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मंगलवार, 2 मार्च 2010

मैं फुरसतों से यूं खौफ खाता हूं जैसे क़ातिल जो सर्द रस्सी ...


पिछले कई दिनों से ब्लाग्स पर रंग पर्व नें क़ब्ज़ा सा किया हुआ है ! कैसे कहें बड़ी तकलीफ हुई जहां भी पहुंचे होलियाया हुआ ब्लागर मिला...रंग बरसें...हम खेलें समझ में आता है...पर पढ़ें कितना...? एक ही मुद्दे की धुवांधार पिटाई ! कोई झेले भी तो कैसे और कब तक ? बुरी बात ये कि जिन्दगी के क़ीमती वक़्त में से बंटवारा कुछ ऐसा कर डाला है कि काम के पहले और बाद में ब्लागिंग फिर आराम के पहले और बाद में ब्लागिंग ...यानि काम और आराम कुल जमा दो लेकिन ब्लागिंग जमा चार ... तो काम संग आराम बनाम ब्लागिंग के दरम्यान वक़्त का बंटवारा हुआ २ : ४ के अनुपात में ! आदत ऐसी पड़ गई कि दुनिया उलट पलट जाये ! क़यामत आ जाये पर ब्लागिंग ...आह...जरुरी है ! बच्चों नें पढ़ा ? घर में राशन ? कुछ पता नहीं ... लेकिन ब्लागिंग...लत की तरह ! 

हां तो मैं कह रहा था कि रंग पर्व के चक्कर में ब्लाग्स में पठनीय सामग्री का अकाल सा पड़ गया था पर आदत ...मित्रों के ब्लाग खोलते ...पढ़ते... झल्लाते और बंद कर देते ! कोई अपडेट नहीं...पर समय ब्लागिंग का... आदत है...सो कटे कैसे ? ऐसा लगता बला की फुरसत  हो गई हो ! 

कोई ३०-३१ बरस पहले की बात है तब मायने पता ना थे अब समझ में आ गया कि फुरसत कितनी भयंकर हुआ करती हैं ! उन दिनों सुषमा या शमा नाम की मैगजीन हुआ करती जिसके हम नियमित पाठक हुआ करते थे ...एक दिन किसी शायर की नज़्म पढ़ी ..."मैं फुरसतों से यूं खौफ खाता हूं जैसे क़ातिल जो सर्द रस्सी के एक टुकड़े से कांपता हो" बात आई गई हो गई लेकिन फुरसत और क़ातिल का रिश्ता मन के किसी कोने में बेमतलब... बेमानी सा पडा रह गया ...मगर आज घमंड से कह सकता हूं थैक्स टू ब्लागिंग ...थैंक्स टू रंग पर्व ... थैक्स टू पठनीय सामग्री का अकाल... फुरसत का व्यवाहरिक मतलब अब जाकर समझ पाया हूं...वाकई वो शायर बेजोड़ शायर था...पता नहीं कौन ...?

रविवार, 19 अप्रैल 2009

तुम मुझे अच्छी लगती हो...

कई बार ऐसा होता है कि थोड़ा बहुत तनावों भरा समय गुज़ार लेने के बाद हम हब्शियों की तरह आराम कर डालते है !... इधर चुनाव की मारामारी के बाद का सन्नाटा था, इसलिए जरुरत से ज्यादा, यूं कहूं कि जम कर सोया, कुछ इस तरह कि नींद ने भी तौबा कर ली और मुझे निद्रालीन परिजनों के दरम्यान अकेले भूत की तरह खुली आंखों रात गुजारना पड़ रही थी ! मरता क्या ना करता वक़्त गुज़ारने के लिये स्मृति को आवाज़ दी और वो... !  उसे तो जैसे मेरे बुलावे का ही इंतजार ही था दौडी चली आई ! सच कहूं तो स्मृति को हमेशा मुझसे एक ही शिकायत रही कि मेरी व्यस्ततायें उसकी सौत जैसी हैं ! जिनकी वज़ह से मैं उसे समय नहीं दे पाता ! आज वो खुश है कि मैंने उसे बुलाया है, मुझे उसकी ज़रूरत है ! उसे परवाह नहीं कि मेरा बुलावा स्वार्थ से भरा है ! अगर मैं फुर्सत में नहीं होता तो क्या उसे बुलाता ?... पर वो तो निस्वार्थ, निश्चल प्रेममयी है ! जब बुलाओ हाज़िर ! मुझे तो कई बार अपराध बोध हो जाता है और सोचता हूं कि अगली फुर्सत ज़ल्द हो बस वो रहे और मैं रहूं तीसरा कोई ना हो !

इससे पहले कि विषयांतर हो, मैं मुद्दे पर आना चाहूंगा, जैसा कि मैंने कहा कि मुझे अपराध बोध हुआ सो स्मृति के आते ही मैंने उसे सीने से लगा लिया और कहा कि 'तुम मुझे अच्छी लगती' हो ! फिर क्या था उसने भी शिकवे भूल कर मेरे दिल पर हलकी हलकी थपकियां देना शुरू कर दिया ! ...और मैं ...!

अरे भैय्या ये सिर्फ़ मेरी ही नहीं, सारी दुनिया के तमाम इंसानों, मर्दों, औरतों की स्वार्थ भरी प्रेम कहानी है जैसे ही फुर्सत हुई, बेचैनी हुई, अकेलापन महसूस हुआ, कि स्मृति को आवाज़ दी ! ... है ना ? और मैं... उसकी सोहबत में अकेलापन बेचैनी सब कुछ भूल चला था ! मुझे फुर्सत थी, मैं था और स्मृति, मेरी परवाह कर रही थी !

मैं बखूबी जानता हूं कि कुदरत ने सिर्फ और सिर्फ 'स्मृति' को ही ये सलाहियत बख्शी है कि आप चाहें या ना चाहें वो आपके 'दिल' में ( आप इसे 'अंतर्मन' कहे तो मुझे कोई आपत्ति नहीं होगी ) हुकूमत कायम कर ही लेती है !

फिर तमाम रात मैं उसकी पनाह में खुश रहा वो कहती रही और मैं सुनता रहा !