शुक्रवार, 17 दिसंबर 2010

आधे अधूरे चांद को देखते हुए फिर वही दिन...

इस वक़्त रात के करीब नौ बज रहे हैं , बाहर हल्की सी ओस की झरन , छज्जे की रेलिंग और अपने कांधों पर महसूस करते हुए ,  ऊपर आसमान में चांद के आधे अधूरे वजूद से माहौल में उजाले और अंधेरे भी आधे अधूरे की तर्ज़ पर घुले मिले से !  वापिस कमरे में दाखिल होता हूं , बहुत फर्क है बाहर और अंदर की हरारत में , सोचता हूं कोई पोस्ट लिखूं , कई दिन गुज़र गए कुछ लिखा ही नहीं !  आज शाम तो बाऊ ने भी लंबी गैरहाजिरी का सबब पूछ ही लिया , मैंने कहा ज़रा सा कामकाज...थोड़ी सी घरेलू मसरूफियात...और फिर कुछ और तकाज़े वगैरह वगैरह !  

मंसूर अली साहब के दोस्त आर एस कार की मुमानियत के बावजूद पुरानी फ़ाइल पर हाथ चल निकले हैं , अब आप पे मुन्हसिर है  कि जो भी लिख रहा हूं उसके मायने क्या हैं ?  एक मुख़्तसर सा खत , उम्र यही कोई २६-२७ बरस...बेहद सहेज कर रखा हुआ...बेगम से ज़र्रा बराबर डरे बिना ! हर्फ़ दर हर्फ़ पढता हूं और कंप्यूटर टेबिल से लगी हुई खिड़की खोल कर बाहर ठिठुरते से आधे अधूरे चांद को देखते हुए फिर वही दिन याद करता हूं इधर मेरे अंदर की हरारत और भी ज्यादा बढ़ चली है...

नमस्ते , आप ऐसा मत कीजिये प्लीज ! मैं अपने आप को बहुत कोशिश करके रोक रखी थी ,परन्तु आप ऐसा करने से मुझसे भी रहा नहीं जायेगा ,प्लीज आप कुछ दिनों के लिए देश चले जाइये , मन में शान्ति मिलेगी ! आप मुझे गलत मत समझियेगा , मेरी मां नहीं है , कुछ करने के पहले मुझे सौ बार सोचना पड़ता है , परिवार का पूरा बोझ मेरे सिर पर , खैर ये बात छोडिये , आप नहीं समझेंगे , मां रहने से कुछ भी कर सकती थी ! लिखने को बहुत कुछ है ! पर मैं ना बोल सकती हूं ना लिख सकती हूं ! बहुत ज़ल्दी में लिख रही हूं ! मुझे थोड़ी भी तन्हाई नहीं मिलती !  ढेर सारा प्यार , चलती हूं , मुझे गलत मत समझियेगा !...

ये खत उस दिन क्या मायने रखता था और आज क्या ?  ये तो वो लोग ही जानेंगे जो कभी ' ...'  में मुब्तिला हुए हों, वर्ना चांद को क्या ? उसे तो घटते बढते अपना फेरे पूरे ही करना हैं , बंद कमरों में क्या , क्यों और कब घटता है , उसे इसकी परवाह क्यों होना चाहिए ?


28 टिप्‍पणियां:

  1. ''वर्ना चांद को क्या?'', जी नहीं चांद भी आहें भरता है और लोग दिल थाम लेते हैं.

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  2. आफत यूँ खोजे नहीं जाते
    ऐसे खत सहेजे नहीं जाते

    चाँद पूनम भी हो जाता है
    खत कभी पूरे नही हो पाते

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  3. Sach to hai ki,chaand kya...kisee ko bhi kya sarokar? Jo tan lage so tan jaane!

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  4. जल्दी जल्दी लिखा एक जिम्मेवार और बहुत प्यारा ख़त जो अपनी चार लाइनों में सब कुछ समेटे है ....
    भाभी जी से न डरने के लिए मुबारक बाद....हमारी तो आज तक हिम्मत न हुई

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  5. @ राहुल सिंह जी,
    क्या मैं आहों को भुक्त भोगी की गाथा समझने का साहस कर सकता हूं ? :)

    @ देवेन्द्र भाई,
    शुक्रिया !
    ये हादसात मुहब्बत जहाँ जहाँ गुज़रे
    बहुत करीब से गुज़रे कि हम जहाँ गुज़रे

    @ क्षमा जी ,
    'जा तन लागे सो तन जाने'... बड़ी बात कह दी आपने !

    @ अदा जी ,
    :) शुक्रिया !


    @ सतीश भाई,
    हौसले से काम लीजिए ,भाभी जी से कोई भी बात छुपाना क्यों ? :)

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  6. .
    .
    .
    अब आप को लिखे गये हैं और आपने सहेज कर रखे भी हैं यह प्यारे-प्यारे खत... हम इतने खुशकिस्मत कहाँ... हमें खत कौन लिखता, दो मीठे बोलों के लिये तक तो तरसते रहे हम... :(


    ...

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  7. अली साहब,
    ये पुरानी फ़ाईलें\डायरियां पुरानी लैंडमाईंस से कम नहीं होतीं। खामोश रहें तो जमानों तक खामोश रहें, और अपनी पर आ जायें तो...।
    कद में बहुत फ़र्क है हमारे, लेकिन बिरादर कहने से शायद एक कैटेगरी में रखे जा सकें। चाँद पीडि़त कैटेगरी, हा हा हा।

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  8. पुराने धुराने प्यार को छोडिये कुछ नयी दास्तान हो जाय! एक नए नीड़ की तजवीज हो जाए ...इक नयी अंगडाई पे दिल आ जाय ...मौसम ये कुछ फिर खुशनुमा हो जाए ...हरारत आखिर क्यों हो जब हर रात इक नयी शरारत हो जाए ....सलाम आले कुम.....

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  9. पुराना ख़त हाथ में,
    फिर से आँखें तर कर गया,
    बची खुची जो कसर थी,
    वो चाँद पूरा कर गया ;)

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  10. अच्छा है कि एक ज़माने में लोग यूं खत-किताबत किया करते थे कि सदियों बाद भी उन्हें खोल कर यूं पढ़ा और जिया जा सकता है... आज की क़ौम के बारे में सोचता हूं कि क्या इनके SMS इतने दिन चल पाएंगे (!)... पता नहीं

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  11. @ प्रवीण शाह जी ,
    बहुत पहले ,आपकी किसी पोस्ट पर मैंने थोड़ी सी छेड़छाड की थी भूला नहीं हूं :)

    @ मो सम कौन ?
    पुरानी लैंड माइंस अगर डिफ्यूज करके रखी जाएँ तो रिस्क नहीं होता :)
    चांद पीड़ित बिरादरों में राहुल सिंह साहब को भी गिन लिया है कि नहीं :)

    @ अरविन्द जी ,
    वाले-कुम-अस्सलाम !
    इस उम्र में नए नीड़ की सोचने का जोखिम लेने से बेहतर है कि हरारतों से काम चला लिया जाए ! आज आपके तेवर बड़े शायराना लग रहे हैं :)

    @ मजाल साहब ,
    शुक्रिया !

    @ काजल भाई ,
    लगता तो यही है कि संदेशों की तर्ज़ पर ताल्लुकात की उम्र भी छोटी होती जायेगी !

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  12. वर्ना चांद को क्या ? उसे तो घटते बढते अपना फेरे पूरे ही करना हैं

    ऐसे कैसे....चाँद के बहाने ही तो वो पुरानी हरारत फिर से यूँ उभर आई......या क्या जाने इस आधे-अधूरे चाँद के अँधेरे उजाले ने ही अब तक ,यह हरारत जिंदा रखी हो..:)

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  13. बंद कमरों में क्‍या क्‍या घटता है, इसकी परवाह तो घटवाने वाले को भी नहीं होती। :)
    ---------
    छुई-मुई सी नाज़ुक...
    कुँवर बच्‍चों के बचपन को बचालो।

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  14. अली साहेब........

    "..बेगम से ज़र्रा बराबर डरे बिना"

    उम्र के साथ हिम्मत भी बढती चली जाती है...... ये निष्कर्ष आज निकला.

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  15. सम प्रकास तम पाख दुहुं,
    नाम भेद बिधि कीन्‍ह.
    ससि सोषक पोषक समुझि,
    जग जस अपजस दीन्‍ह.

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  16. @ रश्मि रविज़ा ,
    संभावनाओं पे कोई बंदिशे तो हैं नहीं :)

    @ ज़ाकिर भाई ,
    बंद कमरों की घटनाओं में 'शामिलों' का नाम तो ठीक है पर 'घटवाने वाले' के लिए कुछ बुरी बुरी संज्ञायें सुनी हैं :)

    @ दीपक भाई ,
    एकदम सही निष्कर्ष पे पहुंचे हैं 'बढ़ती' के दौर में खोने को बचता ही क्या है :)

    @ राहुल सिंह जी ,
    :)

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  17. करैक्टर से बाहर निकलने पर न जाने किन-किन खतरों का सामना करना पडे. बस यही वजह है कि आपकी पोस्ट पर टिप्पियाते हुए भी तनिक डर सा लगा रहता है :)

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  18. पहले के [यहीं कोई५०-६० साल] के लोगों की आदत थी कि कुछ कहते (लिख कर) ही नही थे. कभी-कभी ज़िन्दगी गुज़र जाती थी. अगले दौर में यानी कि २६-२७ बरस पहले जबकि ये खत आपको लिख गया, कुछ कहने कि हिम्मत जुटा ली गयी थी , मगर उसमे भी सांकेतिक भाषा का प्रयोग अधिक ही दिखता है. 'अर्थ' निकालने में कभी-कभी तो 'अनर्थ' ही हो जता था. अब आपको आया हुआ खत [प्रेम-पत्र] ही ले; Fill in the Blanks जैसा प्रश्न -पत्र ही लगता है. आप इजाज़त दे तो कुछ रिक्त स्थानो की पूर्ति कर दूँ? अतिशयोक्ति होने का डर है, टाईम-मशीन से २६-२७ साल पहले पहुँच कर एसे मजमूँ से छेड़ -छाड़ करना खतरे से खाली न होगा!

    "एस. कार" साहब कि सलाह "बेकार" गई, अच्छा ही हुआ, आपकी शख्शियत कि कुछ और परते तो उधड़ेगी !

    mansoorali hashmi

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  19. ये कुछ लाइनें काफी हैं खींच कर आभासी दुनिया में ले जाने के लिए ...
    कल्पना की दुनिया में उदा ले जाती पोस्ट है आपकी ... बहुत खूब अली जी ..

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  20. इस बार तो मैं आजकल nostalgic हुए जा रहे अली साहब को 'बहुत खूब' कह कर गुज़रने ही वाला था कि 'मौसम कौन' और 'अरविन्द मिश्र जी' की शोख टिप्पणियों ने प्रेरित किया कि अली साहब की मिज़ाज पुरसी कर ही ली जाए. अली साहब ने भी उदारता पूर्वक इजाज़त प्रदान करदी . इस तरह संभावित Between The Lines जोड़ते हुए उस पत्र की पुनर्प्रस्तुती {brackets मे } , अली साहब से क्षमा याचना करते हुए , यदि 'चन्दा' की सोह्बत मे कोई डाय्लाग मर्यादा भंग कर गया हो तो. - M. Hashmi


    नमस्ते , आप ऐसा मत कीजिये प्लीज { आज तो आपने हद ही कर दी ! वह बारीक महीन सा पर्दा भी आपने बीच मे से हटा लिया ! अगर धोने की खातिर भी हटाया है तो कोई चादर ही दाल दी होती खिड्की पर . आपने तो पूरा कमरा ही बेनक़ाब कर दिया है मैरी खिड्की के सामने , और तगाफुल [बे तवज्जही} एसी की जैसे मेरे वजूद से ही बे ख़बर है आप! मै रोज़ सुबह - सवेरे खिड्की के पास इस लिए थोड़ी ही खड़ी रह्ती हूँ कि वर्जिश करते हुए आपका कसरती जिस्म बारीक से पर्दे मे से देखू वह भी लगभग निवस्त्र सा !
    यह खिड्की तो मैरी मन-पसंद जगह है , बैथने की . आप को आए तो जुमा-जुम्मा आठ दिन हुए. कसरत करे ठीक है, कमरे मे रोशनी इतनी ज्यादा क्यों कर रखते है कि नामुराद पर्दे से सब कुछ उजागर हो जाए? कभी तो इतना गुस्सा आता है कि मैं भी मोटा पर्दा उतार कर कोई बारीक सा दुपट्टा ही टांग दूं अपनी भी खिड्की पर !
    और आप ही के अन्दाज़ मे; मैं भी कसरत शुरु कर दूं. फिर कैसे नही देखेंगे आप इस तरफ. रात के अन्धेरे मे "चाँद" धूँदने वाले साहब, दिन मे "सितारे" नज़र न आ जाए तो कहना ! }
    मैं अपने आप को बहुत कोशिश करके रोक रखी थी ,परन्तु आप ऐसा करने से मुझसे भी रहा नहीं जायेगा { एक चीज़ बडी समान सी है हमारे बीच- आप "चाँद" पर आसक्त दिखते है तो मुई "चन्दा" ,हमारे उस तरफ के पडौस की नौकरानी, मैरे पीछे हाथ धो कर पड़ी है. वही 'एसी-वेसी' बातें करके मैरे मन को गुद्गुदाती रहती है. फुर्सत मे मैरे यहाँ आ धमकती है. डाँटती हूँ तो कहती है कि हम तो केवल बात ही करते है. इस पर भी "आदमी" लोग हमे "छिनाल" तक कह देते है, और वे लोग तो सब कुछ कर गुज़रते है.
    ये चन्दा एक प्रोफेसर का बड़ा ज़िक्र करती है , अपने नज़्दीक के ही एक शहर का, जो आधी रात को बिना कुछ पहने ही दौड़ लगाते थे शहर की सडको पर , शायद साहस और आत्मविश्वास आर्जित करने के लिए .
    खैर, मुझे उससे कोई मतलब नही, मगर ये चन्दा छुप-छुप कर उसको देखती थी तब, और रोमान्चित होती थी. मुझे भी अब ये बाते ज्यादा बुरी नही लग्ती तभी तो मुझे अब आपको देखना भी अच्छा लग्ने लगा है. मगर पत्थर से सर टकराने से क्या फायदा.
    अपनी "हिमालयी नैतिकता" लेकर.........}. प्लीज आप कुछ दिनों के लिए देश चले जाइये** , मन में शान्ति मिलेगी ! आप मुझे गलत मत समझियेगा , मेरी मां नहीं है , {नही तो मैं उसके साथ् रिश्ते का पैगाम भेजती. माँ को मैं कैसे भी मना लेती. फिर अपने यहाँ "खाप पंचायत" जैसी बीमारी भी तो नही. लोग थोड़े दिन शौर मचा कर चुप हो जाते है.}
    कुछ करने के पहले मुझे सौ बार सोचना पड़ता है , परिवार का पूरा बोझ मेरे सिर पर , खैर ये बात छोडिये , आप नहीं समझेंगे , मां रहने से कुछ भी कर सकती थी ! लिखने को बहुत कुछ है ! पर मैं ना बोल सकती हूं ना लिख सकती हूं ! बहुत ज़ल्दी में लिख रही हूं ! मुझे थोड़ी भी तन्हाई नहीं मिलती ! ढेर सारा प्यार , चलती हूं , मुझे गलत मत समझियेगा !...

    {** ये आपको चले जाने का भी इस लिए कह रही हूँ कि कोई मुझे देखने आने वाला है.....पता नही क्या होगा. आप जिसे देखते है वह चाँद तो आजकल बादलो मे छुपा हुआ है , इसलिए कुछ दिन के लिए गांव चले ही जईये .}

    -mansoorali hashmi

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  21. जला दिए वो सारे खत, किसी का जी जलता था
    जमीं-ए-दिल पर बचे हर्फ अब भी बाँचा करता हूँ।...

    अली सा! वाक्य भूल जाते हैं, कहने वाले खो जाते हैं लेकिन अक्षर शब्द पत्थर की लकीर से होते हैं, दिल पर पत्थर रख उन्हें सँजोना, बाँधना और बाँचना पड़ता है। अजीब बात है कि जितना ही बाँचो उतना ही सुकून मिलता है।

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  22. khat mahaz khat nahee hote ,jeevan kee sachchai ko kagaz pe ukerate syahee kee bhasha ko padne ke liye chand se achchha madhyam ho hee naheen sakta kyokee chand ke gat-bad men khat ka mazboon chhupa hota hai.

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  23. इस छोटे से ख़त आपने जो सहेज रखा है बहुत अच्छा है . बरना यादें आजकल तो कम्प्यूटर में रहती है जहाँ कभी वायेरस लग सकता है......... निडर रहने की अदा भी निराली होती है... काबिलेतारीफ .
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  24. राहुल जी से सहमत . वाकई ,अक्सर चाँद आहें भरता है और लोग दिल ...?

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  25. उम्र के इस दौर मैं ऐसा ही होता है .

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  26. कुछ अधिक दिन हो गए आपको हमसे दूर रहते , नए साल पर कुछ तो हो जाए .....
    नए वर्ष की अंतिम संध्या पर आपको शुभकामनायें भेज रहा हूँ !

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  27. अली सा! नये साल के आग़ाज़ पर आपके आशीर्वाद के मुस्तहक़ हैं हम... साल मुबारक़ आपको!!

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