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गुरुवार, 12 जनवरी 2012

पहले उसने कहा फिर मैंने !

इंसानों के दरम्यान अपनी भाषा के सौंदर्य / माधुर्य और दीगर समूहों की भाषा के कथित असौंदर्य / खुरदरेपन को लेकर होने वाले बहस-ओ-मुबाहिसे के अवसरों के समानांतर अक्सर ये ख्याल आता कि अगर भाषा ना होती तो ?   सभ्यता और संस्कृति के विकास में भाषा की लगातार अपरिहार्य मौजूदगी के चलते अक्सर एक धारणा बनती और बिगड़ती है कि , अखिल ब्रह्मांड में किसी ईश्वर के होने या ना होने से इंसानों को क्या फर्क पड़ता ? ...और फिर ये कि इंसान क्या होता जो उसके साथ कोई भाषा ना होती तो  ? 

अब ये कल्पना करने में क्या हर्ज़ है कि , यदि डाक्टर अरविन्द मिश्र यू.पी. के बजाये तेलंगाना में अवतरित होकर तेलगु को अपनी मातृभाषा कहते और मैं खुद इसी तर्ज़ पर तमिल , डाक्टर दराल असमिया होते , फिर संतोष त्रिवेदी मणिपुरी और देवेन्द्र पाण्डेय काश्मीरी या डोगरी वापरते ,सुब्रमनियन जी बलोचिस्तान में पैदा होते तो ?  राहुल सिंह कुरुख बोलते तो कौन सी कयामत टूट पड़ती  !  संजीव तिवारी पश्तो और घुघूती बासूती स्पेनिश , रश्मि रविजा पंजाबी और वाणी गीत सिंधी बोलतीं तो कौन से पहाड़ ढह जाने वाले थे ! सरदार बी.एस.पाबला कन्नड़ होते और सलिल वर्मा जेस्मिन क्रांति के सूत्रधार होते ,सतीश सक्सेना रास गरबा खेल रहे होते तो ? यकीनन दुनिया तब भी वैसी ही चलती जैसी आज है और अगर कुछ बदलता तो वो है एक विशिष्ट संपर्क सूत्र के प्रति हमारा मोह / हमारा अपनत्व !

और भी कई ब्लागर मित्र हैं जिन्हें अलग अलग भाषाओँ में फिट करके देखने की ख्वाहिश तो है पर ऐसा करने से इस पोस्ट की उम्र अयाचित ही लंबी करने का खतरा मैं मोल नहीं लेना चाहता...खैर भाषावाद के खास खांचे में ढले बगैर और किन्ही खास लिपियों की पैरोकारी के बिना सिर्फ एक तर्क को आगे बढ़ाना चाहूंगा कि भाषा भली वो जो मनुष्यों को आपस में संवाद करने की सलाहियत दे , चाहे ध्वनियों में या फिर निःशब्द ही !  अपने इसी कथन के समर्थन में दो अलग अलग लिपि वाली भाषाओँ में संवाद /अभिव्यक्ति के उद्धरण पेश कर रहा हूं ...                                        

उसने कहा 
यहां उनके चित्र को देखते हुए सोच रहा हूं कि पार्श्व में हरियाली और पाषाण भित्ति ,नीचे एक खाली पात्र और नहाने योग्य स्थान के ठीक सामने कुर्सी पर ठाठदार अंदाज में फोटो खिंचवाने में उनके व्यक्तित्व के कितने ही रंग उजागर हो जाते हैं ! शर्ट का गहरा चटख नीला रंग , ब्ल्यू प्लेनेट के 'मूल पर आधिक्य' लिए हुए फिर उसपर श्वेत वर्ण पैंट का काम्बीनेशन थोड़ा सा 'शांति के सहअस्तित्व जैसा' और इसके साथ ही फाइबर कुर्सी का सिंहासननुमा इस्तेमाल जैसे साधारणपन की स्वीकार्यता के साथ एक ठाठपन ! चित्र में शारीरिक दुबलेपन को हाबी नहीं होने देने की झलक स्वयमेव स्पष्ट है ! आपको आश्चर्य नहीं होना चाहिए जो उन्होंने सबसे आगे लगभग रक्तवर्णी पादुकाओं को प्रस्तुत किया हुआ है ! उनके स्याह केश और चश्में की मौजूदगी पर कोई वक्तव्य ना भी दूं तो पढ़े गये बाकी सारे रंग उन्हें उद्घाटित तो करते ही हैं !  कहने का आशय यह है कि उनके बारे में आपका अंदाज-ए बयां जो भी हो पर वे स्वयं भी अपने व्यक्तित्व को विविध रंगों और पाश्चर में उजागर करते हैं !
उसने कहा 
गहरी कृष्णवर्ण पृष्ठभूमि में निहित प्राइवेसी / गोपनीयता / अमुक्त अनिश्चित सत्य की तुलना में काव्य संकलन शीर्षक और कवि के नाम का धवलवर्णी प्राकट्य और रक्तवर्णी दो बिंदुओं का छोटा सा संयोजन कहता है कि कवि सायास ही ज्यादातर अव्यक्त (श्यामवर्ण) रहते हुए केवल दो रंगों की शब्द / रेखीय लघुता में नियोजित ढंग से प्रकट / अभिव्यक्त होता है ! अब ज़रा इसकी तुलना दूसरे पृष्ठ से करें जहां रंगों में अधिक वैविध्य नहीं है किन्तु पार्श्व के रंग के अनुपात में कवि स्वयं के रंगों को अधिक चटख / शोख तरीके से पेश करता है !  यदि आप दोनों पृष्ठों में तुलना करते हुए , शब्द और पार्श्व अनुपात तथा कवि स्वयं और उसके पार्श्व के अनुपात को देखें तो मेरे कथन की कदाचित पुष्टि ही होगी !

अब सवाल ये है कि क्या हममें से कोई भी बन्दा यह तय कर सकता है कि अभिव्यक्ति / संवाद के लिहाज़ से दोनों में से कौन सी लिपि श्रेष्ठ है और कौन सी भाषा ?

मंगलवार, 23 नवंबर 2010

इक राह फक़त मर्दों की ...

अपना कहना : 
पिछले काफी समय से संजीव जी का ख्याल था कि एक ही शैली में लिख लिख कर मैं उन्हें बोर करने लगा हूं सो बाकी के  यार दोस्त  भी बोर ही  हो रहे होंगे  , अनुमान लगाने में देरी  ना हुई  !  एक दिन  राहुल सिंह साहब  के आलेख  'फ़िल्मी पटना' पर टिपियाते हुए कह डाला कि "फोटो , पेंटिंग और फिर शब्‍दों में उतर कर कविता की तरह बही है यहां"...तो  यूं समझिए कि कह कर  फंस गए हम ! पिछली पोस्ट इन्हीं दो महानुभावों के प्रभामंडल से आतंकित होते हुए और टिपियाने में अपने बडबोलेपन ? को साबित करने की गरज़ से छापी थी और अब एक और छाप रहे हैं...आगे देखना ये है कि ये तस्वीरें, शब्दों और कथन की भरपाई कर पाती हैं कि नहीं ?

सामूहिक चिंता 


  
अकेली चिंता  






आखिरकार लोकेशन मिल ही गयी अगली ब्लागर्स मीट के लिए , कृपया पता नोट करें और सम्मति दें 




बस ख्याल रहे :
गर्मियों का तापमान रायपुर की टक्कर में ,बिजली पानी की कटौती २४ घंटे ,आगे की रिस्क अपनी अपनी ! कार्यक्रम की घोषणा आपकी  सम्मतियां मिलते ही !