शनिवार, 15 सितंबर 2012

पवित्र धरोहर के संरक्षक...!

एक समय , वहां कुछ भी नहीं था...कुछ भी नहीं , केवल जीवन आत्मा , उसके इतर वृहत कालखंड तक कुछ भी नहीं ! तब उस जीवन आत्मा के अंतर्मन में स्वप्न शीलता उद्भूत हुई , रिक्त अन्धकार में एक स्वप्न आलोक जागा और महान आत्मा के अंतस में इस आलोक के रंग चमकदार होते गये ! पहले पहल पवन का स्वप्न , फिर जीवन आत्मा के मन में नर्तन / घूर्णन करता आलोक और उसके बाद आया वर्षा का स्वप्न ! इससे आगे अग्नि , जल और वायु के महासंग्राम , रोष , उन्माद का सुदीर्घ कालखंड ! महान आत्मा को ये स्वप्न प्रीतिकर लगे सो निरंतर / जारी रहे ! जब अग्नि , जल और वायु का पारस्परिक उन्माद क्षीण हुआ सो आये धरती , आकाश और महासागर के स्वप्न !...ये स्वप्न लंबे समय तक आते रहे ! भले ही महान आत्मा स्वप्न देखते देखते थक चली थी पर उसे आगे भी स्वप्न देखते रहने की इच्छा थी सो उसने इन स्वप्नों में प्राण फूंके ताकि वे स्वप्न उस सृजनकर्ता आत्मा के लिए निरंतर और जीवंत बने रहें !

अब जीवन आत्मा ने मत्स्य आत्मा के साथ स्वप्नों के रहस्य धरती पर भेजे , फिर मत्स्य शांत / थिर गहरे जल में प्रविष्ट हुई और उसने भी स्वप्न देखने शुरू किये ! उसने लहरों और भीगे रेत के स्वप्न देखे , लेकिन वो इन स्वप्नों का अर्थ समझ नहीं सकी , उसे केवल गहरे थिर जल के स्वप्न देखने की लालसा थी सो उसने कछुवे की आत्मा से स्वप्न रहस्य साझा किये ! इसके बाद कछुवा लहरों के साथ भीगी रेत पर प्रकटित हुआ और उसने देखे, चट्टानों तथा तप्त सूर्य के स्वप्न ,किन्तु वह इन स्वप्नों का अर्थ समझ नहीं सका और चाहता रहा , केवल भीगी रेत तथा लहरों के स्वप्न देखना निरंतर...फिर उसने स्वप्न रहस्य छिपकली की आत्मा के संग साझा किये ! वो एक चट्टान पर चढ़ गयी और उसने देखे मुक्त आकाश तथा वायु के स्वप्न , लेकिन वह इन स्वप्नों का अर्थ नहीं समझ सकी , हालांकि उसकी चाहना में बने रहे चट्टानों और तप्त सूर्य के स्वप्न लगातार , सो उसने भी स्वप्न रहस्यों को गरुड़ आत्मा के संग साझा किया !

और इसके बाद गरुड़ ऊंचे आकाश में अपने पंखों में वायु की अनुभूति लिए डोलने लगा, फिर उसने देखे वृक्षों और रात्रिकालीन आकाश के स्वप्न ! गरुड़ इन स्वप्नों का अर्थ नहीं समझ सका , वो देखना चाहता था , मुक्त आकाश और वायु के स्वप्न...अतः उसने स्वप्न रहस्य , ओपोसम आत्मा से साझा किये ! ओपोसम एक ऊंचे पेड़ पर चढ़ गया और उसने रात्रिकालीन आकाश को देखा , फिर उसने देखे स्वप्न , विस्तृत मैदानों और पीली घास के ,लेकिन वो इन स्वप्नों का अर्थ नहीं समझ सका...उसे पसंद बने रहे वृक्षों और रात्रिकालीन आकाश के स्वप्न , सो पासम ने स्वप्न रहस्य कंगारू आत्मा से साझा किये , जोकि पीली घास में तन कर खड़ा दूर तक देख रहा था और फिर कंगारू ने देखे संगीत , गीत और हास्य के स्वप्न , लेकिन वह स्वयं इनके अर्थ नहीं समझ सका , वो चाहता था , देखना विस्तृत मैदानों और पीली घास के स्वप्न देखना लगातार , इसलिए उसने स्वप्न रहस्य मनुष्य की आत्मा से साझा किये और मनुष्य चल पड़ा धरती पर !

मनुष्य ने देखा सारा सृजन कर्म और सुने ऊषा काल में पक्षियों के गीत तथा संध्या के झुटपुटे में आरक्त सूर्य, फिर उसने देखे स्वप्न , भोर में परिंदों के संगीत तथा संध्या में सूर्यास्त की लालिमा के दौरान एमू के नृत्य और शिशुओं के हास्य के , मनुष्य स्वप्नों के अर्थ समझ गया! वो निरंतर स्वप्न देखता रहा , जोकि पहले भी देखे गये थे , गहरा थिर जल ,लहरें और भीगी रेत , चट्टानें और आकाश , वृक्ष और रात्रिकालीन आकाश , मैदान और पीली घास वगैरह वगैरह ! मनुष्य ने स्वप्नों से जाना कि सृष्टि में सारा सृजन उसकी स्वजन आत्मायें हैं सो उसे स्वप्नों को संरक्षित करना होगा...और फिर उसने स्वप्न देखा कि , किस तरह से अपने अजन्में बच्चों को स्वप्न रहस्य समझाये जायें ! अब महान आत्मा समझ गयी कि स्वप्न रहस्य सुरक्षित हैं , वो सृजन के स्वप्नों से थक चुकी थी , सो धरती पर जीवन आत्मा के रूप में प्रविष्ट हो गयी ! इसी तरह से सभी प्राणी आत्मायें थक गईं , सो वे भी धरती पर जीवन आत्मा के साथ आ जुटीं ! इस प्रकार से धरती पवित्र हुई और अब मनुष्य को इसका रखवाला / संरक्षक होना चाहिए !

आदिम लोक जीवन में सृष्टि सृजन को स्वप्नों के माध्यम से आख्यायित करने का यह यत्न , आत्मा पर विश्वास पर आधारित है यानि कि गाथा कहने वाला आस्ट्रेलियाई आदिम समाज आत्मावादी समाज है , जो ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के समय रिक्त शून्य / अन्धकार की कल्पना करता है , उसके तईं इस काल में केवल ईश्वर / सर्व-जीवनों की आत्मा मौजूद थी , उसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं ! पहले पहल ईश्वर के स्वप्नों के बहाने , अग्नि , जल और वायु की उत्पत्ति और फिर मत्स्य के बहाने जल से उद्भूत जीवन का कथन ! यह लोक आख्यान स्वप्न रहस्य / बोध को क्रमशः अन्य जीवों पर आरोपित करता चलता है ,यह देखना अत्यंत रोचक है कि स्वप्न को देखने वाला हर जीव , नव स्वप्न की व्याख्या स्वयं नहीं करता / या कहें कि स्वयं को इस हेतु असमर्थ पाता है , उसकी अपनी आकांक्षा पुराने स्वप्न / ज्ञान पर टिके रहने तक सीमित बनीं रहती है , सो वह नव स्वप्न सहित पुराना ज्ञान अगले जीव को हस्तांतरित कर देता है और फिर वह अपने नव स्वप्न की व्याख्या के लिए अगले जीव पर निर्भर हो जाता है !

जीव जगत में स्वप्न / ज्ञान के हस्तान्तरण और उसके बोध का सिलसिला अंततोगत्वा मनुष्य पर आकर ठहर जाता , जहां सपष्ट सन्देश यह है कि मनुष्य को स्वप्नों की इस पवित्र धरती / सृजन / ज्ञान का संरक्षक / केयर टेकर बने रहना है , उसे अपनी आत्मावादी आस्थाओं के साथ सारे के सारे जीव जगत को अपना बंधु बांधव / स्वजन मान लेना होगा , क्योंकि उन सबमें महान आत्मा का वास है जोकि मौलिक सृष्टिकर्ता / सृजनकर्ता शक्ति है ! यह कहना कठिन है कि स्वप्नों और जीवात्माओं की प्रतीकात्मकता के आलोक में कही गयी यह कथा मनुष्य के आज के यथार्थ के अनुकूल हैं कि नहीं ...पर आदिम सोच में गहन शून्य अंतरिक्ष , जल से जीवन की उत्पत्ति सहित ज्ञान के नियमित हस्तांतरण और अद्यतन होते रहने का कथन नि:संदेह अदभुत है !

19 टिप्‍पणियां:

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    यह कहना कठिन है कि स्वप्नों और जीवात्माओं की प्रतीकात्मकता के आलोक में कही गयी यह कथा मनुष्य के आज के यथार्थ के अनुकूल हैं कि नहीं ...पर आदिम सोच में गहन शून्य अंतरिक्ष , जल से जीवन की उत्पत्ति सहित ज्ञान के नियमित हस्तांतरण और अद्यतन होते रहने का कथन नि:संदेह अदभुत है !

    गाथा कहने वाला 'आस्ट्रेलियाई आदिम आत्मावादी समाज' सचमुच जैव विकास के चक्र को, जीव की उत्पत्ति समन्दर में होने, फिर जलचर-उभयचर-सरीसृप-पक्षी-स्तनपायी-मनुष्य क्रम में हुऐ विकास को सही सही समझा है... यह जरूर कहूँगा कि यह समाज आज के कई समाजों से ज्यादा अच्छी-साफ समझ रखता है एक विराट शून्य से हमारे 'हम' तक होने की...



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    1. बेहतरीन प्रतिक्रिया ,अभिनन्दन !

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  2. महान आत्मा ने बड़े ही वैज्ञानिक ढंग से वे स्वप्न पहले देखे जिससे जीवन का सृजन संभव है। स्वप्न को जलचर, नभचर और फिर थलचर से साझा करने का सिलसिला भी काफी रोचक है। अंत में स्वप्न सृजन से थककर महाना आत्मा जीवन आत्मा के रूप में प्रवृष्ट हो गई। इस प्रकार से मनुष्य को अपना रखवाला मानकर धरती पवित्र हुई।

    ..वाह! अद्भुत कथा!! ठीक से पढ़कर समझने का प्रयास ही कर पाया। आपकी व्याख्या भी बढ़िया है।

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    1. देवेन्द्र जी,
      उन्हें अक्सर / चलते चलाते , पिछड़ा हुआ समाज कहा जाता है , बस इसी हवाले से यह कथा मुझे आकर्षित करती है कि हम कितने उथले चिन्तक हैं !

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    2. सही कह रहे हैं। लेकिन 'वे' यहाँ 'विराट' हैं।

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  3. उनकी समझ निश्चित ही हमसे बेहतर है. सुन्दर प्रस्तुति. मुझे उस शिल्पी का ख्याल हो आया जिसने एक प्रतिमा तालागांव में ५/६ वीं सदी में गढ़ रखी है.
    कोच्ची प्रवास पर.

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    1. आदरणीय सर ,
      तालागांव की प्रतिमा के बारे में कहें / लिंक दें , उत्कंठा जागी है !

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  4. प्रत्येक आत्मा परमात्मा का अंश है , इसलिए उसके संरक्षण , विकास का जिम्मा भी आत्माओं का ही है .
    वतमान समय के परिप्रेक्ष्य में यथार्थवादी इसे स्वीकार ना भी करें , मगर सत्य यही है . पंचभूत से बने शरीर का प्रकृति में समा जाने जैसा ही !

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    1. परम और उसके अंश की नित्यता का चिंतन है ये !

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  5. अली सा.
    मसरूफियात देरी का सबब, कारोबारी मसरूफियात... मुआफी!!
    आज कुछ कहने को नहीं मेरे पास लेकिन अलग हट कर बस एक बात कहना चाहूँगा कि आज पहली लाइन से आख़िरी लाइन तक आते-आते ऐसा लगा कि जैसे पूरी पोस्ट मैं अपनी खुली आँखों से देख रहा हूँ.. यकीन मानिए मुझे ऐसा लगा कि इस पोस्ट को पढते हुए मेरे दिमाग में मिस्टिक पैटर्न बनने लगे... और बस लगा कि मैंने मनुष्य से फ्लैश बैक के मार्फ़त मैमल मनुष्य से, परिंदे, फिर रेप्टाइल्स, ऐम्फिबियंस,और फिर मीठे और खारे पानी तक का सफर पूरा कर लिया!!
    बस आखिर में यही कहूँगा कि एक अलग ही दुनिया का नज़ारा!!

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    1. (१)
      देरी से कोई दिक्कत नहीं मैं समझता हूं काम की अहमियत ! ब्लागिंग हमारी फुर्सतों का हिस्सा है !

      (२)
      सच में ये कथा मुझे भी ऐसी ही लगी थी ! आप का कमेन्ट मेरी फीलिंग्स की ताईद करता है !

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  6. "यह देखना अत्यंत रोचक है कि स्वप्न को देखने वाला हर जीव , नव स्वप्न की व्याख्या स्वयं नहीं करता / या कहें कि स्वयं को इस हेतु असमर्थ पाता है , उसकी अपनी आकांक्षा पुराने स्वप्न / ज्ञान पर टिके रहने तक सीमित बनीं रहती है"

    यही सिलसिला अब तक नहीं बना हुआ है?..यानि सपने देखने का रहस्य अब तक सुलझाने में असमर्थ है...पर सपने देखने , उसे विश्लेषित करने और उसके कार्यान्वयन में ही मानव का विकास भी निहित है.

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    1. (१)
      कथा का महत्वपूर्ण हिस्सा है अन्य जीवधारियों के बोध से चलकर बात का मानव के बोध पर आ टिकना !

      (२)
      मानव में , ज्ञान को लेकर सिलसिले की बात आपने खूब कहीं आपने ! हम अपने बच्चों के ज्ञान से अपनी तुलना करते वक़्त इसे हर दम महसूस करते हैं ! नई पीढ़ी माने ज्यादा अपडेटेड !

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  7. अब तक आप के ब्लॉग पर पढ़ी गई सभी लोक कथाओ या सोच में ये सबसे ज्यादा वैज्ञानिक और आज के समय में भी प्रासंगिक लगी | ज्यादातर लोक कथाये सामजिक ताने बाने को देख कर एक सामजिक रूप से बनाई जाती है किन्तु इस कथा में एक सही वैज्ञानिक रूप भी दिख रहा है किन्तु आत्मा वाली बात इसे सभी कथाओ से मिला रही है और ज्ञान जानकारी की सीमा को भी दर्शा रही है | इसमे कोई भी दो राय नहीं है की धरती के सभी जीव जंतु पेड़ पौधो का संरक्षण मनुष्य को ही करना चाहिए थे, क्योकि उसी के लिए ही ये सबसे जरुरी था की पर्यावरण का संतुलन बना रहे और धरती पर विनाश की जगह हमेसा सृजन हो नये स्वप्नों को देख जाता रहे किन्तु ऐसा नहीं हुआ , शायद मनुष्य ने ऐसे स्वप्न देखना शुरू कर दिया जो सृजन तो कर रहा था किन्तु पर्यावरण को नष्ट करके , नतीजा उसे ही भुगतना होगा जीवन का आरंभ जहा से हुआ यदि उसे ही नष्ट करेंगे तो एक दिन खुद भी नष्ट हो जायेंगे |

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    1. हां दूसरी कथाओं की तुलना में यह कथा ज्यादा विज्ञान सम्मत है ! बहरहाल आत्मावाद के मुद्दे पर चिंतित होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आज के साईंटिस्ट कहीं ज्यादा आत्मावादी नज़र आते है ! आपने सुना ही होगा सेटेलाईट लांच करने से पहले पूजा अर्चना का किस्सा :)

      आपके पूरे कमेन्ट से शब्दशः सहमति !

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  8. नईदृष्टि और विश्लेषण के साथ विचारणीय आलेख

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