गुरुवार, 12 जुलाई 2012

लड़की का प्रतिशोध ...!

ये वर्षों पहले की बात है !  शहंशाह यान की इकलौती पुत्री का नाम न्युवा था !  वो बहुत सुन्दर , प्यारी और मजबूत इच्छा शक्ति वाली युवती थी ! उसे तैरने का शौक था इसलिये वो अक्सर पूर्वी समुद्र में तैरने चली जाया करती थी !  वो नीली लहरों से खेलती और प्रकृति की निकटता से आनंदित हुआ करती थी !  एक दिन तैरते हुए वो पानी में डूब गई , किन्तु उसकी आत्मा ने हार नहीं मानी , वह पानी से बाहर निकल आई और एक पक्षी बन गई !  उसके सिर पर काले सफ़ेद धब्बे और उसकी चोंच भूरी तथा पंजे लाल थे !  उसने प्रतिशोध लेने में ज़रा भी समय नष्ट नहीं किया !  वह प्रतिदिन पश्चिमी पहाड़ों से कंकड और तिनके / लकड़ी के टुकड़े उठाकर पूर्वी समुद्र में डाल देती है !  वो पूर्वी समुद्र को भर देने और बदला लेने के लिए दृढ संकल्पित है , ताकि समुद्र किसी और को डुबा पाने की क्षमता हमेशा के लिए खो बैठे !  बारिश हो या धूप वह कभी आराम नहीं करती !  सर्दी हो या गर्मी वो हमेशा काम करती रहती है , यहां तक कि वह अब भी स्वयं को अपने काम में व्यस्त रहती है  ! 

कई बार आख्यानों को पढ़ते हुए लगता है कि , जैसे देश काल का फ़र्क मिट गया हो !  विदेशी धरती पर कही गई कथाओं में कमोबेश वैसी ही भावनाओं की अभिव्यक्ति जैसे कि हमारी अपनी देशज कथाओं में !  हमारे यहां सद्कार्य हेतु , एक गिलहरी , समुद्र के विराटत्व के विरूद्ध अपना योगदान देती है , ताकि एक अन्याय का निवारण किया जा सके तो चीन में एक राजकुमारी स्वयं के साथ हुए व्यवहार का प्रतिकार इस तरह से करना चाहती है कि , कोई दूसरा इंसान , आतताई समर्थ के अकारण / अवांछित शौर्य प्रदर्शन का शिकार ना हो जाये !  एशिया महाद्वीप के खेतिहर समाजों में सत्ता का राजतान्त्रिक स्वरूप अच्छे और बुरे , दोनों ही तरह से अभिव्यक्त होता है , जैसे कि हमारे यहां अगर रावण और दुर्योधन का राज है , तो राम राज भी है , ऐन इसी तरह से चीन का राजतान्त्रिक ढांचा भी नायक और खलनायक के द्वैध रूप में दिखाई देता है , मसलन महान दीवार को बनवाने वाले शहंशाह के क्रूर निर्णय बनाम इस कथा की नायिका का सोद्देश्य कर्म  ! 

अगर इस कथा को राजपरिवार से ना भी जोड़ा जाये तो भी राजकुमारी एक प्रभावशाली परिवार की सुन्दर कन्या है ! वो अपने शौक , अपनी रुचियों के चलते , छुई मुई लाजवंती की तर्ज वाली , घर की चार दीवारों के दरम्यान सिमटी हुई, कोई एक लड़की नहीं है , बल्कि वह बहिर्जगत के साथ खुलकर अंतःक्रिया करती है , प्रकृति के साथ तादात्मीकारण चाहती है !  उसे तैरने का शौक है , सो उसके देश का पूर्वी समुद्र उसकी क्रीड़ा स्थली है , सत्य यह कि उसे प्रकृति से प्रेम है !  कथा से लेशमात्र भी संकेत नहीं मिलता कि वह प्रकृति के प्रतिकूल कोई कर्म कर रही थी ! प्रतीकात्मक रूप से समुद्र एक सामर्थ्यशाली दैत्य / खलनायक बन कर उभरता है , जब वह प्रकृति प्रेमी राजकुमारी की अप्राकृतिक मृत्यु का कारण बनता है !  कथा कहती है कि राजकुमारी एक दिन पानी में तैरते समय डूब गई यानि कि उसकी मृत्य हो गई , किन्तु उसकी दृढ इच्छा शक्ति के कारण से उसकी आत्मा एक पक्षी के रूप में जीवित बनी रही ! एक इंसान के तौर पर उसका देहांत हो चुका है , जिसका कारण वह समुद्र है , जिससे वह अठखेलियां करती थी, जिसके साहचर्य में आनंदित हुआ करती थी  ! 

प्रेम के इस प्रकटीकरण में समुद्र कहीं अधिक शक्तिशाली पक्ष था किन्तु उसने अमर्यादित व्यवहार किया , स्वयं से प्रेम करने वाली लड़की की जान ली !  लड़की को इस बात का दुःख है कि सामर्थ्यशाली ने उस पर भरोसा कर रहे जीवन को नष्ट कर दिया !  अब वह अपनी जिजीविषा के रूप में एक पक्षी है और उस समुद्र को कंकड़ और तिनकों पाट देना चाहती है , ताकि अन्य कोई इंसान उसकी तरह से समुद्र के अमर्यादित व्यवहार शिकार ना हो जाये !  उसका प्रतिशोध स्वयं के लिए नहीं है बल्कि वह भविष्य की ओर देखती है , उसे दूसरों के जीवन की फ़िक्र है !  वह समुद्र से उसकी प्राण हर लेने वाली सामर्थ्य छीन लेना चाहती है !  वह तैरना जानती थी , पर समुद्र पर भरोसा करके डूब गई , अब उसे धोखेबाज़ समुद्र से अन्य जीवनों की रक्षा करना है !  संभव है कि आख्यान की नायिका का पक्षी हो जाना और कंकड़ और तिनकों से समुद्र को पाटने का यत्न भी सांकेतिक हो !  शायद वह डूब कर मरने से बच गयी हो ? मुमकिन है कि उसे स्वयं समुद्र में तैरती हुई किसी एक लकड़ी का सहारा मिल गया हो ?

अब वह समुद्र में तिनकों / लकड़ी के टुकड़ों के रूप में जीवन रक्षक संकेत छोड़ रही है !  समुद्र की गहराई में कमी के संकेत बतौर कंकड़/पत्थरों , के उपयोग की प्रतीकात्मकता से भी इंकार नहीं किया जा सकता !  बहरहाल एक लड़की , सारे मौसम , दिन रात एक ही काम कर रही है , अमर्यादित शक्ति को मर्यादा में रहने की सीख दे रही है , होने वाली क्षति के विरुद्ध उपाय कर रही है , इंसानी जीवन को साधने का यत्न कर रही है...और अविश्वस्त को मृत्यु का भय दिखा रही है  !

14 टिप्‍पणियां:

  1. अदम्य जीजिविषा और उत्कट ललक
    का महिमागान करती कथा ....

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  2. ऐसी लड़ाई जिसमें हार पहले से मालूम हो,पर लड़ना ज़रूरी हो,बहुत आसान नहीं होती.राजकुमारी ने निश्चित ही अपने दिमाग की न् सुनकर दिल की आवाज़ सुनी और प्रतीकात्मक-रूप से उस लड़ाई को चुना जिसे जीतना असंभव-सा दिखता है.

    ...पर ऐसी लड़ाइयाँ इसलिए भी लड़नी ज़रूरी हैं कि ये सबल ,समर्थ और सत्ता के खिलाफ होती हैं.कमज़ोर से लड़ने में कैसी बहादुरी..?

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    1. संतोष जी ,
      ये लड़ाई वस्तुतः राजकुमारी जीत चुकी है क्योंकि प्रतीकात्मक रूप से समुद्र में फेंके गये लकड़ी के टुकड़ों का एक ही अर्थ है कि अब डूबने वाले को बचाने वाला सहारा वहां मौजूद है !

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  3. @ समुद्र कहीं अधिक शक्तिशाली पक्ष था किन्तु उसने अमर्यादित व्यवहार किया , स्वयं से प्रेम करने वाली लड़की की जान ली !

    अमर्यादित शब्द की जगह क्रूर और असंवेदनशील होना चाहिए ! समुद्र पर आप अधिक मेहरबान लगते हैं !
    :)
    अमर को मृत्यु भय दिखा रही है ! अच्छा लगा ...

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    1. सतीश भाई ,
      क्या क्रूर और असंवेदनशील,ज़ालिम,हत्यारा,हिंसक वगैरह वगैरह शब्द अमर्यादा की सीमा से बाहर हैं :)

      अगर एक समुद्र की लाश पर सीना तानकर हिमालय खड़ा है तो किसी भी समुद्र को अमर क्यों मानना :)

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  4. बहुत ही सटीक व्याख्या...
    हालांकि हमेशा की तरह मन में यह ख्याल आ रहा है कि किसी कथाकार ने सिर पर काले सफ़ेद धब्बे , भूरी चोंच और लाल पंजे वाली एक चिड़िया को लगातार पहाड़ों से कंकड ,तिनके , लकड़ी के टुकड़े उठाकर समुद्र में डालते हुए देखा होगा और यह कहानी बुन डाली होगी...और सोचने वाली बात तो है ही..कि वो चिड़िया आखिर ऐसा क्यूँ करती है.

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    1. जी ज़रूर ! संभव है कि राजकुमारी की मृत्यु और चिड़िया की कवायद अलग अलग हों और कथाकार ने इन दोनों घटनाओं को सांकेतिक रूप से जोड़ दिया हो ! चिड़िया के व्यवहार पर पक्षी विज्ञानी ही बेहतर कह पायेंगे !

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  5. धोखेबाज समुद्र से अन्य जीवों की रक्षा करना ...बचे हुए या दुबारा मिले जीवन की सार्थकता चिड़िया ने ढूंढ ली ! बाकी भी जीवन की सार्थकता को समझ जाए , संभल जाएँ !
    खूब ढूंढ कर लाते है कहानिया जो इस ब्लॉग जगत पर भी सटीक लगती है !

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  6. बढ़िया !
    ब्लाग जगत पर भी :)

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  7. अब वह समुद्र में तिनकों / लकड़ी के टुकड़ों के रूप में जीवन रक्षक संकेत छोड़ रही है !

    ....लड़ाई जीतना या हारना मायने नहीं रखता। लड़ाई लड़ना और आने वाले के लिए कुछ अनुकूल वातावरण पैदा कर देना भी महत्वपूर्ण है। कहानी में चिड़िया हमे संदेश देती है कि बड़ी लड़ाई जीती जा सकती है। लड़ी जानी चाहिए।

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    1. सुन्दर प्रतिक्रिया देवेन्द्र जी !

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  8. आप के नजरिये से सहमती | पर एक और रूप भी हो सकता है |
    सागर का व्यवहार उस पुरुष जैसा था जो शक्तिशाली है और राजकुमारी रूपी स्त्री को सीमा में रहने की सिख दे रहा था की तुम्हारी एक सीमा है तुम तट पर नहा तो सकती हूं किन्तु मेरी अथाह गहराई में जा कर मेरे सिने पर तैरने की और मेरी शक्ति को चुनौती देने का अधिकार नहीं है तुमने अपनी सीमा को तोडा है उसका दंड भुगतो , और स्त्री मात्र अपनी इच्छा शक्ति के बल पर उसे एहसास दिला रही है उसका सागर से कमजोर होना उसके निर्बल या असहाय होने का प्रतिक नहीं है और ना ही इस बात का की वो सागर से मुकाबला नहीं कर सकती वो सागर के मुकाबले कमजोर हो कर भी अन्य जीवो की जान बचा शक्ति है | पता नहीं कितना सही है मेरा नजरिया |

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    1. बिल्कुल, सागर को शक्तिशाली पुरुष भी कहा जा सकता है जिसने स्वयं पर भरोसा करने वाली लड़की से छल किया! उससे विश्वासघात किया और ये भूल गया कि वह दृढ इच्छा की स्वामिनी है, परोपकार की जिजीविषा है उसमें! वो हारेगी नहीं !

      लोक आख्यानों के प्रतीकों को इसी तरह से समझा जाना चाहिये,आपकी व्याख्या पसंद आई! आख्यान लिखने का मकसद भी यही है कि मित्रगण प्रतीकों को नये अर्थ दें!

      शुक्रिया!

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