रविवार, 30 जुलाई 2017

टोकरी भर मछलियां !

हर साल, गर्मियों का मौसम खत्म होने और बाढ़ आने से पहले चीकामस नदी, स्क्वामिश लोगों के लिये पर्याप्त मात्रा में रसद उपलब्ध करा देती थी ! इस समय सलमन ( मछलियां ) अंडे देने के लिये चीकामस नदी में आ जाया करतीं और स्क्वामिश लोग देवदार की जड़ों से बनाये हुए जाल, पानी में डाल कर आने वाली सर्दियों तक के लिये सलमन जमा कर लिया करते ! ऐसे ही एक दिन, एक व्यक्ति, आगत सर्दियों के लिये, मछलियां पकड़ने, नदी तट पर आया ! उसने देखा कि अबके बरस ढ़ेरों सलमन नदी में आ पहुंची हैं ! उसने मछलियों की आत्मा को धन्यवाद दिया, कि वे इतनी बड़ी संख्या में, उसके परिजनों का आहार बन कर आई हैं...फिर नदी में जाल डाला और मछलियों के फंसने इंतज़ार करने लगा !

जल्द ही उसका जाल मछलियों से भर गया ! पकड़ी गई मछलियां, उसके परिजनों के साल भर के खाने के लिये पर्याप्त थीं ! उसने मछलियों को देवदार की छाल से बनी हुई टोकरी में रखा और घर वापस जाने के लिये तैयार हो गया ! ऐन इसी समय, उसने कुछ और मछलियां पकड़ने की बात सोची और नदी में दोबारा जाल डाल दिया ! जाल फिर से मछलियों से भर गया पर...उसने इन मछलियों को, टोकरी में रखने के बजाये, नदी तट पर बिखेर दिया और तीसरी बार फिर से पानी में जाल, डाल कर मछलियां फंसने का इंतज़ार करने लगा ! लेकिन इस बार उसका जाल टूटी फूटी लकड़ियों / नुकीली टहनियों से भरा हुआ था ! पानी से बाहर खींचते समय, जाल इतनी बुरी तरह से फट गया था कि उसमें मरम्मत की कोई गुंजायश नहीं थी !

पूरी तरह से बर्बाद हो चुके जाल में एक भी मछली नहीं थी ! उसने देखा कि, टोकरी में रखी हुई और नदी तट पर बिखेरी गई  मछलियां भी टहनियों में तब्दील हो चुकी हैं ! अब...वहां कोई मछली थी ही नहीं ! घटनाक्रम से व्यथित होकर उसने ऊंचे पहाड़ की चोटी की ओर देखा, जहां चीकामस नदी को संरक्षित रखने वाली आत्मा, वॉन्टी मौजूद थी, आत्मा ने उस व्यक्ति से कहा कि तुमने, तुम्हारी और तुम्हारे परिवार की ज़रूरतों से ज्यादा मछलियां पकड़ कर नदी और प्रकृति का विश्वास तोड़ा है, यह उसी का परिणाम है ! बहरहाल उसी दिन से वॉन्टी आत्मा, चीकामस नदी और स्वर्ग जैसी उस घाटी को सुरक्षित रखने के लिये, पहाड़ की चोटियों पर हमेशा मौजूद रहती है !

पश्चिमी कनाडा के सेलिश समुद्र तट के स्क्वामिश आदिवासियों के गांव के उत्तर में बहने वाली चीकामस नदी में हर साल अंडे देने के लिये आने वाली सलमन के शिकार के बहाने गढ़ी गई ये कथा, प्रकृति और मनुष्य के पारस्परिक सम्बन्धों में संतुलन की पैरवी करती है ! रोचक कथन ये कि कथा का नायक, अपने परिवार के लिये, आगामी चरम शीत काल के लिये, रसद संग्रहीत करने के उद्देश्य से नदी तट पर पहुंचा है ! उसे, उस ऋतु का ख्याल है, जिसमें सलमन को प्रजनन के लिये चीकामस नदी में आना है, उसके पास देवदार की जड़ों / तंतुओं से बना हुआ जाल है और छाल से बनी हुई टोकरी भी, जिसमें पकड़ी गई मछलियों को रखा जाना है ! कहने का आशय ये कि आखेटक को उसके पारिवारिक जीवन के लिये शुभ अशुभ ऋतु का ज्ञान है, उसके लिये नदी है, मछलियां हैं और देवदार का पेड़ भी ! अस्तित्व रक्षण के लिये सारे का सारा प्रकृति प्रदत्त !

नदी की संरक्षक आत्मा, पहाड़ की चोटियों में रहती है,जैसा अद्भुत कथन,कदाचित उन ग्राम्य अनुभवों पर आधारित है, जोकि हिमाच्छादित पर्वत शिखरों से अवतरित नदियों को समतल सपाट मैदानों में बहते और फिर समुद्र से आलिंगन करते हुए देख कर हुए होंगे ! तटीय बसाहटों के लिये यह मान लेना स्वभाविक है कि, उसकी अनंत पीढ़ियों के संस्मरणों में अजर अमर बहती आई नदी को, हिम-शिखरों में रहने वाली आत्मा का आशीर्वाद / संरक्षण  प्राप्त है ! बहरहाल कथा का नायक प्रथम दृष्टय: प्रकृति की औदार्यता के आगे नतमस्तक दिखाई देता है जबकि वो मछलियों की आत्मा को इस बात के लिये धन्यवाद देता है कि वे, उसके परिजनों के, आगत कठिन समय की रसद बतौर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं, उसकी मंशा पहले प्रयास में प्राप्त मछलियों को लेकर वापस घर लौटने की है किन्तु...

वह मनुष्य ही क्या? जो स्वभावगत द्वैध से पीड़ित ना हो ! संयमी हो पर...अति-कामी ना हो ! सहज उपलब्ध संसाधनों का सदुपयोग तो करे, लेकिन दुरूपयोग नहीं ! क्या यह संभव है ? इस आख्यान का नायक भी स्वभावगत द्वैध से पीड़ित है ! पहले पहल जहां वो प्रकृति के आगे नतमस्तक दिखाई देता है, वहीं कुछ ही समय के अंतराल में, वो प्रकृति और मनुष्यों के मध्य संतुलन के अलिखित अनुबंध का उल्लंघन करता है ! कथा का सन्देश यह कि, प्रकृति प्रदत्त संसाधनों की अंधी लूट मनुष्यता को भुखमरी के कगार पे ला पटकेगी ठीक वैसे ही जैसे कि आखेटक के साथ हुआ ! यानि कि सुदूर कनाडा के स्क्वामिश आदिवासी भी कहते हैं, अति की वर्जना हो !