सोमवार, 25 जून 2012

राज हित...!

मेंग जियांग बहुत सुन्दर और सुहृदय लड़की थी ! एक दिन वह अपने आंगन में काम कर रही थी , तो उसने देखा कि अंगूरों की रैक के नीचे एक युवक छुपा हुआ है , वो डर कर चीखना ही चाहती थी , कि युवक ने याचना की , मुझे बचाओ मेरी जान खतरे में है , मैं तुम्हारी शरण में हूं  !  मेरा नाम फेन जिलियांग है  !  उसने कहा , सम्राट किनशीहुआंग महान दीवार बनवा रहे हैं  , इस विशाल परियोजना के लिए सम्राट के सैनिकों द्वारा , गांवों से नागरिकों तथा युवाओं को जबरदस्ती पकड़ा जा रहा है , वहां बहुतेरे लोग भूखे प्यासे , थक कर मर गये हैं  !  मेंग जियांग उस युवक के तर्क से सहमत हो गई  !  वह एक सज्जन , शिष्ट और सुन्दर युवा था  !  कुछ समय बाद , उन दोनों में प्रेम के अंकुर फूटते देखकर परिजनों ने उनका विवाह कर दिया !  घर में रंगीन लालटेने जलाकर रौशनी की गई , पूरा घर मेहमानों से भर गया ! भोजन की बेहतर व्यवस्था से सब प्रसन्न थे  !

विवाह की रस्म पूरी होने पर जब सारे मेहमान अपने घरों को वापस लौट गये तो रौशनियां कम कर दी गईं , नवविवाहित जोड़ा अपने मिलन कक्ष के अन्दर जाने ही वाला था कि घर से बाहर अजीब सा शोर उट्ठा , सैनिक बलपूर्वक घर में घुस गये ! उन्होंने बिना कुछ भी कहे , फेन जिलियांग को गिरफ्तार कर लिया और महान दीवार के निर्माण स्थल की ओर भेज दिया ताकि उससे मजदूर बतौर कठिन श्रम करवाया जा सके ! मेंग जियांग शोकाकुल हो गई ! उसने सोचा कि घर मे रहकर , प्रिय पति का इंतज़ार करने से बेहतर है कि उसे निर्माण स्थल में जाकर खोजा / देखा जाये , अस्तु वह सामान बांध कर घर से बाहर निकल पड़ी !  रास्ते में भयानक आबोहवा , खतरनाक घाटियां, भयंकर ठण्ड , ऊबड़ खाबड़ मार्ग से उसे कोई पीड़ा नहीं हुई , कोई दुःख नहीं हुआ , क्योंकि प्रेम की भावना , उसे जिस्मानी और रूहानी तौर पर मजबूत बनाये हुए थी ! 

वह महान दीवार तक पहुंच ही गई , किन्तु उसे , इस विशाल क्षेत्र में से एक छोटा सा क्षेत्र खोजना था , जहां उसका पति काम कर रहा हो !  वह लंबे समय तक उसे ढूंढ पाने में असमर्थ रही , अंत में उसने एक प्रवासी मजदूर से पूछा , फेन जिलियांग यहां है  ?  मजदूर ने कहा हां , एक नया आगंतुक ... वो यहां है  !  कहां है वो ?  मेंग जियांग ने पुनः प्रश्न किया  !  मजदूर ने कहा , दुर्भाग्यवश उसकी मृत्यु हो गई है , सैनिकों ने उसकी लाश , यहां दीवार की बुनियाद में / नीचे दबा दी है  !  यह सुनकर मेंग जियांग के सामने अंधेरा छा गया , आकाश में भयंकर गर्जना हुई , उसकी आंखों से आंसू बह निकले , वो तीन दिन और रात तक आर्तनाद करती रही , स्वर्ग उसके आंसुओं में बहने लगा , आसमान स्याह हो गया और हवायें तूफ़ान में तब्दील हो गईं  !  महान दीवार का एक हिस्सा ढ़ह गया  !  फेन जिलियांग का शव मलबे में से बाहर आ गया !  उसके आंसू पति के विकृत हो चुके चेहरे पर टपक गये !  पत्नि ने अपने प्रिय पति को अंतत: देख ही लिया , किन्तु फेन जिलियांग अपनी प्रिया को नहीं देख सका , क्योंकि वह सम्राट किनशीहुआंग द्वारा तयशुद मौत मारा जा चुका था !

इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि , दुनिया के महान आश्चर्यों की बुनियाद रक्त रंजित है ! आज उन्हें देखने , पर्यटकों की भीड़ लगी रहती है , निर्मिति देखकर , सब अश अश करते हैं ,पर कोई सोचता भी नहीं कि इसने कितने इंसानों का लहू , खुश्क कर दिया है ?  कितने घर , उजाड़ डाले हैं ?  कितने प्रेम , स्यापे में बदल डाले हैं ?  हम तब भी क्रूर और बे-ध्यान थे और आज भी कमोबेश आत्मकेंद्रित सुख ध्यानी ज्ञानी  !  इंसानी लक्ष्यों के चरमोत्कर्ष , उसकी महानतायें , उसकी ही लाशों के ढ़ेर पर खड़ी हुई हैं  !  इंसानी देहों और ज़ज्बातों पर बेहद तकलीफदेह राह से गुज़रते हुये वक्तों और हाहाकारी हालातों में रचे गये इतिहास के खुशदिल अध्येता हम इंसान , किस कद्र विरोधाभाषी है , हमारा व्यक्तित्व , स्वयं शोषक और स्वयं शोषित भी...खुदबखुद क़ातिल और खुद क़त्लशुद भी  ! 

इस लोक आख्यान में किन राज वंश का उल्लेख है , जो मंगोलियाई आक्रमणकारियों के भीषण हमलों से अपने राज्य को सुरक्षित रखने के महा आयोजन बतौर महान दीवार की निर्मिति के लिए , अपने सैनिकों का बेजा इस्तेमाल करता है , सैनिक घरों में घुसकर नागरिकों और युवकों को उठा लेते हैं और इस महान आश्चर्य की निर्मिति क्षेत्र में आहुति के लिए भेज देते हैं , कथा से इतर इतिहास भी कहता है कि इसमें वर्षों लगे , काम के हालात इंसानों के जीवन के लिए सर्वथा प्रतिकूल थे , अति शीत , श्रमाधिक्य ,रहवास और आराम की अपर्याप्त दशायें , समुचित रसद का अभाव , लाखों इंसान मर खप गये ! महत्वाकांक्षायें मंगोलिया वासियों की थीं , वे भी इंसान थे , महत्वाकांक्षायें किन राजवंश की थीं , वे भी इंसान थे और जो लोग इन महत्वाकांक्षाओं की भेंट चढ़ गये ,बेशक वे भी इंसान ही थे !  क्या राज हित और महत्वाकांक्षाओं के इस प्रलयंकारी गठजोड़ को एक समान औचित्य तथा समतुल्य अर्थों में स्वीकार कर लिया जाना चाहिये ? ...स्मरण रहे वे राजतन्त्र थे , गणतंत्र नहीं ! चंद कुनबों / गिरोहों के हाथ में केंद्रित सत्ता थी , संबंधित भूक्षेत्रों के जनसामान्य से इसका कोई लेना देना नहीं था !

मेंग जियांग और फेन जिलियांग , सामान्य नगर जनों की श्रेणी में गिने जायें ! आंगन में अंगूर के रेक्स की मौजूदगी के संकेत से ऐसा प्रतीत होता है कि मेंग जियांग का परिवार अंगूरों की खेती करने वाला परिवार रहा होगा ! संभव है कि वे , फेन जिलियांग के परिवार की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक संपन्न रहे हों , क्योंकि वे , विवाह के लिए रंगीन लालटेनों से रौशनी की व्यवस्था कर पाये थे, उनका घर मेहमानों से खचाखच भरा था और वे , मेहमानों के लिए भोजन का बेहतर प्रबंध भी कर पाये थे ! सुंदर , सुहृदय मेंग जियांग और सुंदर , शिष्ट युवा फेन जिलियांग एक दूसरे के प्रेमासक्त हुए और उनके घरवालों ने उनके प्रेम को अपनी सहमति देकर विवाह का आयोजन किया , यह इस कथा का सकारात्मक पक्ष है , जहां दोनों पीढ़ियों के दरम्यान प्रेम और उसकी परिणति को लेकर कोई मतभेद नहीं है  ! 

विवाह के उपरान्त प्रेमी द्वय की सामाजिक संस्थिति तो बदलती है , वे सामाजिक रीति रिवाज से पति और पत्नी बन जाते हैं , किन्तु उनके मधुचंद्र / हनीमून / दैहिक मिलन से एन पहले राज सैनिक फेन जिलियांग को अपने कब्जे में ले लेते है  , और बतौर मजदूर उसकी तैनाती , महान दीवार के निर्माण स्थल में कर देते हैं , फिर वही होता है , जो असंख्य युवाओं के साथ पहले भी हो चुका होगा ! कठिन/दुष्कर श्रम और कार्य की असहज दशाओं के साथ रहवास , आराम और रसद की असामान्य स्थितियों ने उसके प्राण ले लिए ! वह अपनी पत्नी को अंतिम बार देखे बिना सम्राट किनशीहुआंग की महत्वाकांक्षा की बलि चढ़ गया ! मेंग जियांग एक साहसी युवती है , वह अपने पति की प्रतीक्षा घर बैठ कर नहीं करती बल्कि उसकी खोज में हर तरह की कठिनाइयों का सामना करती है और अंततः वह उसे खोज तो पाती है किन्तु ...?  ये प्रेम कथा दुःखद हालात पर समाप्त ज़रूर होती है , लेकिन प्रकृति एक बार फिर से प्रेम के समर्थन में खड़ी दिखाई देती है !

27 टिप्‍पणियां:

  1. सच है, महलों, अट्टलिकाओं के नीचे इंसानियत की लाशें दबी हो सकती हैं और बदन पर पड़ा धातु का एक टुकड़ा भी रक्तरंजित हो सकता है। अतीत तो सुरक्षित है, हाँ वर्तमान और भविष्य को बेहतर बनाने का प्रयास तहेदिल से चलता रहे ... तमसो मा ज्योतिर्गमय ...

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    1. हां ये सही है ! अतीत जैसा भी है उसे बदला नहीं जा सकता ! वर्तमान को बेहतर और भविष्य को बेहतर बनाने की चिंता कर लें यही उचित होगा !

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  2. हमारे यहां कहानि‍यां आमतौर पर सुखांतक होती हैं जबकि‍ दूसरे देशों में अधि‍कांश्‍ात: दुखांतक. शेक्‍सपि‍यर ने तो बड़े बड़े लोगों की दुखांतक कहानि‍यों गढ़ीं और छा गया...

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    1. काजल भाई ,
      दु:खांत प्रसंग तो हमारे भी सत्य हैं पर हम उन्हें छुपाते हैं ! हमें सब कुछ सुखमय देखना अच्छा लगता है , भले ही अपनी खुद की , रोज़मर्रा की ज़िन्दगी नर्क बनी हुई हो !

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  3. ओह ऐसा लग रहा था कि कोई पुरानी कथा पत्रिका हाथ लग गई है । सुंदर , मैं तो पढता ही चला गया एक सांस में । मुझे बहुत ही अच्छी लगी

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    1. (१)
      आपने इसे नियति कथा कहा , किंचित आश्चर्य हुआ !

      (२)
      मुझे लगता है कि यह शब्द 'नियति' भी तानाशाहों ने ही गढ़ा होगा अथवा यह उनके ही छल का एक अंश है ! एक पांसा , हज़ार खून माफ !

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  5. प्रेम का गौरव गान ...चाहे वो मंगोल हों या मुग़ल उनके यादगार मानुमेंट्स के पीछे शाश्वत प्रेम की ऐसी ही कितनी सिसकियाँ दफ़न हैं !

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    1. अरविन्द जी ,
      यहां मंगोलों ( के वंशजों ) ने स्वयं सिसकियां दफ़न कीं , वहां उनके भय से दफ़न की गईं !

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  6. इस कथा में सामाजिक और पारिवारिक विरोध से तो प्यार बच गया पर व्यवस्था ने उसे अव्यवस्थित कर दिया,उजाड दिया.

    ...सबसे बड़ा सन्देश यही है कि लोग झूठी महत्वाकांक्षाओं को कमज़ोर और मजलूमों के सपनों की कीमत पर पूरा करते हैं !

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  7. तानाशाहों की क्रूरता की मिसाल है यह दीवार ....

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  8. पहले के राजे महाराजे तानाशाह तो होते ही थे . इसीलिए इन्सान की जान की कीमत कुछ नहीं होती थी .
    अब लोकतंत्र है , फिर भी जान की कीमत उतनी ही कम है .
    समझ नहीं आता - कलियुग कब से चल रहा है !
    इन कहानियों में -- आकाश में भयंकर गर्जना हुई , उसकी आंखों से आंसू बह निकले , वो तीन दिन और रात तक आर्तनाद करती रही , स्वर्ग उसके आंसुओं में बहने लगा , आसमान स्याह हो गया और हवायें तूफ़ान में तब्दील हो गईं ! महान दीवार का एक हिस्सा ढ़ह गया !
    -- इस तरह की बातें हजम नहीं होती . :)

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    1. सच्चा लोकतंत्र हो तो राजतंत्र से तुलना भी की जाये :(

      राजनीति में लेबल बदलने से क्या फर्क पड़ता है डाक्टर साहब ?

      ये कथाएं सदियों पहले कही गईं थीं इसलिये इनमें थोड़ी कल्पनाशीलता / अतिशयोक्ति दिखाई देना ही है ! अगर आप , ज़रा प्यार से देखें तो इस तरह की बातें हजम भी हो सकती हैं मसलन ...

      @ आकाश में भयंकर गर्जना हुई = कहावत है आसमान फट पड़ा / दुःख का पहाड़ टूट पड़ा ,ऐसे ही और भी !

      @ आंखों से आंसू बह निकले = अब इसमें आपको क्या दिक्कत है ? आंखों के सिवा और कहां से बहता देखना चाहते हैं आप :)

      @ वो तीन दिन और रात तक आर्तनाद करती रही = इसे आप हर घंटे हर मिनट का लगातार रोना क्यों देख रहे हैं ! हम तो कितनी ही बार सात दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित कर देते हैं :)

      @ स्वर्ग उसके आंसुओं से बहने लगा = वह हनीमून भी नहीं मना पाई थी उसके प्रेम का सुख / उसकी खुशियों का स्वर्ग उसके आंसुओं में बह निकला की नहीं :)

      @ आसमान स्याह हो गया = कहावत है आंखों के सामने अंधेरा छा जाना ,ऐसे में आसमान क्या सभी कुछ स्याह हो जाएगा :)

      @ हवाएं तूफ़ान में तब्दील हो गईं = उसकी सांसे तेज चलने लगी होंगी :)

      @ महान दीवार का हिस्सा ढह गया = दीवारे क्या ? यहां तो कल के बनाये पुल आज ही ढह जाते हैं इसमें हैरानी कैसी :)

      डाक्टर साहब , आप कविता करते हैं , कविताओं में अक्सर प्रतीकों / संकेतों में बात कही जाती है , ठीक उसी तरह से लोक आख्यानों को भी पढ़ा जाना चाहिये ! इन कथाओं को कहने वाले लोग कल्पनाशील / भावुक कथाकार / कवि / लोक साहित्यकार थे , उनसे डाक्टरों और वैज्ञानिकों जैसी जुबान /भाषा की उम्मीद आप क्यों करते हैं :)

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    2. यानि २.१ पंक्तियों में ७ कहावतें / मुहावरे छुपे हैं . :)
      ग़ज़ब !
      अली सा , सच मानिये कवियों में ज्यादा संवेदनशीलता मात्र एक दिखावा होती है .
      अपने तक ही रखियेगा , अन्दर की बात है . :)

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    3. डाक्टर साहब ज़रा आहिस्ता कहिये किसी कवि ने सुन लिया तो वो दिखावा छोड़ कर हम दोनों पे टूट पड़ेगा :)

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    4. एक ही पैरे में इतने सारे मुहावरे और उनका औचित्य साबित करना इन लोककथाओं को समझने में सहायक है . स्वयं पढ़ कर समझ लेना और बात है उसे आसान शब्दों में समझा देना अलग , आप इस फन में माहिर हैं ...आभार !

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    5. @ देवेन्द्र जी ,
      आपकी प्रतिक्रिया से राहत मिली , हम तो आपको भी कवि मानकर डर रहे थे :)

      @ वाणी जी ,
      शुक्रिया !

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  9. अजय जी ,
    शुक्रिया , लिंक्स आप अच्छी ही लगाते हैं ! चलकर देखा जाये !

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  10. मार्मिक कथा,सुंदर व्याख्या।

    हम तब भी क्रूर और बे-ध्यान थे और आज भी कमोबेश आत्मकेंद्रित सुख ध्यानी ज्ञानी ! इंसानी लक्ष्यों के चरमोत्कर्ष , उसकी महानतायें , उसकी ही लाशों के ढ़ेर पर खड़ी हुई हैं ! इंसानी देहों और ज़ज्बातों पर बेहद तकलीफदेह राह से गुज़रते हुये वक्तों और हाहाकारी हालातों में रचे गये इतिहास के खुशदिल अध्येता हम इंसान , किस कद्र विरोधाभाषी है , हमारा व्यक्तित्व , स्वयं शोषक और स्वयं शोषित भी...खुदबखुद क़ातिल और खुद क़त्लशुद भी !

    ...यही सच है। तब भी जब हिटलर हुआ करते थे। आज भी जब लोकतंत्र का झंडा बुलंद है। लोकतंत्र के नाम पर छले जाने से बेहतर है किसी तानाशाह के हाथों मारा जाना। कम से कम रूह को यह अहसास तो नहीं होगा कि अपनो के हाथों कत्ल कर दिये गये!

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    1. देवेन्द्र जी ,
      आलेख में मेरे प्रिय अंश पहचान कर / पकड़ कर आप मुझे खुश कर देते हैं !

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  11. शाहजहाँ को किस श्रेणी मे रखें ? ताजमहल तो मुमताज के लिये था लेकिन उसे बनाने वाले श्रमिकों का क्या ?

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    1. आशीष जी ,
      (१)
      चौथा पैरा , पहली लाइन, मैंने कहा...

      "इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि , दुनिया के ''महान आश्चर्यों'' की बुनियाद रक्त रंजित है"

      ''महान आश्चर्यों'' में ताज महल भी सम्मिलित है ! शहंशाह शाहजहां ने निज प्रेम हित को लेकर वही किया जो चीन में राज हित के नाम से सम्राट किनशीहुआंग ने किया ! सामान्य इंसानों / श्रमिकों / नगर जनों का वही हश्र :(

      (२)
      अरविन्द जी की टिप्पणी को लेकर मेरा जबाब इन्हीं दो दृष्टान्तों को लेकर है !

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