मंगलवार, 19 जून 2012

पूर्वजों की पवित्र धरोहर ...!

अफ्रीका के महा-जलताल विक्टोरिया के निकटवर्ती क्षेत्रों में बसे जनसमुदाय क्वाया , जल को पूर्वजों से प्राप्त पवित्र धरोहर मानते हैं  ! उनके आख्यान के अनुसार बहुत समय पहले , सारे महासागर एक छोटे से पात्र में बंद थे  !  एक क्वाया दंपत्ति ने इस पात्र को अपनी झोपड़ी की छत पर लटका रखा था  !  वे प्रतिदिन इस छोटे पात्र से अपने दैनिक उपयोग के लायक जल बड़े पात्रों में भर लिया करते थे ! उन्होंने अपनी पुत्रवधु को इस पात्र को छूने से मना करते हुए कहा था कि वो इसे ना छुये  , क्योंकि इसमें पूर्वजों के द्वारा दी गई पवित्र वस्तु बंद है  !  किन्तु पुत्रवधु ने एक दिन अति उत्सुकतावश उस पात्र / बर्तन को छू लिया , जिसके कारण से वह पात्र टूट कर बिखर गया और फिर जल उन्मुक्त होकर बह निकला , पूरी धरती पर बाढ़ आ गई  !

इस लोक आख्यान से यह संकेत स्पष्ट है कि जल एक पवित्र वस्तु है और उसका नियमित किन्तु आवश्यकता के अनुरूप उपयोग किया जाना ही अपेक्षित है , जल से अयाचित खिलवाड़ / अनाड़ियों जैसी छेड़छाड़ किये जाने की स्थिति में वह संकट का कारण भी बन सकता है , जैसा कि इस कथा में जलप्रलय के तौर पर हुआ ! नि:संदेह जल , मानव के अस्तित्व के अनिवार्य तत्व बतौर चीन्हे जाते ही अपने सुनियोजित उपयोग की अपरिहार्यता की शर्त के साथ ही धरती पर उपलब्ध है , वर्ना बीहड़ रेगिस्तानों तथा जलसंकट और सतत बाढ़ से जूझते भूक्षेत्रों की मानवीय बसाहटों को इसका महत्त्व खुद ब खुद सूझने लगता है ! जलातिरेक और जलशुष्कता , दोनों ही , मानव जीवन और उसकी बसाहटों वाली धरती में , जल की उपलब्धता की असामान्य / असहज दशायें हैं  !

यह आख्यान स्पष्ट करता है कि जब तक क्वाया दम्पत्ति नियमित रूप से पूर्वज प्रदत्त धरोहर का उपयोग करते रहे , जल उपलब्धता की दशायें सामान्य बनी रहीं ! वे समाज के अधिक अनुभवी / ज्ञानी व्यक्ति के रूप में समाज के अपेक्षाकृत कम अनुभवी व्यक्ति को पवित्र धरोहर से दूर रहने के निर्देश भी देते हैं , किन्तु वह अपनी उत्कंठा के चलते उस निर्देश की अवहेलना कर बैठती है , परिणाम , जैसा कि अपेक्षित ही रहा होगा ? जलातिरेक का संकट ! मानव जीवन के विरुद्ध एक असहज समय  !  हालांकि यह कहना कठिन है इस बाढ़ के बाद कौन कौन जीवित रहा ? और क्वाया दंपत्ति ने , जल पात्र को नहीं छूने की शर्त केवल पुत्रवधु पर ही क्यों आरोपित की थी ? पुत्र पर क्यों नहीं ? क्या यह प्रश्न इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि उस समाज में भी लैंगिक भेदभाव मौजूद था ? 

इसके अतिरिक्त अन्य कई प्रश्न भी हैं ! छोटे पात्र से बड़े पात्रों में प्रतिदिन जल निकासी का रहस्य क्वाया दंपत्ति तक ही क्यों सीमित था ? झोपड़ी में प्रतिदिन जल की निरंतर उपलब्धता पर अन्य परिजनों ने कोई प्रश्न क्यों नहीं किया / उठाया होगा ?  इन सारे प्रश्नों के सीधे सीधे उत्तर इस कथा में दिखाई नहीं देते , लेकिन प्रतीति यह  है कि परिवार / समुदाय के अनुभवीजन जल की पवित्रता / महत्ता से भलीभांति परिचित रहे होंगे , इसलिए उन्होंने जल के संतुलित उपयोग की कमान केवल अपने हाथों में सीमित रखी और उसे परिवार के कम अनुभवी सदस्यों  से  यथा संभव दूर रखने की चेष्टा की  !  लेकिन प्रश्न अब भी शेष , कि जल निकासी के ज्ञान से वंचित किया गया सदस्य , एक स्त्री ही क्यों है ?  संभव है कि क्वाया जन समुदाय के पुरुष प्रधान समाज होने में इसका उत्तर निहित हो  ! 

कथा को ज़रा सी / अतिरिक्त  कल्पनाशीलता के साथ से बांचें तो यह कथा एक अदभुत संकेत देती है ! इसके अनुसार सम्पूर्ण महासागरीय जल एक छोटे से पात्र में बंद था , जिससे प्रतिदिन बड़े पात्रों में उपयोग के लायक जल भर लिया जाता था ! एक छोटे से पात्र में मौजूद पवित्र वस्तु / जल से बड़े बड़े पात्रों में नियमित , किन्तु अबाध जलापूर्ति की व्यवस्था के कथन , का एकमात्र आशय यही हो सकता है कि जल उस छोटे से पात्र में एक पवित्र वस्तु था , यानि कि वह 'तरल जल' के बजाये किसी 'अन्य रूप' में उस पात्र में मौजूद था ! क्या आप इसे जल की , संकुचित / संघनित अवस्था / वायव्य / गैसीय रूप में , मौजूदगी के तौर पर भी स्वीकार कर सकते हैं ? क्या यह कहना गलत होगा कि 'वह' हाइड्रोजन और आक्सीजन के फ़ार्म में मौजूद था तथा उस छोटे से पात्र / या शायद उपकरण में होने वाली ,एक निश्चित प्रक्रिया के चलते प्रतिदिन जल के रूप में परिवर्तित हो जाया करता था ? ...खैर यह एक कल्पना / एक विचार मात्र है , मित्रगण , इसे 'जल के पिछले जन्म' वाला अतार्किक ख्याल कह कर ख़ारिज भी कर सकते हैं  ! 

संभवतः यह जल के कायांतरण / उत्पत्ति की प्रतीति कराने वाला कथन है , अन्यथा कोई कारण नहीं बनता कि एक छोटा सा पात्र , बड़े पात्रों में सतत जलापूर्ति कर सके , इस आशय की पुष्टि , कथा के इस कथन से भी होती है कि छोटे से पात्र में सम्पूर्ण महासागरीय जल मौजूद था !  जल की , संघनित अथवा अन्य रूप में मौजूदगी की , कहन एक स्थापित सत्य है  !  क्वाया दम्पत्ति इसे वैज्ञानिक सत्य के रूप में भले ही ना जानते रहे हों पर वे जल के कायान्तरण और उसके एकाधिक स्वरूपों से भिज्ञ अवश्य थे ! उन्हें इस बात का भान भी था कि कोई अनाड़ी / अनभिज्ञ / अनुभवहीन व्यक्ति , अनचाहे ही , जलप्लावन का कारण बन सकता है , अतः उन्होंने इसे पूर्वजों की पवित्र वस्तु के रूप में प्रचारित कर संरक्षित करने की कोशिश की , हालांकि चमत्कारी / पवित्र वस्तु के तौर पर प्रचारित करके पूर्वजों की धरोहर पात्र / उपकरण को संरक्षित रख पाने का उनका उपाय , चमत्कार को ही जानने की सहज मानवीय उत्कंठा के कारण से ध्वस्त हो गया...                                                                                                    
                              
                                                                                                                                   

[  प्रविष्टि का पांचवां पैरा लिखते वक़्त जेहन में ये ख्याल कौंधा था कि , कहीं क्वाया पूर्वज किसी दूसरे ग्रह के , विज्ञान समुन्नत , वासी तो नहीं थे ? जिन्होंने एक्सपेरीमेंट के लिए मनुष्यों को , धरती पर छोड़ते वक़्त पानी बनाने का कोई उपकरण , दिया हो और एक अनुभवहीन की छेड़छाड़  के चलते उपकरण से इतना पानी बना कि महासागर भर गये  :)  ]

16 टिप्‍पणियां:

  1. ...आश्चर्य है कि एक छोटी सी हिदायत न मानने पर जल-प्रलय जैसी स्थिति आ गई !

    ...फिलहाल यही सन्देश पाता हूँ कि बड़े जिस बात को मना करें उस पर अमल करना चाहिए.जब हम अनुभव के आगे अपने तर्क देने लगते हैं तो इसी तरह की त्रासद परिस्थितियाँ आ सकती हैं !

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    1. संतोष जी ,
      हिदायत तो हिदायत है चाहे छोटी हो या बड़ी :)

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  2. क्वाया दंपत्ति ने , जल पात्र को नहीं छूने की शर्त केवल पुत्रवधु पर ही क्यों आरोपित की थी ?

    ..इससे यह अनुमान लगाना कि उस समाज में लिंग भेद था थोड़ी जल्दबाजी होगी। जैसा कि आपने लिखा है..परिवार / समुदाय के अनुभवीजन जल की पवित्रता / महत्ता से भलीभांति परिचित रहे होंगे..यही मूल कारण है। पुत्र वधु उस परिवार की नहीं थी। अतः उसे अभी जल की महत्ता के बारे में बहुत कुछ सीखना शेष था। लिंग भेद होता तो कथा में दंपत्ति शब्द का प्रयोग नहीं होता। मुखिया शब्द का प्रयोग होता। दंपत्ति में पुरूष-महिला दोनो आते हैं। इसलिए यह अनुमान लगाना अधिक उचित है कि उस समाज में लिंग भेद नहीं था।

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    1. देवेन्द्र जी ,
      हो सकता है आपका कहना / आपका तर्क सही हो कि पुत्रवधु दूसरे परिवार से आई थी तो उसपर अविश्वास के कारण ऐसा किया गया हो ! संभव है कि वहां पर लिंगभेद की मौजूदगी का जो अनुमान हम लगा रहे हैं सिरे से ही गलत हो , जल्दबाजी हो !

      हमारा लिंग भेद विषयक अनुमान केवल दो बातों पर आधारित था कि दंपत्ति ने पुत्र को सावधान नहीं किया और दूसरा हमारी व्यक्तिगत जानकारी कि क्वाया समाज पुरुष प्रधान समाज है ! चूंकि पुरुष प्रधानता की बात कथा में स्पष्टतः उल्लिखित नहीं थी तो हमने भी नहीं लिखी ! हालांकि , व्याख्या करते समय यह बात कहने का अवसर था पर पता नहीं , लिखते वक़्त कैसे फिसल गई :)

      खैर...अब आपका ख्याल ही सही हो ,तो यही बेहतर होगा :)

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  3. इस कथा से यह अनुमान लगाना श्रेयस्कर है कि जल से अयाचित खिलवाड़ / अनाड़ियों जैसी छेड़छाड़ किये जाने की स्थिति में वह संकट का कारण भी बन सकता है। भारत के संदर्भ में या विश्व में और भी जगह दिख रहे जल संकट के संदर्भ में यह अनुमान सटीक बैठता है। आज गंगा और दूसरी नदियों पर आया जल संकट भी इसी खिलावड़ का
    परिणाम है। गंगा आंदोलन तो सिर्फ एक शुरूआत है। जल को लेकर विश्वयुद्ध की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।

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    1. ओह , बहुत बहुत धन्यवाद ! जल के महत्त्व को हम जितना जल्दी समझ जायें , उचित होगा !

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  4. यह व्याख्या भी अद्भुत है...

    यह जल के कायांतरण / उत्पत्ति की प्रतीति कराने वाला कथन है। जल की संघनित अथवा अन्य रूपों में मौजूदगी एक स्थापित सत्य है।

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  5. पहले उत्तरजीविता को लेकर भय और आशंकाओं का इतना वितान था कि कितने ही निषेध थे -यह फल मत खाओ ,इस दिशा में मत जाओ ,इतने सवाल मत पूछो और इसी क्रम में यह मटकी भी ...ताकि जीवन निर्बाध निर्विघ्न चलता रहे मगर मुसीबतें तो आनी थीं ....जो निषेध था वही किया गया ...
    फिर इन कहानियों का मिथकीय तत्व -एक ऐसा ही अक्षय पात्र द्रोपदी के पास था ....जहां जब तक द्रोपदी खुद खाना नहीं खाती थीं किसी के लिए भी ,बरात तक के लिए खाना उपलब्ध था मगर खुद रसोयियें के खाने के बाद कुछ शेष न बचता था ..मगर एक बार ऐसी महादशा आ ही गयी .....मगर कृष्ण ने एक साग के तुकडे को खाकर फिर पात्र को अक्षय बना दिया .यह कथा यहाँ इसलिए कि भारतीय सोच हमेशा आशावादी रही है अन्य महाद्वीपों की तुलना में -अब जैसे यह यह अफ्रीकी कथा का पात्र ही ...कोई जल प्रलय नहीं रोक पाया ......

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    1. निषेध और वरीयतायें , अनुपालन और विद्रोह , जिंदगी , सदियों से यूंहीं गुज़रती आई है , अरविन्द जी !

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  6. जल की पवित्रता असंदिग्ध है, मगर अब हमें इसका ध्यान नहीं रहा है, यह निश्चित है ! पूर्वजों की कही बातों पर विज्ञान की समझ हावी हो गयी है , हमें इसका फल भुगतना पड़ेगा !
    सादर

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    1. बेशक , हद दर्जे की बेफिक्रियां हैं हममें , आने वाले कल को लेकर !

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  7. मेरा ध्यान तो वहीँ अटक गया...कि पुत्रवधू को वह पात्र छूने से मना किया गया...और फिर उसके छूने से वो पात्र टूट गया.
    यानि कि यह भेदभाव...सदियों से हर समाज में व्याप्त है.
    और पुत्र को इसलिए मना नहीं किया गया होगा...कि उसे तो सबकुछ हाथों में मिलता होगा,उसे कोई उद्दम करने की क्या जरूरत ( गृह-कार्य में )...अब यह भी सदियों से चलता आ रहा है..:)

    अब देखिए जिसे कहानी में जो दिख जाए...)

    आपने बाकी विश्लेषण से सहमति

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    1. देवेन्द्र पाण्डेय जी इससे बात से असहमत हुए हैं जो आपने कही और मैंने भी कही थी :)

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