शुक्रवार, 7 सितंबर 2012

परमारथ के कारने...!

दोनों ही सुन्दर धागे बुनते , उनकी हुनरमंदी के सब कायल...और एक दिन, उनमें बहस छिड़ गई एक दूसरे के किये धरे को लेकर , मकड़ी ने कहा , ओ रेशम कीट...तुम मुझसे बेहतर धागा बुनते हो , चाहे सफ़ेद या पीला...दोनों ही उज्जवल और चमकदार ! तुम उस सुन्दर रेशम को खुद के लिए बुनते हो और बनाते हो एक सुन्दर कोकून , फिर रह जाते हो एक आभासी और ‘अ’सच शहनशाह की तरह उस सौंदर्य से लिपटकर , अपनी ही बुनी हुई कैद में ! उस नन्हें कोकून में जीते हो तब तक...जब तक कि स्त्रियां गर्म खौलते हुए पानी में डालकर , उसका रेशा रेशा छील देती हैं और तुम अपने ही बुने हुए सुन्दर संसार में अपना सर्वस्व खो बैठते हो ! क्या यह शर्म की बात नहीं है कि सुन्दर धागों को बुनने की तुम्हारी सलाहियत / दक्षता, तुम्हारी अपनी मूर्खता के चलते , तुम्हारी ही मृत्यु का कारण बन जाती है ? 

रेशम कीट यह सुनकर पहले तो चिन्तन मग्न हुआ फिर बोला , यह सच है कि हमारे काम , हमारी मूर्खता जैसे दिखते हैं , पर हम बुनते हैं वो धागे , जिन्हें गूंथ कर इंसान भी अपने लिए सुन्दर आवरण तैयार कर सकें...सो हम देते हैं इंसानों को इस लायक /योग्य / दक्ष होने के अवसर कि वे भी सुन्दर दिख सकें ! इस ख्याल से क्या हमारी मेहनत सच में अकारथ / व्यर्थ है ? जबकि तुम मकड़ियां बुनती हो धागे आखेट के वास्ते , जिनमें फंसकर सुंदर सुंदर कीट अपनी उड़ान / अपनी आज़ादी , यहां तक की , अपना जीवन खो बैठते हैं और तुम उन्हें खाकर जीवन पाती हो और तुम्हें इसका पछतावा भी नहीं होता होगा लेकिन...क्या तुम्हारा यह कर्म क्रूरता नहीं है ? कई लोग यह सोचते हैं कि वो सारे काम बेकार हैं , जो स्वयं उन्हें फायदा नहीं पंहुचाते ! 

ये लोग नहीं जानते कि दूसरों के भले के लिए निज-हितों का बलिदान कितना महत्वपूर्ण है ! इसके बरक्स वे लोग , जिन्हें दूसरों के भले से संतोष होता है , वे खुद को खोकर भी परमारथ में सुख पाते है , उनके कामों को अकारथ और मूर्खतापूर्ण कैसे कहा जा सकता है ? ... सो बेहतर यह है कि , अगर हम दूसरों के निर्णयों को समझ पाने में अक्षम हों , तो उनका तिरस्कार करने के बजाय उनका आदर करें ! बाल्यकाल में पढ़ा कि वृक्ष अपने फल और नदी अपना जल परहिताय / सर्वजन कल्याणार्थ गंवा कर तोष पाते हैं / पाती हैं , सो साधुता उनकी , जो परमारथ के कामों में लीन हों ! परमारथ और साधुता , पर-शुभता और भद्रता के इस प्रसंग को धागों और जीवन लक्ष्य के निर्णयों के हवाले से कहने वाली यह चीनी लोक कथा किसी भी मायने में , भारतीय दृष्टान्त से कमतर नहीं है !

यहां सौंदर्य को बुनने वाले कीट / क्षुद्र जीव एक दूसरे की दक्षता / कौशल / निपुणता की प्रशंसा करते हुए भी , उसके सामाजिक औचित्य की पहचान करने की कोशिश करते हैं ! मकड़ी और रेशम कीट का पारस्परिक आलाप , दरअसल विशेषज्ञताओं / दक्षताओं / निपुणताओं का आलाप है , सृजन के सामर्थ्यवानों का संवाद है , सौंदर्य के पुरोधाओं का रेखांकन है , जो हम इंसानों के उस द्वैध की ओर संकेत करता है जहां हम एक ही समय में , परले दर्जे के स्वार्थी अथवा अव्वल दर्जे के परोपकारी हो सकते हैं ! परनिंदा हमारा प्रिय विषय क्षेत्र है , जहां हम अयाचित बहस में लिप्त होकर समय नष्ट करते हैं !

हमारी अपनी क्षमताओं के नैसर्गिक / साधुवत / शुभताकारी परिणामों से हमारा ध्यान भटक जाता है ! कथा कहती है कि अगर हम , दूसरे व्यक्ति के कार्य / निर्णय को समझ पाने में , अक्षम हों तो फिर , उसकी निंदा भी नहीं करना चाहिए ! पहले समझो , फिर मुंह खोलो !  बीती हुई शताब्दियों में , हर दिन बेहतर ढंग से जीते हुए , अगर हमने , निज-हित से बढ़कर परहित के ध्येय को नहीं साधा होता / व्यक्तिवाद के विरुद्ध सामाजिकता को नहीं स्वीकारा होता , तो हम आज भी पशुओं में गिने जाते ! हमारी क्षमताओं का वास्तविक सौंदर्य दूसरों के हित में अभिव्यक्त होता है ! अब जो , हम पशुवत ना होना चाहें / ना जीना चाहें  , तो इंसान बनकर क्यों ना रहें ?

19 टिप्‍पणियां:

  1. परहित सरिस धरम नहीं भाई...

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  2. परहित का सुस्पष्ट बखान है कथा में ...मकड़ियों के जाले से तो रेशम कीट ही बेहतर !
    मगर यहाँ जेंडर - डिस्क्रिमनैशन नजर आ रहा है , रेशम कीट और मकडी :):)

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    1. @ जेंडर - डिस्क्रिमनैशन ,
      ओह ये तो मैंने सोचा भी नहीं था ,शायद रेशम कीट के संबोधन में उभय लिंग सम्मिलित हैं !

      आप कहें तो उसे मकड़ा कर दूं :)

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  3. वस्तुतः कीट मूर्ख है और मकड़ी चालाक। बुद्धिमान तो वे मनुष्य हैं जिन्होने इन दोनो के माध्यम से समाज को यह अर्थ दिया और 'परहित सरस धर्म नहीं भाई...' की शिक्षा देने का प्रयास किया। अब ऐसी कथाओं पर यकीन करके लोगों में परहित के भाव का संचार होता नहीं प्रतीत होता। कुछ नए संदर्भ लेकर, कुछ नया गढ़ना पड़ेगा।:)

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    1. मतलब वे मनुष्य जो बुद्धिमान थे अब उनका किया धरा सब व्यर्थ हुआ :)

      ...खैर समय के साथ बदलने में कोइ बुराई नहीं है !

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  4. कीट की जीवन के प्रति सोच,दूसरों के लिए अपना उत्सर्ग भले तात्कालिक रूप से मूर्खतापूर्ण लगता हो,पर स्थायी और अंतिम जीत उसी की है.उसे अपने स्वल्पकाल के जीवन से भी संतुष्टि मिलती है,जो मकड़ी/मकड़ा को दूसरों का खून चूसकर लंबे समय में भी नहीं मिल पाती.

    ...बहुत दिन बाद इतना अच्छा दृष्टान्त आपने दिया.सच में,मैं तो रेशम-कीट से प्रभावित हूँ !

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  5. रेशम कीट ने अपना जीवन भी खूबसूरती से जिया ..सुन्दर धागों के बीच रहा...उन्हें बुनते समय उसके मन में ये भावना रही कि वह दूसरों के उपयोग के लिए बुन रहा है...जिस से उसे संतोष और ख़ुशी का ही अहसास हुआ होगा.

    मकड़ी ने दूसरे कीटों के आखेट के लिए जाल बुना. उसका मन हमेशा उद्विग्न होगा...किस तरह से जाल बुने कि कीट उसमे फंस जाएँ. पूरे समय उसका ध्यान लगा होगा कि कीट आ रहे हैं या नहीं...फंस रहे हैं या नहीं.
    मरना तो एक दिन सबको है...रेशम कीट भी मृत्यु को प्राप्त हुआ....मकड़ी भी अमर नहीं होगी. पर दोनों के जीवन जीने का ढंग अलग रहा.

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  6. रेशम कीड़े के मनोभावों को जाने बिना रेशम लोभी मानव नें उसके देहोत्सर्ग को बलिदान व परोपकार में खपा दिया। स्वार्थी इन्सान इसी तरह लाचारों को चने के झाड़ पर चढ़ाते है।

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    1. मान सकते हैं आखिर को कथा मनुष्य ने ही गढ़ी है !

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  7. 'पहले समझो , फिर मुंह खोलो !'
    सही कह रहे हैं. अभी समझने की प्रक्रिया में हूँ. :)
    घुघूतीबासूती

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  8. आख़ि‍री दो पैरे पढ़ कर सोच रहा हूं कि‍ कार्टूनि‍स्‍ट मकड़ी है रेशम कीट...

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  9. अपने लिए जीना भी कोई जीना है. यही तो सुनते आये हैं. त्याग की बड़ी महत्ता रही है. कुछ बातें समय के साथ भी नहीं बदलतीं.

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