बाजारवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
बाजारवाद लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 11 जून 2012

पहला पन्ना...आखिरी पन्ना !

आज उसे फिर से बूझने का ख्याल क्यों आया ? कह नहीं सकता , कोई पक्की वज़ह , सूझती भी नहीं ! करना क्या चाहता हूं , ये बात समझ में तब आई , जब अपने हाथ में स्केल देखी ! इससे पहले भी ये अखबार किन्हीं विशिष्ट अक्षरों से अपने विशेष प्रेम को लेकर मेरे हत्थे चढ़ चुका था और आज जैसे ही इसे पढ़ना बंद करके स्केल थामी तो लगा कि मुझे इसके पहले और आख़िरी पन्ने की पैमाइश करनी है ! यूं तो ये अखबार कुल बारह पन्नों का है , पर मेरा ख्याल ये है कि किसी भी अखबार का पहला और आख़िरी पन्ना उसके व्यक्तित्व का सबसे अहम / सबसे खास हिस्सा हुआ करता है ! 

बहरहाल ... अखबार के पहले पन्ने में कुल मिलाकर 1980 वर्ग सेंटीमीटर कागज का इस्तेमाल किया गया है , जिसमें से 18 फीसदी हिस्सा राजनीति विषयक ख़बरों को समर्पित है ! कोई आश्चर्य नहीं कि इस 18 फीसदी में से कांग्रेस का हिस्सा सिर्फ 3 फीसदी है जबकि बाकी का 15 फीसदी हिस्सा भारतीय जनता पार्टी के हवाले है ! मुमकिन है कि चढ़ते और ढ़लते सूरज जैसा कोई राजनैतिक अनुमान इसकी पृष्ठभूमि में मौजूद हो ! पहले पन्ने की ख़बरों में अपनी 3 फीसदी हिस्सेदारी में , कांग्रेस पार्टी , अन्ना एंड कम्पनी से बचाव की मुद्रा अख्तियार करती हुई दिखाई दी , जबकि भाजपा की 15 फीसदी हिस्सेदारी में से पूरी पार्टी केवल 1 फीसदी में सिमटी हुई है और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी बाकी के 14 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं , हालांकि यह बात गौरतलब है कि मोदी के वक्तव्य में कांग्रेस का जिक्र , एक आक्षेपित पार्टी के तौर पर ही सही पर , ख़बरों में , कांग्रेस की हिस्सेदारी को बढ़ाता ज़रूर है !

आज के अखबार के पहले पन्ने का 15 फीसदी हिस्सा फिल्मों को समर्पित है , इसे हाल ही में आयोजित आइफा अवार्ड्स का असर माना जायगा ! इस पृष्ठ का 12 फीसदी हिस्सा , इस अखबार के नाम तथा अन्य विवरणों के साथ भीतर के पन्नों की मुख्य सुर्ख़ियों को संबोधित है ! इसके बाद ख़बरों का 9 फीसदी फोकस , नौकरशाही की ओर है , जिसमें से 4 फीसदी आइ.ए.एस. अधिकारियों और बाकी 5 फीसदी सेना के उच्चाधिकारियों के बारे में है ! इतना ही नहीं अखबार ने 8 फीसदी स्थान कोल्हापुर के महालक्ष्मी मंदिर से प्राप्त संपत्ति और पुरातात्विक धरोहरों से सम्बंधित ख़बरों को दिया है ! टीम अन्ना की सदस्य किरण बेदी के वक्तव्य ने अखबार के इस अहम पन्ने का 7 फीसदी हिस्सा घेरा हुआ है , नि:संदेह यह वक्तव्य कांग्रेस को निशाने पर रख कर दिया गया है ! सायना नेहवाल की उपलब्धियों के हिस्से इस पन्ने का 6 फीसदी हिस्सा आया है , इस पन्ने में खेलों की ये अकेली खबर है !

शिक्षा और युवाओं के लिए प्रतिस्पर्धात्मक विषय पर अखबार अपने मुख्य पृष्ठ में केवल 4 फीसदी जगह ही दे पाया है जबकि क़ानून व्यवस्था की हिस्सेदारी सिर्फ 3 फीसदी है , इतना ही नहीं , अखबार के नियमित स्तंभ के अंतर्गत मौसम के विवरण के लिए भी 3 फीसदी जगह खर्च की गई है  !  रिश्वतखोरी से सम्बंधित खबरों की हिस्सेदारी सिर्फ 1 फीसदी है  ! छपाई के फॉण्ट और हाशिये जैसे विवशताओं के चलते मुख्य पृष्ठ का कुल 14 फीसदी हिस्सा रिक्त छूट गया है ! अगर हम गौर करें तो इस अखबार का पहला पन्ना राजनीति , फिल्मों , खबर की सुर्ख़ियों , नौकरशाही , धर्मस्थल संपदा , एन.जी.ओ. और खेलों के घटते हुए क्रम में , ख़बरों को अहमियत देता है !  उसके मुखौटे में शिक्षा और प्रतिस्पर्धा तथा कानून व्यवस्था जैसे विषयों के लिए स्थान जरा कम ही है !

अखबार का आख़िरी पन्ना , पहले पन्ने के जितना ही कागज प्रयुक्त करता है , यानि कि 1980 वर्ग सेंटीमीटर लेकिन यह पूरा पन्ना ख़बरों से खाली है  !  यहां पर 85 फीसदी जगह विज्ञापनों के लिए खर्च की गई है जबकि हाशिये वगैरह की वज़ह से 15 फीसदी जगह किसी भी उपयोग में नहीं ली जा सकी है !  विज्ञापनों के लिए अखबार की प्राथमिकता , मानव देह , उसका स्वास्थ्य और ऐसे ही अन्य दैहिक सुख दुःख है  ! आख़िरी पन्ने की 54 फीसदी जगह में ऐसे ही विज्ञापन भरे पड़े हैं ! ‘काम जीवन’ की अभिवृद्धि वाले नुस्खों से सम्बंधित विज्ञापन इस पन्ने के 25 फीसदी हिस्से पर काबिज हैं , जिसमें से पौरुष को अनंत ऊंचाइयों तक ले जाने वाले विज्ञापन 22 फीसदी और स्त्रियों के दैहिक सौंदर्य को दिन दूना रात चौगुना श्रीवृद्धि देने वाले नुस्खे 3 फीसदी हिस्से पर मौजूद हैं ! इसके अतिरिक्त , स्त्री रोगों और उनके निदान सुझाने वाले विज्ञापनों को यह पन्ना 13 फीसदी जगह देता है ! विभिन्न स्वास्थ्यगत कारणों से सर्जरी को प्रेरित करने वाले अस्पतालों के विज्ञापनों ने 7 फीसदी स्थान घेरा हुआ है जबकि चर्मरोग से मुक्ति दिलाने वाले विज्ञापनों का हिस्सा 6 फीसदी और बवासीर से मुक्ति दिलाने वाले विज्ञापनों का हिस्सा 3 फीसदी है  !

विज्ञापनों से लैस अखबार के आख़िरी पन्ने में शिक्षा और प्रशिक्षण से सम्बंधित विज्ञापनों की हिस्सेदारी सिर्फ 5 फीसदी है , जबकि म्यूजिक सिखाने तथा दो पहिया / चौपहिया वाहन खरीदने के लिए वित्तीय ऋण उपलब्ध कराने वाली संस्थाओं के विज्ञापन क्रमशः 3 , 3 फीसदी जगह पर मौजूद हैं ! इसके अलावा , बीमा सुविधा / पासपोर्ट / लायसेंस / पेन नम्बर तथा किराये पर वाहन उपलब्ध करने वाली सेवाओं के विज्ञापन भी 3 फीसदी जगह पर काबिज हैं ! नौकरी के लिए रिक्तियों तथा इलेक्ट्रोनिक सामग्री के विक्रय से सम्बंधित विज्ञापन भी 2 , 2 फीसदी और टूर्स एवं ट्रेवल्स के विज्ञापन भी 2 फीसदी हिस्से पर मौजूद हैं  ! इस पन्ने का 12 फीसदी हिस्सा अखबार ने स्वयं के विज्ञापन और हेड लाइन्स के लिए प्रयुक्त किया है  ! मोटे तौर पर देखा जाये तो अखबार का आख़िरी पन्ना केवल विज्ञापनों के लिए प्रयुक्त हुआ है , किन्तु दैहिकता संबंधी विज्ञापनों में अखबार का खास रुझान अपनी कहानी आप कहता है ...

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

अखबार...सुर्खियाँ और पार्श्वनाद !


सुबह सुबह खबर बांचना गोया व्यसन, मशीनी रूटीन और अखबारों के पन्ने पलटते हुए, परोसी गयी ख़बरों के दायरे के भीतर बाहर की समझ के इतर कागज़ में मौजूद  सुनियोजित वणिक वृत्तियों का संज्ञान ही नहीं लिया कभी ! हॉकर आता कि टूट पड़ते ! कुल जमा पांच अखबार और उनकी सुर्ख़ियों से गुज़रते हुए ख़बरों की पुनरावृत्ति के सिवा बस एक ख्याल ,चलो आगे देखें...अगली खबर क्या ? ख़बरें बहतीं...उड़तीं, हम बहते...उड़ते, ख़बरें बजतीं...नृत्य करतीं,हम बजते...नृत्य करते, वे ठिठकतीं...फुदकतीं सो हम भी, उनके साथ सुख दुःख गम-ओ-गुस्से के अहसास से गुज़रते हुए ! लहर दर लहर हिचकोले दर हिचकोले बस ख़बरों के साथ ! कहना ये कि कागज़ पर छापे के शब्दों और चित्रों में केवल उतना ही दिखता जितना कि दिखाया गया हो ! अखबार एक मिशन...एक माध्यम जो दुनिया से खबरदार करे,उसे जानने बूझने का मौक़ा दे ! ज़मीन के एक टुकड़े पर सिमटी हुई ज़िन्दगी को ज़मीन के ज़र्रे ज़र्रे और हालात से रूबरू कराने वाले अखबार की हैसियत किसी दूधखोर बच्चे की धाई मां सी लगती, जो उसके जान लेने  की कुदरती ख्वाहिश को हर हाल में पूरा करने का दम रखती !

छुट्टियों के बाद वाले दिन अखबार नहीं आने से उपजा खालीपन हमारी ज़िन्दगी में उनकी अहमियत बयान करता ! अखबार यानि कि आदत ! कभी सोचा भी नहीं...कितने पन्ने ...कितने पैसे...कितनी ख़बरें और कितने विज्ञापन ! पन्द्रह अगस्त, छब्बीस जनवरी और दीगर त्यौहार वाले दिनों के बधाई संदेशों वाले अतिरिक्त पन्ने भी कभी गिने नहीं हमने ! साल में ऐसे गिने चुने मौके भी आदत में शुमार हो गये होंगे तभी तो दिमाग में खटक कुछ भी नहीं बस पन्ना दर पन्ना हर्फ़ दर हर्फ़ आँखों की मुसाफिरत सी ! अब ये महज़ इत्तिफाक है या  कुछ और जो, पिछले दिनों में, एक नया ट्रेंड सा चलन में देखा कि, अखबार के मुख्य पृष्ठ के ऊपर विज्ञापन वाला पृष्ठ कुछ इस तरह से अवतरित हो़ता कि जैसे कोई इंसान रोज़मर्रा की ड्रेस के ऊपर डिजाईनर कोट पहन ले ! अब लगता कि अखबारों को भी बिजनेस की ज़रूरत होगी वर्ना पहले वाला  मासूम ख्याल ये कि अखबार हम पर कृपा करते हैं बिजनेस नहीं ! 

अब हुआ ये कि आज सुबह जैसे ही एक ख्यात नाम दैनिक समाचार पत्र को हाथ लगाया कि पहले पहल डिजाइनर कोट हाथ लगा, सोचा चलो देखते हैं कि इस कोट के पैसे भी अखबार की कीमत में शामिल हैं याकि नहीं ! पढ़ा कुल पृष्ठ 20 और कीमत एक रुपये पचास पैसे मात्र, पृष्ठ गिन भी डाले, पक्का हुआ कोट समेत कुल 20...अब सूझा ये कि इन बीस पन्नों में ख़बरें कितनी और विज्ञापन कितने ? सो पाया ये कि केवल सम्पादकीय पन्ने को छोड़ कर शेष सभी 19 पन्ने विज्ञापनों से लैस हैं और कमाल ये कि पांच पन्ने खालिस विज्ञापन वाले...यानि कि खबर शून्य पन्ने ! अपने लिए यह पहली अनुभूति, जो कि अखबार की धाई मां वाली छवि पर चोट कर गयी, लिहाजा हाथ में स्केल और अखबार के कागज की नाप शुरू ! नतीज़ा ये कि इस्तेमाल शुद कागज कुल 3.85 वर्ग मीटर और उसमें विज्ञापन का हिस्सा 2.0092 वर्ग मीटर निकला,यानि कि ख़बरों के मुक़ाबिल विज्ञापन 52.18 फीसदी कागज पर काबिज थे ! इसे यूं समझिए कि अखबार के 20 पन्नों में से 10.43 पन्नों पर विज्ञापनों का साम्राज्य विस्तारित था और एक उपभोक्ता कि हैसियत से हमारे एक रुपये पचास पैसे का भी यही हाल हुआ जानिये  ! 



 { नोट : दिन / माह और फिर कितने साल ? अखबार /  उपभोक्ता ...अरे नहीं ... मैं यह सब नहीं गिनने वाला }

शुक्रवार, 5 नवंबर 2010

देख तो दिल कि जां से उठता है ये धुआं सा कहां से उठता है ?

फिलहाल मैं घर के अंदर दुबक गया हूं  !  बच्चों ने घर से बाहर दिये जला दिए हैं पर बस्ती में पटाखे यूं फूट रहे हैं गोया ये शाम फिर ना आयेगी , एक शोर युद्ध भूमि में होने जैसा !  खिड़कियों के शीशे हर धमाके के साथ सहम जाते है , मुझे फ़िक्र है कि अगर एक भी चटका तो इस शक्ल का बाज़ार में दूसरा मिलेगा भी कि नहीं ?अभी कुछ रोज पहले ही रश्मि जी की पोस्ट पर शिवकासी के पटाखा उद्योग में झुलसते मुरझाते बचपन की चिंतायें देखी थी !  लेकिन इस वक़्त दूर पड़ोस तक के बंदे इस व्यवसाय की श्रीवृद्धि में लगे हुए हैं !  ज़ाहिर है कि 'नौउम्री'  पर मुनाफे का तिलस्म भारी है !  सामाजिक सरोकार पर व्यापार की जीत   जैसे धूम धडाम के दरम्यान फिजां में बिखरते हुए धुवें से साँसें लेने में दिक्कत होगी , सो मेरे पास मुंह छिपाने के सिवा दूसरा , कोई विकल्प नहीं  !  बस ख्याल ये कि वो सारे बच्चे इस वक्त यूज एंड थ्रो की तर्ज़ पर डस्टबिन में होंगे क्योंकि, धमाके अफोर्ड करने की हैसियत होती तो सुबह ३ से रात १० और रुपये पन्द्रह की दिहाड़ी वाली रोजी की गिरफ्त में फंसते कैसे ? 

ऐसा नहीं कि इस धुवें से तकलीफ सिर्फ मुझे ही होगी , यकीनन उन्हें भी जो पटाखे फोड रहे हैं ! उनमें से कई, सुबह सुबह डाक्टरों के शरणागत होंगे पर...इस वक़्त किसके घर के सामने ज्यादा से ज्यादा धमाके हो पाएंगे की होड सी,एक अंधी दौड ! मासूम बच्चों से लेकर प्रौढ़ तक, सारे के सारे तेज आवाजों धमाकों और धुवें से सम्मोहित, दियों को हाशिए में धकेल चुके हैं ! सुनकर भले ही अजीब लगे पर पौराणिक आख्यान मेरी कमजोरी हैं ! चाहे पढूं या देखूं हर सूरत लुत्फंदोज़ होता हूं ! कल्पना करता हूं पुष्पक विमान से उतरते विजेतागण और घी के दियों से रौशन रौशन नगरी के उल्लसित नगरजनों की ! हां उनमें से कोई भी चेहरा धुवें से बचने वाला मास्क नहीं पहनता और उनमें से किसी की भी खुशियां  बारूद के व्यापार पर आश्रित नहीं ! दोपहर बेसन के लड्डुओं की निर्मिति के दरम्यान ही लड्डुओं पर हाथ साफ़ करते हुए भी ये अहसास था कि शाम क़ैद में गुजरेगी ! भले ही देश की बड़ी आबादी अस्थमा पीड़ित है पर यहां पूरा इंतजाम है उसे उरूज पर ले जाने का ! 

सुबह पता चलेगा कितने झुलसे ? कितने अस्पताल आबाद हुये ? इस आलोक पर्व में आलोक से ज्यादा धुवें के सौदागरों का दखल है !  उनकी तिजोरियां सुरसा सी मुंह बाये बचपन और स्वास्थ्य को लील रही हैं ! उन्हें केवल करेंसी खाना और करेंसी ही पीना है !  एक खूबसूरत , खूबसीरत त्योहार का बुनियादी ढांचा बदल दिया है सौदागिरी ने ! पुराने ज़मानों में उल्लास के नतीजे महज़ उल्लास ही हुआ करते थे पर अब उल्लास के नतीजे कल पता चलेंगे ?  'करोड़ों' के नुकसान को 'सैकड़ों'  के मुनाफे में तब्दील होते हुए देखना बड़ा ही दुखदाई है पर इसका हल क्या है ? बेशक कुछ बुद्धिमान मित्र इसे,  डाक्टरों की रोजी रोटी के तर्क का आलेप भी लगाएंगे, ठीक वैसे ही जैसे बचपन की रोजी रोटी बारूद के ढेर आना से जायज़ बता डाला था ! 

मेरी कनपटियां बज रही हैं कोई एक ख्याल स्थिर हो पाए तो कहूं घी...दिये...बचपन...पटाखे...रोजी... उद्योग...पूंजी...मुनाफा...धूमधडाम...धुवां...अस्थमा...आह ! ये आलोक पर्व है जीवन में, अंतस में आलोक का, उल्लास का ! इसमें धुवां  कहां से आ गया ? सारे मोहल्ले सारी बस्ती केवल धुवां, गहरा बारूदी धुवां, खालिस आलोक को अपने लपेटे में लेता हुआ ! मुझे भय है कहीं, किसी एक दिन आलोक भी धनपिशाचों की साजिश का शिकार हो अस्थमाग्रस्त ना हो जाये ? बच्चे तो पहले से ही...? फिलहाल एक उम्मीद...एक दुआ कि आपका आभा मंडल द्विगुणित हो, आपकी यश कीर्ति दसों दिशाओं में बखानी जाये, आपकी पीढियां स्वस्थ और सानंद हों और फिर  सारे का सारा  बचपन महफूज हो ! 


सोमवार, 26 जुलाई 2010

बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं मैं !

जन्माष्टमी के खास मौके पर घर के बेहद करीब का गुढ़ई बाज़ार खाली करा दिया जाता और उसके दोनों छोरों पर खालिस कानपुर से बुलाई गई दो नौटंकियां रात भर दर्शकों को आकर्षित करने में लगी रहतीं , सुबह तक मैदान के जिस छोर पर भीड़ ज्यादा बढ़ जाती , यह मान लिया जाता कि यही पार्टी दमदार है !गांव के तमाम लोग अपने अपने बैठने के लिए कुर्सियों , स्टूल्स , बैंचेस वगैरह का इंतजाम खुद करते...सारी बैठक शिफ्टिंग मोड में होती , अपनी कुर्सी उठाओ और चलो दूसरे छोर की तर्ज़ पर !  हमारा घर मौका-ए-वारदात से इतना करीब था कि हम वहां ना भी जाते तो तमाम रात गाने...ठुमके और अश अश की आवाजें चैन से सोने ना देतीं ,  ज्यों ज्यों रात गहराती आवाजें और भी सघन  होती जातीं !  यही एक मौका होता जब आस पास के गांव के रिश्ते नातेदार और साधारण जान पहचान वाले भी हमारे घर का सारा फर्नीचर उठा ले जाते , यहां तक कि तख़्त और मोढे भी ! 

भीड़ खींचने में सफल पार्टी मालमत्ता भी अच्छा खासा जुगाड़ लेती !  यूं तो सारा आयोजन अमूमन दो रातों का होता पर कभी कभार किसी दल विशेष में मौजूद 'नथ'  संख्या आशिक मिजाज़ बन्दों की खीसें ढीले करती हुई  इसे त्रि-रात्रीय भी बना डालतीं !  घोषित तौर पर नौटंकियों का आह्वान विशुद्ध श्रंगार रस नृत्य आस्वादन निमित्त हुआ करता पर डेरे सिमटने के बाद भी कतिपय आयोजनकर्ताओं की कहानियां चटखारे लेकर कही सुनी जाया करतीं  !   हर बरस नये सिरे से यही सिलसिला चलते रहता !  कलाकार कहते कि वे जिस्म के बाज़ार में नहीं हैं , संगीत, नृत्य और श्रंगार मात्र उनकी रोज़ी रोटी है !  अपवादों को छोड़ कर मुझे भी यही यकीन है !

मेरा एक दोस्त बजाज हुआ करता , मैं पढ़ने गांव से बाहर निकला , वह दुकानदारी में रम गया...उस जन्माष्टमी को मैं गांव नहीं आ सका पर सुना कि नौटंकी पांच रातों तक ज़लवा अफरोज हुई !  छुट्टी पर स्टेशन से घर जाते वक़्त राम मनोहर को घर के सामने खडा देख कर मैं , तांगे में बैठा बैठा ही उसे आवाज़ देना चाहता था कि साईस नें कहा ,  कुछ मत कहना ये तीसरी रात का शिकार है...वो लड़की शायद एम ए में पढ़ रही थी उस वक़्त ,  जबकि उसकी पेशेवराना नथ मेरे दोस्त पर कहर गुज़ार गई !लोहे की सांकल से खिडकी पर बंधा हुआ दोस्त अब तक इश्क की तमाम हदें पार कर चुका था उसे मेरी आवाज सुनाई भी कहां देना थी !   हर तरह के इलाज़ बेअसर यहां तक कि हालात से मजबूर घरवालों नें उसकी शादी भी उस लड़की से करवानी चाही पर सारी कोशिशें उसे दीवानगी के आलम से बाहर ना ला सकीं !  सोचता हूं कि ये  एक अलग किस्म का बाज़ार था जहां मनोरंजन के नाम से गज़ब की मार्केटिंग होती !  त्यौहार से पहले ही हल्ला हो जाता इसबार फलां ...इसबार फलां...सम्मोहित खरीदार सांकलों में बांधे जाते , कुछ की ज़मीन जायदाद बिक जाया करतीं ,  कुछेक घर तबाह हो जाते और कुछ ढीठ बेशर्मी से अगले साल का इंतज़ार करते !

समय भले ही बदल गया हो पर मार्केटिंग आज भी इसी न्यूक्लियस के इर्द गिर्द घूमती है !  सीमेंट बेचो या लोहा...चड्ढी बेचो या पोहा, साबुन बेचो या खोवा , गरज़ कि कुछ भी बेचिये जनाब हुस्न , श्रृंगार और रंगीनियत का बाज़ार आज भी गर्म है वो शक्लें बदल बदल कर आपकी जेबें खाली करने का माध्यम बनता है !  कुसूरवार कौन है इसका ? वो जो विज्ञापन कर रहे हैं ? वो जो विज्ञापन बना रहे हैं ? वो जो रोजी रोटी की खातिर इस धंधे में हैं ? ... अरे नहीं मियां ये तो सब मोहरे हैं !  असली खलनायक तो बाजारवाद है जो बेसिक इंस्टिंक्ट को एक्सप्लायट करके पूंजी पीटने में यकीन रखता है !  खरीदार की परवाह का स्वांग रचाता...उसकी यौन आकांक्षाओं को उकसाता  / सहलाता  / फुसलाता   हुआ ,  उसकी गिरह काटता हुआ बाज़ारवाद !


रविवार, 4 जुलाई 2010

पार: पार: हुआ पैराहने जां : अ'रीना में निओ - ग्लेडिएटर्स ?

अपने प्रोफाइल में पसंदीदा फिल्मों का ज़िक्र करते  वक़्त ग्लेडिएटर्स  टाइप करते हुए मेरी  अंगुलियां कांप रहीं थीं...धड़कने औसत से ज्यादा रफ़्तार पर...और  बेहद  ज़ज्बाती  तौर पर  मैं उन परिजनों के बारे में सोच रहा था,जिनके बच्चे विषम  परिस्थितियों का शिकार होकर सरे बाज़ार बेचे गये होंगे...तब के हालात ,बिकने वाली शय भी इंसान और खरीदार भी ! उन  दिनों प्राचीन रोमन एम्पायर ही क्यों सारी की सारी दुनिया गरीब  इंसानों की मंडी में तब्दील हो चुकी थी  !  वे  बिकते  इंसानों  का क़त्ल करने  के लिये...या फिर इंसानों से क़त्ल हो जाने के लिये ! तमाशाई भी इंसान हुआ करते और तमाशेबाज़ भी !  बारहा सोचता हूं कि तब के हालात ऐसे थे कि पूंजी इंसानों के लिये नहीं बल्कि इंसान पूंजी के लिये बा-आसानी मयस्सर हुआ  करते थे !...शायद पूंजी का आविष्कार ही उन्हें , उनकी औकात दिखाने के  लिये हुआ होगा ? ...कहते हैं वो बर्बरियत का दौर  था जो गुज़र गया ! 

आहिस्ता आहिस्ता नव-सभ्यतायें विकसित हुईं और इंसानियत का  इकबाल बुलंद हुआ ! दुनिया के नक्शे में जुग्राफियाई /  प्रजातीय / धर्माधारित / भाषाई या फिर भिन्न राजनैतिक विचारधाराओं पर आधारित राष्ट्रीयतायें जन्मीं, जिन्होंने पारस्परिक  तुलना में खुद को इंसानियत का सबसे बड़ा अलम्बरदार घोषित करना अपना परम लक्ष्य बना लिया...भले ही अंदरूनी  वास्तविकतायें  कुछ  और  बनी  रही  हों  !  निजी तौर  पर  मुझे  ये  बदलाव  बहुत  बड़ा  दिखता  है , जहां रोमन सम्राटों के  पसंदीदा अ'रीना , बड़े बड़े राष्ट्रों में तब्दील गये हों और 'एम्परर' 'लोकशाहों' का मुखौटा पहन कर अभिनय कर रहे हों ! तब के  परिजनों के बच्चे दासों की शक्ल में बिकते और अब के बच्चे , नौकर / कर्मचारियों की शक्ल में ! खरीदार तब भी इंसान थे,  खरीदार अब भी इंसान हैं ! कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ चिल्लर और कुछ थोक व्यापारी !  व्यापार की टर्म्स एंड कंडीशन्स में  बड़ा फर्क दिखता है अभी...तब माल की कीमत एकमुश्त चुकाई जाती थी अब रकम माहवाराना किश्तों में तय होती है ! जिस  तरह से बर्बरियत के उस युग में सभी दास ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते थे लगभग उसी तर्ज़ पर आज भी सभी नौकर  ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते  ! 

वक़्त का फर्क बहुत लंबा है और सभ्यतायें भी विकसित हुई हैं इसलिए ग्लेडियेटर्स के साज़-ओ-सामान में भी भारी बदलाव  नज़र आता है मसलन तलवार के बदले ए.के.४७ , कलम, टाइपराइटर,कम्प्यूटर्स वगैरह वगैरह और जिरह बख्तर की जगह  वर्दियां / यूनिफार्म वगैरह वगैरह ! मुमकिन है मेरी सोच , मेरा चिंतन उन 'दासों' को मजाक लगे जो बैंकों ,शिक्षण संस्थानों  जैसे शालीन अपेक्षाकृत निरापद  खरीदारों के पास बिके हैं , पर उन दासों का क्या ? जिन्हें रक्षा संस्थानों जैसे रफ एंड टफ  खरीदार नसीब हुए हैं !  बुरा मत मानिये...इंसान तब भी बिकता था और इंसान आज भी बिकता है...पेट के लिये ? अस्तित्व के  लिये ? परिजनों के लिये ? आपको क्या लगता है ?  दुनिया में अ'रीना कहां नहीं हैं ?  ग्लेडियेटर्स कहां नहीं हैं ? तब सम्राट दिलजोई के लिये ग्लेडियेटर्स के तमाशे करते थे आज राष्ट्रीयतायें ,विचारधाराओं और इंसानियत की आज़ादी के नाम से तमाशे  करती हैं ! दिलजोई करने वाला भी इंसान...दिलजोई के लिये शहीद होने वाला भी इंसान ! राष्ट्रीयताओं और विचारधाराओं का  राग अलापने वाला भी इंसान और इस राग पर कुर्बान होने वाला भी इंसान ! शताब्दियों बाद बहाने भले ही बदल गये हों पर  रिज़्क ( रोजी रोटी ) के लिये ग्लेडियेटर्स होना और ग्लेडियेटर्स के परिजनों की पीड़ा शाश्वत है !    

मेरी धरती.. माफ कीजिये...हम सबकी धरती...लहूलुहान, क्षत विक्षत धरती के लिये 'स्लेव' अली गाते रहेंगे "पार: पार:  हुआ पैराहने जां" वे सब गाने के लिये अभिशप्त  हैं ,क्योंकि उनके दिल में रोमान हैं , माशूकायें हैं , बीबियां हैं ,बच्चे हैं , परिजन हैं ,  अस्तित्व की आरजूएं हैं , जिम्मेदारियां हैं !...और हैं...शिद्दत से नफरतें भी ,खरीदारी के ज़ज्बे के साथ ! मैं खुद थक चुका हूं  सोच सोच कर कि दुनिया में अ'रीना कहां पर नहीं है यहां , जहां मैं रहता हूं ,बस्तर भी तो...? हमेशा की तरह अपने अस्तित्व /  अपने परिजनों के लिये मंडियों में बिकते इंसान...शहीद होते...परिजनों को बिलखता छोड़ कर जाते निरंतर...अ'रीना में निओ ग्लेडियेटर्स  ?

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

सुनो पार्थ ये बाज़ार है...


सुबह बच्चों के स्कूल जाते हुए गौर नहीं किया पर वापसी में चंद लोग टिकटी / मृत्यु शैया बांधते दिखाई दिये ! मुख्य सड़क पर होटल के ठीक बगल की छोटी सी दुकान और उसी के अन्दर स्थित मकान में किसी बुजुर्ग की मृत्यु की खबर है ! कोई शोर-ओ-गुल नहीं रोने पीटने / सियापे के कोई स्वर नहीं ! मैं ठहर गया हूँ ! होटल अभी बंद है उसके कर्ताधर्ता हाथ बांधे हुए पड़ोसी की अंतिम यात्रा के इंतज़ार में है ! वे मौन हैं ! मैं भी मौन हूँ ! इशारों से पूछा क्या हुआ ? उन्होंने इशारों में ही पड़ोसी की इहलोक लीला समापन विषयक सूचना दी ! अंतिम यात्रा में देरी के संकेत हैं ! मुझे समझ में नहीं आता किसे सांत्वना दूं ? यहां मृतक के सम्बन्धी अंत्येष्टि से पूर्व की तैयारियों में व्यस्त तो हैं पर शोकाकुल नहीं दिखते  !  घर वापस भी जाना है, देर तक नहीं लौटने से परिजन चिंतित होंगें इसलिए गाड़ी में धंस जाता हूँ ! वहीं  पास में खड़े होटल के नियमित ग्राहकों के चेहरों पर चिंता की लकीरें हैं ! मैं आगे बढ़ जाता हूँ ! ये होटल आज बंद है ! मैं जानता हूँ कि इसमें सुबह / दोपहर / शाम नियमित ग्राहकों का जमावड़ा होता है पर आज केवल एक ईंट की दीवार के फासले पर हुई मृत्यु नें होटल का शटर डाउन कर दिया है ! होटल के ग्राहकों में बड़ी संख्या में विद्यार्थी और नौकरी पेशा लोग शामिल हैं लेकिन उन्हें आज कहीं और व्यवस्था देखना होगी...आह मृत्यु ...आस पास कोई दूसरा होटल भी नहीं है , उन्हें कुछ दूर जाना होगा ! इधर मैं घर वापस तो आ गया हूँ पर होटल के बाजू में हुई मृत्यु का ख्याल मेरा पीछा नहीं छोड़ रहा ! स्वल्पाहार का मूड नहीं ...सो पत्नि को मना कर दिया है पर चाय वो तो व्यसन है उसे किसी दूसरे की मृत्यु से क्या लेना देना !

नेट पर बैठता हूँ पर टिप्पणियां सध नहीं रहीं...उधर मृत्यु हुई है , ग्राहक चिंतित खड़े हैं , का ख्याल टिप्पणियों पर भारी है ! जैसे तैसे अपनी  उपस्थिति दर्ज कराता तो हूँ लेकिन भय है कि  प्रतिक्रिया चुगली ना कर दे ! खैर...जो भी होगा देखा जायेगा की तर्ज पर मित्रों के ब्लाग्स पर दस्तखत तो मार ही दिये हैं ! अब तक दिन काफी चढ़ चुका है लिहाज़ा नहा धोकर चल देता हूँ आफिस की ओर  हालांकि भोजन का मूड अब भी नहीं है ! सोचता हूँ कि पड़ोस की मृत्यु... होटल के चिंतित ग्राहक...और अपनी निष्प्राण हो चुकी भूख के साथ चाय की चुस्कियों और ब्लागिंग...काम्बिनेशन बड़ा अजीब है !

दोपहर बाद फिर से उसी सड़क पर निकल पड़ा...देखता हूँ  अब वहां  कुछ चादरों की ओट में  मृतक का घर / दुकान, सामने चंद कुर्सियां प्लास्टिक की...पड़ी हुई...लेकिन होटल वापस अपने रूटीन पर आ चुका है ! सड़क पर गैस चूल्हे से उठती हुई आवाज और समोसे के लिए चिल्लाते ग्राहक, गल्ले पर निश्चिन्त भाव से खड़ा होटल वाला ...मुझसे कहता है कैसा करेंगे सर...ग्राहकों की व्यवस्था तो करना ही पड़ेगी ना...आप कुछ लेंगे  ?  मैं मना करता हूँ पर वह चिल्लाता है ! अरे लड़के... देख सर के लिए कड़क चाय बना...अबे पत्ती बदल देना...थोड़ी अदरख डाल  !  बैठिये ना सर !  मेरा व्यसन चाय...पर मेरे मुंह में कड़वाहट सी घुल गई है और मैं  निस्तब्ध खड़ा हूँ...यहां कोई व्यास...कोई कृष्ण...कोई अर्जुन नहीं...धर्म अधर्म के लिए किसी युद्ध की कोई सम्भावना नहीं ...कोई उपदेश भी नहीं...सुनो अर्जुन...ये मैं ही जीता और मरता हूँ...नहीं...बिलकुल भी नहीं ! मैं बुदबुदाता हूँ ...अरे यार मेरा चाय पीने का मूड नहीं है...और धप्प से कुर्सी पर बैठ जाता हूँ, पर अन्दर ध्वनियां तेजतर होती हुई ...सुनो पार्थ ये बाज़ार है !

मंगलवार, 9 फ़रवरी 2010

रूम सर्विस...बदतमीज़...मैं तुम्हारी कनपटी स्याह कर दूं !

टीवी चैनल्स पर न्यूज़ देखी और लहू बोइलिंग पॉइंट पर पहुंच गया है ! पता नहीं इस बिजनेस एग्रीमेंट की कानूनी बारीकियां क्या रही होंगी ? और अगर किसी नुक्ते पर एग्रीमेंट का पालन नहीं किया गया हो तो क्या अगली सुबह न्यायिक कार्यवाही की संभावनाएं ख़त्म हो चुकी थीं ? ऐसा लगता तो नहीं ? पर सितारा टंके आलीशान होटल की रूम सर्विस , मीडिया के सामने बिपाशा बासु के शयनकक्ष के दरवाजे को देर रात पीटती नज़र आई ये बात मुझे बर्दाश्त नहीं हो रही है ! सबसे पहले यह साफ़ कर दूं कि मैं बिपाशा बासु को जानता तक नहीं ! उनका फैन भी नहीं ! मैंने उनकी कोई फिल्म भी नहीं देखी है ...लेकिन किसी महिला के आराम और उसकी प्रायवेसी में लगातार खलल डालती हुई स्थूलकाय रूम सर्विस क्या साबित करना चाहती थी ! यदि होटल में ठहरे किसी व्यक्ति नें रूम सर्विस को काल ही नहीं किया हो तो भी क्या रूम सर्विस लगातार दरवाजा पीटते हुए उस व्यक्ति को जागते रहने के लिए बाध्य करेगी ? मुझे पता नहीं कमरे में बंद एक अकेली महिला के साथ हुए इस व्यवहार पर राष्ट्रीय महिला आयोग का नज़रिया क्या होगा ? और कानून के जानकार इस मुद्दे पर क्या ओपिनियन रखते हैं ? परन्तु मुझे लगता है यह सामान्य शिष्टाचार तथा होटल व्यवसाय की मर्यादाओं का खुल्लमखुल्ला उल्लंघन है ! किसी सेलिब्रेटी महिला के साथ मीडियाई कैमरे के सामने यह सब घटता है तो देश के साधारण नागरिकों की दुर्दशा का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है ! अब कौन जाने की इस घटना से कितने लोग आहत हुए होंगे और इसका कानूनी बदला क्या हो सकता है ? होगा भी कि मामला यूंही रफा दफा कर दिया जायेगा ! पर मैं अपना आपा खो रहा हूँ...मेरे परिजन हैरान हैं...उन्होंने मुझे गुस्से में कभी देखा ही नहीं...और चिल्लाते हुए भी कभी सुना ही नहीं पर मैं...मेरे शब्द बिखर रहे हैं...ध्वनि कर्कश हो रही है , मेरी मुट्ठियाँ अपने आप बंधती जा रही हैं ...रूम सर्विस ...बदतमीज़ जी करता है मैं तुम्हारी कनपटी स्याह कर दूं !

गुरुवार, 3 दिसंबर 2009

आदमी कैसा भी हो काग़ज सही होना चाहिए ?

पिछले कुछ दिनों से अपनी कम्पनी घनघोर वित्तीय संकट से गुज़र रही है, सोचा बैंक से मदद ली जाये, इसी उपक्रम में आज दोपहर बाद बैंक जा धमका ! कुछ चर्चा कुछ कागजी कार्यवाही, समय तो लगना ही था ! मूक दर्शक बना लिखा पढ़ी देखता रहा ! ख्याल था कि बैंक की नौकरी, ठाठ की नौकरी है, पर शाखा प्रबंधक मित्र की मेहनत देख कर, बैंकिंग सेवाओं के मुताल्लिक सारे रोमानी ख्याल काफूर हो चले हैं ! लगता है अपनी नौकरी ही भली है, जो थोड़ी बहुत जुबान चलाई और पगार पक्की ! इसके बाद भी, अगर खाली पगार से काम ना भी चले तो 'ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत' के दर्शन की पुष्टि के लिए बैंकिंग सेवायें और मेहनत के लिए मित्रगण हैं ही ! ओफ्फोह...लगता है मैं मूल मुद्दे से भटक चला हूँ, चलिये वापस, मुद्दे पर आता हूँ, दरअसल वहां एक सज्जन अचानक आ धमके और अपने वित्तीय संकट का हवाला देते हुए, शाखा प्रबंधक से ऋण प्रदाय में सहायता की अनुनय करने लगे, बातचीत के दरम्यान मुझे लगा कि उन सज्जन की ख्याति से मित्र ( शाखा प्रबंधक ) भली भांति परिचित हैं, सो उन्हें टरकाने की कोशिश करते हुए तरह तरह के दस्तावेजों को लेकर आने की बात कह रहे हैं ! लेकिन वो सज्जन भी मंजे हुए खिलाडी, आसानी से कहां मानते डटे रहे ! थक हार कर मित्र नें कहा...अरे भाई ...मैं क्या मदद करूं, बैंक केवल एक ही बात मानता है "आदमी कैसा भी हो कागज सही होना चाहिए" आप सही कागज लाइये काम हो जायेगा ! उस वक्त मित्र नें ये बात किसी भी मंतव्य से कही हो पर मैं फ़िक्र में हूँ ...भला हमारे देश...में कागजों की बनिस्बत आदमी की औकात क्या रह गई है ? आदमी कैसा भी हो कागज सही होना चाहिए ?
जनाब मधु कोड़ा के काग़ज बराबर सही थे, जिनकी दम पर वे पहले विधायक और फिर मुख्यमंत्री बन सके पर आदमी...? वे ही क्यों इस महालोकतंत्र में हजारों ऐसे बन्दे हैं, जिनके कागज सही हैं इसलिए वे सांसद हैं... विधायक हैं... मंत्री हैं... बड़े अधिकारी हैं पर आदमी... ?
हे ईश्वर...मैं भारी फ़िक्र में हूँ...इस देश को क्या चाहिए...सही कागज...या...सही आदमी ?

रविवार, 18 अक्टूबर 2009

टोपी...दाढ़ी...लुंगी...तिलक...नारियल...आदि ...

बेहद खूबसूरत मुल्क के बेहद खूबसूरत वाशिंदों पर गर्व करते करते कई बार लगता है कि जैसे ये खूबसूरती महज़ छद्म आवरण सी है वरना धनिये में लीद , दूध में केमिकल्स , मावे में..... , नकली दवाइयां ,जहरीली शराब ! पैसे के लिए और ना जाने क्या क्या पाप कर्म ! इंसानियत के कातिल और हैवानियत के नग्न नर्तक के सिवा दूसरा और कौन सा विशेषण जोड़ा जा सकता है हमारे जैसे घटिया नागरिकों के नाम के आगे ? चीन हमसे बाद में आजाद हुआ , जापान ध्वस्त होकर जी उठा , जर्मनी टूट कर एकजुट हुआ .... अगर हम जैसे नागरिक इन मुल्कों में भी होते तो कल्पना की जा सकती है कि ......? ...अजब लोग हैं हम ! पहले प्रतिभा को दुत्कारते हैं और जब वो पलायन कर किसी दूसरे मुल्क की शान बन जाए तो बेशर्म होकर उसे भारतीय मूल का बताने में संकोच भी नहीं करते ! नारियों को देवी सामान पूजने का दंभ और केरोसिन में डुबा कर मार डालने का व्यवहार , हमारे डबल स्टेंडर्ड होने का ज्वलंत उदाहरण है ! यही नहीं हम तो ईश्वर के कण कण में विद्यमान स्वरूपों के हन्ता होने पर भी लज्जित नही हुआ करते ! आस्तिक होने का स्वांग रचाने में हमसे आगे शायद ही किसी दूसरे मुल्क के लोग होते हों ?
कई बार ....बल्कि हर बार ऐसा क्यों लगता है कि हम जो सोचते हैं वह बोलते नहीं और जो बोलते हैं वह करते नहीं और इन दिनों तो ऐसा लगने लगा है कि जैसे टोपी ... दाढ़ी ... लुंगी ...तिलक ... नारियल ...आदि....आदि ....आदि के सामने मनुष्य और मनुष्यता की कोई औकात नहीं है ! इन्हें ओढ़कर जब जो चाहे , जिसका जी चाहे ' रक्षक ' बन जाए ! अपने गिरेहबान में झांकने की हमारी आदत ही नहीं है ...जिसे मर्जी..... देशभक्त /राष्ट्र भक्त /ईश भक्त होने का सर्टिफिकेट दे डालें ! ....आज दिया कल छुडा लें ! असहमत आदमी और असहमति के सुर हमारे सबसे बड़े दुश्मन हैं और हम हाँ जी , हाँ जी ....के सबसे बड़े खैरख्वाह !
ये मुल्क बेहद खूबसूरत है और हम सब इसके बदतरीन नागरिक हैं ! आओ इसी जनम में पुश्तों के लिए पैसा जोडें , मुनाफा कमायें .... साबुन से दूध और विष्ठा से उबटन बनायें !

रविवार, 9 अगस्त 2009

बेचारी गाय... आक्सीटोन ....धर्म ...और माल बनाओ ...?

तब बोर्ड की परीक्षायें चल रही थीं और मैं संस्कृत के पेपर की तैय्यारी बतौर जोर जोर से रट रहा था ..निबंध ....अस्माकम धेनुः ...यानि हमारी गाय ! मित्र और नातेदार पास से गुजरते और कुछ इस अंदाज से मुस्कराते ..अरे बेवकूफ ... और ले संस्कृत ! सच कहूं तो मुझे भी पता नहीं था कि मैंने संस्कृत को अपनी स्टडीज का हिस्सा क्यों बनाया जबकि उसका मेरे पारिवारिक -सामाजिक बैकग्राउन्ड से कोई लेना देना नहीं था और ना ही इस मामले में , मेरे सनातन धर्मी मित्रों और मुंहबोले रिश्तेदारों का चंद्रमा उच्च का था लिहाजा संस्कृत को एक विषय के रूप में चुनने और पढने की कोई सीधी सादी और ठोस वजह नजर नहीं आती है ! हो सकता है बचपन में उर्दू और अरबी भाषाओँ के अध्ययन नें , भाषाओँ के प्रति कोई मोह जगा दिया हो और मैंने संस्कृत का अध्ययन करना चाहा हो ! वैसे कुछ भी पक्के तौर पर कहना मुश्किल है लेकिन ये तो तय है कि उन दिनों धर्म , दोस्तियों / संबंधों को निबाहने / भाषाओँ को सीखने से लेकर दिन प्रतिदिन की जीवन शैली में निषेध आज्ञायें जारी करने की रूचि या शायद हैसियत नहीं रखता था !
बहुत मुमकिन है कि आज के हालात में धर्म और उसके नाम से फैलाए जा रहे वैमनस्य की तुलना में मेरे किशोरवय निष्कर्ष / अनुमान बेहद कच्चे हों ?.....हो सकता है मेरा बचपन /मेरे दोस्त /मेरे सम्बन्ध ....केवल ....अपवाद हों ..या.. मेरी कल्पना की उपज हों और वास्तव में धर्म तब भी आज जैसा वहशियाना हरकतों और दरिंदगी को प्रेरित करने वाला रहा हो ? कौन जाने सच क्या है .....मैंने जो बचपन जिया वो ..या अभी जो महसूस होता है वो .....भला कोई ईश्वर /कोई धर्म , इंसानों को घृणाजीवी हिंसक और पशुवत कैसे बना सकता है ?
लगता है ...विषयांतर होने लगा है जबकि मैं गाय और उसके जीवन दाई दूध की शुद्धता और मुनाफे के लिए उसमें होने वाली मिलावट की चर्चा के लिए उस निबंध को याद कर था , जोकि मैंने बोर्ड परीक्षा की वैतरणी पार करने के लिए याद किया था !... कमाल की बात ये है कि मेरे मित्र गण मुक्ति के लिए /वैतरणी पार करने के लिए गाय का सहारा लेना चाहते हैं और मैं पहले से ही ले चुका हूँ ...जबकि कुछ लोग इस परोपकारी जीव से मिलने वाले जीवन रस को अपनी आजीविका का आधार बनाये हुए हैं और आजीविका को सम्पन्नता में परिवर्तित करने के चक्कर में बेचारी गाय को आक्सीटोन की डोज पर डोज दिए जा रहे हैं ?... गाय की ऐसी की तैसी ...लोगों की सेहत की ऐसी की तैसी ...जिसकी जान जाना है जाए !... माल अपनी पाकेट में बराबर आता रहे ! लगता है जैसे गाय इन धनकुबेरों /ग्वालों , की लालसा का शिकार होकर , लोगों को जीते जी नरक पहुंचाने का माध्यम बन गई हो ? अब कौन जाने गाय की तरह धर्म भी इन व्यवसाय प्रिय लोगों के 'आक्सीटोन इन्जेकटेड अभियान' चलाओ और माल बनाओ का शिकार हो गया हो ...?
वैसे मुझे मेरी कल्पना और किशोरवय के स्वप्न में ही जीना पसंद है फ़िर चाहे ग्वाले ...दूध ....गाय ....और धर्म के बिना भी !

गुरुवार, 2 जुलाई 2009

मैंने कहा जी मैं भी यही बेचता हूं और उसने फोन ......

झमाझम बारिश के दरम्यान कल शाम तक़रीबन ५.३० बजे आफिस से लौटा , सोचा चाय सुडकते हुए एक दो अदद ब्लाग्स पर टिप्पणी ठोंक दी जाये , लिहाज़ा पढने का सिलसिला शुरू ही किया था और मूड बन ही रहा था कि मोबाईल लेकर बिटिया पहुंच गई , पापा आपका फ़ोन है , देखा अनजान नंबर था , चाय के स्वाद और ब्लाग्स के आस्वाद में व्यवधान डालने वाले फ़ोन को रिसीव करना अच्छा नहीं लगा , सोच में आई कड़वाहट को दबाये बिना कहा , हेल्लो - उसपार कोई लड़की थी जिसने कुछ इस अंदाज में बोलना शुरू किया , गोया दुनियाये फानी के ख़त्म होने का वक़्त आ चुका हो और उसे इससे पहले अपनी बात पूरी कर लेना चाहिये ! वो बोल रही थी बिना सांस लिए /तेज़ रफ्तार ! मैं हरिद्वार ......हमारा संस्थान .......एक मुखी रुद्राक्ष ...... बारह हजार मंत्रो से अभिपूरित..........मैंने उसे रोकना चाहा और कहा सुनिये , पर उसने सुना नहीं , बस बोलती रही ! आपका घर धनधान्य से परिपूर्ण ......कोई बाधा नहीं ......राहू केतु शनि आपका बाल भी बांका नही .....घर में यदि वास्तु दोष हो तो वो भी दूर हो जायेंगे ! यूं तो इसकी कीमत है , मात्र ५५००/ रुपये पर आप हमारे 'लकी नंबर' है इसलिए आपको केवल १५५० /रुपये में हम इसे देंगें , इतना ही नही साथ में चार गिफ्ट .........!
इंसान से 'लकी नंबर' में बदल चुका मैं , उसे बोलने से रोक नहीं सका इसलिए खामोश रह कर सुनने लगा ! पर उसे मेरी खामोशी भी रास नहीं आई ! बोली सुन रहे हैं ना ? मैंने कहा जी ...सुन रहा हूँ , वो आश्वस्त हुई और बोलती रही ! बात ख़त्म हुई तो मुझे लगा जैसे किसी नें केवल दो मिनट में एक अध्याय पढने की शर्त लगा दी थी और वो शर्त जीत गई हो !
उसने कहा , अपना आर्डर बुक कराइये , कृपया अपना नाम और पता नोट करवा दीजिये ! मैंने कहा मुझे सोचने के लिए कुछ घंटे भी नहीं देंगीं ? उसने कहा ये आफर अभी अभी के लिए है बाद में छूट नहीं मिलेगी और कीमत ५५०० / रुपये हो जायेगी ! मैंने कहा कोई बात नहीं , मुझे सोचने दीजिये और आपका पता नोट करवा दीजिये ताकि मैं बाद में संपर्क कर सकूं ! अब वो उदास सी लगी और बोली इसी फोन नंबर पर बता दीजियेगा ! वैसे आप करते क्या हैं ? मैंने कहा जी मैं भी यही बेचता हूं और उसने फ़ोन डिस्कनेक्ट कर दिया !