शुक्रवार, 7 जुलाई 2017

तू खुदा है ना मेरा इश्क फरिश्तों जैसा...

मुद्दतों पहले की बात है जबकि विनइबेगो कबीले में एक प्रभावशाली व्यक्ति रहता था जोकि अपने समुदाय में परम आदरणीय और बेहद लोकप्रिय था ! वह अपने कबीले के औषध अनुष्ठानों वाले समूह का सदस्य था ! उसका एकमात्र पुत्र अल्प-ज्ञानी था ! लिहाज़ा गुज़रते वक्त के साथ पिता अपने पुत्र को उपहार देने लगा ! एक बार उसने, अग्नि पर केतली चढ़ा कर पुत्र से कहा, बहादुर और सच्चे योद्धा बनो, आश्चर्यचकित पुत्र यह नहीं समझ सका कि, उसका पिता उसे इस तरह से उपहार और उपदेश क्यों देता है !  इधर पिता अनवरत, पुत्र को उपहार देता रहा ! एक दिन उसने पुत्र को एक सुन्दर अश्व दिया और कहा कि मेरे प्रिय पुत्र, योद्धा होने के लिये, तुम्हे कुछ प्रक्रियाओं का ज्ञान होना आवश्यक है, बहरहाल पुत्र जो भी समझ सकता था, वही समझा !

कुछ समय बाद पुत्र ने एक सुंदर युवती से विवाह किया, जिसके बाल सुर्ख थे और जो किसी अन्य कबीले  की सुकन्या थी ! किन्तु हैरान कर देने वाली बात यह कि उसका पिता उस युवती के सौंदर्य पाश में बंध कर, उस पर अपनी निगाहें लगा बैठा ! पिता की आसक्ति का संज्ञान लेते हुए, पुत्र ने उक्त युवती को, अपने पिता को उपहार स्वरुप सौंप दिया ! पुत्र की भेंट से कृतज्ञ पिता ने पुत्र से कहा, मैं इसका प्रतिफल तुम्हें कैसे दूं ? तुमने मेरे हृदय को आल्हादित कर दिया है ! अन्ततोगत्वा पिता ने अपने पुत्र को वह समस्त ज्ञान प्रदान कर दिया जोकि उसके आधिपत्य में था !

कालांतर में सुर्ख बालों वाली वो युवती बीमार हो गई और फिर उसकी मृत्यु हो गई, तब उस बूढ़े व्यक्ति ने युवती की खोपड़ी से एक पात्र बनाया...और फिर एक गीत भी सृजित किया जोकि कबीले के औषध अनुष्ठानों में आज भी प्रयुक्त किया जाता है ! 

यह आख्यान अमेरिकन इन्डियन विनइबेगो समुदाय के औषध ज्ञानी पिता और उसके शिशु से युवा होते पुत्र के पारस्परिक सम्बन्धों, पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान के अंतरण के साथ ही साथ यौन नैतिकता की ओर भी हमारा ध्यान आकर्षित करता है ! प्रथम दृष्टया औषध ज्ञानी एक लोकप्रिय और समादृत व्यक्ति है , जिसके परित्यक्त होने की अपेक्षा विधुर हो जाने के संकेत अधिक मुखरित होते हैं , वह अपने पुत्र को उसकी माता की शिक्षा से वंचित रह जाने का अहसास कराने के बजाये, उपहारों और उपदेशों की शक्ल में प्रशिक्षित करने के लिये प्रयासरत बना रहता है ! एक अर्थ में वही पुत्र की माँ भी है और पिता भी ! पुत्र के युवा होकर विवाहित होने तक वह स्वयं पुनर्विवाह नहीं करता ! निःसंदेह वह अपने पुत्र को सौतेली माता के पालन पोषण और तद्जनित नकारात्मक संभावनाओं से परे बनाए रखता है, भले ही इस हेतु वह अपनी नैसर्गिक यौनेच्छाओं का दमन करता रहा हो !  

कथा, युवा पुत्र के अंतर कबीलाई विवाह के कथन के साथ, यह स्पष्ट संकेत देती है कि विनइबेगो समुदाय में अंतर कबीलाई विवाहों का निषेध नहीं था...और पत्नि को उपहार स्वरुप भेंट किये जाने का कथन कथाकालीन समाज के पितृसत्तामक होने का उदघोष करता है ! आख्यान को बांचते हुए पिता पुत्र के दरम्यान उपहारों के विनिमय और ज्ञानान्तरण के तथ्य अन्य समाजों की तरह सहज लगते हैं, किन्तु पिता की आसक्ति पर, पिता को पुत्रवधु का उपहार बतौर सौंपा जाना चौंकाता है ! लंबे समय से यौन सुख से वंचित पिता का, सुर्ख केशों वाली युवती, जोकि उसके ही प्रिय पुत्र की नवविवाहिता है, पर आसक्त हो जाना दैहिक अनिवार्यताओं के मद्देनजर भले ही अप्रिय संकेत ना दे, किन्तु सामाजिक मान्यताओं पर कुठाराघात और यौन नैतिकता उल्लंघन के प्रश्न हमारे सम्मुख सहज ही खड़े हो जाते हैं !

अस्तु विचाराधीन प्रश्न यह है कि क्या पुत्रवधु को पत्नि बतौर स्वीकार कर उस औषध ज्ञानी ने यौन नैतिकता अथवा सामाजिक मान्यताओं का उल्लंघन किया है ? इस हेतु हमें भारत के उत्तरपूर्वी क्षेत्र के मातृवंशीय गारो आदिवासियों को विचारण में लेना होगा जहां, दामाद नितांत आर्थिक कारणों से अपनी विधवा सास से ब्याह कर लेता है या फिर दक्षिण भारत के वे लोग जो मामा को भांजी से विवाह करने का प्राथमिक अधिकार देते हैं अथवा बहु-पत्नियों के एकमात्र पति होने से लेकर अनेक पतियों की एकमात्र पत्नि होने जैसे अनेकों दृष्टान्त ! ममेरे फुफेरे भाई बहिनों के वैवाहिक संबंध याकि पश्चिमी समाजों में निकटतम रक्त सम्बन्धों की अनदेखी करते हुए बनाए गये स्त्री पुरुष संबंध !

निःसंदेह विश्वव्यापी मानवीय बसाहटों में सामाजिक मान्यताओं और यौन नैतिकताओं को लेकर कोई एकमेव स्वीकार्य आचरण संहिता नहीं है और ना ही हो सकती है, यहां तक कि मिथिकीय मान्यताओं, अवतारों, श्रेष्ठियों के अंतर और इतर भी...