मंगलवार, 8 अगस्त 2017

मेहराब पर सूरज

बहुत पहले की बात है जब, एक भाई और बहन अकेले रहते थे !  उनके जीवन यापन का तरीका भी बिलकुल आज के जैसा ही था यानि कि पशुओं / परिंदों का शिकार करना और मछलियां पकड़ना ! बहन, हर एक दिन, तीतर, खरगोश और बनबिलाव पकड़ने के लिये झाड़ियों में फंदे लगाती ! इसी दिनचर्या के दौरान बहन और भाई ने किंचित भयाक्रांत होते हुए गौर किया कि दिन और रात, एक दूसरे का अनुशरण करते हुए, छोटे से छोटे होते जा रहे हैं, इनमें से दिन, खासकर बहुत ही छोटा होता जा रहा था !

यहां तक कि सूरज, जो कभी कभार ही दिखाई देता, जल्द से जल्द दक्षिण पश्चिम दिशा में स्थित धरती के मुहाने की ओर, धरती के नीचे छुप जाया करता ! भाई, बहन समझ गये थे कि आने वाले समय में, पूरी धरती में बर्फ जम जायेगी और उसकी सतह पर मौजूद सारा जीवन खत्म हो जाएगा ! उन्होंने इस समस्या का हल निकालने का निश्चय किया ! एक दिन जब बहन, जंगल में बनबिलाव को फांसने के लिये लगाये गये फंदों का अवलोकन कर रही थी, तो उसने पाया कि एक फंदे में फंस गये सूरज का दम घुट रहा था, उसका गोल चेहरा नीला पड़ने लगा था !

बहन ने अपने भाई को आवाज दी और फिर उन दोनों ने मिलकर सूरज को पकड़कर और पूरी तरह से खत्म कर देने की बात सोची लेकिन...सूरज ने उनसे, अपने जीवन के लिये याचना की ! सूरज ने कहा कि अगर तुम लोग, मुझे जीवित रहने दोगे तो मैं अपनी परिक्रमा का समय बढ़ा दूंगा, दिन को लंबा करते हुए धरती को इतना गर्म रखूंगा कि यहां जीवन सहज हो जाए ! अंततः इसी शर्त पर भाई और बहन ने सूरज को मुक्त कर दिया ! कहते हैं कि उसी समय से सूरज आकाश के मेहराब पर लंबे समय तक चमका करता है !

आदिम समय में भाई बहन का अकेले रहना और जीवन यापन के लिये पशु पक्षियों का शिकार करना अथवा नदी ताल में मत्स्याखेट करना कोई असामान्य बात नहीं है, खेतिहर हो जाने से पहले ज्यादातर समुदाय आखेटक ही रहे हैं, सो खेती के हुनर से अनभिज्ञ भाई बहन के लिये आखेट अस्तित्व रक्षण की प्राथमिक अनिवार्यता रही होगी ! ये कथा, बहन द्वारा रात में फंदे लगाने और सुबह उन फन्दों का अवलोकन कर शिकार के फंसने की पुष्टि करने अथवा रात के निरर्थक बीत जाने का निर्णय लेने  से शुरू होती है ! स्पष्टतः शिकार के लिये रात और दिन का समय चक्र महत्वपूर्ण है !

भाई और बहन अनायास ही यह महसूस करते हैं कि अंधेरे और उजाले का समय / अंतराल घटता जा रहा है, खासकर दिन की आयु, रात्रि की तुलना में अधिक तीव्रता से घट रही थी, जबकि धरती पर सहज और सामान्य जीवन के लिये दिन भर, चमकते हुए सूरज से पर्याप्त ऊर्जा मिलते रहना अपेक्षित होता है, संभव है कि सूर्य नितांत प्राकृतिक कारणों से उस क्षेत्र में अपनी ऊर्जा बिखेर पाने में असमर्थ रहा हो ! आकाश में सूर्य की मुखर अनुपलब्धता निश्चय ही धरती पर चरम शीत का कारण बन सकती थी, ऐसे में भाई और बहन का भय बिलकुल भी अतार्किक नहीं था !

वर्तमान समय में हम अक्सर उदित और अस्त होते सूरज को अपने हाथों में कैद करने वाले छाया चित्र खींचते हैं...और फिर अनहोनी के होने जैसी  आत्ममुग्धता का शिकार हो जाते हैं, या यूं कहें कि अजब से सम्मोहन का हिस्सा बन जाते हैं ! प्रतीत होता है कि भाई बहन भी अति शीत के समय में इसी किस्म के दृष्टि भ्रम / मृग मारीचिका / मोह-भ्रम / इल्यूजन का शिकार हुए होंगें ! जिसके दौरान उन्हें, सूर्य उनके शिकारी फंदे में फंसा हुआ, मृत्यु के भय / फंदे की जकड़न से नीला पड़ता हुआ दिखाई दिया होगा, इतना ही नहीं उसने अपने प्राणों की एवज में, भाई बहन की उस शर्त को मान लिया होगा, जिसके तहत उसे, आकाश के मेहराब पर खुलकर चमकना था !

कहने का आशय यह है कि सूर्य को, हर एक लंबी रात के मुकाबले खड़े हुए, हर एक बड़े दिन भर, चमक कर / दहक कर धरती को गर्म रखना था ! लगता यही है कि, आकाश पर सूर्य की अनुपस्थिति, ऋतु-गत रही होगी और कालांतर में उसकी उपस्थित भी ! परन्तु एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे भाई बहन के लिये सूर्य की तमाम गतिविधियां, प्रतीकात्मक रूप से ही सही, उत्तरी पश्चिमी कनाडा के आदिम लोक जीवन में, एक अनुश्रुति का आधार ज़रूर बन गई हैं !