सोमवार, 18 जून 2012

स्मृतियां जिन्हें खुरच कर फेंक नहीं सकते...!

कल शाम अपने पड़ोसी मित्र घूम घाम कर वापस लौटे तो उन्होंने मुझसे कहा , जगदीश दास  मिला था और वो आपको याद कर रहा था ! मैंने कहा हां , उसे मुझे याद करना ही चाहिये , बल्कि मैं खुद , इतने वर्षों बाद भी , उसे अपनी स्मृतियों से खुरच कर फेंक नहीं सका हूं  !   मित्र मुस्करा दिये , किस्सा उन्हें पता था !  बात 1982-83 के सत्र की है , जबकि जगदीश , बी.ए. अंतिम वर्ष में मेरा प्रिय छात्र हुआ करता था  !  प्रिय कहने का मतलब ये नहीं कि वो कक्षा  में सबसे ज्यादा गंभीर और मेधावी बंदा था बल्कि इसलिए कि वह अपनी बदमाशियों को क़ुबूल करने और उनकी एवज में माफी मांगने में हमेशा अव्वल रहा करता था ! उसकी साफ़गोई मुझे पसंद थी और यह जानकर भी कि वह आगे कोई गलती ना करने का अपना वादा , कभी भी पूरा नहीं कर पायेगा और फिर से सामने आ खड़ा होगा माफी की नई पेशकश और नये बहाने के साथ !

मार्च महीने का पहला हफ्ता रहा होगा जबकि , वह मेरे पास आया और उसने कहा सर , आपको पता है कि मेरी तैयारी बहुत अच्छी नहीं है , अगले हफ्ते से वार्षिक परीक्षायें हैं  !  बाद में गांव जाकर खेती ही करना है , तो फिर मेरिट का क्या करूंगा ?सोचता हूं , किसी , तरह से उत्तीर्ण भर हो जाऊं ! मैं अनुत्तीर्ण हुआ तो घर के लोग भी दुखी होंगे और आपको भी अच्छा नहीं लगेगा ! आप मुझे कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न बता दें , तो मैं उनकी तैयारी कर लूं  ! पूरा पाठ्यक्रम पढ़ पाना मेरे वश में नहीं है !  मैं जानता था कि वह दीगर सब्जेक्ट्स के प्रोफेसर्स के साथ भी यही नौटंकी करके आया होगा !  मैंने पूछा , बाकी विषयों का क्या होगा ?  उन सबसे , महत्वपूर्ण प्रश्न पहले ही ले आया हूं सर , उसने कहा !  बस आप बचे हैं , सो कृपा करें  !  मैंने सोचा चलो जाने दो , यह अंतिम साल  है , उत्तीर्ण  हो जाये यही बेहतर होगा !  पाठ्यक्रम  देखकर हर इकाई से दो प्रश्नों की दर से कुल दस प्रश्न  लिखा दिये उसे  !  मैंने कहा , अब ठीक है ?  घर जाओ , तैयारी करो , पर वह , वहां से हिला भी नहीं  !  मैंने पूछा अब क्या है ? इतने सारे प्रश्नों का क्या करूंगा सर , ये तो पूरा पाठ्यक्रम ही हो जायेगा !  बस दो तीन प्रश्न बन जायें तो मैं उत्तीर्ण हो जाऊंगा , ज्यादा अंक लेकर क्या करूंगा ?

आप इसमें से कोई पांच छै प्रश्न ही बता दीजिए , दो तीन प्रश्न भी फंस गये , तो मेरा काम हो जायेगा ! उसका तर्क  सुनकर मैंने अपना सिर पीट लिया ...वो टलने को तैयार ही नहीं था ! मैंने पहले वाले दस प्रश्नों में से पांच नये सिरे से चिन्हांकित  कर दिये , मेरा ख्याल था कि इसमें से ,परीक्षा में उसे दो तीन प्रश्न तो मिल ही सकते हैं ! वो खुश होकर चला गया !  उसकी परीक्षायें शुरू हुईं  !  उसकी परीक्षायें दिन में 11 से 2 बजे तक हुआ करती थीं  !  एक दिन वह ठीक 2.15 बजे , रोनी सूरत लिये  हुए मेरे घर पर हाज़िर था ! मैंने पूछा क्या हुआ ? उसने कहा , आज पर्चा बिगड़ गया , सर ! कहां है प्रश्नपत्र , दिखाओ मुझे ? उसने प्रश्नपत्र दिया , जिसमें संयोगवश वो सारे प्रश्न मौजूद थे , जोकि मैंने उसे चिन्हांकित करके दिये थे ! मैंने कहा ये तो वही प्रश्न हैं फिर ? उसने कहा , इसीलिये तो सर , मैंने जैसे ही प्रश्नपत्र देखा , पांचों प्रश्न वही थे , लेकिन  खुशी के मारे मैं सबके उत्तर भूल गया ! उत्तरपुस्तिका में क्या लिख कर आया हूं , कुछ पता नहीं ? उसका उत्तर  सुन कर , मैं कर भी क्या सकता था , बस इतना ही कहा , अगर तुमने उन प्रश्नों के उत्तर अच्छी तरह से याद किये होंगे , तो सब ठीक हो जायेगा , अब घर जाओ और अगली परीक्षा की तैयारी करो , वो चला गया !

परीक्षायें खत्म हुईं  ! जब रिजल्ट निकला तो वो न्यूनतम अंक रेखा पे उत्तीर्ण होने वालों में से एक था  !  मुझे खुशी हुई कि चलो, अब वह गांव चला जायेगा...पर जल्द ही मेरी खुशी काफूर भी हो गई , जब उसने कहा , सर , मम्मी पापा बोले हैं , अब एम.ए. भी कर लो  !  मैं आपके विषय में ही प्रवेश लूंगा !  मैंने कहा कि तुम्हारे अंक  बहुत कम आये हैं , तुम्हारा प्रवेश हो ही नहीं सकता ! उसने कहा , अब मैं सीरियस होकर पढ़ना चाहता हूं तो आप मुझे मौक़ा क्यों नहीं देना चाहते हैं ? आगे आप जैसा कहेंगे, वैसा ही करूंगा , बस किसी तरह से मेरी नैया पार लगवा दीजिये ! मुझे लगा इसे सुधरने का एक मौक़ा और दिया जा सकता है ! 1983-84 की साल भर वो काफी गंभीर दिखाई दिया ! मुझे उस पर एतबार होने लगा था ! इस साल रिसर्च मैथडोलाजी के प्रश्नपत्र में उसकी मौखिक परीक्षा होने वाली थी ! अभिलेख भी उसने ठीक ठाक ही तैयार किये थे ! मौखिक परीक्षा की  तारीख निर्धारित हुई और एन उसी सुबह , वह अपना सिर घुटाये  हुये , एक बार फिर से मेरे घर में मौजूद था  ! मैंने पूछा , अब क्या हुआ ?  मेरी दादी मर गई है , सर , गांव जाना पड़ेगा ! मेरी मौखिक परीक्षा जल्दी निपटवा दीजिये !

मैंने कहा ठीक है , सबसे पहले तुम ही मौखिक परीक्षा दे देना , बाह्य परीक्षक के सामने उसका 'गेटअप' सियापे वाला था ! आंखों में गीलापन ! आवाज़ में सोग के लक्षण ! मैंने पहल करते हुए कहा , एक काम करो सिर्फ ये बता दो , कि इस साल तुम्हारे पांचों प्रश्नपत्रों के नाम क्या है ?  उसे शायद इतने सरल प्रश्न की उम्मीद नहीं रही होगी , वह मिनटों तक खामोश बैठा रहा , जब तक कि बाह्य परीक्षक ने उसे बाहर जाने के लिये  नहीं कह दिया , फिर वो गांव चला गया और उसके बाद हम कभी नहीं मिले !मुझे पता है कि उस दिन भी वह इतना सरल प्रश्न सुनकर 'ब्लैंक' हो गया था !

24 टिप्‍पणियां:

  1. पहली नज़र में ही लगता है कि चेला गुरूजी से भी आगे था :-) उसने बिलकुल व्यावहारिक शिक्षा का 'उपयोग' किया.

    ...आजकल ऐसे ही मुन्नाभाई सफल हैं !

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    1. संतोष जी ,
      चेले गुरु जी से आगे हो जायें ये तो गुरु जी के लिए सौभाग्य की बात है :)

      ...शायद आपने गौर नहीं किया कि उसने पढ़ाई छोड़ दी और कम से कम दो मौकों पर जबकि उसे सवाल बेहद आसान या जाने पहचाने हुए मिले तो वो 'ब्लेंक' हो गया !

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    2. ...यहाँ मेरा आशय ऐसी जुगत से क्षणिक सफलता पाना था.केवल कक्षा आगे करना जिसका उद्देश्य हो उसका ज्ञान या समझ से क्या नाता..?

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    3. हां ! ज्ञान प्राप्त करने से कोई लेना देना नहीं था !

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  2. कृपाकांक्षी का यही हस्र होना था।

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    1. देवेन्द्र जी ,
      कहीं आपका आशय ये तो नहीं कि मैं जिस पर मेहरबान होऊं उसका हश्र ... ? :)

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    2. मेरा 'हश्र' तो पढ़ते ही गड़बड़ हो गया था। आपकी कृपा से सुधर गया।:) ऐसी ही कृपा हो तो ठीक। जगदीश दास पर जो कृपा की वो गलत। उसका हश्र तो ऐसा ही होना था।

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    3. देवेन्द्र जी ,
      पक्षपात नहीं किया ! सब बच्चों के लिए एक सा व्यवहार रहता है ! उसे सुधरने का मौक़ा दिया जिसमें वो फेल हो गया !

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  3. कभी कभी छोटी सी एक असफलता कई बड़ी सफलताओं के द्वार खोल देती है।
    शायद उसके लिए ऐसा ही हुआ हो।

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    1. मनोज जी ,
      उसने बड़ी सफलता के लिए कोई यत्न नहीं किये ! फिलहाल एक भरे पूरे परिवार का मुखिया और एक किसान होकर ही जीवन यापन कर रहा है !

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    2. शायद उसके शब्दकोष मे सफलता की परिभाषा ही "एक भरे पूरे परिवार का मुखिया और एक किसान होना" ही हो! वह इसी मे संतुष्ट हो! बड़ी सफलताएँ संतोष की गारंटी तो नही होती!

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    3. ज़रूर हो सकता है ! उसने मुझसे कई बार कहा कि उसे खेती ही करनी है !

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    1. मेरे अलावा उसे पसंद करने वाले अब आप भी हुए :)

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    2. idhar hum bhi hain g d ko pasand karne wale......kahe se ki 10th me hamne bhi garint ke sare prashn hi utar aaye the uttarpustika me...aur gajjab ye
      hua ke 08 no. bhi mile uske????

      pranam.

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    3. सञ्जय जी ,
      प्रश्न उतारने की मेहनत पे आपको आठ नम्बर भी मिल गये ,ये तो सच में गज़ब हुआ :)

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  5. आपकी जमात के सामने ऐसे वाकये आते ही होंगे.

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  6. हाथों की लकीरें किसको, कहाँ, कैसे ले जाए ..कर्म के साथ भाग्य का मिलान भी ज़रूरी है , प्रोफ़ेसर साहब माने या ना माने:)

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    1. अब आपने भाग्य कह ही दिया तो मैं क्या कहूं :)

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    1. यही तो मैंने कहा कि स्मृतियां जिन्हें खुरच कर फेंक नहीं सकते :)

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  8. मुझे पता है कि उस दिन भी वह इतना सरल प्रश्न सुनकर 'ब्लैंक' हो गया था ! --
    जी नहीं , शायद यह प्रश्न सुनकर आपसे नाराज़ हो गया था -- आपने उसका स्टेंडर्ड इतना जो गिरा दिया . :)
    वैसे कहीं नेता तो नहीं बन गया !

    हमारे गाँव के स्कूल में कई छात्र ऐसे होते थे जिन्हें रोज होमवर्क न करने पर डंडे खाने पड़ते थे . उनका एक ही ज़वाब होता था -- मास्टर जी क्या करें , घरवालों ने जाते ही खेत में भेज दिया . फिर होमवर्क कब करते . आखिर में वो सब किसान बन कर ही रह गए .

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    1. डाक्टर साहब,
      स्टेंडर्ड गिराने वाली गलती तो मुझसे हो ही गई :)

      नेता तो नहीं बना वो बस किसान बन कर रह गया है :)

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