मंगलवार, 22 मार्च 2011

डुबोया मुझको होने ने , ना होता मैं तो क्या होता ?


उधर देर रात लीबिया पर भारी बमबारी शुरू हो चुकी है  ! अपने ही हमवतनों  पर  कहर  गुज़ार रहे  कर्नल गद्दाफी की जान अब पश्चिम के निशाने पर है  !  मसला आज़ादी का है  याकि राजनीतिक  स्पेस  का  ख्याल  या फिर  ऊर्जा संसाधनों  पर  कब्ज़े  की नीयत ? गद्दाफी से मुक्ति चाहते लीबियाई नागरिक ? उसके समर्थन में खड़े हथियारबंद दस्ते ? कबीलों की आपसी रंजिशें ? अफ्रीकी अरब देशों के परम्परागत वैमनस्य ?  मानवाधिकार और स्वतंत्रता के पक्षधर होने के नाम पर अमेरिकी अगुवाई में यूरोपीय बिरादरी का विशेष सैन्य अभियान ?  अरब लीग के बैनर तले सुविधाभोगी शेखों और धनकुबेरों का जुंटा ?  सब सवाल दर सवाल हैं ,  कोई जबाब अगर है भी तो वो  है , इन सबके बीच लहुलुहान आम आदमी  !  आप दुनिया के किसी भी कोने में निगाह डाले कमोबेश यही नज़ारा आम है !   जिस आदमी की हैसियत एक अदना सी गोली के सामने कुछ भी नहीं उसे टाम हाक क्रूज मिजाइल से मौत  बा आसानी मयस्सर है !  मौत के मामले में इतनी दरियादिली ?  काश जिंदगियों के काम आती ! 

वहां जापान तरक्की की मिसालें गढता हुआ , अपने नागरिकों के राष्ट्रीय चरित्र और नागरिकता बोध से मालामाल होकर भी तबाही और बर्बादी का उदाहरण बन गया !  भला क्या ज़रूरत थी उसे भूकम्पीय धरती पर एटामिक रिएक्टर्स बनाने की  ?ज़िंदा बमों पर बैठ कर विकास की योजनायें बनाने की मिसाल बन गया है वो  !  सुनते हैं कि उसने अपने एटामिक रिएक्टर्स सात रेक्टर स्केल तक के भूकंप को बर्दाश्त करने लायक बनाये थे पर कुदरत के आगे उसकी गणना फेल हो गई !  पहले पहल अमेरिका ने उसका जीना हराम किया और अब उसने खुद अपनी जिंदगी नर्क कर ली  !  मुमकिन है कि जापानी लोग अपनी जिजीविषा के चलते एक बार फिर से सरपट दौड़ने लगें पर हुक्काम का क्या ? अपना पैर अपनी कुल्हाड़ी...आगे की विकास यात्रा में दोबारा कोई अदनी सी  चूक नहीं होगी इस बात की क्या गारंटी है ?

इधर हम भी एटामिक एनर्जी के सुपर पावर कहलाने की होड में सांसदों के सौदे करते हैं ! बाजार में खड़े , बिक जाने /  गिरवी हो जाने को तैयार जनप्रतिनिधि देश की तरक्की में दिल-ओ-जान से मुब्तिला हुक्काम , कब देश बेच चुकेंगे पता भी नहीं चलेगा ! गांधीवाद  के रास्ते , गांधीवादियों की सरकार में , अस्पताल से होकर गुज़रते हैं ,शर्मिला इरोम दस साल से भूख हड़ताल करके भी जीवित है  !  जनता फिर से वोट डालेगी और नोट अपना कमाल दिखायेंगे , संसद में अपनी आवाज़ ,धरती पर जीवन रहते तक , संभवतः अमेरिकन दूतावास की अनुज्ञा से बुलंद हुआ करेगी , सौ रुपये रोजी कमाने वाले जनगण महारैलियों के लिये सुलभ होते रहेंगे !  जम्मू काश्मीर , उत्तर पूर्व की सातों बहने और आदिवासियों के परम्परागत भूक्षेत्र बारुद से धुंधवाते रहेंगे ! कौन कहता है यहां खेतियों की जमीने पानी की कमी से सूख जायेंगी ?  अपना लहू तो है ही धरती को तर रखने के लिये !   

यहां गुणी और धर्मी लोग कहते हैं क़यामत ज़रूर आयेगी , ईश्वर के कोप से बचने के लिए हमारे तम्बू में शरण ले लो पर वो लोग ये क्यों नहीं समझते कि क़यामत लाने के लिए अब किसी खुदा की ज़रूरत नहीं !  हम इंसानों के होते हुए कोई खुदा...? कोई क़यामत ? ...चलों देखें चौथा विश्व युद्ध कब होता है ?  अभी कुछ रोज पहले ही मेरे एक आलिम दोस्त कह रहे थे कि क़यामत के रोज सूरज धरती से सवा नेजे की दूरी पर आ जायेगा पर मेरा ख्याल ये है कि हम पर सूरज के अति- ताप की कृपा से पहले ही हमारी असहिष्णुता इस धरती का बड़ा गर्क कर देगी !

20 टिप्‍पणियां:

  1. Badaa hee sashakt aalekh! Sach! Apna beda to ham khudhee gark kar lenge!

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  2. मिडिल ईस्ट के बाद जापान और फिर हमारी देसी संसद और अंत में आसमानी संसद ??? आज तबियत ठीक नहीं लगती हुज़ूर की :-)

    लीबिया बरसों से निशाने पर था कर्नल गद्दाफी की गुस्ताख हरकतें , ब्रह्माण्ड आका के सामने अपना सर ऊंचा रखने की कोशिश, आँख दिखाने की हिम्मत बनाये रखने के लिए न्यूक्लियर औजारों को बनाने की कोशिश करना और तेल का विशाल भण्डार ! गद्दाफी का काम होना ही था सो अब समय आ गया !

    जापानी त्रासदी, मानव के लिए विपरीत परिस्थितियों में जूझने की क्षमता के लगातार विकास के लिए आवश्यक ही है शायद प्रकृति का मानव को समझाने का यही तरीका है, साथ ही एक सबक भी, कि हम अजेय नहीं हैं !

    कोई तम्बू तो तब बचाएगा जब आसमानी कहर आएगा और तब तक हम जिन्दा होंगे ! इतना हममे सब्र कहाँ कि हम ऊपरी बिपदा आने तक, अपने आपको सुरक्षित बचा पायें ?

    या खुदा खैर कर !!

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  3. वो लोग ये क्यों नहीं समझते कि क़यामत लाने के लिए अब किसी खुदा की ज़रूरत नहीं!

    खुदा-ए-क़दीर क़यामत का कौन सा तरीका चुनता है इसे फ़ानी इंसान कैसे समझ पायेगा? ऊर्जा की आवश्यकता तो हम सब को है। जापानी अपने रियेक्टर फिर से बनायेंगे। हाँ इस बार वे अधिक सुरक्षित होंगे।

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  4. सक्सेना जी के विचारों से भी सहमति।

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  5. ग़द्दाफी जैसे तानाशाहों के लिये इस दुनिया में कोई जगह नहीं है। उन जैसे सभी को उनकी करनी की भरपाई करनी ही पडेगी।

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  6. घटनाओं का, आपकी भाषा के साथ विश्‍लेषण पढ़कर, अलग-सा असर हो रहा है. पंक्ति-दर-पंक्ति बेहतरीन अभिव्‍यक्ति, स्‍पष्‍ट और प्रभावशाली.

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  7. लीबिया पर अमेरिकी हमला उसके नागरिकों की सुरक्षा के लिए है या अकूत तेल सम्पदा पर ललचाई नजर है ...हवाई आक्रमण करने के अलावा क्या और किसी प्रकार से तानाशाह शासक के खिलाफ नागरिकों की मदद नहीं की जा सकती थी ...ये सवाल हर संवेदनशील व्यक्ति के दिमाग में रेंगते हैं ...

    कौन कहता है यहां खेतियों की जमीने पानी की कमी से सूख जायेंगी ? अपना लहू तो है ही धरती को तर रखने के लिये ! ...काश इस इस दर्द को हर इंसान महसूस कर सके !

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  8. हम तो यही कामना करते हैं कि घोषित अघोषित सभी प्रकार के तानाशाहों का खात्मा हो ताकि धरती में आम आदमी चैन से रह सके।
    ..शानदार ढंग से वर्तमान की तश्वीर खींची है आपने।

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  9. hamari nazar me to dono hi tanashah hi hain........

    prakritik trasdi ki kya kahiye.......lekin jimmewar bhi koi to hoga hi..........

    pranam.

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  10. सब सवाल दर सवाल हैं , कोई जबाब अगर है भी तो वो है , इन सबके बीच लहुलुहान आम आदमी

    और ये आम आदमी दुखी होता है...क्षुब्ध होता है...अपनी विवशता पर खीझता है...उस से अपनी मर्जी से से जीने-मरने तक का हक़ छीन लिया जाता है....और ये हक़ छीननेवालों की शक्लें बदलती है...देश बदलते हैं..फितरत एक ही होती है.

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  11. अली सा!
    एक शेर याद आ रहा है..
    रात का इंतज़ार कौन करे,
    आजकल दिन में क्या नहीं होता.
    .
    क़यामत का इंतज़ार या हर रोज की क़यामत!!

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  12. .
    .
    .
    अली सैयद साहब,

    एक Equilibrium है Nature's Equilibrium इंसान चाहे या न चाहे वह तो अपना काम करता ही है... जब जब जमीन किसी इंसान, आबादी, समाज या सभ्यता का बोझ उठाने लायक खुद को नहीं पाती, कुदरत वहाँ के फैसला लेने वाले इंसानों का दिमाग ही कुछ ऐसा कर देती है कि Auto Destruct Mode की ओर खुदबखुद बढ़ जाते हैं लोग...

    कुछ ऐसा ही होने वाला है एक दिन हम सब के साथ भी... उम्मीद करिये कि वह दिन जल्दी ही न आ जाये... खैर, जो होगा देखी जायेगी... तब तक तो मैं यही कहूंगा ' मस्त रहो '...


    ...

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  13. विचार और संवेदना से भरपूर,भावप्रवण -आज भी दुरभिसंधियों का दौर है और मनुष्य मक्कारी की बिसातों पर चाले चल रहा है!

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  14. @ क्षमा जी,
    शुक्रिया !

    @ सतीश सक्सेना जी ,
    क़यामत की नज़र है आपकी ,ना जाने क्यों ? इस आलेख को लिखते वक्त तबियत कुछ अलील सी थी :)
    आपसे सहमत कि लीबिया के तेल पर निशाना पुराना है ! गद्दाफी को अडंगेबाजी /अड़ियलपन की कीमत चुकानी पड़ेगी !
    प्रकृति के सन्देश स्वीकारने में ही हमारी भलाई है हमारी क्षमताएं उसके आगे कुछ भी नहीं हैं !
    ज़रा सोच कर बताइयेगा ! क्या एक तम्बू अपना भी ताना जा सकता है ? :)

    @ स्मार्ट इन्डियन जी ,
    १. बेशक जापानी जनगण की जिजीविषा का ज़बाब नहीं,वे जरूर उठ खड़े होंगे ! अपना संकेत विकास योजनाओं में इंसानी लैप्सेस(चूकों)तक ही सीमित माना जाये !

    २. सक्सेना जी से कौन असहमत हो सकता है :)

    ३. दुनिया की तमाम तानाशाहियों के अंत और सच्चे जनतंत्र की स्थापना का स्वागत हम भी करेंगे

    @ राहुल सिंह जी ,
    आभार !

    @ वाणी जी ,
    आपकी प्रतिक्रिया से अभिभूत हूं !

    @ देवेन्द्र भाई ,
    आपकी कामना फलीभूत हो !

    @ संजय झा ,
    तानाशाही पर आपका ख्याल दुरुस्त है ! ...और
    प्रकृति से छेड़ छाड के लिए हम इंसान ही जिम्मेदार हैं !

    @ रश्मि जी ,
    हां इस आलेख का ज़्यादातर हिस्सा उन लठैतों /रंगदारों के खिलाफ ही है !

    @ संवेदना के स्वर बंधुओं ,
    बहुत खूब !
    कहां इंतज़ार ? यहां हर रोज हर लम्हा क़यामत !

    @ प्रवीण शाह जी ,
    शानदार प्रतिक्रिया है आपकी , हम इंसानों के अंदर की ख़ूबसूरती सलामत रहे !

    @ अरविन्द जी ,
    मनुष्य की मक्कारी और दुरभिसंधियों पे आपसे बात करना है !

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  15. सही कहा है आपने, इंसान को ख़ुदा की ज़रूरत ही कहां रह गई है...

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  16. भुगतना हर हाल में आम आदमी को ही होता है, शायद इसीलिये हर आम अब खास हो जाना चाहता है।

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  17. bahot khub.....

    pahli baar padha aapka aalekh...age padhti rahungi....


    is nachiz ne bhi kuch likhneki koshish ki hai....waqt mile to padhiyega jarur.....

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  18. वाह अली साहब ... सभी को नाप लिया आपने ... वैसे सच भी है इंसान जिस रफ़्तार से तरक्की कर रहा है उसे किसी की भी क्या ज़रूरत ... खुदा की तो वैसे भी नही ... कहीं ग़लती से भी आत्मग्लानि हो गयी तो इंसान का क्या होगा ...
    बहुत दिनों के बाद इतना मस्त लेख पढ़ने को मिला है ...

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  19. हम पर सूरज के अति- ताप की कृपा से पहले ही हमारी असहिष्णुता इस धरती का बड़ा गर्क कर देगी !.....आपने तो डरा ही दिया.

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  20. हम इंसानों के होते हुए कोई खुदा...? कोई क़यामत ?

    कुछ कहने को बाक़ी है क्या?

    बेहतरीन विचारोत्तेजक लेख

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