बुधवार, 20 जून 2012

अभिशप्त स्त्री ...!

एक आदिवासी युवा आखेटक योद्धा अपनी पत्नी और मां के साथ सागर तट की ओर आकर रहने लगा ! उन दिनों गर्मियां बेहद सख्त थीं और मछलियों ने किनारों पर आना छोड़ दिया था ! वन्य पशु भी सुदूर पर्वतीय क्षेत्रों में चले गये थे ! आखेटक मीलों दूर तक भटकता , पानी में जाल लगाता और जंगलों में फंदे लेकिन शिकार हाथ नहीं आता ! खाने के लिए घास के कंद और बेरियों के सिवा कुछ नहीं मिलता पर वे भी पर्याप्त नहीं थे ! परिवार के लिए भीषण दुर्भिक्ष के दिन थे ! वृद्ध मां जिसे कम दिखाई देता था , वह भोजन की अल्पता के चलते दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी जबकि युवा पत्नी उपलब्ध रसद में से प्रतिदिन पर्याप्त खा लेने के कारण स्वस्थ बनी रही ! आखेटक यह देख देख कर कुढ़ता , उसे लग रहा था कि वह भी अपनी शक्ति खोता जा रहा है ! 

एक सुबह वृद्ध मां ने अपने पुत्र को एक दु:खद किस्सा सुनाया कि उसने एक स्वप्न*देखा है कि हवा में मछली भूने जाने की गंध फ़ैली हुई है और जब उसने गन्ध की दिशा में देखा तो पुत्रवधु ताजी भुनी हुई मछली खा रही है ! वृद्ध मां ने अपने लिए एक निवाला मांगा तो पुत्रवधु ने कहा , यह सच नहीं है , भुनी हुई मछली की गंध तुम्हें स्वप्न में आई होगी ! स्वार्थी युवती ने भूखी वृद्धा की गुहार नहीं सुनी और स्वयं पूरी मछली खाने के बाद उसके गर्म कांटे , वृद्ध मां के हाथ में रख दिये , जिससे उसके हाथों की त्वचा जल गई ! यह सुनकर आखेटक पुत्र को बहुत गुस्सा आया पर उसने अपनी मां को सावधान किया कि वह अभी शांत बनी रहे ताकि वह अपनी पत्नी की गतिविधियों पे नज़र रख सके ! आखेटक ने घटनाक्रम से अनजान बने रहने का अभिनय किया और दिन यूंहीं गुज़र गया !

रात में उसकी पत्नी चुपचाप उठकर समुद्र तट की ओर बढ़ी तो उसने उसका पीछा किया , उसने सुना कि पत्नी ने ज़ोर से कोई मंत्र कहा, जिसके कारण दो मछलियां उसकी टोकरी में आ गईं और वह उन्हें लेकर घर की ओर वापस चल दी , आखेटक ने पत्नी द्वारा कहे गये मंत्र को सुनकर याद कर लिया था और वह पत्नी से भी पहले घर वापस आकर सोने का अभिनय करने लगा ! पत्नी को संदेह भी नहीं हुआ और उसने चुपके से आकर मछलियां भूनी और उन्हें खाकर कांटे जमीन में दबा दिये ! सुबह आखेटक शिकार को चला गया जहां उसे एक मोटी सील मछली मिली जिसके कारण शाम को पूरे परिवार की दावत जैसी हो गई ! देर रात जब पत्नी गहरी नींद में सो रही थी तो युवा समुद्र के किनारे की ओर गया और उसने वही मंत्र दोहराया जो उसकी पत्नी कहती थी , उसे एक बड़ी मछली मिली जिसे लेकर वह घर आया और सुबह सुबह उसने आग में मछली भूनी जिसे उसकी मां ने बड़े शौक से खाया , वह हर निवाले पर खुश होती / हंसती जैसे कि उसे , उसकी पुत्रवधु पर विजय मिल गई हो ! युवा स्त्री जागते ही समझ गई कि उसके शर्मनाक स्वार्थी व्यवहार को उसका पति जान गया है !

पति के क्रोध से बचने के लिए वह पहाड़ों की तरफ भागी , तेज बहुत तेज , पंजों के बल पर ! उसे लगता कि उसका पति उसका पीछा कर रहा है ! उसके कानों में पति के पदचाप गूंजते और वह भागती रही ! उसे महसूस हुआ कि उसका शरीर छोटा होता जा रहा है ! पहाड़ पर एक बड़े शिलाखंड तक पहुंचते ही उसके पूरे जिस्म पर पक्षियों जैसे रोम उभरने लगे , उसके हाथ पंखों में बदल चुके थे ! वह भयभीत हो गई , उसे पता चल गया कि उसने मन्त्रों का स्वार्थपूर्ण इस्तेमाल किया है , जबकि उसका परिवार भूखों मर रहा था और अब उसे अपने किये की सजा मिल रही है ! उसका पति उसका पीछा करते हुए जब तक उस शिलाखंड में पहुंचा , पत्नी पूरी तरह से निशाचर परिंदे , उल्लू में तब्दील हो चुकी थी ! वह दुःख से चीखना चाहती थी , पर उसके कंठ से केवल घू घू की ध्वनि निकली ! वह शोकाकुल होकर उड़ चली , उसका पति देखता रहा , मानवता को निज स्वार्थ के कारण दण्डित होते हुए ! उसने सोचा कि वह उसे घर ले जाकर प्रेम से पुनः मानव बना लेगा , किन्तु वह स्त्री स्वार्थ की दुष्ट शक्तियों के अधीन उसकी पहुंच से दूर जा चुकी थी ...अलास्का के जंगलों में आज भी उल्लू की दर्दनाक और घृणास्पद चीखें सुनाई देती हैं , आज भी सब याद करते हैं , उस स्त्री के स्वार्थी व्यवहार और उसे मिले दंड को !

सामान्यत: वर्ष पर्यंत हिमाच्छादित भू-अंश अलास्का के इस आख्यान की कहन ग्रीष्म ऋतु काल की है ! बर्फ के पिघलने वाले दिनों में मत्स्य तथा अन्य प्रकार के शिकार की अनुपलब्धता / अल्पता से आखेटक परिवार को भूखे मरने की नौबत है ! आखेटक परिवार किसी अन्य स्थान से आकर नये स्थान में बसता है , तो यह अनुमान स्वभाविक रूप से लगाया जा सकता है कि पिछली बसाहट वाले स्थान में जीवन के लिए पर्याप्त / समुचित संसाधनों का अभाव उसके विस्थापन का प्रमुख कारण रहा होगा ! चूंकि हिमाच्छादित भूखंडों में कृषि कर्म की संभावनायें अपेक्षाकृत न्यूनतम हो जाया करती हैं , इसलिये यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि वह युवा पारिवारिक विस्थापन से पूर्व भी एक कृषक होने के बजाये एक आखेटक ही रहा होगा , जिसे वन्य जीवों और मत्स्य संपदा से अपने परिवार का भरण पोषण करना था ! निष्कर्ष यह कि यह परिवार परिस्थितिवश ही सही मांसाहारी परिवार था और उसे सदैव उसी दिशा में आप्रवास करते रहना था जहां उसके लिए नियत आहार की उपलब्धता की संभावना हो ! हालांकि उसकी नई बसाहट में भी उसे भोजन सामग्री की न्यूनता का शिकार होना पड़ा !

इस परिवार में केवल तीन सदस्य थे , जिनमें से आयु श्रेणी के हिसाब दो युवा और एक वृद्ध तथा लैंगिक विभाजन के हिसाब से एक पुरुष और दो स्त्रियां मौजूद थीं ! दोनों स्त्रियां परस्पर रक्त संबंधी नहीं थी बल्कि उनके सम्बंध वैवाहिकता पर आधारित थे ! वृद्धा की तुलना में आखेटक युवा , युवती का प्राथमिक विवाह स्वजन था जबकि वृद्धा युवती की दूसरे क्रम की विवाह स्वजन थी ! यह सहज ही है कि युवती अपनी दूसरे क्रम की विवाह स्वजन से उतनी आत्मीयता ना रखती हो जोकि वो अपनी स्वयं की मां ( रक्त संबंधी ) के प्रति रखती हो !  कथा से प्राप्त विवरण कहता है कि भीषण दुर्भिक्ष के दिनों में युवती स्वयं की आहार पर्याप्तता का ध्यान तो रखती थी किन्तु वृद्ध सास के प्रति उसमें सदाशयता का अभाव था ! आखेटक दिन भर श्रम करता / भटकता और जो भी रसद अर्जित करता , वो तीन प्राणियों की क्षुधापूर्ति के लिए पर्याप्त नहीं हुआ करती थी ! यहां तक कि घास के कंद खाकर भी उनका गुज़ारा नहीं हो पा रहा था !

यह तो निश्चित है कि आखेटक दिन भर की हाड़ तोड़ मेहनत के बाद रात में बेसुध होकर सोया करता होगा और उसके मध्य रात्रि में जाग उठने की कोई संभावना नहीं थी ! युवा पत्नी को दैवीय कृपा प्राप्त थी जिसके चलते वह मन्त्रों के आह्वान मात्र से ही मत्स्य भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित कर सकती थी , किन्तु युवती इस दैवीय आशीष का प्रयोग अपने परिवार के सम्यक कल्याण में करने के बजाये अपने निज स्वार्थ की पूर्ति के लिए करती है ! वह अपने पति को भी अपनी इस उपयोगी मंत्र सिद्धि से अनभिज्ञ बनाए रखती है ! स्पष्ट तथ्य यह है कि वह अपने प्राथमिक और दूसरे क्रम के दोनों ही स्वजनों के प्रति सदाशयी नहीं है और मन्त्रों की सर्वकल्याणकारिता की भावना के विरुद्ध केवल अपने ही हित साधन के प्रति सचेष्ट है ! इतना ही नहीं वह अपनी वृद्ध सास , जोकि भूखे रहने के कारण गहरी नींद में सो भी नहीं पा रही है , को मछलियों के भूने जाने की गंध को स्वप्न की अनुभूति मान लेने का सुझाव भी देती है और गर्म कांटों से उसकी हथेलियां भी झुलसा देती है ! इसे वृद्ध स्त्री के प्रति युवती की क्रूरता ही माना जा सकता है ! 

युवा आखेटक अपनी मां से अपनी पत्नी की शिकायत सुनकर दुखी तो होता है पर वह घटना क्रम की पुष्टि स्वयं करना चाहता है ! संकेत यह कि युवक उन लोगों में से नहीं है जो कान के कच्चे होते हैं तथा सुनी सुनाई बातों पर विश्वास कर लेते हैं ! उसे , इस अर्थ में एक संयत संतुलित मस्तिष्क वाला इंसान माना जाना चाहिये ! युवा आखेटक के बेहतर इंसान होने की पुष्टि कथा के अंत के उस विवरण से भी होती है , जहां वह अपनी पत्नी को उल्लू के रूप में अभिशप्त होने के बावजूद घर वापस लाना चाहता है , उसे प्रेम से पुनः मानव रूप में परिवर्तित कर पाने की कामना करता है , जबकि उसे भली भांति पता था कि उसकी पत्नी ने दण्डित किये जाने योग्य कार्य किया है ! यह आख्यान सामान्यतः सास और पुत्रवधु के असहज संबंधों की ओर संकेत करता है और यह भी स्पष्ट करता है कि आशीषित होने के नाते पुत्रवधु की जिम्मेदारियां कहीं ज्यादा बड़ीं थीं , उसे दैवीय कृपा का उपयोग सार्वजनिक पारिवारिक कल्याण के लिए करना था किन्तु वह निज स्वार्थ में लिप्त बनी रही ! वह प्रेम की अपेक्षा घृणा-पगी युवती थी , इसलिये जिन शक्तियों ने उसे आशीष दिया था , उन्हीं ने आशीष के दुरूपयोग का दंड भी दिया ! कथा बोध यह कि मानव अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतता है , जैसे कि जंगलों से आज भी , उल्लू के रूप में परिवर्तित हो गई युवती का दर्दनाक स्वर मुखरित होता है !


*वृद्ध सास को यह पुत्रवधु का सुझाव था कि उसने स्वप्न देखा है जबकि वृद्धा ने स्वप्न नहीं बल्कि सत्य देखा था अतः वह पुत्रवधु द्वारा दिये गये सुझाव को अपने पुत्र से शिकायत के रूप में कह रही है !

28 टिप्‍पणियां:

  1. इस लोक कहानी में अन्तस्थ भाव क्या है ?
    कर्मफल जैसा शिल्पा जी ने कहा या फिर तत्कालीन विषम पर्यावरणीय परिस्थितियों की इन्गिति जिसमें
    दाने दाने को लेकर संघर्ष ,झूठ फरेब की मानसिकता है ?

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    1. अरविन्द जी ,
      वो स्वजनता की अपेक्षाओं / प्राथमिकताओं से फिसलन और विचलन की दोषी है और यही विचलन उसे मानवीय वैशिष्ट्य से पृथक कर देता है , यह कथा का अन्तस्थ भाव है ! स्वजनों को कठिन हालात में भी स्वजन बने रहना चाहिये :)

      ( कर्म और कर्मफल कथा का प्रत्यक्ष और स्थापित सत्य है )

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  2. ...इस कथा में बहू के अपने परिवारीजनों से छल करने या उनसे झूठ बोलने की जो बात उभरती है,उसमें भी कहीं मुझे आशंका है.
    यदि जादुई शक्ति के द्वारा ही मछलियाँ मिलती थीं,सो उसमें उस स्त्री को क्या दिक्कत थी? हाँ,केवल यह हो सकता है कि जादू सीमित मात्रा में ही मछलियाँ निकाल पा रहा हो,इसलिए उसने ऐसा किया हो पर बाद में उसके कृत्यों का फल भी मिला.ऐसे में सही कारण स्थापित नहिं हो पा रहा है.

    ...युवा शिकारी का रोल ज़रूर ठीक रहा,जिसने बहू को परखने के लिए न्यायसंगत सहारा लिया !

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    1. कथा में युवती को दो मछलियां मिलने का उल्लेख तो है ही ! आधी अधूरी होने पर भी बांट कर जीना संबंधों की प्रगाढ़ता का प्रतीक है ! उसे संबंधों के प्रेम तत्व और निज स्वार्थ में से किसी एक को चुनना था उसने स्वार्थ को चुना इसमें क्या संदेह है ?

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  3. प्राचीन कथा आधुनिक सन्दर्भों में भी कितनी खरी उतरती है , यह कथा इसी का प्रमाण है .
    रोचक आख्यान !

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  4. ekdam sahi ....Darasal mere bhi ek dost hai jinke ghar me do bhai bahar rahte hai,
    do ghar pe maa or bahar rahne wale bhai ke do bachho ke saath..ek vivahit bhai apne family or 3 bachho ke saath or ek awiwahit.waha bhi kuch aisa hi hai ...apne or apne bachho ke liye alag khana-pina or baki ke liye alag agar man me aaya to bana nahi to buddhi maa ke jimme hai jo kuch dino pahle ek gambhir surgery se gujri hai ..
    Bachhe apne pita ko jab ye sachhai batate hai to wo vishwas hi nahi karte ki aisa ho sakta hai... kyoko jab wo ghar kuch dino ke liye jate hai to sab kuch sahi chalta sa pratit hota hai..Is karan bachho ke man me ek alag si bhawna ne janam le liya hai wo aisa bhed dekhkar apne ko pariwar se kata mahsoos karte hai .. Bechari vridh maa ghar me jhagde ke dar se kuch kahti nahi or sahti jati hai ..
    mera yahi kahna hai ye aajkal sachhai hai .Darasal bina sanskar paye log hi aisa kar sakte hai.so koshish karni chhahiye ki apne bachho ko achhe sanskar de jis se bado ko ijjat or choto ko pyar de sakne ki bhawna unke man me aa sake or sare paiwar ko apna samajh sake..

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    1. ओह , दुःख हुआ ये जानकर , बच्चों पर निश्चित रूप से इसका दुष्प्रभाव पड़ेगा ! ऐसा किसी के साथ भी नहीं होना चाहिये !

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  5. सास-बहु के रिश्ते की अच्छी व्याख्या की आपने :) "सैलानी की कलम से" ब्लॉग पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतिक्षा है।

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    1. आपके ब्लाग तक ज़रूर पहुंचेंगे !

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  6. रात में उल्लू के जागने और उसकी आवाज़ जो चीख सी प्रतीत होती होगी ने किसी कथालेखक के मन में जिज्ञासा जगाई होगी...'यह रातों को क्यूँ जागकर चीखता है'..और उसने इस कथा का ताना-बाना बुन डाला होगा.
    अब या तो ऐसी कोई स्वार्थी स्त्री..उसकी पड़ोस में होगी..या फिर उसके घर में...जिसे उसने इस कहानी की नायिका/खलनायिका बना डाला.

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    1. बोध कथायें किन हालात में कही / लिखी गईं ? कहने से ज्यादा आसान यह कहना है कि क्यों ? कही गईं :)

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  7. मुझे तो इस कथा में और कुछ नहीं सदियों से चला आ रहा पुत्रवधुओं के शोषण का भयावह छुपा हथकंडा नज़र आता है। इस कथा को सुनासुना कर नई नवेली पुत्रबधुओं को सदियों तक आतंकित किया जाता रहा होगा कि यदि दुमने अपनी सास का खयाल नहीं रखा तो तुम्हारा हश्र भी इस कथा में वर्णित बहू की तरह हो जायेगा। तुम भी उल्लू बनकर रातभर जंगल में घू घू की ध्वनि निकालती चीखती-तडपती रहोगी। यह कथा अंधविश्वास फैलाने, नारी द्वारा नारी पर अत्याचार करने की कपोल कल्पना मात्र है। क्या पता आज भी उस समुदाय की बहुएँ इस कथा को सुन सुनकर आतंकित होती रहती हों।

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    1. बहुत मुमकिन है | पिछली कहानी में भी तो बहू के पात्र को छू लेने से ही पात्र टूट गया था न ? घर के बाकी लोग छूते रहे तब तक तो कुछ न हुआ था उसे | बहुत सी बातें हो सकती हैं | किन्तु यदि गहरे में जाकर विवेचना न की जाए, और सिर्फ ऊपरी अर्थों में पढ़ा जाए - तो यही सीख है कि परिवार में सब एक दूसरे का ख्याल रखें और स्वार्थी न बनें |

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    2. देवेन्द्र जी,
      इस तरह की सारी कथायें , मिथक मानी जाती हैं , सो इसे भी मान लीजिए !

      आज तो आपने कथा का फ्लेवर ही बदल डाला :) पुत्रवधुओं का शोषण जो कि जटिल समाजों की विशिष्टता / दुर्गुण है उसे आपने सरल समाजों में भी देख लिया :)

      अब कुछ शंकायें / कुछ तथ्य ...जो आपके तर्क के पक्ष में खड़े नहीं माने जायेंगे ...

      (१)
      वृद्ध स्त्री जो लगभग अंधी और अशक्त है ! अपनी युवा बहु को पीट पाने / प्रताड़ित कर पाने में सर्वथा अक्षम है , इसलिये बहु की शिकायत पुत्र से करती है ! उसका हाथ गर्म हड्डियों / काँटों से जलाया जाता है ! उसे भोजन से वंचित रखा जाता है ! कथा में वो कहीं भी पुत्रवधु से झगड़ा नहीं करती ! रोकर याचना करती है , भोजन के एक टुकड़े के लिए जो उसे नहीं मिलता !
      (२)
      युवा पुत्र आंख मूंद कर शिकायत पर विश्वास नहीं करता , वह पत्नी के व्यवहार से कुढ़ता है और स्वयं उसका परीक्षण करता है ! पत्नी के स्वार्थी स्वभाव से परिचित होकर भी वह उसे डांटता नहीं, पीटता नहीं, घर से खदेड़ता नहीं , यहां तक कि कुछ कहता भी नहीं ! वह अपनी मां को वो सुख देता है जो उसकी बहु सरलता से दे सकती थी ! पुत्र तो भागती हुई बहु के पीछे जाता है और उसे बदली हुई हालत में भी घर वापस लाने तैयार था !
      (३)
      पुत्र वधु को कटु वचन नहीं कहे गये ! घर से निकाला नहीं गया ! वह अपने अपराध बोध से ग्रस्त होकर स्वयं घर छोड़कर भागी !
      (४)
      मन्त्रों और उल्लू होने के अंधविश्वासी पक्ष को छोड़ भी दिया जाये तो 'स्वार्थ का व्यवहार' किसके हिस्से आया ? और संयत व्यवहार किसके हिस्से आया ? स्वजनता की अपेक्षाओं पे खरा कौन नहीं उतरा ?
      (५)
      यह कथा शोषण की है या स्वार्थ की ? पुत्र दिन भर आखेट पर भटकता है ! रात थककर सोता है ! सास अशक्त है , लगभग अंधी है ! उन दोनों ने बहु का क्या शोषण किया ? उनके व्यवहार में स्वार्थ क्या था ?
      (६)
      बोध कथाओं का उद्देश्य कोई एक सन्देश / शिक्षा देना होता है जैसे कि यह कथा बहु के स्वार्थ / स्वजनों के प्रति उसके असामान्य व्यवहार / प्रवृत्ति पर खड़ी है ! वह असामान्य व्यवहार की वर्जना चाहती है , किन्तु आपने बहु को शोषित बताकर कथा को सिर के बल खड़ा कर दिया !


      इसलिये आज इस कथा के प्रति आपके मंतव्य से सहमत होना कठिन है !

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    3. :) आपके छहों तर्क सर माथे पर। मैने सरल समाज पर कोई आक्षेप नहीं लगाया। यह कथा उसी सरल समाज द्वारा ही कही गई है तो ठीक है। उनका उद्देश्य स्वजनो के प्रति असामान्य व्यवहार की वर्जना ही चाहती है लेकिन मेरी शंका जटिल समाज पर ही है। जटिल समाज, कल्पना के आधार पर सरल समाज की इस कथा को गढ़कर पुत्रवधुओं पर यह तंज कसता है कि दुर्भिक्ष के दिनो में अपनी अशक्त सास और ईमानदार पति को भोजन न कराकर अकेले-अकेले पेट भरने का नतीजा क्या हो सकता है! तुमने देख लिया? उल्लू बन जाओगी..उल्लू। अब यह जटिल समाज आज जितना जटिल तो हर्गिज न होगा लेकिन कुछ जटिल तो हो ही गया होगा जब उसने यह कथा कही।

      मेरा प्रयास सिरे से कथा के दूसरे पहलू की ओर ध्यान दिलाना ही था। बाकी आपकी बातों से सोलह आने सहमत।

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    4. देवेन्द्र जी ,
      आपके काल्पनिकता और अंधविश्वास वाले मुद्दे को हमने स्वीकार किया है ! जटिल समाज सत्यकथाओं वाले समाज हैं , यहां लेखन और रिकार्डिंग की सुविधा / दस्तावेजीकरण की सुविधा मौजूद है ! जबकि वे आख्यान हैं , कहे गये हैं , उनमें अतिरेक हो सकता है , पीढ़ी दर पीढ़ी घट बढ़ हो सकती है ! हालांकि जो मौजूद है उसपे ही कहा जाये , अपनी यही कोशिश रहती है !

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    5. @ शिल्पा जी ,
      मूलतः ये कथाएं काल्पनिक होती हैं अतः इनमें सुसंगत / तर्कसंगत कथनों का मौजूद होना आवश्यक नहीं है ! पाठक इन्हें बांचते समय जैसी भी व्याख्या उचित लगे कर सकता है ! कमोबेश मैं भी यही कर रहा हूं !

      पहली कथा एक निर्दोष स्त्री पर आक्षेप लगाती / उसका मजाक उड़ाती और अनावश्यक रूप से पुरुषों के पक्ष में खड़ी हुई दिखाई देती है , जबकि दूसरी कथा इन्हीं सन्दर्भों में सर्वथा भिन्न मानी जायेगी !

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  8. कथा की पृष्ठ्भूमि भले आदिकालीन सरल समाज की हो किन्तु विषयवस्तु जटिल समाज की ही है। काल्पनिक कथा हो या सत्यघटनाओं के कथ्यात्मक रूप, उद्देश्य बोध (सीख) देना ही होता है। यहाँ स्वार्थ भावना के दुष्प्रभावों को प्रकाशित कर स्वार्थ से दूर रहने का बोध देने के उपयोग हेतु ही कथा का निर्माण हुआ है, यह स्पष्ट है।
    काल्पनिकता और अंधविश्वास प्रतीकात्मक है, माँ बेटे बहु पर निर्भर है, परिवार में परस्पर सहयोग व सामुहिक उत्तरदायित्व का जटिल विधान पूर्व स्थापित है। बेटे के आय संसाधन अपर्याप्त है, बहु के पास कोई सहज आय के साधन है,(प्रतीक- मंत्र शक्ति) वह अपने उपार्जन से परिवार (मां-बेटे) का भरण-पोषण नहीं करती, उसके स्वभाव में स्वार्थ विद्यमान है। किन्तु स्वार्थ पोषण गलत है इसका बहु को पूरा भान है, इसीलिए रात को छुपकर उपार्जन करती है और गुप्त रखती है। लोकोपवाद से डरकर पलायन करती है स्वार्थ और सम्वेदनहीनता के फलस्वरूप उल्लू में तब्दील होती है,चीखना चाहती है पर कंठ से केवल घू घू की ध्वनि ही निकलती है। (प्रतीक- ग्लानि से तनाव-परेशानीयों के कारण निंद्रा का अभाव, पश्चाताप, प्रायश्चित व्यक्त करने की इच्छा किन्तु असमर्थता)अतः जिसे हम काल्पनिकता और अंधविश्वास मानते है वह प्रतीकात्मक प्रयोग मात्र है।

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    1. प्रिय सुज्ञ जी ,
      सरल समाज के सभी लक्षण जटिल समाजों में यथावत मौजूद नहीं हुआ करते , चूंकि देवेन्द्र जी ने कथा को पुत्रवधु के शोषण का रंग दे दिया था अतः मुझे , उनसे कहना पड़ा कि पुत्रवधु का शोषण जटिल समाजों का दुर्गुण / लक्षण है , यह कथन एक विशिष्ट उदाहरण के सन्दर्भ में था !

      चूंकि आप कथा के मूल तत्व स्वार्थ के आलोक में कथा का विश्लेषण कर रहे हैं , तो आपसे कह रहा हूं कि हां...स्वार्थपरकता का तत्व दोनों ही तरह के समाजों में समान रूप से मौजूद है , अतः कथा इस आशय में दोनों ही तरह के समाजों को सीख देती है ! निश्चित रूप से अलग अलग पृष्ठभूमि के समाजों में यह विषयवस्तु की समानता का उदाहरण है ! अस्तु आपकी प्रतिक्रिया से असहमत होने का कोई कारण नहीं बनता बल्कि इसे सुन्दर प्रतिक्रिया कहने में मुझे कोई संकोच नहीं है !

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  9. कथा बोध से पूर्णतया सहमत - मानव अपने कर्मों का फल अवश्य भुगतता है|
    ये कथाएं हमें यही सन्देश देती हैं ताकि हम समय, स्थान, परिस्थितियों के अनुरूप शुभ कर्मों में संलग्न रहें|

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