शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

किन्नर - 32 (7)

गतांक से आगे...

उरुक का राज-प्रासाद भी उनके साये में समा चुका था । हीबानी समझ गया कि अब देवता न्याय करेंगे । तूफ़ान भयानक था, बिजलियाँ सैनिकों की टुकडियों पर गिर रहीं थी, मूसलाधार बारिश सब कुछ बर्बाद करने पर तुली हुईं थीं । धरती पर ऐसा भयंकर दृश्य कभी नहीं देखा गया था । सैनिक चिल्लाये, स्वामी नाराम –सिन् अब भी मौका है, उरुक लौट चलें, देवता हमारी बलि / उपहार स्वीकार नहीं करेंगे । लेकिन राजा नाराम-सिन् इन्नाना मंदिर पहुंचने को उद्यत था । इधर नहर अपने बांध तोड़ कर सड़कों पर बहने लगी । वे लोग अब ना तो उरुक लौट सकते थे और ना ही इन्नाना के मंदिर पहुंच सकते थे । सड़कों पर जांघों तक पानी भर गया था । नाराम-सिन् चिल्लाया, मैं देवताओं का प्रिय, उरुक सिंहासन का राजा, सुमेरियंस में सबसे शक्तिशाली, अब अभिशापित हुआ । मुझे इससे पहले धरती और स्वर्ग से कोई प्रतिवाद नहीं हुआ ।  ना तो ईश्वर और ना ही मनुष्यों ने मेरा रास्ता रोका । तभी गहराइयों से आप्सू के सहयोगी अहहाजू दानव और सात भयंकर सर्प आत्माएं प्रकट हुईं –

बढ़ता तूफ़ान, वे शैतान देव थे, वे दया और अनुकम्पा नहीं जानते थे, प्रार्थनाओं और विनती को नहीं सुनते थे ।

उन सातों आत्माओं ने नाराम-सिन् और उसके सहयोगियों पर हमला किया । वे भाग भी नहीं सकते थे । बाढ़ का पानी बढ़ता जा रहा था । जब नाराम-सिन् ने अपनी तलवार उठाई तो मोटी चमड़ी वाले दैत्य पर उसका कोई असर नहीं हुआ । एक एक करके सारे मनुष्य / सैनिक, सर्पों द्वारा पानी में डुबा दिये गये, कुछ का दम उनकी कुंडली में फंस कर घुट गया । उन्होंने देवताओं से मदद की प्रार्थना की पर, उनकी मदद को कोई नहीं आया । देवता आप्सू की प्रलय योजना में कोई बदलाव नहीं आया । सैनिकों  की चीखें तूफ़ान, बादलों और बिजली की गर्जन तर्जन में डूब गईं । नाराम-सिन् का गर्वीला सिर पानी में समा चुका था, उसकी शक्तिशाली काया, सातों दिव्य सर्पों का आहार बन गई । संघर्ष थम चुका था । नरसंहार के बाद तूफ़ान भी थम गया। पानी फिर से नहर के अंदर बहने लगा और सड़कें खाली हो गईं । किसान / निर्धन लोग अपने छिपने के ठिकानों से बाहर निकलने लगे थे ।

देवता की चमत्कारिक शक्तियों की बदौलत हीबानी और एकत्रित किये गये जानवरों को कोई नुकसान नहीं पहुंचा । नाराम-सिन् के विनाश की पुष्टि होते ही, कृतज्ञता वश रोते हुए, उन्होंने रसातल के देवता आप्सू को धन्यवाद दिया । हीबानी ने जानवरों को मुक्त कर दिया ताकि वे अपने मूल स्थानों को लौट जायें और फलें फूलें । जब भी कोई सुमेरियन, इन जीवों को देखता है तो वह धरती और जल के नीचे मौजूद ईश्वर से यह प्रार्थना ज़रूर करता है कि वो ईश्वर के कहर और जल प्रलय से बचा रहे ।  हीबानी इन्नाना के मंदिर वापस लौटा लेकिन वहाँ विनाश के निशान थे । नाराम-सिन् की मृत्यु ने उसे संतोष दिया लेकिन किशोर किन्नरों की मृत्यु का जख्म अभी भरा नहीं था । इसके बाद बहुत समय तक वह, देवी इन्नाना का मंदिर देखने नहीं गया हालांकि धरती के लोगों ने उसे खोज लिया और सोचा कि वो उनके लिये देवी इन्नाना से पुनः प्रार्थनाएं किया करेगा किन्तु टूटे हुए दिल का स्वामी, छोटा किन्नर पुरोहित हीबानी मर गया ।