गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

जुगनू...!

वो युवक मात्सू का रहने वाला था और उस रात एक वैवाहिक समारोह में शामिल होने के बाद अपने घर वापस लौट रहा था ! उसने देखा कि एक जुगनू उसके घर के एन सामने थिरक रहा है ! वो एक पल को ठहर सा गया ! बेहद सर्दीली / हिमवत , इस रात में एक कीट को , इस तरह से उड़ते देखकर उसे बेहद हैरानी हुई ! वो ध्यानमग्न होकर इस बारे में सोच ही रहा था कि जुगनू उड़कर उसकी ओर आने लगा ! जुगनू को अपने पास आते देखकर युवक ने उसपर छड़ी से प्रहार किया तो जुगनू उड़कर दूर , युवक के घर से सटे हुए बागीचे में दाखिल हो गया ! अगले दिन युवक अपने पड़ोसी के घर गया ! 

जहां वो अपनी पिछली रात के अनुभव के बारे में बात करना चाहता था , तभी पड़ोसी की बड़ी पुत्री वहां आई और उसने कहा कि , मुझे अभी अभी एक पल को तुम्हारा ख्याल आया , जबकि मुझे पता नहीं था कि तुम यहाँ आये हुए हो ! मैंने कल रात एक ख्वाब देखा कि मैं एक जुगनू बन गई हूं ! ये सब एक हकीकत जैसा और बेहद खूबसूरत था ! मैं इधर उधर उड़ रही थी , तभी मैंने तुम्हें देखा और तुम्हारे करीब आने लगी ! मैं तुम्हें बताना चाहती थी कि मैंने उड़ना सीख लिया है ! लेकिन तुमने मुझे अपनी छड़ी से मारना चाहा ! मुझे यह घटना अब तक भयाक्रांत कर रही है ! मंगेतर के मुंह से यह वाकया सुनकर युवक को तसल्ली हुई ! 

जापान के इस लोक आख्यान से , पड़ोस में रह रहे तथा परस्पर मंगनी कर चुके , एक युवा जोड़े के भावनात्मक खुरदरेपन और मृदुता का अंतर स्पष्ट परिलक्षित होता है ! कथा की नायिका जुगनू के सांकेतिक आशय में स्वयं आलोकित हो चुकी है , उसके अनुभवों का विस्तार हुआ है , सो उसने उड़ना भी सीख लिया है ! उस युवती के बोध / उसके संज्ञान और उड़ान के लिए हासिल उसकी नव-दक्षता के आलोक में , बेहद सर्दीली / हिमवत रात के विरुद्ध उड़ते फिरने का रहने का उसका हौसला, गज़ब के प्रतीकात्मक अर्थ लिए हुए है ! रात के अन्धकार के विरुद्ध जुगनू जैसी वो , गोया अज्ञान के विरुद्ध ज्ञान की आभा , एक किरण ! 

सर्द और ठिठुरन भरे माहौल में वो , आकाश को नापने / लांघने के अपने कौशल का परिचय अपने मंगेतर से कराना चाहती है ! उसका स्वप्न , उसके अवचेतन की थाथी है , जहां वो अपने भावी जीवन साथी को अपने अनुभवों में शामिल करना चाहती है ! उसका प्रयास सोचा समझा और जीते जागते का गणित नहीं है ! यहाँ कोई अवसरवाद नहीं है ! वो अपने अवचेतन से ही अपने भावी जीवन साथी की सहभागिता / हिस्सेदारी के लिए संकल्पित है ! उसके अंतर में अपने बोधत्व बनाम नव-स्वजन यानि कि आगत के जोड़ीदार को लेकर कोई दुराव छुपाव के संकेत नहीं हैं !

अपनी मंगेतर के बर-अक्स वो युवा एक साधारण से कीट के प्रति भी निर्मम हो उठता है , जबकि वो स्वयं भी हैरान था कि हिमवत रात में एक नन्हा सा जुगनू उसके घर के सामने कैसे थिरक रहा है ? वह एक सुखद आयोजन में शामिल होकर वापस लौटा है और अपने निकट आते लघु कीट पर बे-झिझक छड़ी से प्रहार करता है जोकि उस नन्हें की मृत्यु का कारण भी बन सकती थी ! वो अपनी मंगेतर के घर उस घटना का विवरण देने जाता है , जिसमें उसकी अपनी निर्ममता के संकेत निहित है ! एक क्षुद्र कोमल काया के विरुद्ध वो युवक और उसकी हत्यारी छड़ी , उसके अंतर की कठोरता की प्रतीति कराते हैं ...जबकि उसकी तसल्ली कुछ नये सवाल छोड़ जाती है !


[ बेशक,यह आख्यान, पिछली शताब्दियों में पुरुष और स्त्रियों के व्यक्तित्व / मानस में मौजूद आधारभूत तत्वों / लक्षणों की कलई खोलता है ! तो क्या आज के सामाजिक हालात बदल गये हैं ? ]

13 टिप्‍पणियां:

  1. युवक की तसल्ली और आज के सामाजिक हालात में गहरा साम्य दिखता है।

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  2. अच्छा लेखन बिम्बों का सुंदर प्रयोग

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  3. "बेशक,यह आख्यान, पिछली शताब्दियों में पुरुष और स्त्रियों के व्यक्तित्व / मानस में मौजूद आधारभूत तत्वों / लक्षणों की कलई खोलता है ! तो क्या आज के सामाजिक हालात बदल गये हैं"


    nahi...


    pranam.

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  4. कहीं पुरुष की क्षुद्र कोमल काया के विरुद्ध यही निर्ममता तो नहीं जो आज भी समाज में नासूर बनी हुई है।

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  5. आह. ख़ुशबू को समझाया न जाए तो भी अच्‍छा लगता है...

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  6. कितना निष्ठुर था वह् युवक.

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