गांव में बच्चे अपनी शरारत पर मां से डांट खाते, हुलकी आये ! पड़ोसियों में झगड़ा होता तो, हवा में जुमला अक्सर उछलता, हुलकी आये ! तब सोचा भी नहीं कि इस शब्द के मायने क्या हो सकते हैं ? जेहन में कुछ ख्याल कौंधते, शायद ये कोई अपशब्द होगा या कि श्राप अथवा इसमें दूसरे पक्ष को चोट पहुंचाने का सामर्थ्य ज़रूर होगा ! लेकिन जब शब्दकोष देखने की उम्र हुई तो पता चला कि, इसका मतलब वमन / उल्टी / हैजा / उबकाई / जी मिचलाना / हिलोर मारना भी हो सकता है और देखना / झांकना भी ! जिन्हें बागवानी का शौक हो, उनके लिए जानकारी ये कि पेड़ / पौधे की चोटी / टुनगी / फुनगी / कोपल को भी हुलकी कहा जा सकता है !
उत्तर भारत में बहुतायत से प्रयुक्त इस शब्द के इतने सारे मायने देख / सुन / पढ़कर हैरानी होती है ! उत्तर प्रदेश के उरई शहर में हुलकी माता के मंदिर की मौजूदगी, पंजाब के पटियाला और मध्य प्रदेश में जबलपुर के पास के किसी गांव का नाम हुलकी होना, बिहार का कोई हुलकी पुल, हुलकी मार्ग ! ...मैत्रेयी पुष्पा अपने उपन्यास ‘ बेतवा बहती रहे ‘ में कह उठें, तुम पर हुलकी परे ! राजकमल चौधरी अपने उपन्यास ‘साँझक गाछ ‘ में लिखें, खिड़की से बाहर हुलकि देवनाथ चिचियाइल...सम गोटा हुलकी मार लागल ! भोजपुरी चैनल में हुलकी बुलकी का ज़िक्र हो या फिर कोई बंदा कह उठे, सांझ के हुनक हुलकी देबार समाचार ओहि मोहल्ला पसरि गेल छे ! क्या बुन्देली, क्या भोजपुरी और मैथिल क्षेत्र या फिर मगही के चाहने वाले, हुलकी के ज़लवे देखते ही बनते हैं !
इधर छत्तीसगढ़ में बस्तर संभाग के मुरिया गोंड आदिवासी, शीत ऋतु में पेन (देव) कोलांग मनाते हों तो वर्षा ऋतु में हुलकी कोलांग ज़रूर मनायेंगे ! यानि कि हरियाली / खुशहाली के लिए महोत्सव ! इस पर्व के विशिष्ट अवसर पर उल्लास की अभिव्यक्ति के लिए मुरिया गोंड समाज में प्रचलित, हुलकी पाटा एक सामूहिक नृत्य वाद्य भी है, जिसमें स्त्री पुरुष संयुक्त रूप से भाग लेते हैं और एक गीत वाद्य भी ! हुलकी गीत गायन के साथ, हुलकी पाटा नृत्य करते हुए, हुलकी मांदरी वाद्य यंत्र को बजाये जाने का उल्लेख, सारे माहौल को हुलकी मय कर देता है ! सच कहें तो हुलकी शब्द से तरंगों और लहर की तरह की ध्वनियों / हिलकोरों जैसे अर्थ की अनुभूति होती है, यहां तक कि ये संकेत, हुलकी के शाब्दिक अर्थ वमन से भी परिलक्षित होते हैं !
आस्ट्रेलिया के विक्टोरिया प्रांत का एक लोक आख्यान कहता है कि, एक भीमकाय मेंढक ने धरती का पूरा पानी पी लिया ! अन्य जीव धारियों के पीने के लिए कुछ भी नहीं बचा! हर ओर हाहाकार मच गया ! सभी जीव जंतुओं ने अपने अपने तरीके से मेंढक को हंसाने और उल्टी करवाने के यत्न किये,लेकिन मेंढक पर इसका कोई असर नहीं हुआ ! सारे जानवर अपनी कोशिश में नाकामयाब रहे ! जिसके चलते उन सभी के प्राण संकट में पड़ गये थे, तभी ईल ने अपनी शारीरिक भाव भंगिमाओं और खास किस्म की ऐंठन से मेंढक को हंसा दिया ! मेंढक के हंसते ही उसके अन्दर मौजूद सारा पानी बाहर निकल गया ! पानी की इस आकस्मिक निकासी के परिणाम स्वरूप आई, बाढ़ में अनेकों जीव जंतु बह गये, यहां तक कि, मनुष्य भी ! अगर जलसिंह बाढ़ में बहते हुए मनुष्यों को डोंगियों में नहीं डालते तो पूरी मानवता बह गई होती !
कथा में एक दानवाकार जल थल जीव मेंढक दुनिया का पूरा पानी पी लेता है, फिर दुनियां बिन पानी सब सून के हाल पर ! जब सारे जीव जंतु इस समस्या से निपटने में नाकाम रहते हैं, तब एक और जल जीव ईल, मेंढक से पानी की हुलकी / वमन कराने में सफल हो जाती है! पानी की आकस्मिक / एकमुश्त निकासी सृष्टि पर जलप्रलय सा संकट खड़ा कर देती है ! अब एक और जल जीव, जलसिंह बाढ़ में बह रहे मनुष्यों / जीवों को डोंगियों में चढ़ा कर जीवित बचा लेता है ! संभव है कि, ये डोंगियां, पानी में बह रहे, लकड़ी के बड़े बड़े लट्ठे रहे होंगे या फिर नदी / समुद्र के किनारों से बह गईं डोंगियां ही हों ! कथा, पानी के बिना जीवन दूभर होने तथा ज्यादा पानी से भी जीवन दूभर हो जाने का महती संकेत देती है और यह भी कि मनुष्य का जीवन जल जीवों से किस हद तक जुड़ा है, उन पर किस हद तक निर्भर है ! हमारे यहां हुलकी, देखना है, झांकना है, व्याधि है, समस्या है, वमन है, निजात है, उल्लास है, कोपलों के रूप में नवजीवन है...और वहां भी !