सोमवार, 29 जुलाई 2013

और यूं तारे बने...!

रोला-मानो एक वृद्ध व्यक्ति था , जो कि अथाह नील महासागर और उसके अदभुत चमकदार मोतियों , श्वेत फेन और गुलाबी कोरल का स्वामी था , वह महासागर की गहराइयों में परछाइयों और विलक्षण रूपों वाली राजधानी का शासक था , वहां सूर्य की रौशनी , हरे और भूरे रंग की किरणों के तौर पर नीचे उतरती थी ! इस अजीब-ओ-गरीब भूमि पर भूरे , हरित समुद्री शैवाल / सिवार जैसे पौधे थे , जिनकी लंबी बांहें , लहरों के साथ आगे पीछे , ऊपर नीचे डोलती रहतीं...और इसके अतिरिक्त कई जगह समुद्री घास के बिखरे टुकड़े जो कि किसी हिम कन्या के महीन और मुलायम बालों जैसे दिखाई देते !  समुद्री शैवाल और वनस्पति के नीचे की अंधेरी गहराई हजारों भय पैदा करती !

वहां एक विशाल काले पत्थर की गुफा का महाकाय आक्टोपस अपनी भुजाओं को फैलाये भोजन की खोज में लगा रहता , उसकी बड़ी बड़ी किन्तु दीप्तिहीन आंखें गोया पानी को नापती रहतीं ! पास ही एक भूरी शार्क , शैवाल के अंदर और बाहर तीव्र गति से तैरती रहती , जब कि चमकदार रंग वाली मछली , खतरे के इस पथ से बचती हुई दिखाई देती , वहीं बिखरी पड़ी रेत में धंसी सफेद सीप के खोल से बड़ा सा केकड़ा बेढंगेपन के साथ बाहर नमूदार होता और शैवाल की तरफ अपनी भूरी , सफेद भुजायें फैला देता !  यह रोला-मानो की राजधानी थी...समुद्र के उस बूढ़े व्यक्ति की ! एक दिन रोला-मानो समुद्री किनारे के दलदली मैंग्रोव के पास मछली पकड़ने गया , जहां उसने कई मछलियां पकड़ीं और उन्हें आग में भून कर खा रहा था !

उसने देखा कि दो युवतियां उसके पास आ रहीं थीं ! उनके आकर्षक सुन्दर जिस्म , नये नवेले नरकुल की तरह से लचीले थे ! उनकी आंखें शाम की नर्म रौशनी जैसी थीं ! वो जब बोलतीं , तो लगता कि रात में नदी के तट पर सरकंडों से होकर मध्यम मृदु बयार बहती हो !  रोला-मानो , उन युवतियों को पकड़ने के ख्याल से मैंग्रोव के झुरमुट में छुप गया और उनके पास आते ही उसने अपना जाल उन पर फेंका लेकिन एक युवती जाल में फंसने से बच गई और वह समुद्र की गहराई में कूद गई ! रोला-मानो उस युवती के बच निकलने से नाराज होकर उसके पीछे एक जलती हुई लकड़ी लेकर समुद्र में कूदा , लकड़ी जैसे ही समुद्र की सतह से टकराई हिस्स की आवाज के साथ रौशनी के कण आकाश में बिखर गये और तब से आज तक वे सुनहरे तारों के रूप में आकाश में मौजूद हैं !  

रोला-मानो , समुद्र में कूद गई , उस युवती को पकड़ नहीं पाया , सो उसने वापस किनारे पर लौट कर जाल में फंसी हुई युवती को हमेशा हमेशा के लिए अपने साथ रहने के मकसद से , आकाश में रख दिया !  वो युवती शाम का चमकीला तारा हुई ! अपने आराम / अधिवास के स्थान से वो युवती , हर शाम-ओ-रात अनंत धुंध के बीच से चमकते हुए , बेचैन अंधियारे समुद्र और रोला-मानो की रहस्यमयी राजधानी को आलोकित करती रहती है ! गर्मियों की साफ़ रातों में , आकाश में चमकते ढेरों तारे और वो युवती आज भी उस रात की घटना का स्मरण कराते रहते हैं जब कि रोला-मानो ने मैंग्रोव के झुरमुट में छुपकर उसे पकड़ा था और समुद्र की सतह से जलती हुई लकड़ी के टकराने से सितारे जन्में थे !

आस्ट्रेलियाई मूल के अर्वाचीन मानवों / आदिवासियों की यह कथा , अगर वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखी जाये तो हासिल शून्य , भले ही आये पर अपनी कहन के ऐतबार से इसे एक बेहद खूबसूरत कथा माना जाएगा , नील महासागर में हरित शैवाल , समुद्र की गहराई में सूर्य की रौशनी के बदलते रंग , लहरों पर लंबी बाँहें फैलाये तैरते उतराते शैवाल / सिवार , समुद्री घास का हिम कन्या के बालों जैसा होना , महाकाय आक्टोपस की दीप्तिहीन बड़ी बड़ी आँखें , सीप की ओट से बेढंगेपन के साथ निकलता केकड़ा, शाम की नर्म रौशनी जैसी आंखों वाली युवतियां , सरकंडों के दरम्यान से बहती मृदु बयार जैसे उनके सुर , नये नवेले नरकुल जैसी उनकी देह यष्टि  वगैरह वगैरह , कथाकालीन समाज के स्व-पारिस्थितिकीय पर्यवेक्षण के अदभुत नमूने हैं !

इस आख्यान की पृष्ठभूमि नि:संदेह समुद्र तट की किसी मछुवारा बस्ती से जोड़ कर देखी जायेगी ! कथा का नायक एक वृद्ध यानि कि अनुभवी मछुवारा है , संभवतः वह अपनी बस्ती का प्रधान / मुखिया रहा होगा ! गौर तलब है कि समुद्र तटीय विशिष्ट बस्ती के मछुवारे एक निश्चित समुद्री दायरे में मत्स्याखेट किया करते हैं , इसलिए इस निश्चित जल क्षेत्र (टेरेटरी) को उस अनुभवी व्यक्ति रोला-मानो की राजधानी कहा गया है !  इतना ही नहीं इस जल क्षेत्र की तमाम संपदा यथा चमकदार मोतियों , गुलाबी कोरल , श्वेत फेन आदि आदि का स्वामी भी उसे ही माना गया है ! इस आख्यान से यह स्पष्ट प्रतीति होती है कि प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय अधिवासियों के हक / अधिकार की अवधारणा अत्यंत पुरानी है !  

अर्वाचीन समाज में स्त्रियों और अग्नि कणों को आकाशीय तारों के सदृश माना जाना अत्यंत महत्वपूर्ण है ! उक्त समाज के लिए अग्नि , भोजन पकाने का ही नहीं बल्कि अंधियारे को आलोकित करने का स्थायी और कमोबेश अक्षय माध्यम भी है , समुद्र के पानी में जलती लकड़ी के टकराने से उत्सर्जित अग्नि कणों को आकाश में तारों के तौर पर टांक देने / स्थापित कर देने का आशय इसके अतिरिक्त और कुछ हो भी नहीं सकता !  एक युवती जो कि आखेटक के जाल में फंस जाती है , वो भी आखेटक के साथ हमेशा हमेशा रहने के वास्ते आकाश में बसा दी जाती है , ताकि सबसे चमकीले तारे के तौर पर बेचैन / अंधियारे समुद्र और रोला-मानो की रहस्यमयी  राजधानी को रौशन करती रहे ! कहने का आशय यह कि स्त्रियों में अंधकार को आलोकित करने की क्षमता / ऊर्जा निहित है ! यहां प्रतीकात्मक रूप से आलोक को ज्ञान भी माना जा सकता है !

इस कथा में युवतियों की आंखों / दैहिक सुगढ़ता और आवाज़ को लेकर बेहद रोमानियत भरे कथन , भले ही किये गये हों...और स्त्रियों के प्रति पुरुषों के आकर्षण को वय भेद से इतर भले ही बताया गया हो...पर यह कथा स्त्री पुरुष के दरम्यानी आकर्षण के कुछ नये और अलग से अर्थ उकेरती है !  मसलन आख्यान का नायक एक वृद्ध और अनुभवी व्यक्ति है , जो कि स्त्रियों की समाज को आलोकित करने की क्षमता से भिज्ञ / परिचित प्रतीत होता है , यानि कि वृद्ध रोला-मानो , युवतियों के प्रति आकर्षित तो है पर...उसका आकर्षण , उसकी आयु / उसके अनुभव के अनुकूल, सामाजिक सोद्देश्यता-परक है ! वह उन युवतियों की असाधारण क्षमता / ऊर्जा का इस्तेमाल , समाज हित में करना चाहता है , हमेशा हमेशा के लिये...शाम-ओ-रात के सबसे हसीन / चमकदार तारे के जैसा !   

14 टिप्‍पणियां:

  1. १- इस कहानी में एक तरह से कहानी जैसा कुछ भी नहीं है , पिछली पोस्ट पर किसी ने कहा था की ये लोक कहानीया नहीं कविता है , आधुनिक कविता में जैसे पद्य कम गद्य ज्यादा होता है उसी तरह पुराणी कहानियो में गद्य में भी पद्य जैसा प्रकृति का वर्णन विस्तार से कहा जाता है जो कहानी न लग कर कविता ही लगती है , हिंदी फिल्मो की तरह जिसमे गाना बजाना ज्यादा और कहानी कम हो :)
    २ - लगभग सभी कहानिया पढ़ कर लगता है ये बिलकुल वैसे ही जैसे हम अपने मासूम कम जानकार बच्चो के क्यों और कैसे जैसे सवालो पर कुछ भी बहलाने के लिए कह देते है जिसमे हमें दिमाग न लगाना पड़े और उनकी कल्पना शक्ति ही ज्यादा काम करे , कुछ ऐसा जिसमे सब अच्छा अच्छा हो परी कथा जैसा :)
    ३- जब बात सुन्दरता की हो प्रकृति की हो या किसी ने चीज की तो पुरुष की कल्पना स्त्री से आगे नहीं बढ पाती है , वो हर बात की तुलना स्त्री से ही क्यों करने लगता है
    ४ - कभी कभी इन कहानियों को सुन कर कोफ़्त होती है वही बला की सुन्दर सी नायिका जिसे सब पाना चाहते है, जिसे सब बस उसकी सुन्दरता के कारण ही पाना चाहते है , बेचारी नायिका जिसे ज्यादातर पाने की ही चाहत रखी जाती है :(
    ५- मुझे सभी कहानियो में से मेढक बने राजकुमार की कहानी सबसे ज्यादा पसंद है ( आप वाली सबसे ज्यादा ) जिसमे राजकुमार राजकुमारी की जगह उसकी साधारण और कम सुन्दर सहेली को अंत में चुनता है , जहा सुन्दरता से ऊपर व्यक्ति के व्यक्तित्व को महत्व दिया गया है
    ६- स्थानीय लोगो का पहला हक़ ----- मै तो मुंबई के बाहर से यहाँ आई हूँ सोच रही हूँ की जय महाराष्ट्र ! वालो को कैसे सपोर्ट करू :))

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    1. 1 & 2, :)

      3, वैसे तो यह प्रसन्नता का विषय होना चाहिए :) ...पर मसला ये है कि तुलनात्मक रूप से आधी दुनिया, आधी दुनिया को अपने ख्यालात से डिलीट / इग्नोर कैसे कर सकती है भला ?

      4, असल में इस कहानी में 'सुंदरता' को पाने के अर्थ अलग हो गये हैं , क्या यह बात कम महत्वपूर्ण है ?

      5, मुझे भी !

      6, आपकी चिंता जायज़ है! यहां परसों आया व्यक्ति,कल आये व्यक्ति को दुत्कारता है/रिजेक्ट करता है जबकि वह स्वयं जानता है कि वह भी स्थानीयता का अर्वाचीनतम अधिवासी नहीं है,मसलन ठाकरे बंधुओं के लिए स्थानीय कोली/मछुवारे(मुम्बईकर)गौण हो जाते हैं जब वे उत्तर प्रदेश और बिहार से आये लोगों की तुलना में मुम्बई का मूल अधिवासी/दावेदार स्वयं को कहते हों :) हमारे ख्याल से प्राकृतिक संसाधनों(समुद्र-आधारित) पर कोली/मछुवारों का पहला और नैसर्गिक अधिकार है,जबकि मानव द्वारा कृत्रिम रूप से विकसित जीवन अवसरों/संसाधनों पर सभी का समान रूप से,मसलन फिल्म इंडस्ट्री/उद्योग अथवा राजनीति वगैरह वगैरह!

      जहाँ तक कथा में उद्धृत वक्तव्य का सम्बन्ध है,उसे विशेष रूप से देश के आदिवासियों और जल जंगल जमीन वाली धारणा से जोड़कर देखा जाये,जहां स्थानीय आबादी को उनके प्राकृतिक संसाधन-गत नैसर्गिक अधिकारों से वंचित किया जाना,व्यापक शोषण/बड़ी लड़ाइयों/भयावह विनाश/भयंकर हिंसा का कारण बनता है!

      बहरहाल आपका भय/आपकी चिंता,संसाधनों के हकदारी वाले फर्जी दावेदारों,खासकर राजनेताओं/घृणा-जीवियों के लिए जितनी भी है,उतनी ही हमारी भी जानिये!...पर स्थानीयता वाले वक्तव्य को आदिवासी आबादी से जोड़कर देखने की कृपा कीजियेगा!

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    2. और हां, प्रतिक्रिया देते हुए यह बात कहना तो भूल ही गया कि आपकी टिप्पणियां कथा की व्याख्या को संपन्न और समृद्ध करती हैं! अस्तु आभार!

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    3. @ हमारे ख्याल से प्राकृतिक संसाधनों(समुद्र-आधारित) पर कोली/मछुवारों का पहला और नैसर्गिक अधिकार है,जबकि मानव द्वारा कृत्रिम रूप से विकसित जीवन अवसरों/संसाधनों पर सभी का समान रूप से
      बिलकुल सहमत |
      ३- काहे की प्रसन्नता , इस बात की की आधी आबादी हमें और हमरे अंगो को इतना गौर से देखती( घूरती है ) है , या उसे हर जगह हमें दिखाई देते है , मतलब हमरे ख्यालो में ही रहता है या उसने हमारे लिए सुन्दरता के पैमाने गढ़ दिए है काले लम्बे बाल हिरनी सी आँखे आदि आदि , एक बार जब पुरुष होने के पैमाने गढ़ दिए जाये , और उसके हर अंग का वर्णन किया जाये सविस्तार तब समझ जा सकता है की वो तारीफ है जिस पर प्रसन्नता व्यक्त किया जाये या बार बार वही सुन कर उस पर खिजा जाये :)
      कहानी कहा उस की व्याख्या कर हमें डोर थमाने का आप का आभार !

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    4. @3,
      अपनी प्रसन्नता केवल देखने तक मर्यादित मानी जाये! घूरने पर हमारी भी आपत्ति दर्ज़ की जाये! आधी आबादी को पूरा हक है कि पुरुषों को खिजाने योग्य सारी कार्यवाही की जाये :)

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  2. आजकल हि‍स्‍टरी-18 चैनल पर परग्रहवासि‍यों पर एक कार्यक्रम आता है, अगर उन्‍होंने यह कथा पढ़ ली तो रोला-मानो नि‍श्‍चय ही परग्रहवासी घोषि‍त कर दि‍या जाएगा

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    1. घोषणा तो इसी ग्रह वाले करेंगे ना :)

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  3. मुझे लगता है रोला-मानो प्रोफ़ेसर या दार्शनिक रहा होगा !
    एक जिज्ञासा है तारे बन जाने /बना दिया जाना उनकी इच्छा के विरुद्ध के रहा ?

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    1. मत्स्य आखेटक,प्रोफ़ेसर/दार्शनिक हो भी सकता है :)

      प्रतिभा / सामर्थ्य / गुणों की 'संस्वीकृति' अनैच्छिक नहीं हो सकती पर उनका 'उपयोग' किया जाना ऐच्छिक / अनैच्छिक ज़रूर हो सकता है !

      रोला-मानो ने स्त्रियों में निहित 'प्रतिभा' को चीन्हा और स्वीकार किया यहां तक इच्छा / अनिच्छा विषयक कोई प्रश्न नहीं किया जाना चाहिए , लेकिन जब रोला-मानो उस ऊर्जा / प्रतिभा का सार्वजनीन उपयोग करता है तो उस पर प्रश्न अवश्य किया जा सकता है कि 'उपयोग होना' सम्बंधित की इच्छा था भी कि नहीं ?

      इस सम्बन्ध में हमारा अभिमत ये है कि सार्वजनीन हित / सामाजिक हित के सम्मुख / की तुलना में व्यक्तिगत हित / व्यक्तिगत इच्छा गौण मानी जाती है , चूंकि रोला-मानो ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए प्रतिभा का उपयोग नहीं किया अतः उसकी भूमिका सामाजिकता की दृष्टि से उचित मानी जायेगी और प्रतिभा की अनिच्छा यदि हो भी तो गौण ! उम्मीद है आप हमारा आशय समझ गई होंगी !

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  4. सुन्दर! शानदार!

    टिप्पणियां और प्रतिटिप्पणियां और चकाचक!

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