मंगलवार, 26 जून 2012

मोटी लड़की ...!

बहुत समय पहले की बात है , जब एक बहुत सुन्दर और मोटी लड़की के माता पिता , उसके विवाह के प्रस्तावों को ठुकरा रहे थे , क्योंकि उनके ख्याल से वो तेल से बनी थी और खेतों में / तेज धूप में काम करने से पिघल जाने वाली थी ! लड़की के सौंदर्य से आकर्षित होकर कई युवकों ने उसके माता पिता को , आकर्षक धनराशि देकर , उस लड़की से विवाह की पेशकश की , किन्तु लड़की की अति वसायुक्त देह को सूर्य ताप से पिघलना सुनिश्चित जानकर , लड़की की मां ने समस्त विवाह प्रस्ताव ठुकरा दिये थे !  कुछ समय बाद , सुदूर प्रदेश से एक अजनबी युवा उस गांव में आया तो , वह उस लड़की पर मोहित हो गया , उसने लड़की की मां को आश्वस्त किया कि वह लड़की को सदैव छाया में रखेगा ! लड़की की मां अंतत : सशर्त ब्याह के लिए सहमत हो गई , तो अजनबी युवा , उस लड़की को ब्याह कर अपने गांव ले गया ! हालांकि अतिरिक्त सावधानी बतौर लड़की की छोटी बहन भी उसके साथ भेज दी गई !

ससुराल पहुंचने के बाद मोटी लड़की , हमेशा घर के अंदर ही रहती क्योंकि वह धूप / ताप से डरती थी , इसलिये युवक की पहली पत्नी , लड़की से ईर्ष्या करने लगी क्योंकि उसे ,जलाऊ लकड़ी लाने से लेकर पानी भरने जैसे बाहरी काम करना पड़ते थे , जिनमें नवविवाहिता से सहायता की कोई उम्मीद नहीं थी ! एक समय जब युवक घर से बाहर था तो ईर्ष्यालु पत्नी ने , नवविवाहिता को अपशब्द कहे , जिसके कारण वह खेतों में काम करने के लिए तैयार हो गई ! उसकी छोटी बहन ने उसे मां की बातें याद दिलाईं लेकिन युवक की पहली पत्नी की जिद के आगे , मजबूर होकर उसे खेतों की ओर जाना ही पड़ा ! वह रास्ते भर छाया में चली , यहां तक कि खेत में भी वह एक बड़े पेड़ के नीचे बनी रही ! उसे छाया में खड़े देखकर ईर्ष्यालु पत्नी ने पुनः अपशब्द कहे और पूछा कि वह खेत के काम में सहायता क्यों नहीं कर रही है  ? नवविवाहिता की छोटी बहन ने बहुत रोका किन्तु उसे पेड़ की छाया से हटकर खेत में जाना पड़ा !

खेत में तेज धूप के कारण , वह फ़ौरन ही पिघलना शुरू हो गई ! कुछ ही क्षणों में वो पूरी पिघल गई , केवल एक अंगूठा शेष रह गया क्योंकि वह पत्ती के नीचे छुपा हुआ था ! छोटी बहन यह देख रही थी , रोते हुए उसने नवविवाहिता के अवशेष अंगूठे को सावधानी पूर्वक पत्ती में लपेटकर अपनी टोकरी के नीचे रख लिया और घर में ले जाकर ,मिट्टी के एक पात्र में रख दिया तथा उसमें पानी भरकर , पात्र का मुंह मिट्टी लेप कर बंद कर दिया ! युवक जब घर वापस लौटा तो उसने पूछा , मेरी प्रिय पत्नी कहां है ? छोटी बहन फूट फूट कर रोने लगी , उसने बताया कि , किस प्रकार से पहली पत्नी ने नवविवाहिता को धूप में जाने के लिए बाध्य किया , जिस के कारण वह पिघल गई है , उसने मिट्टी के पात्र को युवक को दिखाकर कहा , नवविवाहिता के पुनर्जीवन में तीन माह का समय लगेगा किन्तु पहली पत्नी के रहते यह समस्या सदैव बनी रहेगी ! यदि युवक इस समस्या का कोई हल नहीं निकालता , तो वह मिट्टी के पात्र को लेकर वापस अपने घर चली जायेगी और तब , पुनर्जीवन के बाद भी उसकी बड़ी बहन हमेशा अपने मायके में ही बनी रहेगी !

युवक ने अपनी पहली ईर्ष्यालु पत्नी को उसके माता पिता को लौटा दिया ! उन्होंने उसे दासी के रूप में बेचकर , युवक द्वारा विवाह के समय प्रदत्त धन , युवक को वापस कर दिया ताकि वह इस धन से दूसरी पत्नी प्राप्त कर सके ! युवक ने प्राप्त धन को व्यय नहीं किया , उसने उसे तीन माह तक सुरक्षित रखा ! तीन माह पूरे होते ही छोटी बहन ने पात्र खोला जिसमें से उसकी नवविवाहिता पत्नी पुनर्जीवित होकर निकली , वह अब भी पहले जितनी ही स्वस्थ / वसायुक्त और सुन्दर थी ! युवक ने खुशी के इस मौके पर एक सामूहिक भोज का आयोजन किया , जिसमें उसने अपने सभी सम्बन्धियों , मित्रों , पड़ोसियों को , अपनी पहली पत्नी के खराब व्यवहार की पूरी कहानी विस्तार से बतलाई !  उसी समय से , जब भी कोई पत्नी खराब व्यवहार करती है तो उसका पति उसे , उसके माता पिता को लौटा देता है , जो उसे दासी के रूप में बेच कर पति के धन की प्रतिपूर्ति कर देते हैं  ,जोकि उसने विवाह के समय स्त्री धन के तौर पर दिया था !

प्रतीत होता है कि आख्यान के समय के नाईजीरियाई युवक अपेक्षाकृत स्वस्थ युवतियों को पसन्द करते थे ! सम्भव है कि कथा में उल्लिखित मोटी लड़की से आशय सुडौल लड़की से हो !  स्पष्ट यह कि , उनके सौंदर्य बोध में , युवतियों के छरहरे पन / पतले पन की तुलना में मोटा पन अथवा सुडौलता , प्राथमिकता बतौर सम्मिलित है ! कहानी की नायिका के अभिभावक , नायिका के स्वास्थ्य के प्रति पर्याप्त चिंतित और सचेष्ट दिखाई देते हैं !  लगता यह है कि लड़की की परवरिश इस तरह से की गई है कि वह सौंदर्य के सुडौलता वाले मानदंड पर खरी तो उतरती है किन्तु घरेलु काम काज की दृष्टि से सुकुमार / नाज़ुक है  !  इसलिये उसके अभिभावक उसके विवाह के लिए आने वाले प्रस्ताव स्वीकार करने में झिझक / अनिच्छा प्रदर्शित करते है ! मोटी लड़की को तेल से निर्मित बताये जाने का ये आशय , कदापि नहीं हो सकता कि वह वास्तव में तेल से बनी थी , क्योंकि आगे चलकर उसकी देह को वसायुक्त कहा गया है  !  यानि कि लड़की की भरी भरी देह की लोनाई / लावण्य / कांति , उसके तेल निर्मित होने अथवा वसायुक्त होने जैसे शब्दों के माध्यम से अभिव्यक्त की गई है  ! 

आख्यान , उक्त समाज के परस्पर विरोधाभाषी मानदंडों को उजागर करता है ,जहां , एक ओर विवाहोत्सुक युवक , विवाह के पूर्व स्त्री धन / वधु मूल्य / दहेज देने के लिए बाध्य हैं , वहीं , यह धन युवती के माता पिता के हिस्से जाता है ! आप कह सकते हैं कि युवती अपने भविष्य की सुरक्षा की गारंटी के लिए पूर्णतय : अपने माता पिता पर ही निर्भर है और दु:खद बात यह है कि अभिभावक इस धन को खर्च चुके होते हैं अतः पति द्वारा , पत्नी के परित्याग के समय , धन की प्रतिपूर्ति के लिए वे उसे गुलाम / दासी बतौर बेच देते हैं  ! यानि कि जो स्त्री धन समाज में स्त्रियों की गरिमा की बहाली कर सकता है और उन्हें सुरक्षित भविष्य की गारंटी दे सकता है , वो ही उनके हाथ नहीं आता ! तो फिर माना ये  जाये कि उन्हें बार बार बेचा ही जाता है , पहले विवाह के नाम पर और बाद में बतौर दासी !निश्चित रूप से स्त्रियों के दासत्व के संकेत इस कथा का सबसे कलुषित पक्ष माने जायेंगे !

ऐसा लगता है कि कथा कि नायिका का पिघलना वास्तव में उसके फैट्स का कम होना है , उसका दुबला हो जाना है ! उसे मायके की आरामदेह ज़िन्दगी की आदत है किन्तु प्रथम पत्नी उसे घर से बाहर के कामों में लगने वाली मेहनत का रास्ता दिखा देती है  !  एकमात्र अंगूठे का शेष रह जाना संभवत: प्रतीकात्मक रूप से खेत में की गई मेहनत की वज़ह से कृशकाय हो जाने जैसा है ! उसे धूप की आदत नहीं है , युवक ने उसकी मां की शर्त मानकर विवाह किया है , युवती की मां ने शर्त के निभाये जाने की पुख्तगी के ख्याल से अपनी छोटी पुत्री को साथ भेजने जैसा , आयोजन पर निगरानी बनाये रखने का , कार्य किया है !  छोटी बहन , पहली पत्नी को कामों में अकेले खटते हुए देख कर भी , अपनी बहन को , धूप ताप वाली कार्यदशाओं से बचाने का भरसक प्रयत्न करती है , किन्तु नवविवाहिता , पहली पत्नी के अपशब्दों , शायद उलाहनों से अपराध बोध की अनुभूति करती है और वह सायास बचते हुए भी , खेतों के श्रम का हिस्सा बन जाती है !  हालांकि युवती की दैहिक कृशकायता का यह तर्क तभी स्वीकार किया जा सकता है जबकि युवक / पति लंबे समय तक घर से बाहर रहा हो !

आख्यान में शेष बचे प्रतीकात्मक अंगूठे अथवा कृशकाय पत्नी / सौंदर्य मानकों से फिसल गई पत्नी , को मिट्टी के पात्र में तीन माह तक रखे जाने का ख्याल / कथन भी सांकेतिक ही लगता है !  सामान्यतः तेज ताप वाले ग्रामीण क्षेत्रों में घास और लकड़ी की झोपडियों में मिट्टी का लेप किया जाता है ताकि सूर्य की आक्रामकता का निषेध किया जा सके ! ऐसा लगता है कि धूप में काम करके दुबली हो गई , असुंदर हो गई युवती को तीन माह तक मिट्टी के झोपड़े में रखा गया हो ! देह के अंश को मिट्टी के पात्र में पानी में डुबा कर रखने का मतलब यह भी हो सकता है कि , कृशकाय हो चुकी युवती को मिट्टी के झोपड़े में पानी अथवा नमी युक्त / ठंडक युक्त माहौल में रखा गया हो ! तब एयर कंडीशनर  अथवा कूलर्स का अविष्कार भले ही नहीं हुआ था किन्तु तापमान को नियंत्रित रखने की ग्रामीण तकनीक यही थी , मिट्टी / लकड़ी / घास फूस और पानी ! तीन माह के बाद , युवती का सौंदर्य और स्वास्थ्य पहले जैसा हो जाना , अनुमानतः इसी उपक्रम का नतीजा हो सकता है ! 

कथा का समाज बहुविवाही समाज है , जहां पुरुषों को एकाधिक विवाह करने का अधिकार प्राप्त है ,बशर्ते उनकी जेब में पैसा हो ! वे पहली पसंद को बाद की पसंद की तुलना में ठुकरा कर अपने धन को वापस प्राप्त कर सकते हैं पर इस सारे प्रपंच में स्त्री तो केवल खोती ही खोती है ...अपने यौवन के दिन , अपने भविष्य की गारंटी का धन यानि कि वधु मूल्य और फिर हर तरह से लुट पिट कर एक बार फिर से दासत्व ...!  तो क्या उस मोटी लड़की का भविष्य सुरक्षित है ...?

26 टिप्‍पणियां:

  1. लड़की का स्वास्थ्य उसकी खूबसूरती का पैमाना है , एक कामकाजी पत्नी के साथ एक खूबसूरत पत्नी को अफोर्ड किया जा सकता है , मगर जब कामकाजी स्त्री को देशनिकाला दे दिया गया हो तो क्या उस व्यक्ति का गुज़र लड़की की खूबसूरती से हो जाएगा , आखिर कब तक ...
    इस सवाल के जवाब में ही उस लड़की का भविष्य है !

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    1. वाणी जी ,
      नवविवाहिता की धूप ताप वाली मजबूरियां क्या थी ? अगर यह मायने रखता भी हो , तो भी पहली पत्नी की प्रतिक्रिया गलत नहीं थी ! उसे ईर्ष्या कहा गया जबकि वह एक तर्क संगत प्रतिक्रिया थी ! आप इसे फ्रस्ट्रेशन की परिणति भी कह सकती हैं !

      आलेख का आखिरी पैरा , दूसरी लाइन , मैंने कहा ...

      "पहली पसंद को बाद की पसंद की तुलना में ठुकरा कर अपने धन को वापस प्राप्त कर सकते हैं"

      सवाल का जबाब ये है कि अव्वल तो उस युवक का खालिस ख़ूबसूरती से गुज़र बसर होने वाला नहीं और फिर पहली के बाद वाली दूसरी पसंद का विकल्प तो हमेशा खुला ही रहना है , यहां शर्त छाया की है , दूसरी पसंद का निषेध तो नहीं ! लड़की का भविष्य तय ही है ! अंगुलियों में दिन गिन कर नहीं कह सकते पर समय ज्यादा लंबा नहीं लगना चाहिये !

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  2. ...एक स्त्री का दूसरी स्त्री से ईर्ष्या करना लाजिमी है क्योंकि उसके रहते दूसरी आए और यहाँ तो वह विशेषाधिकार के साथ आई थी.

    ..युवक ने पहली के रहते ऐसा क्यों किया,इस पर भी सवाल उठना ज़रूरी है ?

    स्त्री कई जगह बेचारगी की स्थिति में अपने को पाती है.यह स्थिति तब से लेकर कमोबेश अब तक जारी है !

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    1. अच्छी प्रतिक्रिया !


      आप जानते हैं कि युवक ऐसे ही होते हैं फिर सवाल क्यों :)

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  3. इस कथा में औरत को मर्द के पैर की जूती जैसा दिखाया गया है , जो कालांतर में यहाँ भी सोचा जाता था .
    यानि पुरुष द्वारा नारी का शोषण हमेशा होता आया है .

    तेल से नहीं लेकिन मोम से बनी होने का मुहावरा यहाँ भी सुना है -- क्या मोम से बनी है जो पिघल जाएगी -- यह नाज़ुक होने को ही दर्शाता है .
    खूबसूरती कई प्रकार की होती है जैसे तन की --- मन की --- गुणों की--- विचारों की . अकेले तन की खूबसूरती किसी काम की नहीं होती , यह बात सबको जल्दी ही समझ आ जाती है जब जिंदगी की हकीकतें सामने आने लगती हैं . इसीलिए कहते हैं --खूबसूरती को क्या चाटोगे ! या यूँ कहें -- कब तक ! :)

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    1. डाक्टर साहब ,

      उन्होंने वसायुक्त यानि कि फैट्स से बनी भी कहा है ! आपकी स्त्रियों के शोषण वाली बात से सहमति !


      वो लोग पैसा वापस ले लेते हैं , सो बदल बदल कर चाट सकते हैं बशर्ते खुद की औकात रहे तब तक :)

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  4. एक ही पोस्ट में सौतिया डाह,सौन्दर्यानुभूति और वैवाहिक प्रथा को निरुपित करते पहलू !

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  5. वहशी समाज कितनी घिनौनी सोच! कितने स्वार्थी! कितने जालिम! स्त्री का परित्याग कर प्रतिपूर्ति भी लेते थे, बाप इसके लिए पुत्री को बेच भी देता था!! फिर न मालूम क्यों शादि से पहले पुत्री के पिघलने का इतना भय था कि शादी के बाद बहन को भी भेज दिया देखभाल के लिए!! लिजलिजा, दोगला चरित्र।

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    1. बाप अकेला नहीं भाई माता पिता दोनों लिखा है :)

      बाकी आज आप , इन लोगों की भयंकर पिटाई के मूड में थे ... नमूनार्थ शब्द ...ये रहे ...:)

      वहशी / घिनौनी सोच / स्वार्थी / ज़ालिम / परित्याग / प्रतिपूर्ति / पुत्री विक्रेता बाप / दहेज वाली बहन / लिजलिजा / दोगला चरित्र !

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    2. :)ऐसे समाज में माता का क्या रोल? नाममात्र की उनकी रजामंदी से क्या फरक पड़ता है।

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    3. देवेन्द्र जी ,
      रजामंदी छोटी हो बड़ी , पर है तो गुनाह के साथ ! अपराध में हिस्सा छोटा या बड़ा , पर हैं तो दोनों साथ साथ !

      बेटी के साथ और कोई हो या ना हो मां तो होनी ही चाहिये ! इस नज़रिये वह बेटी की आख़िरी उम्मीद है इसलिये उसके गुनाह को छोटा करके मत देखिये !

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  6. आपकी विवेचना बहुत अच्छी लगी ...
    आभार आपका !

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  7. काम की न काज की, ऐसी ख़ूबसूरती को क्या पसंद करना जी?

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    1. लेकिन अक्सर ऐसा हो जाता है :)

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  8. पता नही क्यों अमिताभ बच्चन अभिनित "सौदागर" याद आ गयी....

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    1. एकदम सही फिल्म याद आई है :)


      भारत और नाईजीरिया देश भले ही अलग पर हालात और सोच एक जैसी !

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    2. मान गए आशीष जी को, क्या पकड़ा है गुड वाले को:)

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    3. ये तो पता नहीं कि नाइजीरिया वाले बंदे का आगे क्या हुआ पर वसायुक्त स्त्री के चक्कर में अपने यहां के सौदागर का गुड़ ज़रूर गोबर हो गया :)

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  9. कथा वाचक का युवक की पहली पत्नी के सन्दर्भ में बार बार ये उल्लेख करना कि 'ईर्ष्यालु थी..और उसने अपशब्द कहे.' यह संकेत देता है कि कथावाचक की भी उस पहली पत्नी से कोई सहानुभूति नहीं थी...वरना वो यूँ भी कह सकता था....' अपने पति पर दूसरी स्त्री का अधिकार देख और अकेले काम करते करते परेशान हो उसने ये सब कहा...'

    पर उन दिनों समाज में ऐसी ही स्थितियाँ होंगी (अब भी अपने देश में ही ज्यादा क्या बदला है..सिर्फ इसके कि माता-पिता अब अपनी बेटी को बेच नहीं देते ...पर पति के यहाँ से वापस आने पर बहुत प्यार से भी नहीं रखते )..कथावाचक भी उस समाज का ही एक हिस्सा होगा और उसकी सोच भी उस समाज से कोई अलग नहीं थी (जबकि होनी चाहिए थी ) ...और जाने-अनजाने उसने ये संदेश भी दे दिया है कि अगर अपने पति की दूसरी पत्नी की गुलामी नहीं की और उसे भला-बुरा कहा...तो पहली पत्नी जैसा ही हश्र होगा .

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    1. असल में बढ़ती उम्र का ही असर रहा होगा वर्ना कथा कहने वाले की इस गलती / आदत को व्याख्या में शामिल करने का ख्याल जेहन से कैसे उतर गया ? फिर वाणी जी की टिप्पणी का जबाब लिखते वक़्त व्याख्याकार को इस बिंदु / मुद्दे पर जबरिया लिखना पड़ा कि ...

      "नवविवाहिता की धूप ताप वाली मजबूरियां क्या थी ? अगर यह मायने रखता भी हो , तो भी पहली पत्नी की प्रतिक्रिया गलत नहीं थी ! उसे ईर्ष्या कहा गया जबकि वह एक तर्क संगत प्रतिक्रिया थी ! आप इसे फ्रस्ट्रेशन की परिणति भी कह सकती हैं"

      रश्मि जी, हमारे यहां का हाल इससे भी बुरा कहा जाये, क्योंकि हमारे मां बाप बेटियां बेचते नहीं हैं बल्कि दामाद की कीमत (वर मूल्य) चुकाते हैं और इसके बावजूद उनकी बिटिया की हालात बद से बदतर हुआ करती है !

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  10. बेहतरीन आलेख .सौन्दर्य बोभ के बारे में मैंने कई बार गौर करने पर पाया की दुबले या जीरो फिगर को कुछ दशको में सौन्दर्य का प्रतिमान माना जाने लगा है .दा विन्ची की मोनालिसा पर्याप्त वसायुक्त है .आज भी दक्षिण की युवतियों की औसत देहयष्टि उत्तर भारतीय युवतियों के मुकाबले भरी है परन्तु उन्हें किसी दृष्टी से असुंदर या कम सुन्दर नहीं कहा जा सकता

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