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सोमवार, 19 दिसंबर 2011

ये कहां आ गये हम यूं ही साथ साथ चलते ...


अभी सुबह सुबह की ठण्ड में घर से बाहर के काम रास नहीं आते पर अपना परिवार अपनी जिम्मेदारी ,सरकारों पे अंगुली उठाने से तो निभने वाली नहीं ! सो गाड़ी उठाई और चल दिए काम पे ...वैसे हमारा पसंदीदा शगल ये कि जो भी लिखो सरकार के ऊपर लिखो ,सड़कों पे कचरा बिखरा , बाबू ने रिश्वत ली , नदी तट पर पालीथिन की भरमार , जगह जगह मानव उत्सर्जन के ढेर , दहेज के कारण नवविवाहिता का अग्नि स्नान , जमीन बटवारे को लेकर भाइयों में मारपीट , प्रेम को लेकर दो समुदायों में बलवा , बिजली के तारों पे लोगों ने हुक लगा कर बिजली चोरी की , राशन की चोरी ,  ड्राइविंग लाइसेंस से लेकर  जाने अनजाने करोड़ों मुद्दे पर हिट लिस्ट में एक ही नाम , सरकार निठल्ली कुछ करती क्यों नहीं ? मतलब ये कि नागरिक के रूप में हमारा योगदान क्या हो  ?  कैसी सरकार चुने का कोई ख्याल नहीं , बस एक ही रट ये सरकार ...

दिन तमाम ग्राहकी की उम्मीद में दुकानें सजने लगी हैं दुकानदारों ने अंदर का खास माल बाहर सड़कों के मुहानों पे अटकाना शुरू कर दिया है ! अब मार्केट में राह और सकरी होती जायेगी क्योंकि दुकानों ने ग्राहक लपेटने के वास्ते अपनी जीभ बाहर कर ली है ! दिन अभी शुरू ही हुआ है सो नगर निगम की कल्याण योजना में शामिल स्वीपर्स शिद्दत से धूल झाड़ने में भिड़ गये हैं...सारी सड़क की धूल अब सड़क के ऊपर के आसमान में  , मेरे हिस्से , नाक को रूमाल से ढ़कने के सिवा कोई विकल्प शेष नहीं ...कुछ दूरी पर चंद गायें सड़क के बीचो बीच पगुराती हुई बेफिक्र कि इंसानों को यहां से गुज़रना होगा और यह भी कि उनके बिना उनके मालिकान का जीवन कितना दुश्वार हो गया होगा...ये सरकार ...

यहां दुकान और मकान के भेद मिट चुके हैं...एन सामने नालियां बजबजाती हुई , रेत और गिट्टियां सड़क पर , ज़रूर अंदर कोई निर्माण का काम चल रहा होगा ! नालियों के ऊपर पक्की फर्श ढ़लाई और उसके ऊपर तक अपने घर / दूकान का एक्सटेंशन...निश्चय ही प्रवेश की सीढियां और रेम्प आगे चल कर इस सार्वजनिक सड़क को उपकृत करने वाली हैं  ! सार्वजानिक नल की टोंटियां अब नल पर नहीं हैं  ! चमचमाती  कार में बैठे बड़े साहब अपने मोबाइल कैमरे से इस  परिवेश और आसपास बिखरी हुई गंद-ओ- ग़ुरबत की तस्वीरें खींच रहे हैं ! उन्हें शौक है अपने परिवेश को निरखने और बरास्ता तस्वीर सामाजिक आर्थिक बदहाली-ओ-बदलाव पे आलेख चिपकाने का ! सुना है वे असल ज़िन्दगी में एयर ट्रेफिक कंट्रोलर हैं सो उन्हें समाजी जीवन के बदहाल ट्रेफिक की फ़िक्र का शौक पालने में सहूलियत हुई ! उनका ड्राइवर कार से उतर कर नाई की ओर लपकता है , साहब तुमसे मिलना चाहते हैं...लेकिन नाई को साहब के शौक आराई की फुर्सत नहीं  !  उसे रोजी कमाना है  बच्चे पालना है  !  वो शौक नहीं पाल सकता लेकिन आदत उसे भी है  ग्राहकों से निपटते हुए , नीचे गिर रहे बालों को बाहर की नाली की ओर धकेलने की  ,  आहिस्ता आहिस्ता ...ये सरकार...

राज्य के सबसे बड़े बैंक घोटाले के मुख्य आरोपी इन दिनों जमानत पर हैं  , दुकान के ठीक सामने मेरे करीब ही खड़े टीम अन्ना के शैदाई उनसे भावी आन्दोलन में शिरकत करने की गुज़ारिश कर रहे हैं और शिकवा भी कि भैय्या आप पिछले वाले में नहीं आये  ! वे कनखियों से मुझे ताड़ते है कि कहीं मैं उनकी बातचीत का नोटिस तो नहीं ले रहा ! मैं ब्लागजगत की प्रविष्टियों में लघु टिप्पणियों की तर्ज़ पर मुस्कराता हूं...अति सुन्दर  !  मुंह फेरने से पहले पूछता हूं , मुझसे कुछ कहा क्या ? मगर स्मित हास्य चेहरे पर चस्पा किये हुए...होठों पे  बुदबुदाता हूं सालो...लगे रहो...नहीं आपसे कुछ नहीं कहा  !  वे आश्वस्त हैं कि मेरा ध्यान उनपर नहीं है  !  ये  कहने में कोई हर्ज़ नहीं कि मेरा ध्यान , जैसा कि , उन पर है भी तो  ?   मैं  उनका क्या उखाड़ लेने वाला  हूं  !  खैर...मुझे घर लौटना है , मैं जानता हूं कि हम सब एक ही आदत में जी रहे हैं जहां खुद के गिरेहबान में झांकने की सख्त मुमानियत है  !  

शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

ये बेनाम कोई अपने ही रहे होंगे !


सच तो ये है कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट को खुद की मसरूफियात के खबरनामे की तरह से अंतरजाल पृष्ठ के हवाले किया था !मंतव्य ये कि कहीं ब्लॉग-जागतिक बंधु बांधव अपने एक पाठक की गुमशुदगी का भ्रम ना पाल बैठें !  हुआ ये कि एन उसी वक़्त क्रिकेट के विश्वविजय अभियान के समापन समारोह की एक नाज़ुक सी घटना का ज़िक्र भी कर बैठा ! मुझे लगा कि राष्ट्रीय प्रतीक और विजय आनंद के दरम्यान होश-ओ-हवास की बारीक सी ही सही पर विभाजक और विवेक सम्मत रेखा होनी ही चाहिए !

समारोह के समय खिलाडियों के व्यवहार को लेकर अपने असहमति कथन में मैंने खिलाडियों के अनजानेपन की एक ढ़ाल भी रख छोड़ी थी !  घटनाक्रम में जिस  संभावना की अनुभूति हुई उसे दर्ज़ करना  मेरा फ़र्ज़  था सो किया !  आलेख पर ब्लॉग-जागतिक मित्रों ने बेहद संतुलित और लाज़बाब प्रतिक्रियायें दर्ज कराईं ! बहरहाल काम काज के बीच जब भी मौका मिलता मित्रों के अभिमत माडरेशन से मुक्त कर जाता !  इस बीच तारीख  आठ  अप्रेल  दो  हज़ार  ग्यारह  को , एक  बेनाम  सुर स्पैम में जा अटका...पहले सोचा कि उसे  वहीं पड़ा रहने दूं पर अब लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार उस पर्देदार  को भी है !   ज़रा गौर फरमाइयेगा कि वे क्या कहते हैं ...

"तुम तो वो लोग हो जो पी के झूमते रहे इंडिया इंडिया करते रहे और उतरने पर तिरंगे का ख्याल आया या अल्ला...इन महान खोजो को करने वालों के लिए नोबुल पुरस्कार की व्यवस्था क्यों नहीं की ?? "

सोचता हूं कि ये बेनाम कोई अपने  ही रहे  होंगे जिन्हें  शराब और तिरंगे बाबत मेरी फिक्र कुछ ज्यादा ही आहत कर गई वर्ना शेष सारे टिप्पणीकारों की प्रतिक्रिया में ये तल्खी कहां है ?   खैर... उन्होंने मुझे विश्वविजय के इस ज़श्न में शरीक माना और पिलाई भी :)  उतारे के बाद ही सही पर ईश्वर और तिरंगे के ख्याल से जोड़ा और इससे आगे भी मेरा हौसला बनाये रखा :)  मुझे उनकी प्रतिक्रिया पर कोई प्रति-प्रतिक्रिया नहीं देनी है पर कहना इतना ही है कि उन्होंने जो भी कहा वो सब अगर अपने नाम से ही कह देते तो क्या मैं बुरा मान जाता :) 



सोमवार, 28 जून 2010

ओ प्रेत उस लड़की के घर तुम्हारा डेरा है अब !

आज मैं जो भी किस्सा बयान करने जा रहा हूं उसे सुनकर ये ना समझा जाये कि विज्ञान से मेरा विश्वास उठ गया है !  सच  तो ये है कि प्रेतों की मौजूदगी के अहसास ने विज्ञान पर मेरे भरोसे को और भी मजबूती दी है !  बचपन में  बरगद / पीपल और इमली के बुजुर्गवार दरख्तों को देख कर एक अदृश्य भय जागता ...सयाने कहते ,रात में वहां से गुजरना खतरनाक होगा क्यों कि उन दरख्तों मे अशरीरी आत्माओं का डेरा है !  वे कहते प्रेतों के उलटे पैर होते हैं , वे छाया की मानिंद गुम हो सकते है , वे प्रकाश पुंजों की तरह रात्रि विचरण करते है , वे हवा की तरह मानुष की देहो पर कब्ज़ा भी कर सकते है...वगैरह वगैरह और हम विश्वास करते...विश्वास की पृष्ठभूमि में तर्क का कोई स्थान भी नहीं था ये विश्वास केवल बड़प्पन और अनुभव पर भरोसे पर आधारित हुआ करता !   आहिस्ता आहिस्ता बचपन पीछे छूटता गया और साथ ही ये ख्याल भी कि प्रेत सचमुच में होते भी होंगे...अब थोडा सा दुःख  होता कि हमारे बड़े , फ़िज़ूल में डरते और डराते रहे ...प्रेतों के ना होने का ख्याल ज्यों ज्यों पुख्ता हुआ बुजुर्गो का सम्मान धूल होता गया !  लगता कमबख्त बूढ़े , बचपन खराब कर गये !  वर्ना उन शानदार दरख्तों की छाँव में क्रीडा का आनंद हम भी ले पाए होते !

एक अजीब बात ये कि जिस विज्ञान की वज़ह से हम प्रेतों का होना नकारते रहे आज उसी विज्ञान की वज़ह से प्रेतों का होना सिद्ध हुआ है ...और अफ़सोस भी हो रहा है कि हमने अपने बड़े बूढों को गलत समझा !  वे सही थे , हमसे ही उनका सन्देश / उनकी भाषा बूझने में गलती हुई वर्ना प्रेत उस वक्त भी देखे जा सकते थे !  असल में उन्होंने हमारे चहुँ ओर मौजूद जिन घटकों में प्रेतों का डेरा होने की बात कही थी , हम उन्हें महज दरख़्त ही समझते रहे और वहां प्रेत ना पाकर ...उन्हें गरियाते रहे !  

पिछले बरस अपने बनारस के मित्र के डेरे पर जाना हुआ वहां एक अशरीरी आत्मा को देख कर हैरान रह गया फिर सोचा ये केवल संयोग होगा !  संभव है मेरी आँखों का भ्रम हो ...उनके डेरे में बारम्बार घूमा...सामने शब्द उभरते...गहरे शब्द ...गोया वो प्रेत जतलाना चाहता हो कि मैं हूँ  मुझे बांचो ..मेरे अस्तित्व की पुष्टि करो !  मैं बेहद हैरान और परेशान सा उस वक्तव्य को पढता ...उसके शब्द ,विनम्रता की सारी सीमायें लांघते हुए धरती पर झुक से गये थे...गोया नतमस्तक हों पर उसके वक्तव्य का एक अर्थ यह भी था कि वो किसी ज़माने में डेरे के मालिक , मेरे मित्र का मित्र हुआ करता था पर अपनी  हीनभावना और सतत असफलताओं के चलते उसे यह लोक असमय ही छोडना पड़ा...खैर मै उस घटना को संयोग मानकर खामोश रहा ... जिल्लत का एक भय भी कि मित्र क्या कहेंगे अगर मैं कहूँ कि मैंने प्रेत देखा है और उसके शब्द भी पढ़े हैं !

इस बरस मेरी मित्र अनिंदिता के घर का उदघाटन हुआ उनके सारे शुभ चिन्तक वहां मौजूद थे पर मेरे आश्चर्य का पारावार नहीं कि वो प्रेत वहां भी हाज़िर था अपनी सम्पूर्ण विनम्रता के साथ !  अब मुझे विश्वास हो  गया है कि प्रेत होते हैं !  ओ प्रेत तुम हो  ...यक़ीनन तुम ही हो ...ओ प्रेत उस लड़की के घर तुम्हारा डेरा है अब !  मैं जानता हूं तुम दरख्तों में नहीं वेब साईट पर विचरते हो  आजकल !   तुम तो पुनर्जन्म में विश्वास करते हो फिर दूसरों के घर पर अशरीरी होकर डेरा डालने से बेहतर तुम अपना खुद का ब्लॉग क्यों नहीं बना लेते ?  अपने लिए एक आई डी / एक जिस्म का इंतजाम कर लो फिर शौक से दूसरों के घर आया जाया करो !  कम से कम लोग तुम्हें नाजायज़ / बेनामी / छद्म होने की गालियां तो नहीं देंगे !   

सोमवार, 21 जून 2010

उफ...ये शिष्ट बच्चा...सिर झुका कर...अपशब्द कहता है !

लोक-गल्प अच्छे अच्छों को निपटाने की गरज़ से गढ़े  और प्रसरित किये जाते है कभी सदेच्छाओं के साथ और कभी कभी सुनियोजित दुर्भावना के तहत  !   इंसानों से लेकर देवता तक इनकी मारक परिधि से बाहर नही और वैविध्य इतना कि श्लीलता  से लेकर अश्लीलता तक , शब्द से लेकर अपशब्द तक और  सौजन्यता से लेकर धृष्टता  तक के सारे के सारे भाव इनके अधिकार क्षेत्र में शामिल माने जाते हैं  !  गौर से देखा जाये तो ये भाषा और व्याकरण की सीमाओं से इतर और अंतरवर्ती  सभी क्षेत्रों मे व्याप्त  हुआ करते हैं , लोक-गल्पों का लोकव्यापीकरण , समय और जुगराफिया के दायरे का मोह्ताज नही !  इन्हें गली मुहल्लों की क्षुद्रता से लेकर विश्वव्यापी विराट मंच तक अपनी विजय पताका फहराते हुए देखा जा सकता है  !  कोई आश्चर्य नही कि लोक-गल्प जिस पर भी आरोपित कर दिये जायें वह पीढियों तक इनके पाश से बंधा रह जाता है , बल्कि आरोपित व्यक्ति / परिवार / कुल / गांव / समाज अपनी निज पहचान के बजाये आरोपित गल्प से पहचाना जाता है  !  जैसे पठान / सरदार या लखनऊ कहते ही समलैंगिकता की लोक-गल्प मुखर हो उठती है जोकि उनकी बहादुरी और नफासत जैसी विशेषताओं को हाशिये पर छोडती चलती है  ! वैसे ये  सम्भव है कि गल्प का स्रोत उसी इकाई की अच्छी या बुरी विशेषताओं मे से कोई एक हो  !

लोक-गल्प मे किसी अशिक्षित / गंवार परिवार के दुर्गुणों को उसके शिक्षित हो चुकने के बाद भी किस तरह से उकेरा जाता है ज़रा उसकी बानगी देखिये , कहते हैं कि एक परिवार अपने दिन प्रतिदिन के सम्वादों में अपशब्दों के आदतन प्रयोग के लिये कुख्यात था अभिभावकों ने सोचा कि हम तो बिगड ही चुके हैं , कम से कम बच्चे को शिक्षित और शालीन बनाया जाये ! लिहाज़ा बच्चा अध्ययन के लिये  परदेश भेजा गया और जब शिक्षित होकर वापस घर लौटा तो अभिभावकों के सीने गर्व से चौड़े हो गये , भोजन के समय बच्चे ने कहा "तनिक जल" दीजिये अभिभावक...पुलकित अहा ..हा  बच्चा पानी को जल कह रहा है , कितना सुसंस्कृत  ,  देखा 'बाहर'  भेजकर शिक्षा दिलाने का परिणाम...( बस गल्प यहीं से शुरु मानियें ) ...बच्चा बोल पड़ा अभी तो पानी को जल ही कहा है , तो  इतना खुश हो रहे हो जब घी को घृत  कहूंगा तो ...( अपशब्द् ) !  बस यूं  समझिये कि इस गल्प का निहितार्थ ये हुआ  कि  काबुल में घोडे होते होंगें पर अपना गधा वहां भेजने से घोड़ा नहीं बन जायेगा उसे गधा ही बने रहना है !

जाने अंजाने ब्लाग्स मे विचरते हुए उनके आलेखों और उनपर  नामी / बेनामी टिप्पणियों को पढते हुए मुझे अक्सर लोक-गल्प याद आ जाते हैं , अभी पिछ्ले ही दिनो अपने मित्र के ब्लाग से गुज़र रहा था कि एक छद्मनामी टिप्पणीकार को बांचते हुए बस एक ही ख्याल आया  "उफ...ये शिष्ट बच्चा...सिर झुका कर...अपशब्द कहता है"  अगर मैं गलत नही हूं ...मेरी स्मरण शक्ति ठीक ठाक है ...और मैने अपने केश धूप में नही सुखायें है  , तो उक्त छद्मनामी को मैने कुल जमा दो ब्लाग्स मे टिप्पणी करते हुए देखा है , तीसरा कोई ब्लाग बिल्कुल भी नहीं  ! मजेदार ये कि बन्धुवर अपनी मूल आई डी के साथ भी इन ब्लाग्स में नमूदार होते है  पर मूल आई डी के साथ कुछ ज्यादा ब्लाग्स में ...अब ये मत पूछियेगा कि मैने इन्हें पहचाना कैसे ?  मित्रो , गोपन क्या इतनी सहजता से ओपन किया जा सकता है ?  खैर अभी तो मैं सिर्फ इतना ही सोच रहा हूं  कि काबुल जाकर भी मेरा बच्चा घोड़ा  ना बन सका  !  आह ... मैं और ये गल्प ...!

शनिवार, 19 जून 2010

चिलमन ...पोस्ट आयटम...और पीने वाले गधे ...

आहा मानसून...सुबह से झमाझम...बीबी मेहरबान...गर्मागर्म मूंग बड़े के साथ टमाटर की चटनी और एक चुटकी काला नमक...ये  बीबियां...शौहर को काबू  में करने के नुस्खे खूब जानती हैं...पेट के रास्ते सम्मोहन का हुनर कोई इनसे सीखे...खैर अब  मैं  तैयार हूं...देखें  वे क्या आदेश  देती  हैं ! बेशक दुनिया भर में तानाशाही के विरोध में चिल्ला चोट करने वाला मैं घर की तानाशाही का मुरीद हूं...जानता हूं...एजेंडा हिडेन है पर परवाह नहीं ...क्योंकि 'रिश्ता' 'हिडेन एजेंडे' के सामने दम तोड़ देने वाली मेरी 'असहमतियों' को भी प्रेमिल...स्नेहिल स्पर्श का मरहम देता है ! अर्ज़ ये है कि 'रिश्तों में स्पष्टता' हो तो हिडेन एजेंडा और असहमतियों का दमन दुखदाई नहीं हुआ करता लेकिन रिश्ता अगर छदम हो तो...मरहम आलेपन की संभावनाये समाप्त हो जाती है और केवल  पीड़ा ही शेष  रह  जाती है ! कई  बार  सोचता हूं...काश  ब्लाग जगत भी परिवार की तरह से 'स्पष्ट रिश्तों' के साथ हिडेन एजेंडे और असहमतियों के क़त्ल का रणक्षेत्र बन पाता तो कितना सुखकर होता...पर अफ़सोस ऐसा है नहीं...यहां  'चिलमन' की ओट में छुपी हुई 'प्रतिभायें' आखेट पर  हैं और...मैं  दुखी हूं ...

कल  रात अपने  संजीव   जी  से चर्चा हो रही थी मैंने  पूछा  मित्र...मेरे  शहर  में ...एक  ब्लागर  बंधु  के आने की खबर है...वैसे तो मैं उनसे परिचित नहीं पर शिष्टाचार के तक़ाजे से भेंट करने पर आपकी क्या राय है? वे बोले...हाहाहा...मस्त आदमी है, व्यावहारिक आदमी है, यार बाज़ / शौक़ीन आदमी है, जरुर मिलिये ! मैंने कहा यार बाज़ तो ठीक पर शौक़ीन ? उन्होंने कहा हाँ...मिलिये तो सही, मजा आयेगा फोटो शोटो होगी, चर्चा होगी...मुमकिन है वे आपको अपनी ब्लॉग पोस्ट में भी शामिल कर लें !...संजीव भाई मिल तो लूं पर उन्होंने 'खबर' में कोई 'पता' भी नहीं छोड़ा है...और ब्लाग पोस्ट में 'आयटम' बतौर शामिल होने वाली सम्भावना से आप मुझे भयाक्रांत कर रहे हैं...खैर कोशिश करता हूं कि 'बे'-पता को पकड़  पाऊं...लेकिन 'आयटम डांसर' की तर्ज़ पर 'पोस्ट आयटम' होने का ख्याल मेरे कदम वापस खींच रहा है ! कल रात ही धोबियों  की फिक्र में संजीव भाई , एक उदास गधे का बेहद खूबसूरत फोटो अपने ब्लॉग में चिपका चुके है...उन्हें मुझे पर्याप्त डरा चुकने के बाद भी ये फोटो छापने का ख्याल कैसे आया पता नहीं...पर मैं...पोस्ट आयटम...होने के खतरे बखूबी भांप रहा हूं , बस इसी  डर से उनकी धोबियों वाली पोस्ट पर एक कमेन्ट करना मेरी मजबूरी हो गया समझिये  !