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मंगलवार, 3 अगस्त 2010

कुछ चिपचिपा कुछ तरल सा ...

पिछली गर्मियों की एक  सुबह अपने पड़ोसी मित्र के साथ घर के आंगन में गपशप का दौर चल रहा था, उनका ख्याल था कि मुझे अपने बगीचे में फूलों से ज्यादा सब्जी भाजी उगानी चाहिये, जिससे कि मेरे माहवाराना बजट पर थोड़ा बहुत पाजिटिव  फर्क पड़ना तय है...और ये फूल वूल  इनका क्या ? अभी खिले और अभी मुरझा गये !  वे अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और प्रेम  भी नाप तौल कर करते हैं ! उन्होंने  कुल जमा 3000 वर्ग फीट जमीन में चार फ्लेट बनवाये, एक में खुद बसे और बाकी तीन किराए पर ! इधर अपने राम एक छोटी सी खोली और बाकी सात आठ हजार स्कवायर फीट जमीन खाली का अर्थशास्त्र ! दोस्ती हमारी तकरीबन 28 बरस पुरानी, बस ऐसे ही उत्तर दक्षिण अर्थशास्त्र पर निभे जा रही है !

हमारी बातें हमेशा की तरह, शुद्ध पैसे की व्यवहारिकता...से लेकर तितलियों, मधुमक्खियों और परिंदों की चाहत के कल्पनालोक के दरम्यान बेनतीजा झूलती हुई...अचानक बाहरी गेट पर एक अर्धनग्न किशोर चिल्लाया अंकल जी घर की खिड़कियां बंद कर लीजिये...मैंने पूछा सारी खिड़कियां बंद कर लूं ? भला  क्यों ? उसने कहा सड़क के उस पार काम्प्लेक्स से हम छत्ता तोड़कर शहद  निकालने वाले हैं, मधुमक्खियां इस तरफ आ सकती हैं, उसकी बात में दम था, लगभग भागते हुए सारे घर में कर्फ्यू लगा दिया गया ! बीबी बच्चे और हम दम साध कर बैठ गये  कोई आधा घंटा गुजरा मधुमक्खियों के हमले का कोई संकेत नहीं, हिम्मत करके वापसी दोबारा आंगन में ! थोड़ी देर में वही किशोर फिर से नमूदार हुआ और चिल्लाया अंकल जी शहद लेंगे ? मैंने  पूछा  निकाल लिया ? उसने कहा हाँ ! ठीक है, आता हूँ, वही देखूंगा...

मित्र के साथ सड़क पर पहुंचे तो पाया कि शहद का एक बड़ा सा छत्ता सड़क के किनारे पडा हुआ है और बाल्टी में शहद बिकने के लिए तैयार ! कुछ और लोग भी खरीदार की शक्ल में बाल्टी को घेरे हुए शायद उन्हें भी हमारी तर्ज़ पर आमंत्रित किया गया था ! छत्ते की मौजूदगी से सम्मोहित ग्राहकों में शुद्ध शहद की खरीदी के नाम से पहले मैं, पहले मैं, की होड़ सी लग गई...आखिर में बचे मैं...मेरे पडोसी मित्र और उनका अर्थशास्त्र ! मित्र ने शहद की जांच परख शुरू की तो विक्रेतागण भाग खड़े हुए, पता चला कि टूटा हुआ छत्ता और खिडकियां बंद करवाना, शहद की विश्वसनीयता स्थापित करने का बिजनेस टेक्ट मात्र था वर्ना वो तो गुड़ का शीरा ही था ! भय के मनोविज्ञान और जीवंत विज्ञापन से पैसे कूटने का यह उपक्रम मधुमक्खियों की सृजनधर्मिता से छल और शहद के औषध गुणों के नाम से व्यावसायिक ठगी के अलावा और क्या माना जाये  ?

इधर  इंसानों ने भी समूहों में बंध कर शताब्दियों की मेहनत और कुदरत के साथ अपने तालमेल बतौर कुछ  छत्ते डिजायन किये हैं जिनमें शहद सा कुछ चिपचिपा कुछ तरल सा...औषध गुणों से परिपूर्ण जीवनदाई प्रेम रस बसता है ! अभी कल ही कुछ लड़के,सड़कों पर चिल्लाते हुए, लड़कियों को पीटते हुए नमूदार हुए,खूबसूरत चेहरों पर कालिख पोतते हुए ! रमने वाले  देवता निश्चय ही भाग लिए होंगे वहां से...क्योंकि पूज्यनीय नारियां गिर गिर पड़ रही थी ज़मीन पर कटे हुए छत्तों सी...गालियों के मंत्रोच्चार के बीच ! लातों से अभिषिक्त ! पुजारियों...ओह...आई एम सॉरी...इन व्यापारियों की बाल्टियां भी कथित भारतीय संस्कृति के तारकोलीय शहद से भरी हुई थीं और वे भी आतंकित कर थोप रहे थे अपनी कम्पनी का शहद ! अपने गुड़ का शीरा !


[ मेरे ख्याल से बेचारी मधुमक्खियां, बाजारवाद और राजनीति का शिकार हो चलीं हैं ]