लोक साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
लोक साहित्य लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 12 जुलाई 2026

युकी ओना

एक बर्फीली और भीषण सर्द रात में , बेहद हसीन युवती अकेले ही सफर कर थी । वो उस सराय में आकर ठहरी , जिसे एक बुजुर्गवार दम्पत्ति चलाते थे । कहते हैं कि यह घटना यामागाटा प्रांत में घटी थी । युवती ने अलाव से कुछ दूरी पर बैठकर बुजुर्ग दम्पत्ति के साथ खाना खाया लेकिन हैरानी की बात यह हुई कि वो युवती खाना खाने के फौरन बाद , उठ खड़ी हुई और बाहर की भयंकर तूफ़ानी रात की परवाह किए बगैर सराय से बाहर निकलने लगी । उसकी इस हरकत से हतप्रभ सराय मालिकों ने उससे कहा कि वो बाहर ना जाए और उन्होंने उस लड़की का हाथ पकड़ कर उसे, वापस सराय के अंदर खींच लिया । उन्हें बाहर के मौसम को लेकर उस युवती की फिक्र थी । युवती का हाथ बेहद ठंडा था और उसे पकड़ते ही, बूढ़े सराय मालिकों के जिस्म की सारी गर्मी खत्म हो गई । सराय के अंदर वापस आते ही युवती का पूरा जिस्म महीन बर्फीली धुंध में बदल गया और वो चिमनी के रास्ते एक बार फिर से सराय से बाहर निकल गई । वृद्ध दम्पत्ति अत्यधिक हैरान थे कि ऐसा कैसे मुमकिन हुआ ?

तभी उन्हें याद आया कि बहुत पहले सराय में ठहरे हुए एक व्यक्ति ने उन्हें इसी तरह का एक किस्सा बताया था । उसका दावा था कि उसका ब्याह युकी ओना से हुआ था जो बला की खूबसूरत युवती थी । उसकी आंखें तीखी और जिस्म संगमरमर की तरह से झक्क सफेद था । उस व्यक्ति को रात में गरम पानी से नहाना पसंद था लेकिन युकी ओना को नहाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी । वो हैरान था कि उसकी पत्नी सर्द रात में गरम पानी से नहाना पसंद क्यों नहीं करती । उसने बताया कि एक तूफ़ानी बर्फीली रात में उसने युकी ओना से जोर देकर कहा कि वो गरम पानी से नहा ले वरना ठंड में जम कर मर जाएगी । युकी ओना ने प्रतिरोध में, बहुतेरी बहस की लेकिन पति  के आग्रह को मानने के सिवा उसके पास अन्य कोई विकल्प शेष नहीं था । वो नहाने चली गई और जब उसे नहाते हुए काफी देर हो गई तो उसके पति  को उसकी फिक्र हुई उसने झांक कर बाथरूम में देखा । वो हैरान था कि उसकी पत्नि वहां थी ही नहीं  बल्कि बाथटब में आधे अधूरे पिघले हुए बर्फ के टुकड़े मौजूद थे

यह आख्यान जापान की प्रांतीय विविधता के कारणवश दो अलग अलग संस्करण में प्रचलित और बहुश्रुत आख्यान  है । जबकि, वास्तविकता यह है कि कथा की नायिका युवती और कथा में उल्लिखित घटनाक्रम नितांत काल्पनिक है । कथा का पहला संस्करण यामागाटा प्रांत के बूढ़े दम्पत्ति की सराय से चिमनी के रास्ते बाहर निकल भागी खूबसूरत युवती को संबोधित है । सराय के अंदर की सुरक्षा और सराय के बाहर के भयंकर बर्फानी तूफ़ानी माहौल की तुलनात्मक फिक्रमंदी बुजुर्ग दम्पत्ति को युवती के जीवन के लिए आश्वस्त होने के यत्न का कथन करती है । वो युवती को सराय से बाहर नहीं जाने देना चाहते और युवती को पकड़ कर सराय के अंदर लाते हैं । युवती के जिस्म का ठंडापन और चिमनी के रास्ते सराय से बाहर भाग जाने का कथन प्रतीकात्मक है जिसके तहत वर्णित युवती का जिस्मानी ठंडापन, बुजुर्ग दम्पत्ति की दैहिक ऊष्मा को लगभग शून्य कर देता है और सराय के अंदर आकर भी युवती का धुंध में बदल कर चिमनी के रास्ते बहिर्गमन कर जाना बुजुर्ग दम्पत्ति का मतिभ्रम है ।

इंसानों के लिए सर्द मौसम में भयंकर ठंडेपन की उपस्थिति की, मनः परिणति, कमोबेश वैसी ही है जैसे कि भीषण गर्मी में किसी रेगिस्तान में फंसे इंसान की, मनः स्थिति की, कहने का आशय यह है कि असामान्य मौसम, मनुष्य को मतिभ्रम में डालता है और उसकी कल्पनाशीलता वास्तविकता से इतर स्वप्न संसार को रचने लगती है । दृष्टिभ्रम जनित ये संसार बेहद दिलचस्प भी हो सकता है जैसे कि सराय वाली लड़की का सौन्दर्य, बूढ़ों की फिक्र, और लड़की का धुंध में बदलकर बहिर्गमन कर जाना । कथा का दूसरा संस्करण जापान के निगाटा प्रांत के हवाले से कहा गया है जिसमें एक पुरुष अतिशीत के चलते युकी ओना नाम के काल्पनिक चरित्र को गढ़ता है और उसे अपनी पत्नि  बतौर उद्धृत करता है जिसकी देह- रंगत संगमरमर की तरह की और आंखें मदमस्त कर देने वाले नूर / आभा वाली । पुरुष को देर रात गरम पानी से नहाने की आदत है क्योंकि वो अपने जिस्म को सामान्य तापमान पर रखना चाहता है जबकि घर से बाहर का तापमान शून्य से साठ या सत्तर डिग्री कम हो सकता है ।

वो अपनी पत्नी के लिए फिक्र मंद है और उससे हर रात आग्रह करता है कि वो भी गरम पानी से नहाया करे किन्तु पत्नि उससे निरंतर इंकार करती रहती है , यहाँ यह कह देना उचित है कि पति के लिए, पत्नि का साथ बना रहना, मौसम की लंबाई जितने लंबे मतिभ्रम का पर्याय है । पति चाहता है कि उसकी सुंदर पत्नि मौसम के विरुद्ध उतनी ही सुरक्षित बनी रहे जितना कि वो स्वयं है । उसके आग्रह की निरन्तरता और सतत मनुहार के चलते युकी ओना रात में गरम पानी से नहाना स्वीकार कर लेती है किन्तु वो नहाकर बाथरूम से बाहर नहीं निकलती । फिक्रमंद पति बाथरूम में झाँकता है जहां युकी ओना है ही नहीं । युकी ओना यानि कि एक कल्पना संसार जो बाथटब के गरम पानी में युवती की सम्पूर्ण सजीव देह के बदले बर्फ के छोटे छोटे टुकड़ों में मौजूद रह गया है । अगर गौर से देखें तो कथा का पहला संस्करण युवती के स्वयं के जैसे मौसम के साथ पलायन या एकरूप हो जाने जैसा है जबकि दूसरा संस्करण में युवती गरम पानी जैसे विपरीत मौसम के साहचर्य में अपना अस्तित्व खो बैठती है ।

आख्यान के दूसरे संस्करण वाले पति यानि नौजवान की चिंता और पहले संस्करण वाले वृद्ध दम्पत्ति की चिंता, मनुष्य के अस्तित्व को बनाए रखने के उद्देश्य के तहत एक जैसी भले ही लगती हों पर इन दोनों चिंताओं में पीढ़ियों का फासला है । पति तुल्य अथवा पिता तुल्य, यानि इल्यूजन अथवा मतिभ्रम आयु भेद नहीं देखता वो केवल सामान्यता से असामान्यता वाली ऋतुओं को मनुष्य के चिंतन से जोड़ता है । वास्तविकता हो या दृष्टिभ्रम ।   

मंगलवार, 26 मई 2026

इफ़िस

इएंथे बेहद खूबसूरत लड़की थी , उसे युवा इफ़िस से मुहब्बत हो गई और इसके बर-अक्स इफ़िस ने भी आकर्षक इएंथे की मुहब्बत में होश गवां दिए । इफ़िस के पिता लिगडस को उनके ब्याह से कोई ऐतराज नहीं था इसलिए उन्होंने फौरन से पेश्तर इस रिश्ते के लिए हामी भर दी ।  मगर दिक्कत यह थी कि , मुहब्बत के रिश्ते को ब्याह की हद तक तक ले जाने में इफ़िस को एक ज़ेहनी मुसीबत का सामना करना पड़ रहा था । उसका ख्याल था कि ब्याह होते ही यह रिश्ता टूट जाएगा क्योंकि वो भले ही एक लड़के के तौर पर पाली गई थी पर उसका जन्म बतौर लड़की ही हुआ था और यह राज उसके पिता लिगडस को भी नहीं मालूम था । केवल उसकी मां टेलेथुसा और देवी आइसिस ही इस राज को जानते थे क्योंकि उन दोनों की वज़ह से ही इफ़िस युवापन तक जीवित रह पाई थी ।

हुआ यूं कि लिगडस और टेलेथुसा जिन दिनों ब्याह के बंधन में बंधे थे वो बेहद गरीब थे उन्हें संतान की चाहत तो थी पर वो जानते थे कि लड़की का जन्म, पालन पोषण, और अंततः दहेज की व्यवस्था उनकी आमदनी के दायरे में सिमट नहीं पाएगी इसलिए जैसे ही टेलेथुसा गर्भवती हुई , लिगडस साफ साफ कह दिया कि अगर संतान, लड़की हुई तो वो उसे जन्म लेते ही मार डालेगा, भले ही वो इस कलंकित और दुखदाई घटना के लिए खुद को आजीवन दोषी मानता रहे, यह सुनकर टेलेथुसा बहुत दुखी हुई मगर उसके सामने कोई विकल्प भी नहीं था । उसने प्रार्थना की, कि देवी देवता उसकी मदद करें, उसकी अजन्मी संतान को जन्म के बाद के संकट से बचाएं । उसी रात देवी आइसिस , उसके सपने मे आई और कन्या के जन्म के बाद कन्या की सुरक्षा का वचन उसे दिया ।

बहरहाल लड़की के जन्म के बाद देवी आइसिस ने , उसे लड़के की वेशभूषा में छुपाने में मदद की । ये घटनाक्रम लिगडस की समझ में नहीं आया । वो पुत्र जन्म से संतुष्ट था , उसने संतान का नाम इफ़िस रख दिया । उन दिनों ये नाम लड़की और लड़कों, दोनों के लिए इस्तेमाल हुआ करता था , तो इफ़िस , एक लड़के की तरह से पाली गई । हालांकि इफ़िस को यह मालूम था कि वो देवी आइसिस और अपनी मां की कृपा से जीवित है । अब आगे का किस्सा ये कि, उसे इएंथे से मुहब्बत हुई , जोकि बस होती ही है , उसे कथासार और अंदरूनी रहस्योद्घाटन से कोई लेना देना नहीं होता । इफ़िस, जिसे मुहब्बत हुई, उसे डर भी था , प्रियतमा के बिछड़ने का , अपनी जग-हंसाई का और फिर, देवी आइसिस ने पुनः हस्तक्षेप किया और इफ़िस को मूलतः लड़का ही बना दिया । देवी के आशीर्वाद से युवा जोड़े का ब्याह हुआ और दोनों  खुशी खुशी पति पत्नी की तरह से जीवन गुजार पाए ।

यह आख्यान , ग्रीक पौराणिक कथाओं का महत्वपूर्ण अंश है जिसमें, संयोगवश, अजाने ही ,  दो युवतियों के मध्य प्रेम पल्लवित हुआ । इफ़िस , क्रीट में रहने वाले निर्धनतम जोड़े लिगडस और टेलेथुसा की एकमेव संतान थी , उसके पिता ने विपन्नता के नाम पर , लड़की का जन्म होते ही , उसे मार डालने का संकल्प ले लिया था , वो पुत्र जन्म की कामना करता था । उसके संकल्प में दहेज का उल्लेख भी है कदाचित उस समाज में लड़की के पिता के सामने वर मूल्य चुकाने का संकट भी मौजूद रहा होगा । गर्भवती टेलेथुसा , अजन्मी संतान के भविष्य को लेकर चिंतित थी तो उसने सामान्य , असहाय स्त्रियों की तरह से देवी देवताओं के सामने गुहार लगाई । उसके आर्तनाद को देवी आइसिस ने सुना और उसकी मदद की , हालांकि यह मदद केवल वेशभूषा के स्तर पर बदलाव तक सीमित थी ।

कथासार यह कि इफ़िस का अस्तित्व, लड़कों की तरह के वस्त्र विन्यास पर निर्भर था और वो मूलतः स्त्री ही थी । पर प्रेम , वो तो गुणा भाग सह  पूर्व नियोजन से नहीं होता , बस हो ही जाता है । इफ़िस को भी हुआ । इएंथे को इफ़िस पसंद थी पर वो तो उसे लड़का ही मानकर ब्याह करना चाहती थी । पिता लिगडस भी इफ़िस को लड़का ही समझता था । लेकिन इफ़िस, उसकी मां और देवी आइसिस तो जानते ही थे कि सच क्या है ? कल्पना करें कि , अगर इएंथे को पहले से पता होता कि इफ़िस लड़की है और तब ये प्रेम पनपता तो इसे समलैंगिक प्रेम माना जाता जो तत्कालीन समाज में सहज स्वीकार्य था । पुरुष सह पुरुष , स्त्री सह स्त्री , किन्तु ये मिथक , पिता लिगडस की निर्धनताजन्य क्रूरता के चलते इस सत्य को छुपा कर आगे बढ़ता है । एक स्तब्ध कयामत के जैसा , संबंधों की टूटन की दिशा में ।

इफ़िस के सामने अतीत के झूठ की विरासत है , उसके सामने दु:ख और विरह का भयावह संकट है । उसका अतीत उसके आगत का हत्यारा होने ही वाला था कि मिथक एक बार फिर से पारलौकिकता से ओत प्रोत उपचार लेकर हाजिर होता है और इस बार ये उपचार काम चलाऊ तथा वैकल्पिक वस्त्र विन्यास परिवर्तन के जैसा नहीं था बल्कि स्थायी तौर पर लिंगान्तरण का उद्घोष करता है , एक सुसंगत यौन परिवर्तन ताकि युवा जोड़ा ब्याह करे और सांसारिक जीवन खुशी खुशी व्यतीत कर के । बहरहाल आख्यानकालीन समाज, देवी देवताओं के सांसारिक हस्तक्षेप, उनकी दयादृष्टि और अनुग्रह तथा इहलौकिक, पारलौकिक विश्वासों पर आधारित था, इसमे कोई संदेह नहीं...  


सोमवार, 25 मई 2026

हायसिंथस

बेहद खूबसूरत और कमसिन हायसिंथस यूं तो स्पार्टन शहजादा था पर उसका ज्यादातर वक्त संगीत और सूर्य के देवता अपोलो के साथ गुज़रता, वो दोनों अक्सर साथ में शिकार खेलने जाते, एक दूसरे के साथ खेलते रहते । हायसिंथस और अपोलो की दोस्ती, दरअसल नश्वर इंसान और अमर देवता के दरम्यान पनपी हुई मुहब्बत थी । इधर पश्चिमी हवा का देवता ज़ेफिर, हायसिंथस और अपोलो के इश्क को लेकर बेहद ईर्ष्यालु हो गया था क्योंकि वो खुद भी हायसिंथस का प्यार पाना चाहता था । हालांकि हायसिंथस का साथ पाने की उसकी तमाम कोशिशें नाकामयाब हुई थीं । मुहब्बत में अपनी शिकस्त के मद्देनजर ज़ेफिर का गुस्सा धीरे धीरे बढ़ता जा रहा था । वो किसी भी तरह से, किसी भी हद मे जाकर, इस इश्क पर लगाम लगा देना चाहता था ।

शहजादा हायसिंथस जब भी मछलियों के शिकार पर जाया करता तो देवता अपोलो जाल लेकर उसके साथ जाता, अगर हायसिंथस जंगली जानवरों के शिकार पर जाता तो अपोलो उसकी मदद के लिए कुत्तों को लेकर साथ चलता । हायसिंथस पहाड़ों पर घूमने निकलता तो भी अपोलो उसके साथ मौजूद रहता । हायसिंथस के करीब रहते हुए देवता अपोलो को अपनी वीणा और तीरों तक की सुध बुध नहीं रहती । इधर उन दोनों का प्यार ज़ेफिर की बर्दाश्त से बाहर हो गया था । एक तेज धूप वाली दोपहर में, अपोलो और हायसिंथस एक दूसरे के साथ खिलखिलाते, हंसी मजाक करते हुए, डिस्कस फेकने का खेल खेल रहे थे इसी दरम्यान अपोलो ने पूरी ताकत से डिस्कस को आसमान में उछाल दिया जिसे पकड़ने के लिए हायसिंथस पूरे जोश के साथ तैयार हो गया था ।

ज़ेफिर के लिए यह एक अवसर था, उसने डिस्कस की दिशा बदल दी और फिर खेल, खेल ना रहा । डिस्कस, हवा की पूरी ताकत के साथ हायसिंथस के माथे से जा टकराया और वो लहूलुहान होकर जमीन पर गिर गया । देवता अपोलो ने जमीन पर बेसुध पड़े हायसिंथस को गोद में लेकर बचाने की बहुत कोशिश की लेकिन उसकी कोशिशें व्यर्थ हो गईं ।  चोट बहुत गहरी थी और अपोलो का उपचार उसके लिए पर्याप्त सिद्ध नहीं हुआ । हायसिंथस की गर्दन उसके कांधों पर लुढ़क गई । अपोलो का चेहरा पीला पड़ चुका था वो चिल्लाया, हायसिंथस तू मर रहा है, मैंने तेरी जवानी छीन ली,  तेरा शोक मेरा गुनाह है, काश मैं तेरे लिए खुद मर पाता पर ये असंभव है इसलिए तू मेरे यादों और गीतों में सदैव जीवित रहेगा, मेरी वीणा हमेशा तेरे ही लिए सुर साधा करेगी, तू मेरे पश्चाताप का फूल बन जाएगा । अपोलो के आर्तनाद के दौरान ठीक उसी जगह एक खूबसूरत फूल उग आया जहां हायसिंथस का रक्त बहा था । 

ये दु:खद गाथा, ग्रीक पौराणिक आख्यानों का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जहां एक नश्वर शहजादे हायसिंथस और एक अमर देवता अपोलो की समलैंगिक प्रणय गाथा का विवरण मिलता है , कथा के तीसरे कोण में वायु देवता ज़ेफिर की उपस्थिति एक खलनायक के जैसी है क्योंकि वह भी हायसिंथस का प्रेम पाना चाहता था और देवता अपोलो की सफलता ने हायसिंथस को उससे दूर कर दिया था । इश्क में नाकाम देवता ज़ेफिर ने अपनी असफलता को हायसिंथस की मृत्यु में बदल डाला, प्रेम-मय खेल की असामयिक मृत्यु । डिस्कस के वायु वेगवान प्रहार ने युवा कदाचित कमसिन हायसिंथस के प्राण ले लिए । हायसिंथस की प्राण रक्षा में असफल और शोक में डूबे देवता अपोलो, हायसिंथस को एक फूल में बदल देते हैं । हायसिंथस जो एक नश्वर मनुष्य था और हम सभी मनुष्यों का प्रतिनिधित्व करता है,वो देवता अपोलो की चाहत का केंद्र था । कथनाशय शायद यह कि सभी नश्वर लोग, दिव्य शक्ति की चाहत का केंद्र हो सकते हैं ।

इस आख्यान से यह संकेत मिलता है कि अगर पुरुष पुरुष से प्रेम करता हो तो समलैंगिकता भी पवित्र और पूज्यनीय है । मिथक में बयान किया गया इश्क, प्रथम दृष्टया भले ही दु:खांत दिखाई देता है पर वो नश्वरता की आकस्मिक मृत्यु के बाद भी जीवित रहा, हरेक बसंत में, पिछले बसंत के बीजों से पुरुत्पादन की लय, नित्यता के साथ, नश्वरता की क्रमिक अमरता के जैसा । एक फूल जो खूबसूरत है, मरता है और जीता है बारम्बार, देवता अपोलो जो हायसिंथस की आकस्मिक मृत्यु से शोकाकुल था किन्तु अपने अपराध बोध को स्वीकारते हुए भी, खुद मर नहीं सकता था क्योंकि वह तो अमरत्व का चिरयात्री है, सो उसने हायसिंथस के लिए नई तरह की नित्यता, अमरत्व का चुनाव किया । किंचित विरह और फिर पुनर्मिलन की सतत यात्रा, कदाचित इस संदेश के साथ कि प्रियतम से अलगाव स्थायी नहीं होता यदि उसमें एक अल्प विराम है तो पुनर्मिलन की आस भी है ।

सूर्य के रात्रिकालीन गोपन अस्तित्व के समांनातर हरेक अगली सुबह सूर्य की दृष्टव्य उपस्थिति के जैसा । इस आख्यान में देवता अपोलो की वीणा हायसिंथस के लिए सुर साधती है , देवता के गीत हायसिंथस के लिए प्रेम पगे हैं , दुख , सुख भरी यादों से भरे पड़े हैं । हायसिंथस जिसने योनि बदली है , काया बदली है । देवता अपोलो, जिसे प्रेम ने, इंसान बनाए रखा और देवता ज़ेफिर जिसे प्रेम की असफलता ने मनुष्यों की तरह खलनायक और हत्यारा बना दिया । बहरहाल मिथक संकेत यह कि प्रेम में समलैंगिकता या विषमलिंगीयता का भेदभाव नहीं । कथा प्रातीतिकता यह कि ईश्वर और मनुष्यों में द्वैध का भाव नहीं है अंततः ईश्वर भी जीता है प्रेम या घृणा में, मनुष्यों की तरह से...

सोमवार, 18 मई 2026

दानवी सुकन्या स्काडी

स्काडी, असुर कुल में जन्मी युवती थी किन्तु उसे सुर कुल में जन्मी किसी देवी की तरह से जंगल की सत्ता हासिल थी । वो अमूमन जंगल और पहाड़ों में शिकार किया करती थी, हालांकि उसकी पुरुषोचित वेशभूषा के कारण से, ज्यादातर सामान्य लोग , उसे एक आकर्षक पुरुष ही मानते थे । स्काडी को कुलीन देवताओं से शत्रुता की हद तक घृणा थी और वो उनसे, अपने पिता असुर राज थियाजी की हत्या का बदला लेना चाहती थी । इसीलिए एक दिन वो बदले की भावना से वशीभूत होकर युद्ध के तमाम हथियारों और जिरह बख्तर के साथ देवताओं से युद्ध करने के लिए, उनके राज्य असगार्ड जा पहुंची और फिर उसने देवताओं को युद्ध की चुनौती दी ।

देवता उससे युद्ध नहीं करना चाहते थे, तो उन्होंने स्काडी से कहा तुम मुआवजा ले लो । बतौर मुआवजा तुम किसी एक देवता से ब्याह कर सकती हो लेकिन तुम्हें ब्याह के लिए देवता का चयन उसके पैर देखकर करना होगा, तुम उसका चेहरा नहीं देख सकोगी । स्काडी ने सोचा कि सबसे खूबसूरत पैर देवता बाल्डर के होंगे । दरअसल वो बाल्डर से ब्याह की इच्छुक भी थी, लेकिन उससे फैसला लेने में चूक हो गई , असल में देवताओं में सबसे खूबसूरत पैर समुद्र के देवता न्योर्ड के थे । शर्त के अनुसार ये स्काडी की मजबूरी थी कि वो न्योर्ड से ब्याह कर ले ।

स्काडी ने बदला ना लेने के लिए एक शर्त देवताओं के सामने रखी थी कि देवताओं को उसे हंसाना होगा तभी युद्ध टाला जा सकता है । शर्त को सुनकर देवता लोकी ने रस्सी का एक सिरा  बकरे की दाढ़ी में और दूसरा उसके अडंकोश मे बांध दिया , बकरा जब भी उछलता, लोकी चीखता चिल्लाता और स्काडी की गोद में जा गिरता । इस अभिनयात्मक कृत्य से स्काडी की हंसी फूट पड़ी । तभी देवता ओडिन ने असुर राज थियाजी की दोनों आंखे , आकाश में फेंक दीं जहां वो तारों की तरह से चमकने लगीं , इससे स्काडी को हार्दिक प्रसन्नता हुई और उसने बदले की भावना को छोड़कर समुद्र के देवता न्योर्ड  से ब्याह कर लिया ।

किन्तु आकर्षक असुर देवी स्काडी  और समुद्र के देवता न्योर्ड का ब्याह असफल हो गया क्योंकि न्योर्ड अपने समुद्र तटीय घर नोआतुन में रहना चाहता था , जहां उसे सीगल की आवाजें सुनाई दें जबकि स्काडी, पहाड़ों पर रहना चाहती थी जहां वो रात में , भेड़ियों की आवाजें सुन सके इसलिए दोनों का साथ रहना असंभव हो गया था । बहरहाल उन्होंने वैवाहिक संबंध बनाए रखने के जतन बतौर एक दूसरे के साथ , क्रमशः नौ , नौ दिन के अनुक्रम में , पहाड़ और समुद्र तट पर रहने का सुनिश्चय किया , यद्यपि यह व्यवस्था ज्यादा दिन तक नहीं चल सकी और वे एक दूसरे से अलग अलग जीवन बिताने लगे ।

यह लोक आख्यान स्केन्डेनेवियाई देशों में बहुश्रुत और प्रचलित है । इस मिथक के अनुसार असुर और देवताओं की प्रतिद्वंदिता का परिणाम था कि असुर राज थियाजी की हत्या, देवताओं द्वारा कर दी गई थी । अगर हम स्केन्डेनेवियाई परिदृश्य की इस कथा को भारतीय परिदृश्य की तुलना में देखें तो देवताओं और असुरों की चिरपरिचित प्रतिद्वंदिता का साम्य , भू भौतिक विविधता के बावजूद बेहद दिलचस्प लगेगा । वर्तमान समय में मानवीय बसाहटों की दूरियों और सामाजिक , सांस्कृतिक वैविध्य के बावजूद देवताओं और असुरों की दुश्मनी का एक सूत्रीय कथन कहीं ना कहीं मनुष्यों की ऐतिहासिक, आध्यात्मिक सह धार्मिक और संसाधनगत कब्जेदारियों की विरासत की वैमनस्य कथा से पूर्व के आदिम युगीन सामीप्य का उदघोष तो करता ही है ।

जन सामान्य में प्रचलित विश्वास यह है कि देवताओं द्वारा, अपनी स्वयंभू कुलीनता सह स्वर्ग पर आधिपत्य के श्रेष्ठी-बोध की धारणा के तहत असुरों को पाताल लोक में ढकेला गया और वे असुरों को निम्न वर्गीय सामाजिक संस्तरण मानते हैं जबकि असुर-गण, देवताओं की इस धारणा को मिथ्या सिद्ध करने के लिए बारम्बार देवताओं के विरुद्ध युद्ध छेड़ते हैं और अक्सर उन्हे स्वर्ग से बेदखल कर देने के नाम पर भयभीत भी करते है । ऐसा प्रतीत होता है कि असुर राज थियाजी की हत्या के बाद देवतागण युद्ध से बचना चाहते थे और उन्होंने स्काडी के सामने समझौते का प्रस्ताव किया जिसमें ब्याह के नाम पर वे स्वयं विचारित, स्वघोषित अभिजात्यता से नीचे झुककर असुर कुलीन युवती स्काडी को  किसी भी देवता से ब्याह करने का प्रस्ताव देते हैं । हालांकि इस प्रस्ताव में एक सामाजिक परंपरा और एक कपट शामिल था ।

सामाजिक परंपरा यह कि ब्याह के लिए स्त्रियां निचले कुल से भी लाई जा सकती हैं और कपट  यह कि स्काडी को पति स्वरूप देवता का चयन, केवल पैरों के सौन्दर्य के आधार पर करना था , उसे देवताओं का मुख या देह देखने की छूट नहीं दी गई थी । प्रतीकात्मक रूप से इस कथन से पति परमेश्वर के चरणों की दासी जैसा भाव बोध होता है । स्काडी को देवता बाल्डर से मोह था कदाचित उसने, उसे, कहीं, कभी, किसी अवसर पर देखा जरूर होगा । उसे प्रतीत हुआ कि सबसे सुंदर पैर भी बाल्डर के ही होंगे पर उसका अनुमान गलत सिद्ध हुआ । पैरों के सौन्दर्य के आधार पर चुना गया देवता न्योर्ड निकला  । कथनाशय यह है कि न्योर्ड, देवताओं का एक कूटनीतिक पांसा था जो बाल्डर से स्काडी के मोह को ध्वस्त कर गया ।

देवताओं की कूटनीतिक चरणकमल-वत नीति ने स्काडी को ऐसे बंधन में बांध दिया जो उसने सोचा भी नहीं था । बहरहाल ये नार्स मिथक संबंधों की टूटन पर समाप्त होता है क्योंकि न्योर्ड और स्काडी अलग बसाहटों, अलग अलग परवरिशों में समाजीकृत हुए थे । भारतीय संदर्भों में कुलीन देवता और असुर-गण एक ही पिता किन्तु दो भिन्न माताओं की संतान थे पर यह संकेत इस स्केन्डेनेवियाई मिथक मे स्पष्ट परिलक्षित नहीं होता । इसे आदिम युगीन लघु समाज के क्रमशः विस्तारित होते जाने और भिन्न भूभागों में बसाहट की पृष्ठभूमि में देखा जाए तो आदिकालीन सामाजिक धार्मिक और विश्वासगत एक्य से यह अनुमान किया जा सकता है कि उक्त एक्य में कुलीनता आधारित संस्तरण का सूत्रपात, विमाताओं की परवरिश का परिणाम रहा होगा ।

बहरहाल वैवाहिक संबंध स्थापित करने की कूटनीतिक पहल ने उक्त कालखंड में, स्काडी और देवताओं के मध्य युद्ध को भले ही टाल दिया हो, पर वैमनस्य और कुलीनता आधारित ऊंच नीच के कथित विश्वास इन दोनों समुदायों के अंतस में गहरे पैठ चुके थे । कथा में उल्लिखित ब्याह भिन्न पर्यावासों और भिन्न संस्तरणात्मकताओं के कृत्रिम गठजोड़ जैसा था जिसे टूटना ही था और जो टूट गया । असुर राजकुमारी को इस ब्याह रूपी समझौते से, केवल मृत पिता की आंखों के सितारों जैसा चमकने का एहसास या आभास मिला पर उसका वैवाहिक जीवन विफल रहा और देव, असुर समझौता भी छलावा सिद्ध हुआ । स्काडी, देवता बाल्डर की पति रूप में कामना करती थी और उसे ब्याह से पूर्व न्योर्ड से कोई प्रेम नहीं था ।

स्काडी को पहाड़ों में गुर्राते भेड़ियों की आवाजे प्रिय थीं और न्योर्ड को समुद्र में गूंजती हुई सीगल की आवाजें मुग्ध करती थीं । वैवाहिक जीवन की निरन्तरता का उनका नौ, नौ दिवसीय क्रमिक प्रबंधन, अंततः ध्वस्त हो गया । कथा से यह निष्कर्ष निकलता है कि दाम्पत्य जीवन की सुखद परिणति के अवसर तभी बढ़ते हैं जब युगल द्वय में सामाजिक सांस्कृतिक धार्मिक और पर्यावासीय भिन्नता न्यूनतम हो अथवा एक समान । वे दोनों पूर्वजों की साम्यता के बावजूद एक दूसरे के शत्रु समाज की तरह से विकसित हुए थे अतः युद्ध टालने का कोई कृत्रिम समझौता, उन्हें स्थायी गठबंधन में रख ही नहीं सकता था । अतः देवता और असुर ही नहीं, बल्कि जनसामान्य में भी इस तरह के युद्ध होते ही रहेंगे । कथासार यह है कि देवताओं ने दुर्लभ और अनमोल संसाधनों पर एक पक्षीय तौर पर जो एकाधिकार बना लिया था वंचित असुर जन उसका विरोध करते ही रहेंगे... 

शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

मे यी

राजकुमारी मे यी को एक बहादुर नौजवान से लगाव था और वो उससे ब्याह करना चाहती थी हालांकि युवक बेहद गरीब था । राजकुमारी की मां इस बात से बहुत खफा थी क्योंकि वो खुद ही उस युवक से ब्याह करना चाहती थी । एक दिन उसने गुस्से में, मे यी से सवाल किया कि क्या तुम उस गरीब नौजवान से शादी करना चाहती हो ? जबकि तुम जानती हो कि तुम दुनिया की सबसे हसीन लड़की हो और तुम्हारे खानदान के मुकाबले में उस युवक का खानदान कुछ भी नहीं है । यह सुनकर मे यी ने अपनी मां से कहा मैं उसे बहुत करीब से जानती हूं । वो मेरे लिए कुछ भी कर सकता है । वो एक नेक नीयत इंसान है और हम दोनों एक दूसरे से बेइंतिहा प्यार करते हैं । यह सुनकर मे यी की मां खामोश हो गई लेकिन उसे यह रिश्ता किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था ।

कहते हैं कि एक रोज उस रियासत में एक खूंखार ड्रेगन आ गया और उसने रियासत के बहुत सारे इंसानों को मार डाला । इंसानी जानों का नुकसान होते देखकर मे यी की मां ने घोषणा कि जो भी व्यक्ति उस ड्रेगन को मार डालेगा । वो उसकी इच्छा पूरी करेंगी । राजमाता की इस घोषणा को सुनकर मे यी के प्रेमी ने इसे एक सुअवसर मानकर, राजमाता से कहा कि वो ड्रेगन को मारने जाएगा । उसके दिल में, मे यी के लिए बेपनाह इश्क था और उसका ख्याल था कि अगर ड्रेगन को मार पाया तो राजमाता से, मे यी का हाथ मांग लेगा, हालांकि वो ड्रेगन से युद्ध का जोखिम उठा रहा था लेकिन उसके पास और कोई विकल्प शेष भी नहीं था, क्योंकि राजमाता के विरोध के चलते उसका इश्क पोखर की तरह से ठहर गया था, जिसमे भविष्य के लिए कोई लय नहीं थी ।

युवक ने मे यी को समझाया कि मेरी चिंता मत करो मेरे पास ड्रेगन को मारने की योजना है । ड्रेगन से युद्ध में जय, विजय की संभावना बराबर थी । हारे तो सब खोया और जीते तो इश्क को पाया । मे यी फिक्र मंद थी और अंदर से युवक भी आशंकित था लेकिन प्रेमिका को पाने की लालसा ने उसे हौसला दिया । वो तलवार लेकर ड्रेगन को मारने के लिए निकल पड़ा । ड्रेगन बहुत ताकतवर था । उसने युवक के हाथ पैर और पूरे जिस्म मे गंभीर चोटें पहुंचाई  लेकिन युवक को मे यी का ख्याल था वो बहादुरी से लड़ता रहा। ये युद्ध भीषण था। बहरहाल युवक ने ड्रेगन को शिकस्त दे दी, ड्रेगन मारा गया। प्रेमी की विजय पर मे यी की आँखों में खुशी के आँसू थे। वो जानती थी कि नौजवान ने उसके लिए यह जोखिम मोल लिया था जबकि इस युद्ध में उसकी जान भी जा सकती थी ।

वो युवक के व्यवहार से अभिभूत थी । ड्रेगन से भयंकर युद्ध में घायल जवान ने घर वापस लौटते ही सबसे पहले राजमाता से, मे यी का हाथ मांगा । राजमाता, ड्रेगन को मार डालने वाले योद्धा के प्रति पहले से ही वचनबद्ध थी सो उसने,  मे यी और युवक के ब्याह की अनुमति दे दी । जिसके बाद वो दोनों आजीवन एक दूसरे का होकर जिए ।

यह आख्यान मलेशिया की किसी रियासत की राजकुमारी के इश्क के हवाले से कहा सुना जाता है । प्रथम दृष्टया यह एक सपाट सी प्रेम कथा लगती है जिसमे प्रेमी, प्रेमिका को पाने के लिए रास्ते की सभी बाधाओं से जूझता है और अंततोगत्वा आख्यान का अंत सुखांत हो जाता है । हालांकि कथा को फिर फिर बाँचें तो इसके कुछ बिन्दु चौकाने वाले हैं जैसे कि प्रेमिका राजकुमारी है और प्रेमी बहादुर योद्धा, किन्तु निर्धन । अतः प्रेम में आर्थिक खाई का ऊंच नीच गौर तलब है,जहां प्रेमिका,प्रेमी की आर्थिक विपन्नता के बजाए,प्रेमी की बहादुरी और स्वयं के प्रति उसके समर्पण का खास ख्याल रखती है।कथनाशय यह है कि प्रेमासक्त जोड़े के सामने आर्थिक वर्ग भेद मायने नहीं रखता। वो दोनों बस प्रेम मे हैं और आगे भी साथ रहना चाहते हैं।

इस मिथक से एक और दिलचस्प बिन्दु प्रकटित होता है कि मे यी की मां जो इस रियासत की राजमाता है स्वयं भी उस युवक को चाहती है । वो भली भांति जानती है कि उसकी पुत्री भी उस युवक के इश्क में मुब्तिला है । उसके मन में कदाचित अपनी ही पुत्री के प्रणय संबंध के प्रति ईर्ष्या का भाव है इसीलिए वो अपनी पुत्री को इस संबंध की अनुमति नहीं देती बल्कि पुत्री के अप्रतिम सौन्दर्य और खानदानी ऊंच नीच का हवाला देते हुए टाल मटोल करती है जबकि वो स्वयं ही इस युवक के प्रति आकर्षित है और उस युवक की निर्धनता उसके लिए मायने नहीं रखती। अगर कथा संकेतों को ग्रहण करें तो राजमाता निःसंदेह उस युवक से आयु में भी बड़ी रही होगी क्योंकि युवक उसकी पुत्री का समवयस्क था अतः मे यी के मार्ग में बाधक बन गई राजमाता,मे यी को हतोत्साहित करती है और खुद के लिए आगे का रास्ता हमवार करती है ।

आख्यान में निहित इस तथ्य को हम राजमाता के अनैतिक यौन आकर्षण का नाम भी दे सकते हैं क्योंकि पुत्री के प्रणय संबंधों से परिचित होकर भी राजमाता स्वयं के लिए प्रेम के द्वार खोलती दिखाई देती हैं और इसके लिए वो अपनी सामाजिक और राजनैतिक संस्थिति, प्रभुता का इस्तेमाल करती है । मिथक में ड्रेगन के आगमन और उसकी हिंसा को प्रातीतिक रूप से स्वीकार करें तो ड्रेगन कोई शक्तिशाली शत्रु है जिसकी हिंसा से रियासत के नागरिक और राजमाता परेशान है और इसे संयोग माने कि राजमाता रियासत के विजयी योद्धा को उसकी इच्छा पूर्ति का वचन देती हैं। युवक भयभीत तो है पर वो इसे सुअवसर भी मानता है कि उसकी जय,उसको रियासत से,प्रेयसी मे यी का उपहार दिला देगी।सो वो प्रेमिका को समझा बुझा कर युद्ध भूमि जाता है।

घायल होने के बावजूद वो शत्रु से युद्ध करता है और शत्रु की मृत्यु के रूप में, मे यी का वरण करता है । कथा कहती है कि प्रेम, युवक का साहस है और फिर प्रेमिका का यह विश्वास भी नहीं टूटता कि उसने प्रणय संगी चुनने मे कोई भूल नहीं की है । बहरहाल पोखर हुआ जाता इश्क फिर से बह निकला 


शुक्रवार, 23 जनवरी 2026

प्रेम जो आसमान से गिरकर खजूर में नहीं अटकता

5000 वर्ष ईसा पूर्व के ग्रीक-ओ-रोमन गल्प कहते हैं कि देवता एगडिस्टस धरती पर,जुपिटर के बिखरे हुए शुक्राणुओं से जन्मा किन्तु देवताओं ने उसका बंध्याकरण कर दियाजिसके फलस्वरूप वो केवल देवी सायबेले के स्त्री रूप में ही शेष रह गया था। इस गल्प के समानांतर दूसरी गल्प कहती है कि एगडिस्टस, सायबेले का स्त्री पुरुष रूपेण,समेकित अवतार था और उसके पौरुष के अंश, धरती पर गिरने से अखरोट का वृक्ष पैदा हुआ, जिसके फल खाकर कुंवारी जलपरी नाना गर्भवती हुई और उसने एट्टिस को जन्म दिया, जिसे वनस्पतियों और चरवाहों के फ्रीजियन देव के तौर पर स्वीकार किया गया। स्पष्ट है कि एट्टिस, प्रकृति का देव था और उसका जन्म कुंवारी जलपरी नाना की कोख से देवी सायबेले के पूर्ववर्ती सम्पूर्ण अवतार एगडिस्टस के पौरुष अंशों से हुआ था और इस सांकेतिक अर्थ में, एट्टिस को सायबेले का पुत्र भी माना जाएगा। 

इस आख्यान में अचंभित करने वाला कथन ये है कि अपने युवापन में एट्टिस और उसकी मातृस्वरूपा सायबेले, प्रेमी युगल माने गए हैं । इससे आगे बढ़कर, बेहद दिलचस्प, स्वभाविक, प्रसंग ये कि, कुछ समय के बाद, एट्टिस को अप्सरा सैग्रिटिस से प्रेम हो गया और वो उससे ब्याह करना चाहता था । एट्टिस की इस हरकत, कदाचित बेवफाई से, सायबेले अत्यधिक क्रोधित हो गई और उसकी क्रोधाग्नि से, एट्टिस विक्षिप्त हो गया । इसके उपरांत गल्प कथन ये है कि, एक तरफ अप्सरा सैग्रिटिस से प्रेम और ब्याह की आकांक्षा और दूसरी तरफ देवी सायबेले की क्रोधाग्नि, से बावले हो गए एट्टिस ने फर के एक दरख्त के नीचे खुद का बंध्याकरण कर लिया और काल के गाल में समा गया, उसके बहते, बिखरे खून से उस जगह एक जामुनी पुष्प, प्रथम नीलवर्णी फूल खिला । 

इस मिथक के अनुसार एगडिस्टस, उर्वरता की देवी सायबेले का पूर्ववर्ती, स्त्री पुरुष रूपी, समेकित संस्करण है, जो कि धरती पर बिखरे जुपिटर के शुक्राणुओं से जन्मा था लेकिन पिता जुपिटर की इस द्विलिंगीय गुण धर्म वाली संतान को अन्य देवताओं ने बंध्याकरण करके, देवी सायबेले के स्त्री-लिंगीय रूप तक सीमित कर दिया। इसी आख्यान का दूसरा संस्करण कहता है कि एगडिस्टस के शुक्राणुओं से अखरोट के दरख्त का आजन्म हुआ और उसका फल खाकर कुंवारी, जलपरी नाना, देवता एट्टिस को जन्म देती है, जो चरवाहों और वनस्पतियों का देवता है जबकि सायबेले उर्वरता की देवी है। इस कथा का यह सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह है कि युवा एट्टिस अपनी मातातुल्य सायबेले का प्रेमी हो जाता है जिसे वर्तमान समय की यौन नैतिकता के मानदंड के हिसाब से सर्वथा अनुचित, माना जाएगा । हालांकि आख्यान कालीन समाज में इसे वर्जनाओं के दायरे में सम्मिलित नहीं किया गया है । 

सामान्य तौर पर एट्टिस और सायबेले के मध्य एक पीढ़ी का आयुगत फासला है ऐसे में स्वभाविक था कि एट्टिस सायबेले की तुलना में अप्सरा सैग्रिटिस की ओर आकर्षित हो जाता है और उससे ब्याह भी करना चाहता है। कथा को बाँचते हुए हम इसी मोड़ पर महसूस करते हैं सायबेले की सौतियाडाह, ईर्ष्या, बेवफाई के विरुद्ध क्रोध और प्रतिकार स्वरूप सामर्थ्य, शक्ति का आक्रामक, मारक प्रदर्शन। यूं तो देवता अमर माने जाते हैं पर इस आख्यान का नायक एट्टिस अतार्किकता की सीमा तक बदहवास हो चुका है और स्वयं के बंध्याकरण, सतत बहते हुए रक्त की परिणति स्वरूप मानवीय मृत्यु को स्वीकार करता है । अंततः कुंवारी मां जलपरी नाना का देवता पुत्र, उत्कर्ष और अमरता की सीढ़ियों से फिसलता हुआ पुनः वनस्पति, नील पुष्प हो जाता है । यह भी एक किस्म का प्रेम है जो नैतिक अनैतिक में भेद नहीं करता, प्रेम जो देवताओं में भी बहु-स्त्रीगामी है , प्रेम जो आसमान से गिरकर खजूर में नहीं अटकता बल्कि मिट्टी में मिल जाता है । 

सोमवार, 27 अक्टूबर 2025

इश्क़ ना पुच्छे दीन धरम नू

मुद्दतों पहले कश्मीर में सोडा राम अपनी पत्नि  के साथ रहता था जिसने उसकी ज़िंदगी नरक बना दी थी । पत्नि बात बात पर झगड़ा करती, वो बेहद अशालीन और घटिया लहजे में बात करती जिसकी वजह से सोडा राम लगभग अवसाद ग्रस्त  हो चला था पर उसके पास पत्नि से मुक्ति का कोई मार्ग नहीं था । दूसरी तरफ पत्नि उससे, हमेशा असन्तुष्ट बनी रहती । एक दिन उसने सोडा राम से कहा जाओ, राजा से दया की याचना करो और भिक्षा मांग कर लाओ । सोडा राम के लिए पत्नि की ये बात कुछ दिनों के लिए ही सही पर आजादी का द्वार खोलने जैसी लगी । वो फौरन लंबी यात्रा के लिए घर से बाहर निकल गया । मीलों पैदल चलने के बाद थोड़ा आराम करने के ख्याल से वो एक झरने के पास के पेड़ की छाया में आराम करने लगा । तभी उसे एक जहरीला सांप दिखाई दिया, जिसे पकड़ कर उसने अपने थैले में डाल लिया और एक कुटिल विचार के साथ वापस अपने घर की तरफ चल दिया । उसने सोचा कि अगर ये सांप पत्नि को डस लेगा तो उसे, उसके दुखों से हमेशा के लिए निजात मिल जाएगी ।

घर पर वापस आते ही उसने पत्नि से कहा, तुम्हारे लिए एक शानदार तोहफा लाया हूँ । उसे पूरी उम्मीद थी कि पत्नि जैसे ही थैले में हाथ डालेगी सांप का जहर उसे परलोक पहुंचा देगा। लेकिन पत्नि ने जैसे ही थैले में हाथ डाला, वहाँ एक सुंदर बच्चा मुस्करा रहा था । सोडा राम हैरान था पर उसके पास आँखन देखी पर विश्वास के सिवा कोई और विकल्प शेष नहीं था । उसने बच्चे का नाम, नाग राय रखा जो जल्द ही उनके परिवार में सुख और समृद्धि की वजह बन गया ।  एक रोज बच्चे ने जिद की कि वो उस झरने में नहाना चाहता है जहां से पालक  पिता उसे लेकर आया था । सोडा राम ना चाहते हुए भी उसे उसी झरने के पास ले आया । असल में यह झरना राजकुमारी हीमल का था जहां वो स्वयं भी स्नान किया करती थी। बालक नाग राय, सांप बन कर झरने की दरार के अंदर दाखिल हुआ और नहा कर वापस आ गया ।  लेकिन ये सिलसिला यहाँ पर रुका नहीं युवा होने तक नाग राय लगभग हरेक दिन नहाने के लिए उस झरने का इस्तेमाल करने लगा जोकि राजकुमारी हीमल का निजी स्नानागार था ।

हीमल को यह अंदाज हो गया था कि कोई व्यक्ति उसके झरने का इस्तेमाल कर रहा है । उसने झरने की निगरानी बढ़ा दी और एक दिन उसने नाग राय को ऐसा करते हुए देख लिया, उसने पाया कि वो एक बांका सजीला नौजवान है । उसे पहली ही नजर में नाग राय से इश्क हो गया । उसने नाग राय से कहा कि तुम मुझसे ब्याह कर लो । नाग राय ने इस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया और फिर धूम धाम से उनकी शादी हो गई । उन दोनों के लिए झरने के करीब ही एक शानदार महल बनवाया गया जहां वे लोग सुख से रहने लगे । उधर पाताल लोक में नाग राय की नाग पत्नियाँ, नाग राय को ढूंढती फिर रही थीं । एक दिन उन्होंने नाग राय और हीमल को एक साथ रहते देखा । वो ईर्ष्या और क्रोध से भर गईं । उन्होंने इस गठबंधन को तोड़ने के लिए भोली भाली  हीमल के मन में शक के बीज बोना शुरू कर दिये । उन्होंने कहा तुम्हारा पति  पहले से शादी शुदा है और तुम्हारे लिए वफादार नहीं है । इतना ही नहीं उसके दूसरी युवतियों से भी नाजायज रिश्ते हैं । उन्होंने सुझाव दिया कि हीमल, नाग राय कि परीक्षा ले । उसे दूध से भरे कुंड में डुबकी लगाने कहे अगर वो चरित्रवान ब्राह्मण पुत्र होगा तो कुंड में डूबने लगेगा वरना तैर कर बाहर भागेगा ।

हीमल ने ऐसा ही किया, नाग राय इस साजिश को समझ गया लेकिन हीमल उसकी ना नुकुर से संतुष्ट नहीं हुई । मजबूरी में नाग राय जैसे ही दूधिया कुंड में उतरा उसकी नाग पत्नियों ने उसे घुटनों तक दूध कुंड में खींच लिया । नाग राय ने हीमल से कहा क्या वो संतुष्ट  है ? हीमल संतुष्ट नहीं थी । वो खामोश रही इसके बाद नाग राय की जांघे, सीना और चेहरा भी डूबता गया और जब तक हीमल कुछ समझ पाती वो सशरीर दूध के कुंड में डूब गया । यह देख कर हीमल  विलाप करने लगी । उसने अपनी पूरी सुख सुविधाओं  का परित्याग कर दिया और हर दिन नाग राय की प्रतीक्षा करने लगी । एक रोज एक बूढ़े ने उसे बताया कि झरने में एक युवक नहाने आता है जो असल में सांप है ।  हीमल ने सुबह से शाम तक इंतजार किया और शाम को नाग राय को देखते ही उसके कदमों से लिपट गई । उसने कहा तुम जहां भी रहते हो मुझे अपने साथ ले चलों । नाग राय उसे प्रेम करता था, तो कंकड़ बनाकर पाताल लोक ले गया लेकिन उसकी नाग पत्नियाँ समझ गईं कि ये हीमल है । उन्होंने हीमल को प्रताड़ित करते हुए अपने बच्चों की हत्या करने का आरोप लगाया और मार डाला ।

हीमल की मौत के बाद नाग राय शोक संतप्त होकर पागलों की तरह से व्यवहार करने लगा । वो हीमल की चिता नहीं जलाना चाहता था । वो उसके जिस्म को पाताल लोक से बाहर, झरने की दुनिया में लेकर आया और उसके जिस्म को जादुई लेप से संरक्षित करते हुए एक दरख्त के नीचे रख दिया । वो हर एक दिन हीमल के शव के पास आता और शोक मनाता । एक रोज हीमल का जिस्म उस पेड़ के नीचे नहीं मिला तो वो उसे ढूँढने लगा । असल में हीमल को एक साधु ने फिर से जिंदा कर दिया था।बेचैन नाग राय उसे ढूँढता रहा, एक रोज वो सांप बनकर हीमल को ढूंढ रहा था तो साधु के बेटे ने उसे इस आशंका से मार डाला कि वो हीमल को डस ना ले । उधर हीमल साधु के संरक्षण में चैन से सो रही थी और जब वो नींद से जागी तब तक नाग राय की मौत हो चुकी थी । घटनाक्रम से दु:खी होकर हीमल ने नाग राय की चिता में ही जौहर कर लिया ।

यह मिथक प्रथम दृष्टया सतही तौर पर नागों और इंसानों की सर्वथा भिन्न प्रजातियों, देहों के मध्य प्रेम के पलने, पनपने और अपनी सुविधा के अनुसार काया बदल सकने की क्षमताओं के होने का कथन  करता है । इसे बांचते हुए जहरीले और गैर जहरीले जिस्मों के सहज सहअस्तित्व के संकेत मिलते हैं । अन्य भारतीय आख्यानों की तरह इंसानों का भूलोक में रहवास और नागों का पाताल लोक निवासी होना सामाजिक जीवन और विभाजन के कम-ओ-बेश दैवीयता और दानवीयता जैसे उच्च और निम्न स्तरीय विभाजन का प्रातीतिक कथन करता है । यह कथन किसी ज्ञानी, ऋषि की भिन्न पत्नियों के सौतेले भाइयों के अभिजात्य और अधम होने के निरंतर संघर्ष के दृष्टान्तों के मध्य यदा कदा पनपने वाले परम प्रेम, वैवाहिक संबंधों की अनुभूति कराता है । मसलन अर्जुन और नाग कन्या उलूपी , भीम और असुर हिडिंबा के किस्सों  के उलट नाग राय और हीमल ।

आख्यान की शुरुआत पत्नि पीड़ित सोडा राम के व्यथा कथन से होती है । सोडा राम का दु:ख चरम पर है और वो अपनी पत्नि की मृत्यु अथवा उससे येन केन प्रकारेण मुक्ति के सिवा कोई दूसरी बात सोचता ही नहीं है । वर्ण व्यवस्था के मानकों के अंतर्गत वो एक ब्राह्मण है और उसे ज्ञानी होना चाहिए पर कथा उसके धर्म और जातीयता से इतर उसकी निर्धनता, दम घोंटू दाम्पत्य जीवन और नि:सन्तानता पर विशेष रूप से मुखरित होती है । कहने का तात्पर्य यह है कि वर्ण, धर्म और जातीयता, स्त्री पुरुष के सहज रहवास, सहवास, संतति की अपरिहार्यता और आर्थिक विपन्नता के मुकाबिले में पिछड़ जाती है , कदाचित हाशिये मे चली जाती है । बहरहाल आर्थिक विपन्नता को दूर करने के लिए धन, वैभव सम्पन्न वर्ग से याचना का सुझाव पत्नि देती है और पति इसे सामयिक राहत का संकेत मानकर प्रसन्न है कि कम से कम यात्रा की अवधि में वो, अपनी पत्नि के असहज और क्रूर व्यवहार से मुक्ति पा लेगा ।

सोडा राम की लंबी और थकाऊ पैदल यात्रा के दौरान झरने का किनारा और दरख्त की छाया विश्राम करने के लिए सर्वथा उपयुक्त स्थल है पर यह आख्यान, इस स्थल का प्रातीतिक उपयोग जहरीले नाग के बसेरे की तरह से करता है। जिसे सोडा राम अपने सुखद, सहज भावी जीवन लिए सुअवसर की तरह से इस्तेमाल करना चाहता है । कथनाशय यह है कि सोडा राम, अपनी पत्नि से आकंठ पीड़ित है और उससे शत्रुता की सीमा तक घृणा करता है । वो दरार से प्रकटित हुए नाग को पकड़ लेता है और झोले मे डाल कर पत्नि की जहरीली किन्तु नैसर्गिक दिखने वाली मृत्यु की कामना करता है । यानि कि वो चाहता है कि समाज यह मान ले कि नाग के दंश से होने वाली मृत्यु एक प्राकृतिक दुर्योग मात्र है जिसके लिए सोडा राम या उसके द्वारा की गई, कोई मार पीट कदापि उत्तरदाई नहीं है । सच कहें तो कथा का ये संकेत बेहद दिलचस्प है जहां हत्या के प्रयास से पहले, स्वयं के उत्तरदायी नहीं होने का तर्क गढ़ा जाता है ।

सोडा राम, धन की याचना के उद्देश्य को तिलांजलि देकर वापस घर लौट आता है । उसकी प्राथमिकता स्पष्ट है । वो भिक्षा में मिले धन की तुलना में पीड़ा देने वाली पत्नि की मृत्यु अर्थात असहज रहवास, सहवास से मुक्ति का मार्ग पहले चुनता है । बहरहाल आख्यान कहता है कि सोडा राम को वधिक होने से पहले पिता होने की आवश्यकता है । क्या यह संभव नहीं कि सोडा राम अपनी पत्नि की नाग दंश से होने वाली मृत्यु की कामना के बजाए, संयोगवश रास्ते मे मिली एक संतान का उपहार लेकर लौटा हो जिससे उसकी पत्नि का मातृत्व भाव जागृत हो और स्वभाव की कटुता में कमी आए ? वो नाग पुत्र जो उनके परिवार में संपन्नता भी लाता है । मिथक में नाग के शिशु अथवा युवा हो जाने और फिर से नाग या मनुष्य होते रहने की कायिक बारंबारता स्पष्ट परिलक्षित है किन्तु इसे सीधे सपाट शाब्दिक अर्थों के बजाए समाज विज्ञानियों और नृतत्ववेत्ताओं के दृष्ठिकोणों से भी समझा जाना चाहिए ।

सोडा राम का ब्राह्मण होना, वर्ण कुलीनता के आशय में और नाग राय का नागवंशी होना नाग टोटम, नाग गण चिन्ह से जोड़ कर देखें तो नाग राय, विशुद्ध रूप से रंगने वाला नाग नहीं बल्कि नाग गोत्र, नाग समाज का शिशु या युवा माना जाएगा । इसे ऋषि कश्यप की अनेकों पत्नियों मे से अदिति के देव पुत्रों और दिती के दानव पुत्रों के स्वभाव, खान पान, वेशभूषा, राज्य सत्ता, संपन्नता के अंतर की तरह से पेश नहीं किया जा सकता । अदिति  और दिती एक ही पिता की संतान होने के नाते परस्पर बहने थीं और देवता तथा दानव माने गए सभी पुत्र एक ही पिता की संतान थे । उनकी संपन्नता और विपन्नता के साथ ही साथ स्वभावगत सज्जनता और दुष्टता के गलेमराइज्ड और चित्रमय  प्रदर्शन से यह खाई भले ही गहरी प्रतीत होती हो पर उनकी स्वजनता, बंधुत्व के सूत्र एक ही हैं । बस यही संकेत, नाग राय और राजकुमारी हीमल को मनुष्य होने की श्रेणी में रखता है उनमे से कोई भी रेंगने वाला जीव नहीं है । इस संकेत के आधार पर नाग सदृश्य मुकुट और स्वर्ण मुकुट मात्र वेशभूषा के अंतर माने जाने चाहिए ।

गोत्रज भिन्नता और सामाजिक रहवास, प्रेम और विवाह के अनुकूल अथवा प्रतिकूल भी हो सकते है किन्तु यह निश्चित है कि कथा कालीन समाज बहुविवाही समाज था । हीमल से पहले नाग राय की एकाधिक पत्नियां थीं और वे उसके अपने नाग गोत्र या समाज की सदस्य थीं यानि कि सजातीय पत्नियां। हीमल के स्नानागार में चुपके से स्नान करना नाग राय का प्रणय प्रयास माना जा सकता है । उसकी सजातीय पत्नियां उसकी पारिवारिक अनुपस्थति से असहज होकर उसे ढूंढ रही थीं और खोज की सफलता के उपरांत, उसके विजातीय नव दांपत्य जीवन से क्रुद्ध और ईर्ष्यालु हो गईं थीं, जिसकी परिणति नाग राय की मृत्यु और अंततः हीमल के जौहर पर हो जाती है । कथा कहती है कि नाग राय की पत्नियां हीमल को मार डालती हैं । संभव है यह बेसुध होने से उपजी मृत्यु जैसा भ्रम हो जिसकी पुनरावृत्ति ज्ञानी साधु के हस्तक्षेप से होती है । इसी प्रकार से यह भी संभव है कि नाग राय की मृत्यु उसकी नागोचित वेश भूषा के कारण हुई हो ?

इस कथा के अनुसार राजकुमारी हीमल, नाग राय से स्वयं ही प्रणय निवेदन करती है यानि कि उक्त समाज में स्त्रियां प्रणय निवेदन की पहल का अधिकार रखती थीं । आवासीय दृष्टि से नाग राय का खंदक, खोह, दरार, पाताल निवासी होना गरीबों के झोंपड़ों, निचली बस्तियों से,साम्य रखता है और हीमल का महल,धनाढ्य पूंजीवादी अट्टालिकाओं जैसा, पर प्रेम के आगे धन का कोई मोल नहीं । इससे आगे यह भी कि  इश्क़ ना पुच्छे दीन धरम नू, इश्क़ ना पुच्छे जातां, इश्क़ दे हाथों गरम लहू विच, डुबियां लख बरातां, के जैसा...

मंगलवार, 21 अक्टूबर 2025

सिगर्ड और ब्रिनहिल्ड

ड्रैगन फफ़्निर को मारने के बाद सिगर्ड एक नायक की तरह से प्रसिद्ध हो गया था ।  कुछ समय के बाद उसने वाल्किरी, ब्रिनहिल्ड को आग में घिरे हुए महल से बचाया था । खूबसूरत ब्रिनहिल्ड को ओडिन द्वारा दंड स्वरूप कैद किया गया था । कैद से मुक्त हुई ब्रिनहिल्ड को सिगर्ड से मुहब्बत हो गई और सिगर्ड भी उसके सौन्दर्यपाश मे बंध गया । दोनों ने एक दूसरे से ब्याह का वादा किया लेकिन उन्ही दिनों सिगर्ड को छल से एक जादुई शर्बत पिला दिया जाता है और वो अपने अतीत को भूलकर राजा गिउकी की बेटी गुड्रुन से ब्याह कर लेता है । सिगर्ड की बेवफाई से आहत होकर ब्रिनहिल्ड यह घोषणा करती है कि वो, उस पुरुष से ब्याह करेगी, जो शक्ति और साहस के मामले में, उससे बेहतर प्रदर्शन करेगा ।

 

इधर जादुई शर्बत की वजह से याददाश्त खो चुका सिगर्ड, गुड्रुन के भाइयों को खुश करने की कोशिश के तहत गुन्नार बन कर ब्रिनहिल्ड का हाथ जीतने में उसकी मदद करता है तथा उससे शादी करवा देता है । इधर ब्रिनहिल्ड इस सत्य से अनजान थी कि सिगर्ड स्वयं ही जादुई छलावे का शिकार हो चुका है । ब्रिनहिल्ड को लगता है कि सिगर्ड ने उसके साथ दोबारा धोखा किया है और अपने साले गुन्नार से उसका ब्याह छल पूर्वक करवा दिया है तो वो गुड्रुन के भाइयों की मदद से ही सिगर्ड की हत्या करवा देती है और अंतिम संस्कार के समय मृत सिगर्ड की चिता में बैठ कर खुद भी आत्महत्या कर लेती है ।

 

यह दु:खद प्रेम कथाओं मे से, एक है । इस आख्यान के अनेकों संस्करण है जिनमे से नॉर्स और जर्मनिक स्रोतों के मिथक ज्यादा कहे और सुने जाते हैं । इस कथा में प्रेम है और विश्वासघात भी । इसके इतर कतिपय जादुई कृत्यों के आधार पर भाग्य निर्धारण के कथन भी । कथा की खूबसूरत नायिका ब्रिनहिल्ड, देवता ओडिन की अवहेलना के दंड स्वरूप जलते हुए महल में कैद है , वो नायक सिगर्ड के पराक्रम से मुक्त होती है , नायक जिसकी वीरता और ख्याति में ड्रैगन फफ़्निर की हत्या के सितारे जड़े हुए हैं । बहरहाल कथा का नायक सिगर्ड , नायिका ब्रिनहिल्ड की  देह यष्टि और सौन्दर्य का मुरीद है तथा ब्रिनहिल्ड, सिगर्ड के साहस और वीरता की ।

 

देवता द्वारा तयशुदा अंतहीन कैद से मुक्ति के बाद, खुली हवा में सांस लेते ही बलशाली सिगर्ड के साथ जीवन गुजारने की लालसा ब्रिनहिल्ड में जागना ही थी । आख्यान कहता है कि वो दोनों एक दूसरे को ब्याह का वचन देते हैं किन्तु एक जादुई कृत्य, तरल पेय पदार्थ  का सेवन, नायक का अतीत विलोपित करने मे सफल हो जाता है और नायक सिगर्ड, नायिका ब्रिनहिल्ड से की गई वैवाहिक वचनबद्धता को भूलकर राजा की बेटी से ब्याह कर लेता है । नायिका के वास्तविक जीवन में यह पहला धोखा था जो स्वयं उसके प्रेमी ने दिया था, भले ही इस धोखे के लिए जादुई कृत्य की सांकेतिकता का उल्लेख किया गया हो । किन्तु प्रश्न यह भी पूछा जा सकता है कि, क्या यह संभव नहीं कि राजा जैसे कुलीन परिवार में ब्याह करना सिगर्ड ने स्वयं ही चुना हो ?

 

प्रेम में विश्वासघात जैसे यकीन के साथ जीवन जी रही ब्रिनहिल्ड, कथित जादुई कृत्य से अनभिज्ञ है और वो किसी अन्य पराक्रमी योद्धा से ब्याह की सशर्त घोषणा करती है । सिगर्ड अपने नवदाम्पत्य से तादात्म्य स्थापित करने की कोशिश में, अपने ही साले गुन्नार से ब्रिनहिल्ड का ब्याह करवा देता है । यह दूसरा छल था जिससे आहत ब्रिनहिल्ड अपने ही पूर्व प्रेमी की हत्या का संकल्प ले लेती है , भले ही वो उसका प्रथम स्वप्न था । अंततः

जिस परिवार के लिए सिगर्ड ने जाने या अनजाने मे ही ब्रिनहिल्ड को मानसिक चोट पहुंचाई थी । उसी परिवार की मदद से वो सिगर्ड को मृत्यु दंड दे देती है । यह एक दु:खी युवती का प्रतिकार था । जिसने प्रेम में बारम्बार चोट खाई थी ।

 

ब्रिनहिल्ड छल के प्रतिशोध स्वरूप मृत्यु दंड को चुनती है । उन हाथों को चुनती है , जिन्होंने उसके प्रेमी को उससे छीन लिया था । यह मिथक, नायिका के प्रतिकार पर समाप्त नहीं होता बल्कि एक समर्पित प्रेयसी या पत्नि की तरह से सिगर्ड की मृत देह के निकट अंतिम संस्कार के समय आत्मघात कर लेना, प्रतीकात्मक रूप से राजपूताने की स्त्रियों की जौहर गाथा जैसा लगता है । संभव है कि कथा को बाँचते समय यह तथ्य याद रह जाए कि राजपूताने में बहुपत्नियों का सहअस्तित्व सहज स्वीकार्य है , जबकि ब्रिनहिल्ड पत्नियों की बहुलता में विश्वास नहीं रखती, ऐसा प्रतीत होता है ।

 


बुधवार, 15 अक्टूबर 2025

अकीम

इबीबियो में जन्मी खूबसूरत लड़की जो बसंत ऋतु में पैदा हुई थी सो उसके माता पिता ने उसका नाम अकीम रखा,उसके माता पिता बेहद गरीब थे लेकिन अपनी इकलौती बेटी को बहुत ज्यादा प्यार करते थे । वो कोशिश करते कि अकीम अपनी घरेलू जिम्मेदारियों को समझे और उन लड़कियों की सोहबत से दूर रहे जो शहरी तौर तरीकों से प्रभावित हुआ करती हैं । एक रोज अकीम पास के ही झरने में पानी भरने गई, जहां उसे शहरी जिंदगी, रुझान और स्वभाव वाली सात लड़कियां मिलीं । वैसे तो वो लड़कियां अकीम के सौन्दर्य के प्रति जलन का भाव रखती थीं पर उन्होंने दिखावटी अपनापे के साथ अकीम से कहा कि वो लोग चार पांच दिनों बाद शहर जाएंगी और वहां नाटक तथा अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में हिस्सा लेंगी इसलिए अकीम को भी उनके साथ शहर जाना चाहिए । अकीम ने उनसे कहा कि वो माता पिता को छोड़ कर शहर नहीं जा सकती, क्योंकि उसे घर के काम भी करना होते हैं, इसलिए पसंद होने के बावजूद वो, नाटक, नृत्य वगैरह देखने के लिए शहर नहीं जा सकती । अकीम के इंकार से आहत लड़कियों ने साजिश के तहत योजना बनाई कि वो लोग रोज अकीम के घरेलू कामों में मदद का दिखावा करके, उसका विश्वास जीतेंगी और फिर अकीम से बदला लेंगी ।

 

इसके बाद वो लड़कियां अकीम की मदद के लिए उसके घर आने लगीं । वो घर की साफ सफाई करने और झरने से पानी लाने में अकीम की मदद करतीं तथा उसका दिल जीतने की कोशिश करती हालांकि उनके इस व्यवहार में अकीम को नुकसान पहुंचाने का मकसद भी छुपा हुआ था । अकीम के माता पिता ने शहर में होने वाले आयोजन से ठीक पहले अकीम को फर्श चमकाने और घास उखाड़ने का अतिरिक्त काम भी बता दिया ताकि अकीम उन लड़कियों के साथ शहर जाने से बच जाए लेकिन लड़कियां चालाक थीं और उन्होंने अकीम का सारा काम निपटाने में खास मदद की और कहा, अब शहर चलो सारा काम निपट गया है चूंकि अकीम भी नृत्य नाटक देखने की चाहत अपने दिल में छुपाये हुई थी तो वह उन लड़कियों के साथ शहर की ओर चल दी । रास्ते में एक नदी थी जहां एक खतरनाक जलजीव जू जू रहता था जो नदी पार करने वालों से खाने की वस्तुएं मिलने के बाद ही नदी पार करने देता वर्ना पानी में डुबा कर मार डालता । अकीम को यह रहस्य पता नहीं था लेकिन वो सातों लड़कियां यह रहस्य जानती थीं इसलिए जू जू को खाना देकर उन सभी ने नदी पार कर ली और अकीम इस बात को समझी भी नहीं ।

 

नदी के उस पार ऊंचे दरख्त पर बैठा एक नन्हा पंछी अकीम की खूबसूरती की तारीफ में गीत गाने लगा, जिसे सुनकर सातों लड़कियां और भी जल भुन गईं । समारोह स्थल पर पहुंच कर अकीम ने कोई शृंगार नहीं किया लेकिन वो लड़कियां बेहतरीन कपड़े और गहने पहन कर तैयार हुई हालांकि वहां मौजूद युवाओं और अन्य लोगों ने अकीम को उस जगह मौजूद सभी लड़कियों में से, सबसे ज्यादा खूबसूरत लड़की घोषित किया और उसे खाने पीने का मनचाहा सामान उपहार में दिया । देर रात तक सब ठीक और आनंदमय था लेकिन अकीम को पता था कि अगली सुबह उसके माता पिता को घर में उसकी गैरहाजिरी का पता चल जाएगा । उसने लड़कियों से कहा, हमें सुबह जल्द से जल्द घर वापस लौटना होगा । लड़कियां समारोह स्थल में युवाओं की अवहेलना को महसूस करते हुए और भी ज्यादा ईर्ष्यालु हो गईं थीं । तो उन्होंने जू जू को उपहार स्वरूप देने के लिए थोड़ा थोड़ा भोजन छुपा कर रख लिया और अकीम को इस बात पता भी नहीं चला । नदी पार करते समय जू जू को, सातों लड़कियों द्वारा खाना देते देख कर अकीम का माथा ठनका, उसने, उनसे कहा कि वो लोग उसे भी जरा सा खाना दे दें ताकि वो भी जू जू को भेंट दे सके ।

 

लेकिन उन सबने मना कर दिया और आराम से नदी पार कर गईं जबकि जू जू ने खाना नहीं मिलने पर अकीम को पानी में डुबा दिया । अकीम को पानी में डूबते देख कर वो सातों लड़कियां बहुत खुश हुईं उन्हें लगा कि रास्ते का कांटा दूर हो गया है और किसी ने इस घटना को देखा भी नहीं है जबकि छोटे परिंदे ने यह सब देखा था । परिंदे ने तय किया कि वो अकीम के माता पिता को सही समय आने पर सारे राज बता देगा । अगली सुबह, अकीम के माता-पिता को यह देख कर बहुत आश्चर्य हुआ कि कमरे का दरवाज़ा बंद था और उनकी बेटी का कहीं कोई नाम-ओ-निशान तक नहीं था । उन्होंने अपने पड़ोसियों से पूछा, लेकिन कोई भी उन्हें अकीम के बारे में जानकारी नहीं दे पाया इसके बाद वो दोनों, उन सातों लड़कियों के पास गए और उनसे पूछा कि अकीम का क्या हुआ । उन्होंने जवाब दिया कि उन्हें नहीं पता कि उसका क्या हुआ लेकिन वह, उनके साथ सुरक्षित रूप से गांव लौट आई थी और फिर वो बोली कि वो अपने घर जा रही है ।  इसके बाद अकीम का चिंतित पिता नदी तट पर गया, जहां पर नन्हे परिंदे ने उसे पूरा घटना क्रम बताया ।

 

अकीम के पिता ने जू जू से प्रार्थना की कि वो, अकीम को, उसे लौटा दे तब जू जू ने पिता से कहा टोकरी भर अंडे और सफेद कपड़ा मुझे उपहार स्वरूप दें तो अकीम को मैं नदी से सात बार बाहर फेंकूँगा यदि आप उसे पकड़ पाए तो ठीक है वर्ना अकीम हमेशा के लिए गायब हो जाएगी । अगली सुबह अकीम के माता-पिता नदी तट पर गए और जू जू की सलाह के अनुसार बलि दी । जैसे ही उन्होंने ऐसा किया, जू जू ने अकीम को नदी से बाहर फेंका, जिसे अकीम के पिता ने तुरंत पकड़ लिया और बहुत शुक्रगुज़ार होकर घर लौट आए । हालांकि उन्होंने कभी, किसी को नहीं बताया कि उन्होंने अपनी बेटी को बरामद कर लिया है, लेकिन उन्होंने उन लड़कियों को दंडित करने का मन बना लिया था । इसके बाद उन्होंने अपने आंगन में एक गहरा गड्ढा खोदा और गड्ढे के तल में सूखे ताड़ के पत्ते और नुकीले डंडे रख दिए फिर गड्ढे के ऊपर नई चटाई बिछा दी और सभी लोगों को संदेश भेजा कि वो आयें और खुशी मनाने के लिए आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लें, क्योंकि उन्होंने अपनी बेटी को प्रेत लोक से बरामद कर लिया है ।

 

बहुत से लोग आए और पूरे दिन और रात नाचते-गाते रहे, लेकिन ईर्ष्यालु लड़कियां दिखाई नहीं दीं, क्योंकि वो डरी हुई थीं, हालाँकि जब उन्हें बताया गया कि पिछले दिन सब कुछ ठीक ठाक रहा था । कोई परेशानी नहीं हुई तो वो सभी अगली सुबह अकीम के घर गईं और नर्तकियों के साथ घुलमिल गईं लेकिन वो लोग  अकीम का सामना करने में शर्मिंदा थीं, जो नृत्य घेरे के बीच–ओ- बीच में बैठी थी । अकीम के पिता ने अपनी बेटी की सहेलियों की तरह से उन लड़कियों का स्वागत करने का नाटक किया और उनमें से प्रत्येक को एक पीतल की छड़ भेंट की और उनके गले में पहना दिया फिर उन्हें पीने के लिए टॉम्बो भी दिया । इसके बाद उनसे कहा कि वो लोग आंगन के दूसरी तरफ जाकर चटाई पर बैठ जाएं । जब वो लड़कियां गड्ढे को छिपाने वाली चटाई पर गईं तो सभी गड्ढे में गिर गईं और अकीम के पिता ने तुरंत आग से कुछ गर्म राख ली और उसे चिल्लाती लड़कियों के ऊपर फेंक दिया । सूखे ताड़ के पत्तों ने तुरंत आग पकड़ ली और इस तरह से सातों लड़कियां एक साथ मार डाली गईं । जब लोगों ने चीखें सुनीं और धुआँ देखा, तो वो सभी अकीम के घर की तरफ भागे लेकिन तब तक देर हो चुकी थी ।

 

अगले दिन मृत लड़कियों के माता-पिता, ग्राम प्रधान के पास गए और शिकायत की कि, अकीम के पिता ने उनकी बेटियों को मार डाला है । प्रधान ने अकीम के पिता को बुलाया और उससे स्पष्टीकरण माँगा । अकीम का पिता, जू जू, जिस पर सभी लोग भरोसा करते थे और छोटे पक्षी को अपने गवाह के रूप में लेकर प्रधान के पास गया । जब ​​प्रधान ने पूरा मामला सुना, तो उसने अकीम के पिता से कहा कि उसे अपनी बेटी का बदला लेने के लिए केवल एक लड़की को मारना चाहिए था, सातों को नहीं, फिर कुछ सोचकर उसने अकीम के पिता से कहा कि वह अकीम को उसके सामने लाए । जब ​​वह आई, तो प्रधान ने देखा कि वह कितनी सुंदर थी, इसके बाद उसने कहा कि अकीम के पिता ने सातों लड़कियों को मारने का औचित्य सिद्ध किया है और मामले को खारिज कर दिया, फिर मृत लड़कियों के माता-पिता से कहा कि वे लोग चले जाएँ और अपनी बेटियों के लिए शोक मनाएँ, जो दुष्ट और ईर्ष्यालु थीं और उन्हें अकीम के साथ क्रूर व्यवहार के लिए उचित दंड दिया गया था ।

 

यह आख्यान अफ्रीकी देश, नाइजीरिया का है । इस कथा में अकीम नाम की लड़की के नैसर्गिक सौन्दर्य की बात की गई है और उसका नामकरण बसंत ऋतु में हुए उसके जन्म को संबोधित है । इस आख्यान में उसके अभिभावक, सामाजिक आर्थिक संस्तरण मे सबसे निचली पायदान पर जीवन यापन करने वाले मनुष्य माने गए हैं । अकीम इकलौती लड़की है और उसके अभिभावकगण उसके प्रति अत्यधिक संरक्षण का भाव रखते हैं । वो अभिभावकों का सम्मान करती है, आज्ञाकारिणी है और तमाम घरेलू काम स्वयं निपटाती है क्योंकि ये लोग घरेलू सहायिका के पारिश्रमिक का भार वहन नहीं कर सकते हैं । कथा के मध्य में यह ज्ञात होता है कि अकीम नृत्य, नाटक और अन्य सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखती है किन्तु अपने माता पिता की अवज्ञा, घरेलू कार्यों से मुंह फेरने जैसा कृत्य नहीं करती क्योंकि वो अपने अभिभावकों की प्रतिष्ठा को सर्वोपरि मानती हैं इसके बरअक्स उसी कस्बे की सात घुमक्कड़ लड़कियां, अकीम के सौन्दर्य से ईर्ष्या रखती हैं और चाहती हैं कि अकीम उनकी तरह घर बाहर निकले उनकी सहेली बने और कस्बे से बाहर, शहर घूमने में उनका साथ दे ।

 

सातों लड़कियां बाहर घूमने के लिए स्वतंत्र और स्वच्छंद हैं तो प्रतीत होता है कि वो सभी सामाजिक आर्थिक संस्तरण की दृष्टि से अकीम के परिवार की तुलना में उच्चवर्गीय या धन सम्पन्न रही होंगी । नि:संदेह इन लड़कियों की घुमक्कड़ी को उनके अभिभावकों का समर्थन रहा होगा । अकीम के अभिभावक उन सभी लड़कियों की मित्रता को अकीम के लिए उचित नहीं मानते थे, कदाचित वो उन्हें बिगड़ी हुई लड़कियों की श्रेणी में गिनते थे इसलिए कोशिश करते थे कि अकीम उनकी सोहबत, मित्रता से दूर रहे । आख्यान के इस संकेत को हम अकीम के परिवार और उन सातों लड़कियों के परिवारों के मध्य सामाजिक दूरी की तरह से स्वीकार कर सकते हैं । कथा कहती है कि वो लड़कियां षड्यंत्रकारी स्वभाव की थीं अगर घटनाक्रम उनके मनवांछित ना घटे तो वे मित्रवत सहयोग का दिखावा और कालांतर में विश्वासघात करने से नहीं चूकती थीं । अकीम द्वारा शहर घूमने और मित्रता अस्वीकार करने के उपरांत उन सातों लड़कियों ने ऐसा ही किया पहले सहयोग प्रदर्शन से विश्वास जीता और बाद में नदी में डूब कर मरने के लिए छोड़ दिया । संभवतः अकीम के अभिभावक उन लड़कियों के स्वभाव से परिचित रहे होंगे तभी तो वे अकीम को लड़कियों से दूर रखना चाहते थे

 

उन्होंने शहर में सांस्कृतिक आयोजन से ठीक पहले अकीम को अतिरिक्त घरेलू कार्य सौंपे किन्तु चालाक और दुष्ट लड़कियों ने उनकी इस मंशा को विफल कर दिया । यह आख्यान खूबसूरती की कृत्रिमता को त्याज्य और नैसर्गिकता को स्वीकारणीय मानता है अतः नदी के उस पार जाते समय नन्हे परिंदे द्वारा अकीम का स्तुति गान और समारोह के दौरान युवकों द्वारा अकीम को सर्वश्रेष्ठ युवती चुने जाने का विशेष उल्लेख किया गया है । मिथक कहता है कि सातों लड़कियां कपड़े और गहनों से सजधज कर भी युवकों की पसंद नहीं बन पाईं अतः कथा संकेत ये है कि उक्त समाज में सौन्दर्य की प्रकृति प्रदत्त विशिष्टताओं का सम्मान था और दिखावे के लिए सजना अथवा प्रदर्शन प्रियता, खूबसूरती का मानदंड नहीं था । परिंदे और युवकों की पसंद अकीम, यानि कि प्रकृति की प्रथम वरीयता नितांत प्राकृतिक, नैसर्गिक सौन्दर्य । सातों लड़कियां, अच्छे कपड़ों, अच्छे गहनों के उपयोग वाले कृत्रिम साज शृंगार के बावजूद अकीम से मात खा गईं तो उसका परिणाम अकीम की अकाल मृत्यु का जतन । अकीम के पिता को जलजीव जू जू ने उपहार के बदले, अकीम वापस सौंप दी और परिंदे ने सातों लड़कियों की साजिश का रहस्योद्घाटन कर दिया ।

 

अकीम के पिता ने अकीम की वापसी के जश्न के नाम पर उन सातों लड़कियों को अग्नि स्नान वाली पीड़ा दायक मृत्यु दी । यह दंड, षडयंत्र के बदले षडयंत्र और पानी में दम घुटकर मरने जैसा, कष्ट दायक था । बहरहाल लड़कियों के पिता की शिकायत पर प्रधान की राजतान्त्रिक, परंपरावादी, अलिखित न्याय प्रणाली में सर्व प्रथम अकीम की मृत्यु के बदले एक लड़की की हत्या के न्यायोचित होने का उल्लेख है किन्तु नन्हा परिंदा और जलजीव जू जू , अकीम के पक्ष में गवाही देकर अकीम के पिता की मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं । परिंदे और जू जू पर कथाकालीन समाज के सभी लोग सहज विश्वास करते हैं सो ग्राम प्रधान भी । हालांकि अकीम की मृत्यु के षडयंत्र के बदले, सातों लड़कियों में से केवल एक लड़की की मृत्यु के न्यायोचित होने का संकेत देने वाला ग्राम प्रधान, अकीम के नैसर्गिक सौन्दर्य से अभिभूत होकर इस निर्णय पर जा पहुंचता है कि सातों लड़कियां क्रूर और दुष्ट थीं तथा उन सातों को दिया गया मृत्यु दंड न्यायोचित है । आख्यान कालीन समाज की अलिपिबद्ध न्याय प्रणाली के अंतर्गत  न्याय की यह फिसलन, कदाचित जलजीव जू जू और नन्हे परिंदे की गवाही के साथ ही साथ अकीम के अनिंद्य प्राकृतिक सौन्दर्य की पक्षधरता पर आधारित है ।