गुरुवार, 25 नवंबर 2010

इक सवाल मैं करूं इक सवाल तुम करो हर सवाल का जबाब ही सवाल हो ?

कई दिनों से बस सोचता ही रह गया कि आज लिखूं या कल ...?  मौक़ा मिला भी नहीं और प्रविष्टि मन में ही बनी रही  !  घटना को अब तक लगभग एक हफ्ता गुज़र चुका है लेकिन मुद्दा अनुत्तरित सवाल सा यथावत !  वो दोनों एक निर्धन परिवार में जन्मे !  परिस्थितिजन्य सामीप्य ने दोनों के दरम्यान प्रेम के बीज बोये और फिर दोनों ने समाज से दूर भाग कर शादी कर ली !  लड़का राजमिस्त्री बतौर जीविका अर्जित करता था और शादी के वक़्त उसकी उम्र लगभग २७ वर्ष के करीब , जबकि लड़की महज १९ या २० की !  अब प्रेम कोई पूर्व  नियोजित आयोजन तो है नहीं कि पहले पहल नाते रिश्तों और सामाजिकता की पड़ताल करें  फिर आगे का घटनाक्रम साधा जाये  !  प्रेमी द्वय को वर्षों से कुर्बत हासिल थी ही , इधर जैविकता ने जोर मारा , उधर एक दूसरे का साथ निबाहने की कसमें खा डालीं ! 


सोचता हूं कि शादी के लिहाज़ से दोनों ही बालिग थे और अपना अच्छा  बुरा  /  आगा पीछा , समझते भी रहे होंगे ?  उनमें प्रेम अपने आप हुआ होगा ये तो माना ! ...पर शादी तो सोच समझ कर ही प्लान की होगी ?  कहते हैं कि शादी से कुछ अरसा पहले ही गांव वालों और परिजनों को उनकी गतिविधियों पर शंका सी हो चली थी पर इससे पहले कि , कोई बाधा सामने आती या फिर कोई सयाना रोक टोक कर पाता !   दोनों ने सहपलायन किया और शादी करने में कामयाब रहे ! सामान्यतः प्रेम विवाहों में शादी के बाद सामाजिक स्वीकृति की  संभावना   फिफ्टी फिफ्टी भी मानी जाये तो इस प्रकरण के पति पत्नी को भी लौट कर घर वापिस आना चाहिए था और अपने परिजनों से सामाजिक संस्वीकृति की अपील करना चाहिए थी पर उन्होंने ऐसा नहीं किया !...वे लौटे ही नहीं !  

अब ज़रा मसले को और विस्तार से देखा जाये , लड़की , लड़के की बुआ थी  और सामाजिकता के हिसाब से यह रिश्ता प्रतिबंधित है कि कोई लड़का अपने पिता की बहन से विवाह कर ले ! पर उन दोनों ने दीर्घ कालिक प्रेम संबंधों के बाद ऐसा किया !  वे साथ रहते थे... तो दैहिक आकर्षण / जैविक पुकार या प्रेम की जो भी केमिस्ट्री , जवान होते हुए लड़की और लड़के के दरम्यान पनप सकती है , वो उनके दरम्यान भी पनप गयी ! यकीनन ये प्रेम सामाजिक मान्यताओं की परवाह किये बगैर , अपने आप हुआ होगा !  उस जोड़े के मध्य यह घटना जानबूझकर किसी नियोजित प्रेम की तरह से तो हरगिज़ भी नहीं घटी होगी  ?  आशय ये कि युवा देह की अनिवार्यताओं और पारस्परिक आसक्ति की प्रबलता के आगे सामजिकता का हाशिए पर चले जाना कोई बड़ी बात नहीं पर...सवाल ये है कि शादी के बाद वे लौटे ही नहीं !  उनमें सामाजिकता और सामाजिक निषेधों का सामना करने का साहस  ही नहीं था !

अब वे कभी लौटेंगे ही  नहीं , फैसले पर पुनर्विचार की कोई गुंजायश नहीं  ! उनके परिजनों ने उनके शरीर अग्नि के सुपुर्द कर दिये हैं  !  प्रेम उन्हें हुआ ?  हो गया होगा ?   देह के आगे किसकी चलती है ?   लेकिन पहले शादी और फिर मृत्यु का वरण उन्होंने स्वयं ही किया !  सवाल ये कि क्या मृत्यु के सिवा अन्य कोई विकल्प शेष नहीं था ?   और था तो  आखिर क्या ...? 


26 टिप्‍पणियां:

  1. Incest is aberration.
    विवाह समाज की व्यवस्था है। उसी समाज की व्यवस्था है कि incest घोर पाप है।
    एक व्यवस्था को सम्मान और दूजे का तिरस्कार! क्यों? समझ का फेर है। दोनों अविवाहित साथ रहते। जैविकता निभाते और बाद में अलग अलग शादी हो जाने पर भी शरीर की भूख की व्यवस्था हो जाती!
    ऐसे जाने कितने उदाहरण थे, हैं और रहेंगे। शायद ही कोई गाँव, क़स्बा, शहर बचा हो!
    अनैतिक लग रहा हूँ?
    प्रेम शरीर की जैविकता से आगे की चीज है
    । हाँ उसमें शरीर भी रहता है।
    केवल भूख ही मिटानी है तो प्रेम की क्या आवश्यकता?
    कुछ अनैतिकताएँ (मिश्रित सी, कुछ आज के मानकों से अनैतिक नहीं हैं। देश काल के अंतर भी हैं):
    - मुगलों की अविवाहित बेटियाँ। शाहजहाँ-जहाँआरा
    - कृष्ण और रुक्मिणी का विवाह
    - दक्षिण में सगे मामा के साथ कन्या का विवाह। उत्तर में असम्भव!
    ...लम्बी सूची दी जा सकती है।
    प्रेम नियोजित नहीं होता। बस होता है

    और समाज नियोजित होता है।
    दो विपरीत टकरायेंगे तो किसी न किसी को झेलना ही होगा। दोनों दूर अनजान जगह जा कर कमा खा सकते थे(क्या पता हमारे आप के पड़ोस में ही ऐसे जन रहते हों?) लेकिन दिमाग में ठूँसी गई नैतिकता और अपराधबोध, पापबोध का क्या करते? ...कुछ लोग थेथर नहीं हो पाते।
    कुछ बातें 'अतिनैतिक' श्रेणी में आती हैं। सुना है कि कृष्ण की उत्तरपीढ़ी के एक लाल का किसी राक्षसी ने अपहरण कर लिया था-बालपन में ही
    । पहले माता बन कर पालन पोषण किया और बाद में अंकशायिनी प्रेमिका/पत्नी बनी
    !
    ...हाँ, मृत्यु हमेशा बुरी नहीं होती। जाने क्यों कुमारिलभट्ट का स्वयं को तुषाग्नि में जला देना याद आया। पता नहीं प्रासंगिक है कि नहीं लेकिन उन्हों ने गुरुद्रोह के पाप का दण्ड शास्त्रोक्त तरीके से स्वेच्छा से चुना। एक व्यवस्था को सम्मान दिया

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  2. आपका यह ’इक सवाल’ खुद में मानव मन-तन मंथन, सामाजिक मान्यतायें और बहुत कुछ समेटे है। कभी इंगलिश की बोल्ड समझी जाने वाली मैगज़ीन में incest टापिक पर बहस पढ़ी थी। पढ़ते समय बहुत बार थू कहने का मन होता था, लेकिन पक्ष-विपक्ष के तर्क पढ़कर उन्हें अनदेखा करना उसके साथ न्याय भी नहीं लगा था। मेरी नजर में इस दुनिया की सबसे जटिल मशीन यदि कोई है तो वो है इंसान का मन, इंसान का मस्तिष्क।
    लेकिन ऐसी घटना में हमारे जैसे समाज में आखिरी विकल्प मृत्यु के अलावा कुछ और भी हो सकता है, मुझे नहीं लगता।

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  3. ... dukhad va afsosjanak ... dono premee pankshiyon ko ek daal se doosare daal ki aur udh jaanaa chaahiye thaa ...!!!

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  4. Biology और Sociology अलग-अलग discipline हैं, इनमें Chemistry शामिल हो जाय तो इनके बीच कभी तालमेल बैठता है, कभी नहीं. इस पर मंथन से विश्‍लेषण हो पाता है और निष्‍कर्ष आता भी है तो सुविधाजनक और विषयगत ही. .

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  5. मसले की तो हमें पूरी जानकारी नहीं है. ये कोई अखबारी खबर है या आपके आँखों देखी बात है ? उन्होंने आत्महत्या करी या परिवार वालों ने मार दिया ?
    फलसफे तो कई सुना दें, पर अब जब वो मर ही गए तो क्या बच गया कहने को .... क्या कहें, भगवान् उनकी आता को शान्ति दे

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  6. वैयक्तिक स्वतंत्रता और सामाजिक स्वतंत्रता हमेशा एक दूसरे के विरोध में हैं। एक ओर जहाँ समाज हमेशा नियम-कायदों की कभी न खत्म होने वाली श्रंखला सरीखा है तो दूसरी ओर व्यक्ति को अपने होने का पता ही तभी लगता है, जब वो इन नियम-कायदों का अतिक्रमण करने का प्रयास भर करता है। वरना किसी मशीन का एक पुर्जा भर है आदमी!

    व्यक्ति के प्रयास जब भी सार्थक होते हैं तो समाज उन्हें स्वीकार कर लेता है और थोड़ा बदल जाता है। यही सिलसिला है शायद सभ्यता की इस कहानी का।

    प्रेम के सन्दर्भ में इतना ही कि प्रेम सनातन है और विवाह एक समाजिक व्यव्स्था जो समाजिक बदलाव के साथ बदलती रही है, बदलती रहेगी।

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  7. प्रेम तो प्रेम है ... कोई भी कारन हो सकता है ... पर मन है जो फिर भी मानने को तैयार नहीं होता ऐसे रिश्ते को ... पता नहीं शायद दकियानूसी हूँ ... परिस्थिति समझ नहीं प् रहा .... या कुछ और ...

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  8. मानव मन ...एक जटिल गुत्थी जो उस परिवार के संस्कारों पर अधिक निर्भर करती है ! क्या कहें ...

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  9. आपके पोस्‍ट और गिरिजेश जी की टिप्‍पणी से प्रेम और मृत्‍यु के सुसुप्‍त पहलुओं से रूबरू हुआ.

    धन्‍यवाद.

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  10. ali bhaayi aadaaab aek sval or uskaa dukhd jvab bhut khub zindgi kaa sch byaan kiya he yhi schchayi bhi he mubark ho apa ko bhayi dinesh ji ki post pr dekha achcha to chota shbd he lekin bhut bhut achcha lgaa mubark ho. akhtar khan akela kota rajsthan

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  11. दुखद प्रसंग..
    ऐसी शादियों को ना सिर्फ़ भारत में...यहाँ भी प्रतिष्ठा नहीं मिलती...
    एक ऐसा गन्धर्व विवाह यहाँ भी हुआ है...लड़की लड़के की मौसी है, और उम्र में भी बड़ी है...ख़ैर भारत से भाग कर वो यहाँ आ गए शायद इसलिए सुरक्षित रह गए...लेकिन बात यहाँ तक पहुँच ही गई...अब उन्हें जान का तो ख़तरा नहीं लेकिन उनसे मिलते हुए मन में कहीं कुछ खटक ही जाता है...
    ये खटका क्या है... अविश्वास तो नहीं..!
    कई बार सोचती हूँ....

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  12. मुझे ऐसा लगता है कि incest और suicide दोनों अलग मुद्दे हैं....कच्ची उम्र थी....परिपक्वता आई नहीं थी...उस समय प्रेम के नाम पर कुर्बान हो जाने , अपना बलिदान दे देने की भावना ही प्रबल रहती है...कई युवा एक ही जाति के होते हुए भी या कोई रिश्ता ना होने पर भी सिर्फ अलग जाति के होने के कारण ...अपने परिवारजनों के विरोध के तहत बिलकुल फ़िल्मी अंदाज़ में मौत को गले लगा लेते हैं. यहाँ भी समाज का डर तो था ही...पर साथ में बलिदान की भावना भी थी..वरना दूर-दराज़ जाकर जीवन यापन कर सकते थे.

    भले ही दक्षिण में मामा-भांजी के विवाह को मान्यता है...पर मेरा व्यक्तिगत विचार है कि इसे किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होना चाहिए. समाज की कुछ मर्यादाएं होती हैं..अगर उन्हें नहीं निभाना...फिर समाज का निर्माण ही क्यूँ...जंगल राज में ही लौट जाएँ...और प्रेम की परिणति दैहिक आकर्षण के सम्मुख समर्पण में ही क्यूँ हो....लेकिन सच यह भी है कि इसी समाज में लुके-छिपे ऐसे कितने रिश्ते चलते रहते हैं.

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  13. सवाल नि:संदेह बहुत मुश्किल है पर सच ये भी है कि ऐसे किस्सों की परिणति सुखांत इसलिए नहीं होती कि कहीं ये किस्से बार-बार दोहराये न जाने लगें...समाज के नियमों को बनाए रखने का बस यही एक रास्ता दिखाई देता है लोगों को...

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  14. .
    .
    .

    " प्रेम उन्हें हुआ ? हो गया होगा ? देह के आगे किसकी चलती है ? लेकिन पहले शादी और फिर मृत्यु का वरण उन्होंने स्वयं ही किया ! सवाल ये कि क्या मृत्यु के सिवा अन्य कोई विकल्प शेष नहीं था ? और था तो आखिर क्या ...? "

    अली सैय्यद साहब,

    जाने दीजिये... ज्यादा सिर खपा सोचने वाला मामला नहीं है यह... बस यूं समझ लीजिये कि वो जो कहते हैं न 'प्यार में साथ-साथ जीने मरने की कसमें खाना'... अब हर दौर में कुछ सरफिरे ऐसे होते हैं जो 'जीने' को तो बिल्कुल नजरअंदाज कर देते हैं और 'मरने' को हाईलाइट, या यों कहें कि ध्येय ही मान लेते हैं ... अब ऐसे तो मरेंगे ही...

    विकल्प तो अनेकों थे, हैं और रहेंगे... पर विकल्प होते तो उसी के लिये हैं न जिसने कोई और रास्ता खाली छोड़ा हो... जब प्रेम की पूर्णता ही शादी करने के बाद साथ मरने में मान रहा हो वह युगल... तो फिर हर बात बेमानी है, और हर चिंता भी...



    ...

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  15. अली साहेब,
    नहीं मालूम क्या कहना चाहिए....
    पर नहीं मालूम ये भी कहना चाहिए!
    आशीष.
    ---
    नौकरी इज़ नौकरी!

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  16. अब क्या कहा जाय विद्वान् लोग पहले ही कह चुके हैं -मुझे तो लगता है सम्मान से जीना और मरना दोनों जायज है !

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  17. आज ही लगभग दस दिनों के बाद नेट के सम्‍पर्क में आया हूँ। शरीर और दिमाग दोनो बुरी तरह से पस्‍त हैं। फिरभी गिरिजेश जी और अरविंद जी ने लगभग मेरे मन की बातें कह दी हैं, इसलिए मैं क्‍या कहूं, समझ नहीं पा रहा हूँ।

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  18. दोनों की मृत्यु दुर्भाग्यजनक और बहुत दुखद है . लेकिन देश और दुनिया में कथित प्यार के नाम पर कोई अपने माता/पिता के भाई से या माता/ पिता की बहन से शादी करे, क्या यह नैतिक, सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टि से उचित माना जाएगा ? अगर ऐसा होने लगा तो दुनिया में परिवार नामक संस्था का भविष्य क्या और कैसा होगा ? समाज की तस्वीर कैसी होगी ?

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  19. ऐसी समस्याओं के मूल में अज्ञान है ....
    वे तो ( कम से कम एक ) बच्चे थे , यहाँ बूढ़े भी अज्ञान के वशीभूत हो जाते हैं , जिसे प्रेम कहते हैं वह एक केमिकल लोचा भर है , वासना ही सत्य है , आगे समाज द्वारा जीवन जीने के लिए बनायी गयी मर्यादाएं हैं , व्यक्ति और समूह के बीच का समन्वय - विवाह संस्था ! बाकी तो तमाम बातें 'बम्बैया-सिनेमा' बताने सिखाने के लिए हैं ही . सेक्स एजूकेसन के प्रति हिकारत का भाव उम्र की शरीर-प्रिय नैसर्गिकता को नहीं पछाड़ सकता और अज्ञान-जनित ऐसी घटनाएं जारी रहेंगी ! आभार !

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  20. सामाजिकता कहती है..वे सरासर गलत थे।
    पिता का मन कहता है..जब मरना ही था तो शादी क्यों की ? लेकिन आत्मा कहती है ...
    .. तू होता कौन है उनको गलत ठहराने वाला? जब कुछ समझ मे नहीं आता मैं आत्मा की ही बात सुनता हूँ।

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  21. सबसे पहले तो आपको सुन्दर व मर्यादित भाषा के प्रयोग हेतु कोटिशः बधाई! आपने ‘जैविक पुकार’ जैसे प्रयोग करके मर्यादा निभायी!

    ऐसे देह-संबंध को हिन्दी में‘अगम्यागमन’ की संज्ञा दी गयी है...! जब यह अगम्यागमन है... तो अब इस पर क्या कहा जाए? किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ...!

    जब हो ही गया यह सब, तो दो ज़िन्दगियों को बचाने के लिए प्रयास किया जाना चाहिए था... मेरी सीमित बुद्धि में तो यही सबसे सही तरीक़ा धँस रहा है...अब समाज जो भी कहे!

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  22. जितेन्द्र जौहर साहब ,
    'अगम्यागमन' बहुत अच्छा शब्द है पर ये सामाजिक नैतिकता के पक्ष का प्रतिनिधि शब्द है बस इसीलिये सवाल पूछते समय तटस्थ बने रहने के लिए इसका इस्तेमाल नहीं किया ! अच्छे सुझाव के लिए आपका बहुत बहुत आभार !

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  23. jolog rishton ki maryada samajhte hi nahi unse iski aasha bhi kyon ki jati hai ? maryada todne vale samaj ka samna nahi kar pate to maryada todte hi kyon hai ?yadi ve sahi hai to samaj ke samne datkar khade rahe jaise ye sab karte vaqt samaj ki maryada ko bhool gaye the ab bhi bhool jaye .

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  24. प्रेम के वषिभूत आदमी कुछ भी कर लेता है ! किसी हद तक ये सही है ! पर सवाल आपका गम्भीर है ! बात समाज की भी है ! विचारना होगा !

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