अब तक कोई तर्क नहीं ! जो भी कहा, महज़ ख्वाब थे, कुछ स्वयं सिद्ध...तो कुछ असिद्ध जैसे गुज़र गये ! बचपन से एक शौक़, चारा लगाया और किसी एक तालाब में कांटा डाल कर बैठ गये, कभी घंटों खाली और कभी लगातार ढ़ेर सारी मछलियां हाथ लगतीं ! रात को ख्वाब देखता, किसी पक्की तारकोल सड़क पर चला जा रहा हूं और अचानक हाशिये की कच्ची सड़क पर एक बड़ा सा छेद हो जाता... नीचे झांकूं तो, छै सात फुट की गहराई में नम रेत की नदी जैसी, जिसका पानी खत्मशुद और एक बेहद चमकीली चांदी जैसी सफेद मछली रेत पर ! कह नहीं सकता कि इस ख्वाब की पुनरावृत्ति कितनी बार हुई ! वज़ह शायद वो अनगिनत मछलियां रही हों, जिन्होंने मेरे कांटे में फंस कर जान दी...या फिर हज़रते ईसा अलैस्सलाम की कोई कृपा होनी थी मुझ गैर इसाई / विधर्मी / सुधर्मी पर !
कभी देखता आकाश में ढ़ेर सारे फाइटर प्लेन, उनमें से कोई एक चोट खाकर मेरे घर से कुछ ही दूरी पर मलबे के ढ़ेर में तब्दील होकर गिरता हुआ कुछ घरों को तबाह करते हुए, कारण...पता नहीं, युद्ध...कोई लड़ा नहीं, फिल्म...कोई देखी नहीं, इस ख्वाब को देखने से पहले ! बहरहाल यह ख्वाब भी अपनी नींदों में बार बार शामिल हुआ ! अक्सर खुद की कच्ची पक्की नींदों में हाथी देखता ! हरे भरे खेत देखता ! जागने पर सोचता, पास के गांव के हाथियों के बारे में, जो शादियों में बुलाये जाते, जिनकी पीठ पर बारहा बैठे ! अपने पुश्तैनी खेत...रात के ख्वाब को सुबह होने तक ख्याल में बदल डालते ! एक फ़र्क ये कि जो अपने पास था वो ख्वाब होकर भी ख्याल ही रहा और फिर इस तरह के तमाम ख्यालों को लेकर कोई ख्वाब नहीं पाले हमने !
एक छोटी सी रेल लाइन पर छुक छुक दौड़ती एक ट्रेन अक्सर अपने ख्वाबों में भी दौड़ती रही ! पूरब से उगते सूरज की ओर भागती इस ट्रेन के दाहिनी ओर / दक्षिणी दिशा में, पटरियों से थोड़ी ही दूर काले काले पत्थरों वाले छोटे छोटे पहाड़ ! पहाड़ों पर बौने बौने से छुटपुट दरख्त और उनके साथ ही सफेद रंग के चंद मठ / समाधियां / मज़ार ! पहाड़ों का सिलसिला खत्म होते ही मंगलूर टाइल्स वाला एक बड़ा सा घर जिसके पीछे से ट्रेन को गुज़र जाना है ! इससे आगे शायद कोई स्टेशन भी हो...पर अनुभूति ये कि ट्रेन थोड़ी दूर पर रुक जायेगी और उसे यहीं से वापस लौट जाना है, लेकिन हम ट्रेन से कब उतरे और इस घर तक कैसे पहुंचे...कोई खबर नहीं !
दक्षिणी दिशा में खुलने वाले इस घर के मुख्य दरवाजे से कुछ एकड़ की दूरी पर अथाह जलराशि...संभवतः कोई बड़ी सी झील और झील के एन उस पार पहाड़ियों की लंबी श्रृंखला ! झील की लम्बाई चौड़ाई इतनी ज्यादा कि उस पार की पहाडियां छाया जैसी दिखाई देती हैं ! हैरत अंगेज बात ये कि इस घर से जुड़ा हुआ कोई दूसरा घर दिखाई ही नहीं दिया, यहां तक कि आस पास भी नहीं ! घर के सामने अलबत्ता एक घना विशालकाय छायादार दरख्त, शायद बरगद हो ? ख्वाब में दरख़्त की कोई पहचान नहीं ! एक अहसास ये कि इस दरख्त के नीचे खेलते हैं हम...पर किसके साथ पता नहीं ! वो घर अब शायद, वीरान हो गया है जो, हमारी ख्वाब ख्वाब आमद पर वहां बेहिसाब सन्नाटा पसरा हुआ है !
जिस क़दर अफ़साना-ए-हस्ती को दोहराता हूं मैं
और भी बेगाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूं मैं