने वालों की खाल खींच कर पनहीं बनवा लें :)

    @ रमेशकेटीए जी , रंजन जी ,जय भाई ,भावना जी , क्षमा जी
    शुक्रिया !

    @काजल भाई
    आपको आलेख /संस्मरण अच्छा लगा शुक्रिया !

    @संजीव तिवारी जी
    ऐसे देवर हों तो भ्राता श्री को सावधान रहना होगा :)

    @ पंडित डी.के.शर्मा वत्स जी
    आप जैसा ज्योतिषाचार्य मित्र जिसके साथ हो उसे ग्रहों / पड़ोसियों के प्रभाव से भय कैसा :)

    @ अनामिका जी ,वाणी जी ,आचार्य उदय जी
    प्रतिक्रिया के आपका आभारी हूं !

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  8. वाह, वह जन्मदिन तो पत्नी को बस यादगार रहेगा ही। शिष्य वधु ने दुख से निबटने का विचितचर तरीका ढूँढा है।
    घुघूती बासूती

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  9. यहां नेट की भारी समस्या है एक तो पेज नहीं खुल रहा था , उसके बाद आप सभी टिप्पणीकारों के लिए तीन बार प्रतिक्रिया स्वरुप टिप्पणियां प्रकाशित करने की कोशिश की जो कहां उड़ गईं पता नहीं !
    इसलिए फ़िलहाल आप सभी का ह्रदय से आभार !

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