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गुरुवार, 23 जून 2022

जन गण तेरी जय हो...

अनंत ब्रह्मांड की अरबों खरबों आकाश गंगाओं में से एक, मन्दाकिनी के सर्पिलाकार बाह्य छोर पर अस्तित्वमान सौर परिवार  और उसमें मौजूद, एक नन्ही, किन्तु खूबसूरत नील ग्रह पृथ्वी, जीवन के इंसानी स्वरूप का, कदाचित अब तक ज्ञात, एक मात्र प्रतिनिधि ग्रह है जोकि इंसानों के अस्तित्व रक्षण के लिए प्रचुर मात्रा में प्राकृतिक संसाधनों से लैस है और इन्हीं संसाधनों पर आश्रित रहते हुए, शताब्दियों से मनुष्य का जीवन अस्तित्व बना हुआ  है । यही कारण है कि इन नैसर्गिक संसाधनों पर कब्जेदारियों को लेकर मनुष्यों ने अनेकानेक राष्ट्र गढ़े हैं, बहु-देश बनाये हैं, पारस्परिक सहिष्णुता विकसित की है और इसके समांनातर असहिष्णुता के परकाले भी बन गये हैं

ब्रह्मांडीय दृष्टि से, यह विश्व, एक धरा, एक भूखंड है किंतु मनुष्यों ने इसे खंड खंड कर बांट रखा है, कथनाशय यह कि मनुष्यों की देहाकृति सह जीवन साम्य के बावजूद मनुष्यों ने अपने लिए सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक भिन्नताओं की निर्मिती की है और वे जहां मौजूद हैं, उस जगह से बाहर निकलकर किसी अन्य भूखंड अथवा देश के नैसर्गिक संसाधनों पर कब्जेदारियों की प्रत्यक्ष अथवा छद्म मुहिम छेड़ने में निष्णात सिद्ध हुए हैं , वे अपने अस्तित्व रक्षण के लिए दूसरे मनुष्यों के अस्तित्व को दांव में लगाने से नहीं चूकते, अतः सम्पूर्ण विश्व और वैश्विक संसाधन, मनुष्यों की पारस्परिक कब्जेदारियों की इच्छाओं के अधीन, सदैव युद्ध जैसी स्थितियों में बने रहते हैं

बहरहाल साहित्य में भारतीय राष्ट्रीयता और स्वतंत्रता आंदोलन के विषय में चर्चा करने से पूर्व यह स्मरण रहे कि यह चर्चा, आंग्ल युगीन दासत्व तथा उससे मुक्ति की कामना में किए गए प्रतिरोध को संबोधित है, किन्तु आंग्ल युगीन दासत्व का कालखंड भारत के समेकित सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि का समुचित प्रतिनिधित्व नहीं करता है अस्तु  यह उचित होगा कि भारत में ब्रिटिश राज्य सत्ता की स्थापना से पूर्व के समय का भी पूर्वावलोकन कर लिया जाये, सो मुगल या उससे बहुत पहले के भारतीय समाज में अन्य बहिरागत जन-जत्थों के योद्धा स्वरूप आगमन के कारणों और उनके लक्ष्यों की चर्चा अपरिहार्य है

विचारणीय प्रश्न यह है कि भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक कालखंड विशेष में सीमित करने तथा उक्त कालखंड में रचे गए साहित्य में उल्लिखित राष्ट्रीयता और मुक्ति आंदोलन पर विचारण, क्या भारतीय अस्मिता की संपूर्णता का प्रकटीकरण करता है ? जिसके आधार पर भारतीय दासत्व और दासत्व से मुक्ति का कथन किया जा सके ?  यदि अतीत की ओर मुड़कर देखें तो पायेंगे कि प्राचीन भारत की भौगोलिक सीमायें घटती बढ़ती रही हैं और इस भू-भाग विशेष में बसी हुई जनसंख्या, किसी भी दौर में सांस्कृतिक, सामाजिक, धार्मिक अथवा आर्थिक रूप से एक समान नहीं थी वे लोग, लघु-भूखंडीय तथा सामान्यतः अ-लोकतांत्रिक, जन्म जन्मान्तर की विरासत परम्पराओं पर आधारित, रियासतों में बसे हुए तथा अपने से भिन्न, अन्यान्य रियासतों से संसाधनगत अथवा बहुतायत से यौन साहचर्य की आकांक्षाओं में लिप्त, युद्धरत, कुल, परिवार, समूह सह अधीनस्थ जनसमूह थे

कहन ये कि तत्कालीन भारत में, देस तो अनेक थे, किंतु कोई एक महादेश अथवा राष्ट्र नहीं था। उल्लेखनीय है कि आंग्ल युगीन भारत में स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा में, अतीत कालीन भारत की बहु-रियासती, राजतांत्रिक अधिसत्ताओं के मध्य अनायास, सायास  होने वाले युद्धों अथवा भारत नामित अन्तः भू-खंडीय संग्राम की कोई चर्चा सम्मिलित नहीं है ऐसा नहीं है कि उन दिनों, भारत में केवल राजतंत्र थे और लोकतन्त्रों का कोई अस्तित्व नहीं था, चाणक्य और चंद्रगुप्त की जुगलबंदी के दौरान, उत्तर पश्चिमी सीमांत प्रांत के गण राज्यों का उल्लेख, भारत की लोकतांत्रिक अधिसत्ता प्रणाली का साक्षी है, जिसे राजतंत्र लील गया था । वस्तुतः यह देश तत्कालीन समय में युद्धरत देसों, रियासतों का जीता जागता उद्धरण है जिनमें से अधिकांश किस प्रकार के स्वतंत्रता आंदोलन में लिप्त थे यह कहना कठिन है

यहां धार्मिक, आध्यात्मिक, वैचारिक समृद्धि की भिन्न  परंपरायें मौजूद रही है किंतु उन सब के दरम्यान असहिष्णुता का चरम भी देखने को मिलता है यथा पश्चिमी देशों के जैसा भौतिक जीवन बोध रखने वाला लोकायती संप्रदाय पारस्परिक असहिष्णुता का शिकार होकर विलुप्त हो गया है । अस्तु यह स्वीकार करने में संकोच नहीं होना चाहिए कि प्राचीन भारत में राजतांत्रिक व्यवस्थाओं के विरुद्ध मुक्ति आंदोलन अथवा कथित वैचारिक समृद्धि से मुक्ति या फिर उक्त वैचारिक समृद्धि के अनुकरण को लेकर शताब्दियों तक संभ्रम, कुहासा व्यापित मिलेगा । इसके समान्तर यह तथ्य भी स्वीकारणीय है कि भारत, वैश्विक व्यवस्था से सर्वथा भिन्न, अलग रहा हो ऐसा भी प्रतीत नहीं होता सत्य तो यह है कि वैश्विक जनसंख्या में भारत जैसी असमतामूलक राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और जन-बसाहटों की व्यवस्था मौजूद रही है

बहरहाल वैश्विक परिदृश्य में ब्रिटिश, फ्रेंच अथवा स्पेन या पुर्तगीज मूल के साम्राज्यवाद की उपस्थिति और इस उपस्थिति के समानांतर वैश्विक परिदृश्य में भारत की साम्राज्यवादी, उपनिवेशवादी, बाजारवादी गैर मौजूदगी गौर तलब है  वे कौन से कारण हैं जो ब्रिटेन जैसा लघु द्वीपीय देश तथा फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल और नीदरलैंड जैसे समुद्र तटीय लघु देश जोकि भारतीय संबोधन के अधीन उल्लिखित भूखंड के समतुल्य या पासंग भी नहीं थे, पूरी की पूरी पृथ्वी को नाप बैठे तुलनात्मक दृष्टि से देखें तो भारत और इन सभी लघु देशों की समुद्री तट रेखा की लंबाई में जमीन आसमान का अंतर है, किंतु छोटे- छोटे यूरोपीय देश, विश्व में साम्राज्यवाद का प्रतीक बन गए और भारत अपने आंतरिक कारणों से दासत्व का जीता जागता उदाहरण बन गया

यहां ये तथ्य उल्लेखनीय होगा कि ब्रिटिश, स्पेनिश, पुर्तगीज और डच बसाहटों  में भूमि की न्यूनता थी जबकि भारत के पास तुलनात्मक रूप से विशाल भूखंड मौजूद था । यूरोपीय देश अपने अस्तित्व रक्षण के लिए अधिकाधिक नैसर्गिक संसाधनों को जुटाने, व्यापार करने के और जीवन यापन के लिए महासागरों की यात्राओं के लिए विवश थेउन्हें अपने सीमित भूखंडों के इतर जीवन यापन के संसाधन, समुद्र तथा विदेशी बाजारों से प्राप्त होते थे, जबकि भारतीय मूल की छोटी बड़ी रियासतें, अधिकांशतः कृषि व्यवस्था और उपलब्ध संसाधनों के न्यूनतम स्तर पर जीवन यापन हेतु संकल्पित बनी रही हैं, यद्यपि इस संकल्प में कतिपय समुद्र तटीय क्षेत्र सम्मिलित नहीं हैं, जहां मत्स्य आखेट किया जाना, अपरिहार्य प्रतीत होता है

जहां यूरोपीय देश, जीवन के लिए सतत संघर्ष की योजना के अधीन अपने समुद्री जहाजी बेड़ों को मजबूत और अधुनातन कर रहे थे, वहीं भारतीय जनमानस, अन्य देशों, बहिरागत बाज़ार गमन हेतु वांछित समुद्री यात्राओं के लिए धर्म-च्युत, पतित हो जाने के संकट और आशंकाओं से मार्ग दर्शन प्राप्त कर रहा था । वो नितांत, धार्मिक कारणों से समुद्री अथवा विदेश यात्राओं पर निकलना ही नहीं चाहता था, अतः उसे, मजबूत, अधुनातन नौ-सैन्य बेड़े की आवश्यकता ही नहीं थी । स्पष्ट है कि यूरोपीय देशों के बरक्स भारत, समुद्री यात्राओं और उनके समर तंत्र से मुंह फेर कर बैठा था जबकि यूरोपीय देश अपने अस्तित्व की रक्षा के नाम से समुद्र पर अधिकार को अपनी प्राथमिकता मानकर चल रहे थे, सो यूरोपीय लघुता के पास भारतीय (खंड खंड) विराटता के विरुद्ध समुचित समुद्री समरतंत्र, परिवहन तंत्र मौजूद था, अतः भारत, दासत्व के लिए अभिशप्त देश हो कर रह गया

छोटे छोटे यूरोपीय देशों ने अपनी ताकतवर नौसैन्य शक्ति के दम पर, पहले पहल विश्व व्यवस्था में मौजूद, समृद्ध वैश्विक अर्थ तंत्र सह बाज़ारों को खोजा और बाद में बाजारों पर अपनी सत्ता स्थापित कर ली उन्होंने उपनिवेश बनाये और इसी तर्ज पर भारत उपनिवेश होकर रह गया वे भारत के बाजारों में गरम मसाले तथा अन्यान्य सामग्री खरीदने आते थे और धीरे धीरे अधिकांश भारतीय रियासतों के अधिनायक हो गये अतः भारत में आंग्ल युगीन स्वतंत्रता आंदोलन की चर्चा करने से पूर्व यह चर्चा आवश्यक है कि पूरे विश्व में मौजूद जनसंख्या ने अपने लिए अलग-अलग भूखंडों की राष्ट्रीयतायें कैसे गढ़ीं और क्यों कर गढ़ीं ? भिन्न राष्ट्रीयताओं के लिए उपलब्ध, प्रतिनिधि भूखंड पर मौजूद नैसर्गिक संसाधनों पर बसी हुई जनसंख्या के अस्तित्व रक्षण का भार होता है अतः प्रत्येक राष्ट्रीयता अपने नैसर्गिक संसाधनों के इतर अन्य भूखंडों अथवा अन्य राष्ट्रीयताओं की आर्थिक गतिविधियों में लिप्त होकर, उनके नैसर्गिक संसाधनों पर प्रथम दृष्टया काबिज होने की चेष्टा करती हैं और ऐसा ही आंग्ल युगीन भारत में भी हुआ

वे व्यापार करने आए थे, उन्होंने बाजार ढूंढा और फिर बाजार के नैसर्गिक संसाधन स्रोत भूखंड पर कब्जा जमा लिया, इस कारण से स्रोत भूखंड पर पहले से मौजूद और अपने अस्तित्व के लिए निर्भर जनसंख्या, दासत्व के लिए अभिशापित हो गई इसीलिए राज्य सत्ता की स्थापना से पूर्व और राज्य सत्ता की स्थापना के कारणों के तौर पर हमें मूलतः संसाधनगत और बाजारगत मुद्दों की चर्चा करना होगी और यह भी स्वीकार करना होगा कि वे, मनुष्यों के आर्थिक हित ही हैं जो किसी एक राष्ट्र अथवा देश को दासत्व स्वीकार करने पर विवश करते हैं । गौर तलब है कि अन्य यूरोपीय देशों की तुलना में ब्रिटिश व्यापारी, वैश्विक बाजारों, नैसर्गिक संसाधनों, पर कब्जा करने में अधिक सफल रहे और साम्राज्यवादियों में उनका स्थान सर्वोपरि रहा

उन्होंने भारतीय मूल की अनेकों रियासतों में,ना केवल नैसर्गिक संसाधनों की लूट की बल्कि कालांतर में नैसर्गिक संसाधनों वाले भू-क्षेत्रों में शासक भी बन गए ऐसे में आंग्ल साम्राज्य के विरुद्ध स्वतंत्रता आंदोलन को, मूलतः अंग्रेजों के आधिपत्य से, अपने भूखंड के नैसर्गिक संसाधनों की मुक्ति का संग्राम माना जाना चाहिए, वे व्यापारी थे, उनके आर्थिक हित थे और भारत की अधिकांश रियासतें प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष रूप से ब्रिटिश बाजारवादी हितों को पूरा करने वाली चेरियों के तौर पर देखी जाना चाहिये भारतीय रियासतों और आंग्ल प्रबंध तंत्र के अधीन, नैसर्गिक संसाधनों की लूट के विरुद्ध भारतीय जनमानस का विरोध स्वाभाविक था,क्योंकि उन्हें स्वयं अपनी और आगत पीढ़ियों की अस्तित्व रक्षा के लिए अपने नैसर्गिक संसाधनों की मुक्ति आवश्यक प्रतीत हो रही थी,अतः ब्रिटिश सत्ता जोकि संख्या बल के आधार पर केवल प्रातीतिक सत्ता थी,उसे उखाड़ फेंकना था

यद्यपि ऐसा करने में भारतीय जन गणों को शताब्दियां लगीं, क्योंकि वे आंतरिक रूप से परस्पर भिन्नता के सम्मोहन से पीड़ित थे, उन्हें आंग्ल सत्ता के लोकतंत्रवाद को स्वीकारने में समय लगा, उन्हें यह समझने में भी समय लगा कि अंग्रेजों की राजनीतिक सत्ता निर्बल सत्ता है, जबकि उसकी नीयत में बसा हुआ, बाजारवाद सह नैसर्गिक संसाधनों का दोहन, भीषण है, अतः भारत में राष्ट्रीयतावाद की धारणा के स्वीकरण  के लिए यूरोपीय राष्ट्रवाद का अभिवादन और स्वतंत्रता आंदोलन के लिए, भारतीय नैसर्गिक संसाधनों की लूट को रोकने के विचार के लिए कतिपय रियासतों के शासकों, नाममात्र के मुग़ल शासकों, झांसी की मराठा अधिसत्ता के ध्वंसावशेष और अन्यान्य जागरूक प्रतिनिधियों के जैसी अकुशल सैन्य टुकड़ियों, अनियोजित गठजोड़ तथा भारतीय खेतिहर मजदूरों का वंदन, जिन्होंने सर्वप्रथम आंग्ल व्यापारियों को खदेड़ने का उपक्रम शुरू किया

कालांतर में महात्मा गांधी और उनके समानांतर जन-नेतृत्व ने इस मुहिम को धार दी । सो आंग्ल युगीन सत्ता के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम, वस्तुतः राजनीतिक स्वतंत्रता संग्राम बाद में है, प्रथमत: वह बाजारवाद से मुक्ति, आर्थिक शोषण से मुक्ति और अपने कब्जे के भूखंड के नैसर्गिक संसाधनों की मुक्ति तथा आगत पीढ़ियों के सुरक्षित जीवन की आश्वस्ति के तहत लड़ा गया युद्ध है, प्रतिरोध है, विश्व में ऐसी घटनायें सामान्यत: घटती रहती हैं क्योंकि जन-बसाहटें, अपने भूखंड के प्रति देश अथवा राष्ट्रीयता के भाव से जुड़ी होती हैं और वे अपने भूखंड के नैसर्गिक संसाधनों पर अपने कब्जे की सुरक्षा के भाव से, बाहरी शक्तियों तथा उनके आक्रमण के प्रति सचेत बने रहते हैं । यद्यपि संभव है कि बाह्य शक्तियां, बाजार के रूप में किसी विशिष्ट भूखंड अथवा देश पर अपनी अप्रत्यक्ष  कब्जेदारी बना चुकी हों

किन्तु  विश्व में ऐसा कोई देश नहीं है, जिसने अपने जीवन के सुदीर्घ समय में अपने भूभाग की सीमाओं के घटते बढ़ते रूप का साक्षात नहीं किया हो, अतः भारत ने भी ब्रिटिश, उपनिवेशवाद, बाजारवाद से मुक्ति के समय द्वि-राष्ट्रवादी पीड़ा को भुगता है और अपने लिए निर्धारित, आश्वस्ति के भूखंड को कम होते हुए देखा है, अतः दुनिया में राष्ट्रों के पुनर्गठन, जुड़ाव और टूटन को प्रथमत: आर्थिक कारणों से जोड़कर देखा जाना चाहिये, तदुपरांत आर्थिक हितों की रक्षा के लिए निर्धारित की गई, राज्य सत्ता से मुक्ति अथवा नई राज्य सत्ता की स्थापना की बात की जानी चाहिये

दासत्व से मुक्ति के आर्थिक और राजनैतिक आयाम के इतर यह तथ्य ध्यातव्य है कि आंग्ल युगीन भारतीय समाज ने ब्रिटिश समुदाय को विकास और आधुनिकता का प्रतीक मानते हुए, स्वयं के दोयम दर्जा होने की जो मनःस्थिति स्वीकार कर ली थी, वो आज भी विद्यमान है अतः दासत्व की पूर्ण विदाई अथवा देश की आद्योपांत स्वतंत्रता की बात बेमानी मानी जायेगी । यह सत्य है कि चन्द्रगुप्त काल के गण राज्यों के पतन के बाद, भारत को, अंग्रेजों से विरासत में लोकतान्त्रिक राजनीतिक प्रणाली मिली और प्राचीन भारतीय लोकायती अथवा चार्वाक दर्शन परम्परा की चिता में, शेष राख से, आंग्ल-यूरोपीय तर्ज का, भौतिकतावादी फीनिक्स पुनः जी उठा ।

आध्यात्मिकता और चार्वाक दर्शन परम्परा के पारस्परिक द्वन्द्व में निष्प्राण हो गये, चार्वाक दर्शन का पुनर्जन्म, आंग्ल दासत्व का नव प्रतीक है अथवा प्राचीन भारत की लुप्तप्राय वैचारिक विरासत की पुनर्स्थापना ? स्पष्ट रूप से कह नहीं सकते कि स्वतंत्र भारत के आगत समय के लिए सुनिश्चित यह वैचारिक द्वन्द्व, अंग्रेज साम्राज्यवादी छोड़ कर  गये हैं अथवा यह भारतीय सामाजिक अंतर्विरोधों की आत्मा में मूलतः निष्पंद किन्तु आंग्ल सत्ता में निहित प्रेरणा से पुनः जीवित हो जाने के लिये प्रतीक्षारत था । बहरहाल अंग्रेजों की आर्थिक, राजनैतिक आयामों वाली विदाई के बाद की भारतीय स्वतंत्रता में, अंग्रेजों के, सांस्कृतिक, सामाजिक वर्चस्व का सम्मोहन अब भी शेष है और यह भी, परतंत्रता का ही एक रूप है ।

आंग्ल-युगीन अनेकों रियासतें और जन-गिरोह अंग्रेजों की विदाई के विरोध में थे और तब बहुतेरे जन गण और रियासतें, अंग्रेजों की विदाई तथा स्वशासन के पक्ष में । अंग्रेज वैमनस्य और विभाजन के कांटे बो कर गये, भारतीय नस्लें, पीढ़ियों तक उसका परिणाम भुगतेंगी कदाचित यह मुक्ति संग्राम चिरकाल तक जारी रहे...और हां, साहित्य का क्या ? वो तो घटित घटनाक्रम का प्रतिरूप होता है , आगे भी होता रहेगा ।

शुक्रवार, 29 अक्टूबर 2010

खत तेरा कासिदों के पास जो है सांस मेरी लबों पे अटकी है !

सुबह सुबह बाहरी दरवाजे की हर आहट पर ध्यान रहता है , उधर घंटी बजी इधर बेटा दौड़ा , न्यूज पेपर आया होगा  ?  हर रोज यही सिलसिला ! आम तौर पर हेड लाइन्स देख , मज़मून भांपने की शैली में पेपर पढ़ना एक आदत निबाहने जैसा लगता है...एक रूटीन सा !  पिछले कुछ महीनों से संजीव तिवारी की कृपा से 'छत्तीसगढ़'  समाचार पत्र भी सुबह सवेरे की मुहब्बत का हिस्सा बन गया है पर खास बात ये कि खबरों से फिसलन के बावजूद सम्पादकीय पर अटकना ही पड़ता है  !  बस ऐसे ही कल यानि कि  बृहस्पतिवार को भी 'असहमति और राजद्रोह' के उनवान  पर ठहर सा गया !  मुद्दा अरुंधति के बहाने 'विचार'  पर सहमत और असहमत होने के ख्याल से वाबस्ता होने के कारण बेहद अपना सा लगा क्योंकि विचार के प्रति असहिष्णुता मुझे भी आहत करती आई है !  उक्त सम्पादकीय पर मेरी प्रतिक्रिया से पहले ही संजीव  इसे अपने ब्लॉग मे प्रकाशित कर बौद्धिकों का अभिमत मांग चुके हैं ! 

विषय , अरुंधति , मार्क्सवाद ,  काश्मीर और राष्ट्रवाद से जुड़ा हो तो उस पर "श्रृगाल वत हुआ हुआ" ब्रांड टिप्पणी निज तौर पर मुझे पसंद नहीं क्योंकि इसमे विषय और विचार के प्रति तर्कपूर्ण प्रतिवाद कम और मित्रों  के संवेदनशील / भावुक मिजाज माइंड सेट का जोर ज्यादा रहता है !  कहने का आशय ये कि प्रेम , श्रद्धा और भावुकता के साथ किन्हीं मुद्दों से हमारा जुड़ाव किसी 'विचार' विशेष की विवेक सम्मत , तर्कपूर्ण और निरपेक्ष शल्यक्रिया का अवसर छीन लेता है !  खतरे साफ़ तौर पर दो है , एक तो हम विचार के प्रति प्रेम मे अंधे की तर्ज पर सत्य से भटक सकते हैं और दूसरा , मौलिक विचार के प्रति असहिष्णुता , पूर्वाग्रह हमारे व्यक्तित्व का क्रूरतम  पक्ष कहलायेगा  !  मेरा ख्याल है कि अरुंधति के बारे में , मैं किसी भी निष्कर्ष पर तब पहुंचूंगा जबकि उनका वक्तव्य मैंने स्वयं पढ़ लिया हो और हर्फ़ दर हर्फ़ , उसकी विवेकाधारित विवेचना कर पाऊं वर्ना मुझे क्या अधिकार है कि सुनी सुनाई बातों के आधार पर कोई धारणा बनाऊं ?  क्या ये संभव नहीं कि आज अरुंधति , कल मैं , परसों आप , इस भेडचाल , सुने सुनाये , धारणावाद का शिकार हो जायें ? ज़रा कल्पना कीजिये कि मुझे या आपको समझे या पढ़े बगैर कोई 'भीड़' रिजेक्ट कर दे , राजद्रोही ठहरा दे  ?  संभव है कि तमाम सन्दर्भों और शब्दों की तर्कसंगत पड़ताल के बाद अरुंधति के 'विचार'  विशेष को खारिज ही होना पड़े ,  तब नि:संदेह उन्हें  विधिक नतीजों को भुगतने के लिए तैयार रहना होगा किन्तु शब्दों को सुनवाई से पूर्व ज़ज्बाती तौर पर खारिज किया जाना अनुचित है ! लगभग ऐसा जैसे कि कोई न्यायालय आरोपी का पक्ष जाने बगैर सज़ा सुना दे! मेरा ख्याल है कि विचारों के प्रति ऐसी निर्ममता किसी भी स्तर की बौद्धिकता का हिस्सा नहीं मानी जा सकती ! 

कोई दो दिन पहले ही शिखा वार्ष्णेय के ब्लॉग पर ऐसी ही टिप्पणियों की भरमार देखकर मन काफी विचलित हुआ , विश्वास नहीं होता कि उनमें से किसी भी बुद्धिजीवी ने अरुंधति का मूल वक्तव्य पढ़ने का कष्ट किया होगा या कि पढ़कर रिजेक्शन का ख्याल किया होगा ! क्या मानूं इसे  ?  ना कोई वाद और ना ही कोई प्रतिवाद , बस सजा और केवल सजा की घोषणायें !  कैसा बौद्धिक विमर्श था ये  ?  दूसरे मित्रों की तो कह नहीं सकता पर अपने विचारों / शब्दों की सुनवाई ज़रूर चाहूँगा !  आखिर को मेरे विचारों और शब्दों को भी अपना पक्ष रखने का अधिकार है कि नहीं ?  बस यही तर्क मैं सभी तरह के बौद्धिक विमर्शों और विचारों के स्वीकार अथवा अस्वीकार की कसौटी के साथ संबद्ध कर देखना चाहूँगा !

'छत्तीसगढ़' के इस चिंतनपरक सम्पादकीय में राजद्रोह के मसले पर गृहमंत्रालय और उच्चतम न्यायालय के अभिमत का ज़िक्र किया गया है और यह भी कि इन बिंदुओं को अनेकों राजनेता पहले भी स्पर्श कर चुके हैं तो अरुंधति  ?... सच कहूं तो काश्मीर मेरे लिए भी जीवन मृत्यु का प्रश्न है ! मैं सपने में भी नहीं सोच सकता कि वह मेरे मुल्क का अटूट हिस्सा नहीं है !   उसके मुल्क से अलग होने का ख्याल भी मेरे लिए खुदकुशी करने जैसा है !  पर इसका मतलब ये नहीं कि मैं इसपर किसी दूसरे बंदे के तर्क भी ना सुनूं  ?  जब मैं कहता हूं कि काश्मीर मेरे मुल्क का मुकुट और अभिन्न अंग है तो इसे विधि सम्मत ठहराने के लिए मुझे महाराजा हरिसिंह का दस्तखत याद आता है जिसने विलय पर अंतिम मुहर लगा दी और अलगाव की सारी संभावनाएं समाप्त कर दी , लेकिन अगर कोई दूसरा कहे कि महाराजा हरिसिंह की बतौर शासक उपस्थिति के दिनों में काश्मीर मेरे मुल्क से अलग था तो  ?  ये  तो सहज तर्क की प्रक्रिया है फिर मैं भला इससे खफा क्यों होऊं ?  मेरे लिये  ' था '  और ' है '  में  से विकल्प चुनना कठिन कहाँ है  ?  अगर अरुंधति ' था ' का ज़िक्र करती हैं  तो क्या  ?  मेरे पास तो ' है'  ना  ?    ' है' जो वर्तमान और यथार्थ है क्या उसे अरुंधति ने अस्वीकार किया  ?  इसे जाने / पढ़े  बगैर राजद्रोह के निर्णय तक कैसे पहुंचूं ?

काश्मीर मे पंडितों और मुसलमानों का सहअस्तित्व मेरा ख्वाब है इसे यथार्थ मे बदलना चाहिए पर अतिवाद और अलगाववाद की बुनियादी वज़हों से निपटे बगैर ख्वाब को यथार्थ में कैसे बदला जाये ?  वार्ता भी ना करें ?  जो हमारा हिस्सा है जो हमारे नागरिक हैं उनकी बात भी ना सुने  ?  बहुत दिनों से एक जुमला सुनते आया हूं कि "सारे मुसलमान आतंकी नहीं होते पर ज्यादातर आतंकी मुसलमान क्यों हैं ? "  कितना सरलीकरण है , अपनी तर्ज पर बात को कहने के लिये  ?  अब इसी सरलीकरण को एक दूसरे रूप में देखिये...मुल्क के इतिहास में देश से धोखा करने वालों की  गिनती करके क्या ये कहा जाये कि " सारे हिंदू गद्दार नहीं पर ज्यादातर गद्दार हिंदू क्यों हैं  ? "  क्या  बकवास है  !  इस कुतर्क को लिखते हुए भी लज्जित हूं क्योंकि सच मुझे पता है कि सैन्यबलों में आबादी का अनुपात इस कुतर्क को होने की वज़ह देता है वर्ना गद्दारी और देशप्रेम का सर्टिफिकेट धर्म आधारित हो ही नहीं सकता !  वास्तव में ऐसे कुतर्क उन लोगों का सहारा हैं जो विचारों के प्रति असहिष्णु और  निर्मम हैं !  जिन्हें खुद के तर्कों पर भरोसा नहीं और जो राष्ट्रवाद तथा अंधराष्ट्रवाद में फर्क नहीं करते  !   बुनियादी बात ये है कि हम इंसान हैं या  कि जानवर ? और अगर इंसान हैं तो एक दूसरे को समझते क्यों नहीं ?  भला वार्ता से बेहतर और कौन सा रास्ता हो सकता है एक दूसरे को समझने / समझाने और सहमत / असहमत होने का   तथा औदार्यता के साथ जीवन जीने का ?  मुमकिन है कि वार्ता के पक्ष में राम जेठमलानी का अभिमत , उनके ही कुनबे में उन्हें विजातीय घोषित करने के लिए पर्याप्त साबित हो जाये ?  तो फिर इस प्रवृत्ति को क्या कहा जाये ? केवल अपनी मुर्गी की डेढ़ टांग ?  केवल असहमत होने के लिए असहमत होना ? 

सम्पादकीय में लोकतंत्र के गौरव और देशहित जैसे प्रश्न भी उठाये गये हैं , इसके साथ ही यह भी साफ़ तौर पर कहा गया है कि कई बिंदुओं पर अरुंधति से असहमति होने के बावजूद सहमति गुंजायश की अनदेखी करना उचित नहीं है !  मेरे हिसाब से बहुत ही संतुलित और सहज ढंग से लिखा गया सम्पादकीय है ये जो कि असहमत और सहमत होने के बुनियादी हक़ के साथ खडा है ! मैं खुद भी अरुंधति के सारे तर्क जानकर   ही उनसे असहमत  और सहमत होनें के बिंदु तय कर पाउँगा  !  मित्रों का पता नहीं पर मैं गंभीर विमर्श के पक्ष में हूं क्योंकि मैं अपनी सुविधानुसार देश प्रेम की व्याख्या नहीं करना चाहता और ना ही विधिक सुनवाई से पहले किसी विचार की 'हत्या' का दोषी होना चाहूँगा ! मुझे इस देश का जिम्मेदार नागरिक मानते हुए...समझिए , स्वीकार कीजिये , ख़ारिज कीजिये और विश्वास कीजिये कि मैं भी आपके साथ ऐसा ही बर्ताव करने का इच्छुक हूं !  इस देश को वैचारिक औदार्यता तथा  सहिष्णुता की दरकार है !

अभी पिछले ही दिनों सोच रहा था कि देश द्रोह , संविधान द्रोह,  राष्ट्र्गान द्रोह , राष्ट्रध्वज द्रोह में क्या अंतर हैं ? वैचारिक अतिवाद और दैहिक  अतिवाद के प्रश्नों के उत्तर कहां खोजूं ?   राजनेता ... धार्मिक नेता ... व्यापारी और हम सब जो करते हैं , जो कहते हैं उनमें से कितना इन श्रेणियों से बाहर होगा ?  लेकिन ये तो तय है कि इन सभी को अपने विचारों और कार्यों का पक्ष रखे बगैर , किसी सुनवाई के बगैर अपराधी घोषित नहीं किया जा सकेगा !  हम सलामत रहें !  देश सलामत रहे ! अतिवाद से परे विचार विमर्श जीवित रहे !  पूर्ण सहिष्णुता और उदारता , सम्पन्नता के साथ...सुख समृद्धि से सुसज्जित राष्ट्र , परस्पर सहमत और असहमत होते हुए सुसंस्कृत प्रेमिल नागरिकों के बलबूते शक्तिशाली राष्ट्र की उम्मीद के साथ !

रविवार, 15 अगस्त 2010

ग़ुरबत के हिस्से की चिल्हर धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...!

कल शाम से सरकारी महकमों की इमारतें जगमग कर रही है...सुबह ध्वजारोहण पर जाने से कब्ल नहाना चाहता हूं , हल्की सी ठण्ड है सो पड़ोसी का सुझाव है कि मुंह हाथ धोकर निकल चलो...कौन सा नमाज़ पढ़ने जा रहे हो  ?  सोचता हूं जन गण मन की शान में पहले कभी बे नहाया गया नहीं ,  तो फिर आज कैसे ?  इधर खब्ती शौहर की फ़िक्र में बीबी गर्म पानी का इंतजाम पहले ही कर चुकी  है  !  दूर किसी  इमारत  में सरकारी आदेश से तैनात लाउड स्पीकर शिद्दत से चीख रहा है और उसके साथ बाथरूम  में , मैं  भी...अब कोई गुलशन ना उजड़े अब वतन आज़ाद है ,रूह गंगा की हिमाला...

वक्त कम है गाड़ी तेजी से सड़क पर मोडता हूं , सामने स्कूल के बच्चे भागते नज़र आ रहे हैं , उन्हें भी देर हो गई लगती है , वे सब मेरे घर के दक्षिणी छोर वाले स्कूल में पढते हैं  !  हुई देरी से उनके पिटने के ख्याल से मेरे अंदर बैठा मुकम्मल आज़ादी का फरिश्ता सहम सा जाता है  !  मुझे उत्तर दिशा में जाना है वर्ना मैं... !   उनकी प्रिंसिपल को फोन करता हूं...सिस्टर कुछ बच्चे देर से पहुंचेंगे खुदा के लिए उन्हें पनिश मत करियेगा कम से कम आज के दिन  !  दो बाथरूम वाले घर में आश्रम की तर्ज़ पर रहने वाले बीसियों बच्चे समय पर तैयार कैसे हो पायंगे  ?  ये वो भी जानती हैं  ! ...पता नहीं कैसे  ?  ख्याल कौंध सा जाता है...नौनिहाल आते हैं...को किनारे कर दो मैं जहां था , इन्हें जाना है वहां से आगे...

चंद नारे और त्योहार खत्म , दोस्त बतला रहा था कि आज उसका क्लब अस्पताल में फल...फल माने , केले...बांटेगा  !  ना चाहते हुए भी मन ही मन में गाली देता हूं...सा...sss ढोंगी , केले बांटेगे और न्यूज पेपर में उससे ज्यादा अपनी समाज सेवा का ढिंढोरा पीटेंगे ! तुम्हारी...समाज सेवा का बिजनेस क्या मैं जानता  नहीं?अंतिम आदमी के लिए सरकारी मदद को रास्ते में हाइजैक करने वाले समाज सेवी ............ कहीं के  !  वो पूछता है चलोगे क्या  ?  मैं कहता हूं , बिलकुल नहीं  ! ...अभी चुप क्यों थे  ?  बस यूं ही तुम्हें गरियाने का दिल किया इसलिए  !  वो बेशर्मी के साथ हंसता है उसे पता है कि मुझे धन पिशाच पसंद नहीं  हैं  !  मैं एक बार फिर से उसे अपनी सर्द निगाहों से टटोलता हूं  !  क्या देख रहे हो वो पूछता है ?  तुम्हारे जिस्म की बनावट देख रहा हूं ...कल्पना कर रहा हूं कि इसपर लदी फंदी चर्बी किस किस बंदे का हक मार कर जुटाई होगी तुमने  !  वो फिर से हंसते हुए कहता है ...ओ यू आउट डेटेड मैन... घर चलें ?  मै सहमति में सिर हिलाता हूं  ! 

इधर टीवी चैनल्स आजादी के परवानों के भाषणों के टुकड़े सुनवाये जा रहे हैं , पर मेरे कान बंद हो चुके है...कुछ भी सुनाई नहीं दे रहा !  मै सिर्फ देख पा रहा हूं देश के लिए भाग रहे अधिकारी , नये जूते...नई कैप , नई टीशर्ट , बमुश्किल छुपती हुई सेहत , उपदेश देते नेता , खादी के कलफदार कुर्तों से झांकती उनकी विराट देहयष्टि ,मेरा जेहन जानवर खरीदने  गये ग्राहक  सा , उनके बदन की चर्बी टटोलता है  !  कल ही किसी अधिकारी  के लॉकर से  कुछ करोड की चिल्हर बरामद होने की खबर थी , कुछ  किलो सोना  भी  !  लगता है जैसे सोना...रुपया...चर्बी सब गडमड हो रहे हों  !  स्वतंत्रता दिवस अमर रहे , कहता तो हूं पर आवाज गले से बाहर नहीं आती , मेरा दाहिना हाथ बेदम सा हवा में उठा हुआ  !  मुझे लगता है कि आज़ाद भारत के इन आबाद जिस्मों में जमा चर्बी बाहर निकालने से पहले तेज चाकू से इनकी खाल खींचना होगी  !  मै क्रूर होना चाहता हूं पर आंखें साथ नहीं देतीं...वहां कुछ भीगा हुआ खारापन सा है !  फिलहाल तो ग़ुरबत के हिस्से की धूप लॉकर में रख छोड़ी है जिन्होंने...उनके लहलहाने के दिन हैं  !   

रविवार, 11 जुलाई 2010

ओ देव...

कहते हैं यहां खर दूषण का राज था कभी , उनकी अपनी रक्ष प्रजा , अपनी रक्ष संस्कृति !  तब रक्ष कुल की युवतियां अपने पति का वरण अपनी मनमर्जी से कर पाने के लिये स्वतंत्र हुआ करतीं !  वेश भूषा...खान पान...रहन सहन के उनके अपने तौर तरीके थे !  देवताओं को यज्ञं भाग देने वाले ऋषि उनके परम शत्रु हुआ करते !  राजकन्या सूर्पनखा इन्हीं परम शत्रुओं के अभयार्थ आहूत देव पुरुषों के प्रेम में क्या पडी , अपने ही कुल के विनाश का कारण बन गई !  उस प्रेमातुर राजकन्या को इस सत्य का भान ही नहीं हुआ कि विजातीय संस्कृतियों में प्रेम और दैहिक संबंधों के स्वीकरण के नैतिक मानदंड भिन्न हैं अतः उसका प्रणय निवेदन ठुकराया जाना निश्चित है...शेष कथा इतिहास हुई !  इसके बाद शताब्दियों का लंबा अंतराल और ...अब तो ये तय कर पाना भी मुश्किल है कि सांस्कृतिक सहवास और सम्मिश्रण के परिणाम क्या हुए ?  कौन शुद्ध रक्ष कुलीन और कौन शुद्ध देव पूजक शेष रहा यहां  !  पर अब भी ... 

कहते हैं ये खर दूषण की धरती है यहां प्रेम से पहले संस्कृति...धर्म...भाषाओं और विजातीयताओं का ख्याल नहीं किया जाता , परिणाम चाहे कुछ भी हो ! पता नहीं वे लोग कौन होंगे जो ये सब पूछ परख करनें के बाद प्रेम करते होंगे पर यहां की स्त्रियां और पुरुष अब भी कैलकुलेटेड प्रेम नहीं कर पाते, बल्कि उन्हें तो प्रेम करना ही नहीं पड़ता , बस हो जाया करता है...ये देस प्रेम की परम स्वतंत्रता का देस है !  उत्तर दिशा से देवता अब भी आते जाते हैं यहां...पर वे किसी यज्ञं और संस्कृति की रक्षा के लिए नहीं पधारते और ना ही प्रेम की किन्हीं खास मर्यादाओं से बंधे हुए  होते हैं ! उनके अपने एजेंडे के पूर्ण होने तक वे राजकन्याओं के प्रणय निवेदन को बाकायदा स्वीकार भी करते हैं ,यहां तक कि उन्हें एक पत्नी व्रत से भी कोई लेना देना जरुरी नहीं रह गया शायद !...संभव है इंसानों के तौर पर अवतार लेते रहने की लंबी और एकरस प्रक्रिया के चलते कुछ इंसानी दुर्गुण उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन गये हों  ? 

ऋषि आश्रम का स्थाई सदस्य होने के नाते ऐसी कई प्रेम गाथाओं को रचते हुए देखा है मैंने...लगभग १६-१७ वर्ष पूर्व हमारे आश्रम में एक सुदर्शन देव पुरुष का आगमन हुआ वे काव्य रचते...उनकी ऋचायें , पाषाण खण्डों से टकरा कर अदभुत सम्मोहन संसार सृजित करतीं !  शीघ्र ही वे विवाहोत्सुक युवतियों के आराध्य की तरह स्थापित हो गये !  उनके प्रति युवतियों का प्रबल आकर्षण आश्रम के निकटवर्ती आवास क्षेत्रों के अन्य वाचाल युवकों के रागद्वेष का कारण बन गया !  बिगड़ती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए,  उन्होंने आश्रम का त्याग कर दिया और वापस उत्तर दिशा की ओर प्रस्थित हो गये किन्तु उनसे अशेष / सीमाहीन प्रेम करने वाली युवती रेत सम देव पुरुष को मुट्ठी में कैद करने की लालसा लिए इधर उधर भटकती रही !  उसकी मुट्ठी से फिसलती रेत के चिन्ह साफ़ नज़र आते और मैं किसी अनहोनी से आशंकित बना   रहता क्योंकि इस धरती का इतिहास...?

शायद समय किसी भी स्पर्श और उसके निशानों को खुरच कर फेंक देने में मददगार हो गया हो !  लिहाजा ताजातरीन घटनाक्रम की सूचना मैंनें खुद उस प्रस्थित प्रेमी को दे दी है और कहा कि ... ओ देव...राजकन्या तुम्हारे प्रेम पाश से मुक्त हो किसी साधारण मनुष्य से शादी कर रही है , फिलहाल इस प्रकरण में प्रेम के लिए कुल विनाश या फिर आनर किलिंग की संभावना समाप्त हुई...भले ही खर दूषण की धरती है ये ! 


रविवार, 4 जुलाई 2010

पार: पार: हुआ पैराहने जां : अ'रीना में निओ - ग्लेडिएटर्स ?

अपने प्रोफाइल में पसंदीदा फिल्मों का ज़िक्र करते  वक़्त ग्लेडिएटर्स  टाइप करते हुए मेरी  अंगुलियां कांप रहीं थीं...धड़कने औसत से ज्यादा रफ़्तार पर...और  बेहद  ज़ज्बाती  तौर पर  मैं उन परिजनों के बारे में सोच रहा था,जिनके बच्चे विषम  परिस्थितियों का शिकार होकर सरे बाज़ार बेचे गये होंगे...तब के हालात ,बिकने वाली शय भी इंसान और खरीदार भी ! उन  दिनों प्राचीन रोमन एम्पायर ही क्यों सारी की सारी दुनिया गरीब  इंसानों की मंडी में तब्दील हो चुकी थी  !  वे  बिकते  इंसानों  का क़त्ल करने  के लिये...या फिर इंसानों से क़त्ल हो जाने के लिये ! तमाशाई भी इंसान हुआ करते और तमाशेबाज़ भी !  बारहा सोचता हूं कि तब के हालात ऐसे थे कि पूंजी इंसानों के लिये नहीं बल्कि इंसान पूंजी के लिये बा-आसानी मयस्सर हुआ  करते थे !...शायद पूंजी का आविष्कार ही उन्हें , उनकी औकात दिखाने के  लिये हुआ होगा ? ...कहते हैं वो बर्बरियत का दौर  था जो गुज़र गया ! 

आहिस्ता आहिस्ता नव-सभ्यतायें विकसित हुईं और इंसानियत का  इकबाल बुलंद हुआ ! दुनिया के नक्शे में जुग्राफियाई /  प्रजातीय / धर्माधारित / भाषाई या फिर भिन्न राजनैतिक विचारधाराओं पर आधारित राष्ट्रीयतायें जन्मीं, जिन्होंने पारस्परिक  तुलना में खुद को इंसानियत का सबसे बड़ा अलम्बरदार घोषित करना अपना परम लक्ष्य बना लिया...भले ही अंदरूनी  वास्तविकतायें  कुछ  और  बनी  रही  हों  !  निजी तौर  पर  मुझे  ये  बदलाव  बहुत  बड़ा  दिखता  है , जहां रोमन सम्राटों के  पसंदीदा अ'रीना , बड़े बड़े राष्ट्रों में तब्दील गये हों और 'एम्परर' 'लोकशाहों' का मुखौटा पहन कर अभिनय कर रहे हों ! तब के  परिजनों के बच्चे दासों की शक्ल में बिकते और अब के बच्चे , नौकर / कर्मचारियों की शक्ल में ! खरीदार तब भी इंसान थे,  खरीदार अब भी इंसान हैं ! कुछ छोटे, कुछ बड़े, कुछ चिल्लर और कुछ थोक व्यापारी !  व्यापार की टर्म्स एंड कंडीशन्स में  बड़ा फर्क दिखता है अभी...तब माल की कीमत एकमुश्त चुकाई जाती थी अब रकम माहवाराना किश्तों में तय होती है ! जिस  तरह से बर्बरियत के उस युग में सभी दास ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते थे लगभग उसी तर्ज़ पर आज भी सभी नौकर  ग्लेडियेटर्स नहीं हुआ करते  ! 

वक़्त का फर्क बहुत लंबा है और सभ्यतायें भी विकसित हुई हैं इसलिए ग्लेडियेटर्स के साज़-ओ-सामान में भी भारी बदलाव  नज़र आता है मसलन तलवार के बदले ए.के.४७ , कलम, टाइपराइटर,कम्प्यूटर्स वगैरह वगैरह और जिरह बख्तर की जगह  वर्दियां / यूनिफार्म वगैरह वगैरह ! मुमकिन है मेरी सोच , मेरा चिंतन उन 'दासों' को मजाक लगे जो बैंकों ,शिक्षण संस्थानों  जैसे शालीन अपेक्षाकृत निरापद  खरीदारों के पास बिके हैं , पर उन दासों का क्या ? जिन्हें रक्षा संस्थानों जैसे रफ एंड टफ  खरीदार नसीब हुए हैं !  बुरा मत मानिये...इंसान तब भी बिकता था और इंसान आज भी बिकता है...पेट के लिये ? अस्तित्व के  लिये ? परिजनों के लिये ? आपको क्या लगता है ?  दुनिया में अ'रीना कहां नहीं हैं ?  ग्लेडियेटर्स कहां नहीं हैं ? तब सम्राट दिलजोई के लिये ग्लेडियेटर्स के तमाशे करते थे आज राष्ट्रीयतायें ,विचारधाराओं और इंसानियत की आज़ादी के नाम से तमाशे  करती हैं ! दिलजोई करने वाला भी इंसान...दिलजोई के लिये शहीद होने वाला भी इंसान ! राष्ट्रीयताओं और विचारधाराओं का  राग अलापने वाला भी इंसान और इस राग पर कुर्बान होने वाला भी इंसान ! शताब्दियों बाद बहाने भले ही बदल गये हों पर  रिज़्क ( रोजी रोटी ) के लिये ग्लेडियेटर्स होना और ग्लेडियेटर्स के परिजनों की पीड़ा शाश्वत है !    

मेरी धरती.. माफ कीजिये...हम सबकी धरती...लहूलुहान, क्षत विक्षत धरती के लिये 'स्लेव' अली गाते रहेंगे "पार: पार:  हुआ पैराहने जां" वे सब गाने के लिये अभिशप्त  हैं ,क्योंकि उनके दिल में रोमान हैं , माशूकायें हैं , बीबियां हैं ,बच्चे हैं , परिजन हैं ,  अस्तित्व की आरजूएं हैं , जिम्मेदारियां हैं !...और हैं...शिद्दत से नफरतें भी ,खरीदारी के ज़ज्बे के साथ ! मैं खुद थक चुका हूं  सोच सोच कर कि दुनिया में अ'रीना कहां पर नहीं है यहां , जहां मैं रहता हूं ,बस्तर भी तो...? हमेशा की तरह अपने अस्तित्व /  अपने परिजनों के लिये मंडियों में बिकते इंसान...शहीद होते...परिजनों को बिलखता छोड़ कर जाते निरंतर...अ'रीना में निओ ग्लेडियेटर्स  ?

मंगलवार, 22 जून 2010

उसकी खुश्बू में बसे खत मैं जलाता कैसे...? नो आनर किलिंग !

उन दिनों का ख्याल कुछ शहद सा कुछ नीम सा ...मैने सोचा भी कहां था...प्रेम...उसे होना था सो हो गया एक दम अनियोजित ! क्या पता शायद प्रेम ऐसे ही हुआ करता हो...सहज ही बिना विचारे , बिना यत्न , अपने आप ! मेरी मां....मेरे परिजन... और बहुतेरे मित्रों से भी कहां...किसी योजना के अधीन प्रेम किया मैने...उसे होना था...सो हुआ...शायद इसीलिये मैने 'फिरोज़ा' से हो चुके प्रेम की पृष्ठभूमि में किसी तर्क वितर्क की गुंजायश नहीं देखी...मुझे लगा कि प्रेम के लिये अपने आप हो जाना ही नियत है !  यूं तो इस फन में महारत रखने का दावा करने वाले दोस्तों ने प्रेम हासिल करने के ढेरों नुस्खे ईजाद कर रखे थे और वे दोस्त समझ कर छोटी मोटी टिप्स देने के लिये बर-हमेश तैय्यार रहते ...पर प्रेम मुझ पर यूं ही मेहरबान हुआ तो दोस्तों की कंटियां / जाले मेरे किस काम आते !  खैर हैरानी तो उन्हें भी थी कि लड़की  को मुझ जैसे नातजुर्बेकार में दिखा क्या ? कमाल ये कि बिना दस्तावेजी अपील...बिना भाग दौड ये परियोजना मंजूर हुई भी तो कैसे ? ...दोस्त थे बुरा भी लगा होगा तो दिल में दबाकर , आशीष के हाथ आगे बढा दिये ...कभी कोई जरुरत पडे तो ...वैसे इस मामले में जरुरत पड़ती  भी किसे है !

उसके पिता मेरे कस्बे में ट्रांसफर पर आये थे किराये के मकान की तलाश मेरे पड़ोस  पर खत्म हुई और फिर पता नहीं चला कि सिलसिला कैसे शुरु हुआ ...वो मुझे अच्छी लगती , जो मैं कभी कह भी नही पाया... पहल शायद उसने ही की और आहिस्ता आहिस्ता मुझ पर काबू पाती गई !  जब जैसा उसका जी चाहता मैं वैसा ही करता ! एक अजीब सा बडप्पन हुआ करता उसके व्यवहार में एक बच्चे सा दुलार करती मुझसे ...कभी सलाह मशविरा की नौबत आती भी तो मैं उसका एहतराम करता ! वो कहती शादी के बाद मायके जाउंगी तो क्या करोगे मैं कहता बडी मुश्किल होगी ...वो ठठाकर हंसती , कहती तुम्हें भी मायके ले जाया करुंगी , मैं सहमति में सिर हिलाता !  प्रेम हुआ तो कुछ अड़चने  भी नज़र आनें लगीं कुल / मज़हब वगैरह वगैरह ...आगे क्या होगा ?  अक्सर हमारा चिंतन इसी मुद्दे पर हुआ करता पर उसका आत्म विश्वास सारी शंकाओं पर भारी पडता !  वक्त गुजरता रहा ...आमने सामने की मुलाकात के बावजूद हमें खत किताबत की जरुरत भी पडने लगी , खतों को सम्भाल कर रखना जरुरी था अगर किसी के हाथ लग गये तो रुसवाई का ख्याल भय पैदा करता !  छुट्टियों में वो अपने 'देस' जाती तो मेरे प्राण लेकर ...फोन का जुगाड था नही ...छटपटा कर रह जाते ...मुझे समझ में नही आता कि उसका चेहरा भीगा हुआ क्यों दिखाई देता है जुदाई के वक्त यही शिकायत उसकी भी थी ! उसके खत बेसहारे का सहारा होते बार् बार हज़ार बार पढते...जी ना भरता !

और फिर एक दिन उसका आत्म विश्वास डूब गया उसने कहा हमारी बिरादारी अलग है मैने कहा हां पहले से ...हमें अपने परिजनों का कहना मानना होगा !  मैं खामोश रहा उसने पूछा मेरे बिना रह सकोगे ?  मैं खामोश रहा ...मुझे उसकी बात माननें की आदत पडी हुई थी ! मै रोना चाहता था पर उसने कहा भी नही कि रो लेने से दर्द का अहसास कम हो जायेगा सो मै उसकी इजाजत के बिना रो भी नही सका ...उसने कहा मेरे खत लौटा दोगे ...मैने कहा हाँ  वे तुम्हारे है ले लो ...उसने उन्हें वहीं खाक कर दिया ...मैने पूछा ...डरती थीं ...उसने कहा नहीं ...मैने कहा विश्वास नही था ?  उसने कहा खुद से ज्यादा फिर भी... ! ...उसका चेहरा धुंधला हो चला था और मैं खुद भी आखिरी बार उसे ढंग से देख भी नहीं पाया !
 
 

गुरुवार, 14 जनवरी 2010

रिकार्ड पर अटकी हुई सुइयां और पुरु के हाथी ...

नहीं  लगता कि कोई ज्यादा वक्त गुज़रा होगा जबकि किसान खेतों पर और खेत  ईश्वर की कृपा  पर निर्भर  हुआ करते , अगर  बारिश  हुई तो   जिन्दगी वर्ना  कम जिन्दगी तो थी ही  !  इधर फसल कटती  उधर रिश्ते   जुड़ते  !  भीषण   गर्मी  में  नये कपड़ों से लदा फंदा , पसीने से बजबजाता   दूल्हा , गाड़ी भर  कुम्हड़े  की सब्जी और थोक  भाव से तली गई पूड़ियों से निपटते बारातियों के आशीष की बाट  जोहता और सप्तपदी के लिये तैयार वेदी की ऊष्मा में अपने भविष्य के संकेत ढूंढता रहता  !
निकट सम्बन्धी पहले से ही विलंबित ताल में बजते कार्यक्रम को अपने  मान सम्मान  के नाम पर मिनट दर मिनट  अवरोधित करते हुए  बमुश्किल आगे बढ़ने  देते !  उनके जीवन के सारे गिले शिकवे ,सारी कुंठायें , सप्तपदी के अवसर पर निपटाए जाने के लिये पूर्व निर्धारित हुआ करतीं !  इस आपाधापी भरे माहौल में कोई एक व्यक्ति ग्रामोफोन में निरंतर चाभी घुमाता और गीतों के रिकार्ड , जितनी बार भी  चाहा  जाये  ,  बजाता रहता !  लिहाजा  बारम्बार बजने वाले रिकार्ड अक्सर ख़राब हो जाया करते , तब रिकार्ड पर  चलने वाली सुई अक्सर किसी खास स्थान पर अटक जाया करती , सुर  / शब्द / संगीत सब के सब रिकार्ड पर  अटकी हुई सुइयों के साथ स्थिर और स्थितिप्रज्ञं हो जाते  !
खैर अब वो ग्रामोफोन , रिकार्ड और उन पर अटकती हुई सुइयां अतीत के गर्त में दफन हो चुकी हैं  !  लेकिन  मैं अक्सर सोचता हूं कि तब के  ग्रामोफोन और अब के इंसानों में किस कदर साम्य  है !  ये  भी  किसी विशिष्ट  धुन  और  ख्याल पर  इतना बजते हैं कि कहीं न कहीं अटक ही जाते हैं  !  मेरे अत्यंत निकटवर्ती मित्र हैं जिन्हें देख / सुनकर मेरी इस धारणा की पुष्टि होती है कि दूसरे हो  ना हों  किन्तु यह इंसान  निश्चित रूप से ग्रामोफोन का पर्याय है  !  मित्र टूटी सायकिल के साथ मेरे पड़ोस में अवतरित हुए   !  धर्म आधारित राष्ट्रवाद उनका प्रिय विषय था जिसे दूसरों पर  अपनी बौद्धिकता की धाक ज़माने के लिये अक्सर दुहरा लिया करते ! शुरू में मुझे भी लगा कि बंदा समर्पित राष्ट्रवादी है पर  धीरे धीरे उनके अन्य गुणों का प्रकटीकरण भी होने लगा ! शिक्षकीय वेतन से गुजारा नहीं होने के नाम पर उन्होंने नौकरी के समानांतर बीमा व्यवसाय  प्रारंभ कर ,  जनता पार्टी की सरकार बनते ही अपनी राष्ट्रवादी सोच और छवि को हथियार बना डाला  !  पहले  अधिकारियों को धमकाते फिर  पॉलिसी देते  !  आज उनके पास अकूत  संपत्ति है !  
वे अपनी सुविधा के अनुसार तर्क गढ़ते हैं  ! मैं पूछता , भाभी को धोखा क्यों ?.. वे कहते हैं मैं क्षत्रिय हूं और एकाधिक स्त्री...? वे आज भी उसी राष्ट्रवाद पर अटके हैं जहां चार दशक पहले थे !  भला क्यों  ?  मैं जानता हूं !  उन्हें देखता हूं  तो पुरु के हाथियों का ख्याल आता है , वे राष्ट्रवाद के हाथी हैं  !
हमें  सिकंदर से पहले  राष्ट्र  को  इन  हाथियों से बचाना होगा !

शनिवार, 28 नवंबर 2009

तुम चलो हम चलें सावन की घटा चले......

पिछ्ले कई दिनों से वन्दे मातरम पर घमासान है, उस पर मुतवातिर इसरार और इंकार, मुझे तो दोनों ही पक्ष पूर्वाग्रही लगते हैं, देखा जाये तो राष्ट्रवाद को नागरिकों के सच्चे भावनात्मक समर्पण (दिली ताईद) की जरुरत है, क्या फर्क पड़ेगा अगर मैं किसी सांकेतिकता या प्रतीकवाद के आगे सर न भी झुकाऊं तो ?...और अगर बेमन से ही सही किसी प्रतीकात्मकता का अनुगमन कर भी लूं तो यह मेरी राष्ट्र के प्रति निष्ठा का पर्याय कैसे हुआ ? बचपन से लेकर अब तक वन्दे मातरम गाते हुए कभी नहीं सोचा कि मैं उसे खाना पूर्ति / रस्म अदायगी के लिए गा रहा हूँ या दिल से ? ऐसा सोचने का औचित्य भी नहीं था, पर पिछले दिनों इस बारे में जितना पढ़ा, जितना सुना उससे लगा कि, वन्दे मातरम गाते हुए मेरे दिल में कोई ख्याल भी कहाँ था कि मैं इसे देशभक्ति के प्रमाण पत्र के लिए गाकर अच्छा कर रहा हूँ या फिर इसे गाते हुए खुदा की जात में किसी और को शरीक कर बुरा कर रहा हूँ ! यानि कि अब तक जितना भी गाया क्या वह देश भक्ति के प्रमाणपत्र के लिए गाया ? और अगर गा भी दिया तो उससे मेरा खुदा मुझसे नाराज क्यों कर हुआ होगा ? कहने का मकसद ये है कि अगर मेरा अपना दिल साफ है तो मुझे किसी और से सर्टिफिकेट की दरकार कहाँ है और अगर मेरे अन्दर कोई बदनीयती है तो उसे कोई दूसरा पकड़ेगा कैसे ? बात दिल की है...जज्बात की है...जेहनी समर्पण की है इसमें सांकेतिकता / दिखावा कहाँ से घुस गए और इससे बढ़कर ये कि मैं कौन होता हूँ किसी बन्दे को देशभक्त या देश द्रोही करार देने वाला ? इसी तर्ज़ पर कोई दूसरा कौन होता है मुझे देशभक्त या देशद्रोही करार देने वाला ? मान लीजिये कोई व्यक्ति अपने मन में देश के प्रति कुत्सित विचार रख कर वन्दे मातरम गा रहा हो तो उसकी पहचान कैसे की जाएगी और ये कि वन्दे मातरम गाने वाले हर व्यक्ति के ख्यालात नेक हैं इसकी क्या गारंटी है ? उदाहरण के तौर पर हमारे देश में बड़ों की इज्जत / प्रतिष्ठा की एक सांकेतिक परंपरा है कि उनके पैर छुए जायें लेकिन परंपरा का परिपालन बलपूर्वक तो नहीं करवाया जाता ना ? आशय ये कि लोग दिल से इज्जत करें दिखावे में पैर छुयें या ना छुयें ! उम्मीद है कि आप भूले नहीं होंगे कि इसी नेक परम्परा की आड़ में राजीव गाँधी की जान ले ली गई थी ! चरण स्पर्श की सांकेतिकता के पीछे, धानु के मन इज्जत थी या हत्या का विचार ये तो बाद में पता चला !

इस मिसाल को देने का अर्थ ये नहीं है कि चरण स्पर्श की सांकेतिकता बुरी है बल्कि ये कि 'सांकेतिकता' उसका परिपालन करने वाले की नेक चलनी का प्रमाण नहीं हुआ करती ! मैंने अपने आलेख में लिखा कि मैं वन्दे मातरम गाता रहा हूँ पर उसके गायन को देशभक्ति और देशद्रोह से जोड़ने के बारे में कभी सोचा नहीं इसलिए अगर कोई ये कहने लग जाये कि आप वन्दे मातरम गाने वाले राष्ट्रभक्त मुसलमान हैं तो मेरे लिए डूब मरने की बात हो जाएगी क्योंकि इसे गाते हुए मैंने किसी सर्टिफिकेट की अपेक्षा नहीं की है और विशेषकर इसे गाते हुए किसी दूसरे व्यक्ति से तो बिलकुल भी नहीं जबकि मुझे पता ही नहीं कि उसके मन में क्या है ? मेरे लिए देश भक्ति और राष्ट्रवाद, राष्ट्र के प्रति मेरा मानसिक समर्पण है तथा वह किसी दिखावे किसी प्रतीकात्मकता का मोहताज नहीं है ! मेरे ख्याल से ये बेहद फ़िल्मी अंदाज है कि मुस्लिम / पर्सियन / हिन्दू की पहचान जताने के लिए टोपियों, लुंगियों और तिलक जैसे संकेतों का प्रयोग किया जाये प्रेमी और प्रेमिका के प्रेम को तोता मैना या फूलों की डालियों के आसरे अभिव्यक्त किया जाये ! मुझे तो यह प्रदर्शन काफी भोंडा लगता है ! मैं सोचता हूँ कि धर्म /आस्था/ प्रेम का वास्ता दिल से है ! अगर ये दिल के अन्दर नहीं तो संकेतों का क्या मतलब...बस ऐसे ही राष्ट्र वाद और देश प्रेम मेरे दिल का मामला है...मैं रहूँ या न रहूँ देश का इकबाल बुलंद हो...तुम रहो या न रहो देश का इकबाल बुलंद हो, हम रहे या न रहें देश का इकबाल बुलंद हो ! मेरा देश मेरे कपड़ों, मेरे आभूषणों, जिस्म पर लगे गोदने वगैरह वगैरह में नहीं मेरे दिल में बसता है !
फिलहाल दिल से मजबूर होकर गा रहा हूँ...तुम चलो हम चलें सावन की घटा चले...

मंगलवार, 17 नवंबर 2009

दारोगा - ऐ - जिन्दान इनके 'पंख कलम' कर दो !

सुबह से मन में था कि चाहे जो भी हो जाए आज तस्लीम वालों की सारी की सारी टिप्पणियों का क़र्ज़ चुका कर ही लौटूंगा , फ़िर चाहे उन्होंने समीक्षा लिखी हो , आलेख लिखा हो या कि पहेली पूछी हो ~ टिप्पणी करूं या पहेली हल करूं ~ खाली हाथ तो क़तई भी नहीं लौटूंगा ! मगर .... पहुंचते ही वहां जो कुछ देखा , मेरे हौसले पस्त हो गये ! लगा ज़ाकिर भाई ने पहेली पूछ तो ली मगर मुझे मुसीबत में डाल दिया ! पहेली में दिखाई देने वाली तस्वीर पहले नंगी आँखों से , फ़िर चश्मा लगा कर देखी ! कई .....कई बार देखी ! मुझे तो ये 'मासूम' परिंदा ही लगा !
शायद आपको अंदाज नहीं कि , आसमान में परवाज़ करते परिंदे , दरख्तों की शाखों पर बैठे परिंदे , शाम को घोंसलों की सिम्त डैनों का रुख मोड़ते परिंदे ...और उनकी चहचहाहट का , मेरे लिए एक ही मानी हुआ करता था कि पूरा आसमान....पूरे दरख़्त , सारे परिंदों ....सारे के सारे परिंदों का अपना है !
मेरे ख्याल से इन परिंदों के आसमान का अपना कोई राजनैतिक भूगोल नहीं , वहां कोई सरकारें नहीं , छल प्रपंच में लिप्त राजनेता / गुंडे / मवाली / उन्मादी / फसादी नहीं , कोई फ़तवा / कोई निषेधाज्ञा भी नहीं ! धर्मान्धता और भाषाई पाखंड से मुक्त / अक्षत / मासूमियत भरे परिंदों का आसमान !
कभी लगा ही नहीं कि परिंदे कौन सी जुबान बोलते होंगे ? कभी नमाज पढ़ते या भजन कीर्तन भी करते होंगे ? उन्होंने अपने लिए आसमान के छोटे छोटे टुकड़े भी कर रखे होंगे कि नहीं ? और क्या.... कोई उनकी चहचहाहट को भी 'डिक्टेट' करता होगा ?
परिंदे......मासूम परिंदे , पूरे आसमान में बेलौस , बेख़ौफ़ , परवाज़ के हकदार परिंदे ! आसमान..... सारा का सारा आसमान , परिंदों का और परिंदे आसमान के ! अब तक तो ऐसा ही लगता आया है ! मगर क्या पता ऐसा लगना ग़लत हो ? सिरे से ही ग़लत ?
ज़ाकिर भाई आपकी पहेली का जबाब देने से डरता हूँ ! मुझे भले ही लगता है कि ये एक मासूम परिंदा है और पूरा का पूरा आसमान भी इसका है लेकिन परिंदे की "जात / जुबान और वल्दियत" वगैरह वगैरह तय करने से पहले मुझे बुजुर्गवार का फ़तवा तो सुनना ही होगा और शायद मानना भी होगा ?
अब ये मत कहियेगा कि बाला साहब बीमार हैं याकि बुजुर्गवार बढती उम्र में सठिया गये हैं ! .....खैर आप जो भी कहें हमारा संविधान कहता है कि बुजुर्गवार को परिंदों को डांटने डपटने / पीटने पिटवाने का पूरा पूरा हक़ है !
मासूम परिंदे...... ऊँ....हूँ ....कमबख्त परिंदे , पिंजरे की सरहद से बाहर आसमान में उडनें की ख्वाहिश रखते हैं ! दारोगा - ऐ - जिन्दान इनके 'पंख कलम' कर दो !

शुक्रवार, 18 सितंबर 2009

बोगियों में पहले से जमें इंसान...खाने पर पहले से काबिज़...और सहमी हुई गायें !

अभी अभी लौटा हूँ , बच्चों को स्कूल वालों की गिरफ्त में सौंप कर , थोड़ा लंबा होकर खबरें पढ़ लूँ ...इस ख्याल से नजरे दौड़ाता हूँ....निगाहे टिक गई हैं हमेशा की तरह इस बार भी ...आस्ट्रेलिया में चार और उत्तरी आयरलैंड में दो भारतीय नस्लभेदी ? हमले का शिकार हुए ? सरकारी मुलाजिम पीडितों की मदद करने वाले हैं ? सरकारें चौकन्नी हैं ? ...इधर बाहर बहुत शोर हो रहा है ...निकल कर देखता हूँ , बीबी ने रात का बचा हुआ खाना घर के पिछवाडे ,खुली जगह पर गायों के लिए रख छोड़ा है पर गायें वहां से दूर सहमी सी खड़ी हुई हैं और गली के आवारा कुत्ते खाने पर टूट पड़े हैं ! एक दूसरे पर गुर्राते हुए ...झपटकर एक दूसरे को खून खून करते हुए ! ना जाने क्यों मुझे याद आता है , त्यौहार से पहले छुट्टियों पर घर जाने के लिए ट्रेन पर रिजर्वेशन का व्यर्थ होना ! वहां बोगियों में पहले से ही ठंसा ठंस भरे हुए मुसाफिर , दरवाजे खिड़किया बंद कर किसी को घुसने नहीं देते और जो कोई जैसे तैसे अन्दर पहुँच जाए वो अगले स्टेशन पर दूसरे मुसाफिरों को अन्दर नहीं घुसने देने की कवायद में लग जाता है ! .......हाँ ....ये धरती भी ट्रेन की बोगियों सी खचाखच भर चुकी है अलग अलग कम्पार्टमेंट में काबिज़ इंसानों के समूह ...नहीं चाहते कि कोई दूसरे इंसान. ..अन्दर दाखिल हों और संसाधनों /सुविधाओं में हिस्सेदार बन बैठें ...गोरों के कम्पार्टमेन्टस एशियाई ...भारतीय...पाकिस्तानी ..बंगला देशी ...अफ्रीकी ...नीग्रो ...वगैरह वगैरह के लिए निषिद्ध कर दिए गए हैं ...हाथ में रिजर्वेशन टिकट है......होता रहे ! बात इतनी सी होती तो इसे नस्ल भेद कह कर काम चला लेते मगर ... बंगाल - बिहार में मारवाडी नहीं चाहिए ...मुंबई में यूपी- बिहार के लोग ...नाट अलाउड....असम में बंगाली /बिहारी ....यहाँ ये ....वहां वो ! .... कई बार लगता है जैसे ये लोग भाषाई /धार्मिक /प्रजातीय /मुद्दे पर मारकाट कर रहे हों पर सच तो ये है कि ये सब ऊपरी /सतही बहाने हैं , वरना संसाधनों /सुविधाओं और आर्थिक मुद्दे को इस बवाल का मूल आधार और एकमात्र वजह मानने के पर्याप्त कारण मौजूद हैं !
इंसानी इतिहास में भूखंडों /संसाधनों पर पहले से काबिज़ लोग ...बोगियों में पहले से जमे हुए इंसान और खाने पर पहले से काबिज़ कुत्ते .....बोगियों में घुसने के लिए जूझते ...धक्के खाते ...चोटिल होते लोग ....दूर से खाने पर निगाहें गडाये....गुर्राते हुए कुत्ते , खून खून कुत्ते ....सहमी हुई गायें ...जिधर तक निगाह डालो बस यही नजारा है ...भला इंसानों और जानवरों में कोई फर्क है भी कि नहीं ?

रविवार, 19 जुलाई 2009

...नक्सलवाद ... युद्धोन्माद और ...जानम समझा करो !

कल रात उसने टी.वी.पर समाचार देखा और सुबह...सुबह प्रिंट मीडिया की सुर्खियाँ भी, लिहाजा वो बहुत उत्साहित है कि सरकार और पुलिस ने मदनवाडा के अनुभव से सबक लिया है इसलिए रक्षा बलों की त्वरित तैनाती / मूवमेंट, की गरज से हेलीपैड की तात्कालिक व्यवस्था के साथ ही साथ रणनीतिक मोर्चे पर भी विचार मंथन का दौर चल रहा है ! इतना ही नहीं सरकार के नेक दिल मुखिया नें भी नक्सलियों के विरुद्ध आर पार युद्ध की घोषणा कर दी है ! उस पर खुशी ये भी कि हताहतों* के परिजनों को समकक्ष पदों पर अनुकम्पा नियुक्ति देने का फ़ैसला कर लिया गया है !

(*हताहत इसलिए लिख रहा हूँ कि इसमें आगे चल कर वो इंसान भी शामिल किए जा सकें जो पुलिस में नहीं थे परन्तु इस विभीषिका का शिकार हुए हैं ! )

मैं भी उसकी खुशियों के गुब्बारे को बेवक्त पंक्चर करने के मूड में नहीं हूँ, भला क्यों...?...जरा सोचिये...क्यों नहीं ? अरे भाई वो भी तो मेरी जिन्दगी की दुआएं मांगती है...जैसे कि उन हताहतों की पत्नियां मांगती रही होंगी ! अब कौन जाने कि अपना ईश्वर अधिक क्रूर है याकि नक्सली या फ़िर सरकार, जो जीवन माटी के मोल हो चला है ! पता नहीं कब कौन परिवार अनुकम्पा नियुक्तियों के लिए कतार में खड़ा होने को मजबूर हो जाए !... र अगर घर का मुखिया अपने अकाल स्वर्गारोहण से पूर्व सरकारी नौकरी में ना हों तो...?...तो ?

फिलहाल तो मेरी पत्नी नक्सलियों के विरुद्ध सरकारी युद्धघोष और हताहतों के परिजनों के प्रति उसकी करुणा से गदगद है ! मैं नहीं जानता कि रणक्षेत्र में तैनात अन्य सरकारी अधिकारी / कर्मचारियों में से अगली बारी किसकी होगी ? शायद मैं ? या फ़िर कोई और ?...या फ़िर कोई और...! क्या उस दिन भी मेरे परिजन / मेरी पत्नी समकक्ष पदेन करुणा के मुआवजे से संतुष्ट हो जायेंगे / जायेगी ? क्या मुझ जैसे किसी भी हतभागे के परिजन अपने प्रियजन के असामयिक विछोह के उपरांत सहज जीवन जी सकते हैं ! वो खुश है ! मैं सोच रहा हूं और मेरा सिर दर्द कर रहा है ! अख़बारों की सुर्खियाँ , शब्दों से ध्वनियों में बदलती हुई !...तेज दर तेज होती हुई, मेरे कानों में हथोडों सी बज रही हैं ! मुझे अहसास दिलाती हुई कि एक दिन तुम भी सुर्खियाँ बन सकते हो तुम्हारे परिजन भी तुम्हारे बिना...अमां...लाहौल बिला कुव्वत ! मैं भी...क्या अगड़म बगड़म सोचे चला जा रहा हूं !

आवाज देता हूं मुझे चाय चाहिए ! पत्नी खुश है, उसे इस क्षण, मेरी ब्लागिंग से कोई शिकायत नहीं ! वाव...आज चाय में अदरक भी... ?...और कोई वक़्त होता तो कहता बेहतरीन, मजा आ गया ! लेकिन अभी तो मुंह कसैला हो चला है ! अकाल मृत्यु की परिकल्पना के दरम्यान कौन सी चाय जायकेदार लगेगी भला ? कोशिश कर रहा हूं, कि दिमाग सोचना छोड़ दे, फिलहाल मुझे और मुझ जैसे शान्तिकामी लोगों को इसकी सख्त जरुरत है कि दिमाग सोचना बंद कर दे क्योंकि...?

मध्यप्रदेश के ज़माने में स्वर्गीय भास्कर दीवान के परिजनों को भी समकक्ष पदेन अनुकम्पा नियुक्ति दी गई थी ! अब स्वर्गीय चौबे के परिजनों को दी जायेगी बाद में शायद...कोई और...फ़िर से...नये हैलीपैड, नई रणनीतियां, नये युद्धघोष ?...नई मृत्यु...नई अनुकम्पा, नई सुर्खियाँ...सब कुछ नया और निरंतर ! तब शायद किसी और की नई नवेली पत्नी खुश हो रही होगी ? जैसा का तैसा ! मानव जीवन को अकारथ / व्यर्थ करता हुआ !

मेरा दिमाग, क्या करूं मैं इसका ! कमबख्त सोचना बंद क्यों नहीं करता...हैलीपैड, नये अस्त्रों की दौड़, रक्षा बलों का तीव्र मूवमेंट ! थाने पक्के बंकरों से सुरक्षित ! पुलिस चौकियां फोर्टीफ़ाइड़ फ़िर लाखों करोड़ों जनगण अपनी अपनी झोपड़ पट्टी के पास बने बंकरों /फोर्टीफ़ाइड़ थानों के, अहसास मात्र से सुरक्षित ! अब मैं बडबडा रहा हूं और पत्नी भौंचक मेरा मुंह ताक रही है ! उसे लगता है कि रात मेरी नींद पूरी नहीं हुई या फ़िर काम का तनाव है ! अरे नहीं ये शब्द मेरे नहीं हैं !

हैलीपैड...अनुकम्पा नियुक्तियां, युद्धघोष...बंकर, जंगल, गाँव, पुलिस, मंत्री, संतरी, आदिवासी, जनगण, झोपडे, जीवन, मृत्यु...अनाथ...विकलांग...शहीद...भूखे...नंगे...आह मैं मरा !
कौन सी शान्ति ?... काहे की शान्ति ?

यहाँ नक्सलवाद...युद्धोन्माद और...शान्ति की कब्रगाह है... जानम समझा करो ! फिलहाल , पत्नी मेरे माथे पर हाथ रख कर, हरारत को महसूस करने की कोशिश कर रही है ! वैसे मेरे लिए , उसके हाथ में सिर दर्द और नींद, दोनों की गोली है !

बुधवार, 6 मई 2009

इक शम्मा है दलीले सहर सो ख़मोश है !

सुबह सुबह औघड़ चाय* का वक़्त है ! दर-ओ- दीवार पे हर सिम्त जगजीत भाई की पुर- नूर आवाज़ अनहद से अनगढ़ रिश्ते का सबब बनी हुई है ~~ ज़ुल्मतकदे में ................ इक शम्मा है दलीले सहर सो ख़मोश है ~~
बीबी किचन में , बच्चे नींद की आगोश में और मैं ख़ुद चाय की उम्मीद के साथ ग़ालिब ,जगजीत और अनहद की सोहबत में हूं ! सामने टेबिल पर पड़ा अख़बार अपनी सुर्खियों के साथ अंगडाइयां लेते हुए मुझे दुनियाये फ़ानी की आगोश में ढकेलने की फिराक़ में है ! फ़िर क्या... हर दिन की तरह आज भी अख़बार आहिस्ता आहिस्ता अपनी गिरफ्त मज़बूत करता जा रहा है और फिजाओं में गूंज रहे अल्फाज़ अपने मानी खोने लगे हैं ~~
सत्र न्यायाधीश बस्तर नें , अल्फ्रेड महरा निवासी आवास प्लाट करकापाल ,जगदलपुर को अपने साले मंगलू के कत्ल के जुर्म में , उम्र कैद की सजा सुना दी है ! रिक्शा चलाकर गुज़ारा करने वाले अल्फ्रेड को अपने बेटे सुहेल के जन्मदिन के लिए सिर्फ़ १०० रुपये उधार की दरकार थी ! ताकि बच्चा नए कपड़े पहन सके ! साला मंगलू एक दिन पहले सीमेंट खरीद चुका था सो उधार दे ना सका ! अल्फ्रेड नें गुस्से में साले को पीटा और वह मर गया ! अब मेरे दिल -ओ -दिमाग में अल्फाज़ अपनी शिद्दत से गूंज रहे हैं ~~
अल्फ्रेड ... मंगलू ... सुहेल ... जन्मदिन ... मृत्यु ... बेटा ... साला ... सौ रूपये ... उधार ... सीमेंट... सजा ... रिक्शा ... उम्रकैद... नए कपड़े ... जेल... इक शम्मा ... सरकार ... समाज ... गरीबी ...दलीले सहर... आज़ादी ... विकास ...विश्वगुरु... विकसित देश... भारत... लोकतंत्र ... नेता ...अम्बानी ... मित्तल...फोर्ब्स... विधवा ... पितृहीन ... अनाथ... परिवार ...सो ख़मोश है !

बुधवार, 11 मार्च 2009

पूरे जिस्म पर ......

एक समाचार लेखक की आप बीती :
होली से पहले :
उनकी उम्र ज्यादा नहीं लिहाज़ा ख्यालात भी रूमानी हैं और उन्हें ईश कृपा से एक अदद लैला भी दस्तेयाब है सो जनाब पिछले साल भर से राह तक रहे थे कि होली आएगी तो कौन कौन से रंग किस किस तरह से और कहाँ कहाँ लगायेंगे ! मगर सत्यानाश हो ऑफिस वालों का , फरमान ज़ारी कर दिया , इस साल तिलक होली से गुज़ारा करो , मानवता को विश्व युद्ध से बचाना है ! इसलिए तिलक होली को जन आन्दोलन बना डालो ! अब बेचारा खादिम भला अपने मालिक से कैसे कहे जनाबे आली ख़ुद की होलियाँ तो भले से गुज़ार लीं अब पैर कब्र में क्या लटके , हमारी होली का दहन करने पे उतारू हो गए ! खैर ........मालिक का हुक्म सिर माथे की तर्ज़ पर भाई साहब , पिछले कई दिनों से तिलक होली के तराने गाने पर मजबूर थे !
होली के दिन :
आज भाई साहब नें सारी फिक्रें छोड़ कर होली को होली की तरह से मना डाला है और अपनी तमाम हसरतें खुलकर पूरी कर डाली हैं ! लेकिन दोस्त , दुश्मनी पर उतारू हैं और धमका रहे है कि मालिक को बता देंगे कि तुमने नाफ़रमानी की है ! जन-आन्दोलन की पीठ पर छुरा भोंका है ! ..... अब भाई साहब को कल की फ़िक्र है !
कल क्या होगा :
भाई साहब ने तय कर लिया है कि कह देंगे ! हुजूर हमने इस आन्दोलन को मजबूती देने के ख्याल से ज़्यादा से ज़्यादा जगह पर ज़्यादा से ज़्यादा तिलक लगाये हैं !