सोमवार, 22 जुलाई 2013

हरित वर्ण रेशमी परिधान...!

वो गर्मियों के दिन थे , जबकि नौजवान अध्येता ‘यू’ शांतिपूर्वक अध्ययन कर पाने के ख्याल से पहाड़ी वाले मंदिर में जा पहुंचा, वहां उसने कई दिन और रात लगातार सुकून भरे माहौल में अध्ययन करते हुए गुज़ारे...अब वो थकने लगा था ! एक रात वह अपनी टेबिल पर ही हाथों का सिरहाना बना कर सो गया...असावधानी वश थोड़ी सी स्याही उसकी टेबिल पर बिखर गई थी ! वह गहरी नींद में था , सो ज़ल्द ही , उसके ख्वाब जाग उट्ठे ! उसे लगा कि हरित वर्ण के शानदार रेशमी परिधान पहने हुए एक खूबसूरत युवती , उससे मदद की गुहार कर रही है ! वो युवती ‘यू’ पर झुकते हुए गिड़गिड़ाई , कृपया मेरी मदद करो, शायद...खतरे में फंसी हुई युवती की आखिरी चीख सुनकर वह जागा और उसने अपने चारों तरफ देखा , वहां कुछ भी नहीं था !

बस एक भिनभिनाहट...जो खिड़की के बाहर मकड़ी के जाले में फंसी हुई मधुमक्खी कर रही थी ! मधुमक्खी के जीवन के ये अंतिम क्षण ही रहे होंगे , मकड़ी बस उसे अपना आहार बनाने ही वाली थी कि ‘यू’ ने खिड़की खोल कर , उस जाले के ऊपर झूलती हुई शाख से एक पत्ता तोड़ कर मकड़ी को दूर झटक दिया...और फिर उसी पत्ते के सहारे उस मधुमक्खी को अपनी टेबिल पर ले आया,मधुमक्खी लगभग बेसुध थी ! कुछ लम्हे के बाद वह हिली और लड़खड़ाते हुए , टेबिल पर बिखरी हुई स्याही के ऊपर चलने लगी , उसके बाद वह नौजवान ‘यू’ के कागजों के ऊपर कदमताल सा करती हुई हवा में उड़ गई ! ‘यू’  हैरत के साथ यह सब देखता रहा , उसने पाया कि उसके तालपत्र में आड़े टेढ़े कांपते थिरकते से नन्हें नन्हे से हर्फों में धन्यवाद लिखा हुआ साफ़ साफ़ नज़र आ रहा था !

इस आख्यान के हवाले से पहली बात , स्पष्ट यह कि ज्ञानोत्सुक को एकांत की आवश्यकता होती है, जहां वह बिना व्यवधान अपने चिंतन मनन और अध्ययन का कार्य कर सके ! कथा कालीन समाज नि:संदेह आध्यात्मिक प्रकृति वाला समाज रहा होगा जहाँ पूजा और साधना के स्थल को सामान्य बसाहट से इतर पहाड़ की ऊंचाई में स्थापित किया गया होगा !  कहने का आशय यह है कि उक्त समाज में मंदिर / उपासना स्थल ज्ञान अर्जन के लिए उपयुक्त स्थल माना गया होगा ! संभव है कि चीनी पृष्ठभूमि के इस आख्यान में उल्लिखित मंदिर कोई बौद्ध पगोड़ा ही रहा हो जहां ‘यू’ नाम का साधक अपने बौद्धिक तोष के लिए उपस्थित हुआ हो...हालांकि चीनी मूल के किसी धर्म के उपासना स्थल के रूप में भी , उसका आशय , ज्ञान केन्द्र वाला ही माना जायेगा !

अध्येता ‘यू’ प्रकृति के निकट , धार्मिक उन्मुखता वाले स्थल में ज्ञानार्जन का यत्न करते हुए थककर सो जाता है और उसे ख्वाब में किसी युवती का आर्तनाद , सहायता की याचना का स्वर साफ़ सुनाई देता है , वह उसे हरे  रेशमी धागे वाले लिबास में देखता है , नि:संदेह मंदिर के चहुँ दिश की हरितिमा के आलोक / सन्दर्भ में यह रेशमी लिबास मकड़ी के द्वारा बुना गया जाला ही हो सकता है, धागों में फंसी हुई मधुमक्खी का रेशमी हरा लिबास एक गज़ब की अनुभूति है, मकड़ी के बुनाई कौशल की अदभुत प्रशंसा है !साधक ‘यू’ ख्वाब में आभासी तौर पर एक नन्हे से जीव को भी स्त्री रूप में देखता है , जोकि सुंदर है और उससे दया की याचना कर रही है ! अतः प्रतीति यह कि एकांतिक साधक होने के बावजूद उसका अंतर्मन सुन्दर ‘स्त्री’ की लालसा से मुक्त नहीं है !

‘यू’ अनजाने में ही एक सुंदर युवती का स्वप्न देखते हुए यह सिद्ध करता है , कि या तो उसके ज्ञान मार्ग में स्त्रियों का निषेध है ही नहीं अथवा उसकी साधना , उसे स्त्रियों के प्रति उसके नैसर्गिक लगाव से दूर नहीं कर सकी ! बहरहाल इस कथा का एक अन्य आयाम यह भी है कि किसी अच्छे साधक के लिए मधुमक्खी जैसा नन्हा कीट भी उतना ही अधिक महत्वपूर्ण है, जितना कि उसके स्वयं के स्वजन स्वरुप मनुष्य अथवा उसकी प्रियतम-सह-सर्वोपरि अभिलाषा स्त्री ! वह आक्रामक मकड़ी की जान नहीं लेता बल्कि उसे, हरे कोमल पत्ते की सहायता से मधुमक्खी से दूर कर देता है और मधुमक्खी की जान बचाता है ! अतः लगता है कि सर्व-जीव समभाव की सांकेतिकता लिये हुए यह कथा मांसाहार के विरुद्ध और अहिंसा / दया / करुणा के पक्ष में खड़ी हो गई हो !

इस कथा के अनुसार मधुमक्खी अपने जीवन रक्षक के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करने के लिए अपने पैरों का उपयोग करती है , वह टेबिल पर बिखरी हुई स्याही से अध्येता के तालपत्र पर धन्यवाद लिखती है , नि:संदेह कथा का ये धन्यवाद अंश ध्वन्यात्मक , शाब्दिक , भाषाई दृष्टि से कीट समाज और मनुष्य समाज के मध्य पारस्परिक संवाद के लिए अनुपयुक्त ही माना जायेगा ! हमें मधुमक्खी के धन्यवाद ज्ञापन को उसकी प्रतीकात्मकता में स्वीकारना होगा और यह भी कि साधक / ज्ञानी / बुद्ध  के लिए भाषाई असाम्यता संचार को बाधित नहीं करती ! आशय यह कि जो भी व्यक्ति ज्ञानी / ज्ञानोत्सुक हो उसके लिए विविध भाषायें / भिन्न देह आकृतियां और सांसारिक विविधतायें मायने नहीं रखतीं , वह हर तरह के भेद भाव से मुक्त हो जाया करता है ! 

12 टिप्‍पणियां:

  1. Aapki bhasha itni samruddh hai ki padhne me maza aa jata hai....

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  2. सपनों में हम वही देखते है जो हमारे साथ पहले ही घटित हो चुका हो और कभी कभी अर्धनीद्रा के समय खास कर तब जब हम सोना तो नहीं चाहते है किन्तु थकान हमें नीद के झोके में ले जाती है तो , दिमागी रूप से हम पूरी तरह नहीं सोये रहते है दिमाग हमारे आस पास हो रही चीजो के लिए थोडा सचेत सा रहता है और वहा हो रही घटनाये भी हमारे सपने बन जाते है जो आधे अधूरे रूप में हमारे दिमाग में पहुंचते है , गिले स्याही का नरम स्पर्श ने उसे रेशमी कपडे का एहसास दिया , वो हरा क्यों था आप ने बता दिया और जाले से छूटने के लिए भिनभिनाती मधुमक्खी की आवाज उसे किसी स्त्री के याचना की आवाज लगती है , दबी धीमी थोड़ी थोड़ी मीठी से आवाज एक स्त्री की होने का अहसास कराती है और लगातार आना उसके घबडाहट की और एक सपना बुन जाता है |
    एक नजरिया ये भी हो सकता है राजकुमारी की कहानियो वाला, जहा मुसीबत में फंसी एक राजकुमारी को बहादुर राजकुमार बचाता है और उससे विवाह कर लेता है , जहा लड़किया अपने लिए सुन्दर राजकुमार आने की कल्पना कर सकती है तो कोई लड़का भी खुद के राजकुमार बन किसी राजकुमारी को बचाने के सपने भी बुन सकता है |
    जीव पर दया वाली बात से सहमत बौद्ध धर्म में इस बात को कहा गया है , किसी जीव को इस तरह बचाना सभी को अच्छा लगता है चाहे वो मांसाहारी ही क्यों न हो , डिस्कवरी पर एक कार्यक्रम आता है जिसमे उस द्र्श्यो को दिखाया जाता है जिसमे निरीह प्राणी ताकतवर जंगली जानवरों को चुंगल से बच कर निकल जाते है , उन्हें शूट कर रहा हर व्यक्ति यही कहता है की निरीह प्राणी बच जाये और मै भी , और उसके बचने पर सभी खुश होते है जबकि हम सभी जानते है जीव ही जीव का आहार है किसी का बचना किसी के मरने का कारन हो सकता है , फिर भी शायद हम कमजोर के टक्कर लेने की भावना से खुश होते है , या कमजोर को बचाने की भावना से ये मानते है की वो हमारे प्रति कृतज्ञ होगा और हमारा धन्यवाद करेगा इसी भावना के तहत "यू" को मधुमक्खी के पैरो के निशान में धन्यवाद लिखा होने का भ्रम होता है या ये भ्रम वो खुद पाल लेता है |

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    1. हां,इशारा वही है कि 'यू' के अवचेतन में स्त्रियों से सम्बंधित घटनायें शेष रही होंगी सो उसने स्वप्न में कमोबेश वैसा ही देखा/अनुभूति की ! गीली स्याही के नरम स्पर्श वाली आपकी बात अच्छी लगी और मधुमक्खी के भिन भिन वाली आवाज का मीठापन भी !

      संकट में फंसी राजकुमारी/राजकुमार को सहायता पहुंचाने वाले नायक/नायिका के ख्याल को हम समाजशास्त्र में 'आभासी समूह' कहा करते हैं ! ऐसी अनुभूति अमूमन खेल/फिल्म देखते हुए दर्शकों को अक्सर होती है जब वे अपनी सुविधा अनुसार नायिका अथवा नायक के साथ स्वयं को संबद्ध करके देखते हैं :) अस्तु आपकी व्याख्या से पूर्ण सहमति !

      बौद्ध धर्म के मसले में आपका कथन उचित है ! मधुमक्खी के धन्यवाद को मैं भी 'यू' का आभास ही मान कर चल रहा हूं !

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  3. लालसा न होकर किसी की सहायता करने की उत्कट अभिलाषा भी हो सकती है!
    ज्ञान हर भेद मिटाता है , काश ऐसा होता !

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    1. ये तो कमाल हो गया आलेख के अंतिम ड्राफ्ट से 'अभिलाषा' हटाकर 'लालसा' लिखते वक़्त मैं एक दो मिनट के लिए द्विधा में ज़रूर पड़ गया था :) बहरहाल 'उत्कट' शब्द आपका विशेष योगदान है और मुझे स्वीकार्य है! पांचवें पैरा की तीसरी लाइन में अच्छे साधक का ज़िक्र करते हुए यह बात ज़ेहन में थी कि अच्छा ज्ञान जो हर भेद मिटा दे ! काश ऐसा हो ! आमीन !

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  4. स्त्री के स्वप्न में आने का हमारा अनुभव तो कुछ और ही बोलता है !

    जारी रखिये और हो सके तो खुद की बोध/ नीति कथाओं की सीरिज शुरू करने पर भी विचार करिए :)

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    1. मजाल साहब ,
      वो साधक अविवाहित था और आप यकीनन शादीशुदा होंगे सो स्त्री वाले स्वप्न के अनुभव जैसा आप कहें... :)

      फिलहाल जारी तो है ही, हालांकि गुज़ारिश ये कि 'मैं' वाली दुआयें ना दीजिए !


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  5. मकड़ी हो या मधुमक्खी हर जीव का अपनी-अपनी जगह सुनिश्चित है इस पृथ्वी पर ....हमारी तरह उनका भी अपना मूल्य है ...
    बहुत बढ़िया कहानी ..

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  6. जो भी व्यक्ति ज्ञानी / ज्ञानोत्सुक हो उसके लिए विविध भाषायें / भिन्न देह आकृतियां और सांसारिक विविधतायें मायने नहीं रखतीं , वह हर तरह के भेद भाव से मुक्त हो जाया करता है !

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