बुधवार, 4 मई 2011

स है और श ष भी पर जो अधिक प्रिय है !

पता नहीं पड़ोसी के निहित मंतव्य क्या रहे होंगे जो उन्होंने रायपुर से सद्य प्रकाशित एक दैनिक समाचारपत्र मेरे आंगन में नियमित फेंकने ( आपूर्ति से बेहतर शब्द लग रहा है ) की साधिकार घोषणा कर दी  !  मैंने पूछा कि क्या आपने इसकी एजेंसी ली है ?  या कि ब्यूरो चीफ बन गये हैं ?  या फिर कोई अन्य आर्थिक लाभ वगैरह वगैरह ?  उन्होंने कहा कुछ भी विशेष नहीं, बस अपने लोग हैं इसलिए उनका न्यूज पेपर चलना चाहिए !  मैंने कहा , ये तो ठीक है पर एक अकेले मेरे पढ़ने से ये पेपर चलेगा ?  इसपर उनकी प्रतिक्रिया ये कि ,  आप अकेले कहां हैं मैं तो इसे कई और जगह भी फेंकवा रहा हूं  !

पड़ोसी बहुधंधी व्यक्ति हैं , कभी नवनिर्मित आवासों में इलेक्ट्रिकल फिटिंग्स के ठेके लेते है और कभी जीवन बीमा के उद्यम से जुड जाते हैं , इसके अतिरिक्त कई व्यवसाय और भी ,पर मूलतः घोषित कांग्रेसी कार्यकर्ता हैं सो एक बात अपनी भी समझ में आई कि विविध व्यवसायों से वे क्या कमाते होंगे ये तो वे ही जाने लेकिन हर छोटे बड़े चुनाव में उनके घर के किसी एक हिस्से में नवनिर्माण या जीर्णोद्धार का कार्य ज़रूर संपन्न होता है !   अब  देखना ये है कि वे  इस लोकसभा उपचुनाव में क्या कुछ अर्जित कर पायेंगे !

आगे विषयान्तर नहीं करते हुए बात एक बार फिर से पड़ोसी द्वारा  बलात आरोपित समाचारपत्र की , यूं तो समाचार पत्र का कलेवर और समाचार चयन ठीक ठाक है पर उसमें छत्तीसगढ़ की अपेक्षा मध्य प्रदेश के समाचार प्रमुखता से छापे जाते हैं जिससे लगता यह है कि पुराने राज्य के संवाददाता नवगठित राज्य के अपने सहकर्मियों की तुलना में कहीं अधिक दक्ष हैं, अधिक प्रभावी हैं !  समाचारपत्र के पाठकों वाले स्तंभ में कई बार अपने कार्टूनिस्ट मित्र काजल कुमार के कार्टून्स देखकर हैरानी हुई !  सौजन्य और साभार के अभाव में छपे कार्टून्स ! पता नहीं इस प्रकाशन के लिए कार्टूनिस्ट की सहमति भी ली गई होगी कि नहीं ?

इस क्षेत्र के सांसद के आकस्मिक देहावसान के उपरान्त हो रहे उपचुनाव की बेला में पक्ष प्रतिपक्ष के नेताओं का जमावडा और चुनावी विज्ञापनों से समाचारपत्रों की पौ बारह के इतर लोकप्रिय नेताओं के जन्मदिन की बधाइयों की बाढ़ सी आ गई है, जनाभिमत यज्ञ के अलावा कभी , ऐसे विज्ञापन , इतने सारे जन्मदिन , एक साथ ना देखे ना सुने !  लेख्य यह कि जन प्रतिनिधियों के जन्मदिवस के कई विज्ञापन प्रायोजित प्रतिक्रिया और समाचार की शक्ल में भी देखे गये ! अब संभावित कठिनाई  ये  है कि चुनाव आयोग इन खर्चों को चुनाव लड़ने वाले अभ्यार्थियों के खाते में जोड़ कर देखेगा  भी तो कैसे ?

पड़ोसी द्वारा प्रोन्नत समाचारपत्र में भी कमोबेश चुनावी रेलम पेल और जन्मदिवसोन्मुखी  नज़ारा आम रहा पर एक विशिष्ट बात , आपसे शेयर करना आवश्यक प्रतीत हो रही है !  समाचारपत्र अपने प्रतिक्रियात्मक समाचार के अंतर्गत  "जनप्रतिनिधि विशेष के जन्मदिवस" के हवाले से लिखता है कि " सादगी के साथ संघर्ष ही ... की पहचान"  !  शीर्ष पंक्तियों  को पढ़ने से स्पष्ट होता है कि समाचारपत्र के पास वर्णमाला के तीनों अक्षर स ,श और ष  उपलब्ध हैं पर वो आगे का समाचार गढते हुए जो भी शब्द टंकित करता है  , ज़रा उसकी बानगी भी देखी जाये !  षिक्षित , छग षासन , संघर्श , संघर्शरत , पार्शद ,  आषियाने , विषाल ,  मषाल , कुपोशित ,   प्रतिषत , कुपोशण ,  उत्कृश्ठ , घोशित , षासकीय , राश्ट्रीय !

अब कहना ये कि उनके पास स है और श  ष भी पर जो अधिक प्रिय है उसे संवाद के लिए प्रयुक्त कर रहे हैं क्या केवल इतना ही निष्कर्ष निकालना पर्याप्त होगा  ? या फिर माध्यमों की भाषाई  विकलांगता के प्रति चिंतित होने की आवश्यकता भी है ?

34 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी पोस्ट ने अचानक डा. राही मासूम राजा के उपन्यासों में छिपी "सुशमा" की याद दिला दी. और साथ ही याद आ गयी अपनी स्वर्गीय पिता जी की,जिनका एक लतीफा एक उर्दू बोलने के शौक़ीन के नाम.. पहुंचे एक तेल की दूकान पर और बोले,"ज़नाब! घुलरोघन का तेल है!"
    जवाब मिला,"है! मगर उतना गाढा नहीं जितना आपको चाहिए." ये गाढा उनके "ज़नाब" और "घुलरोघन" के लिए थी.
    वह समाचार पत्र भी जी जान से हिन्दी की सेवा में समर्पित होगा!!

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  2. वर्तनी की इतनी गलतियाँ होनी तो नहीं चाहिए , मगर क्या करें, हम भी कर देते हैं कभी -कभी !

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  3. कभी हिसाब लगाने बैठे कि कितने पेपर और मैगजीन छप रहे हैं इस देश में , और कैसे कैसे लोग छाप रहे हैं ! कम से कम मैं २-३ लोगों को जानता हूँ जो मैनेजिंग डायरेक्टर कम मैनेजिंग एडिटर हैं और मेरा विश्वास है कि उन्हें बेसिक जानकारी का भी अभाव है !

    ब्लॉग जगत का उदाहरण आपके सामने है ! यह तो ऐसे ही चलेगा ! उस पेपर को पढ़ते रहें ... :-))
    शुभकामनायें

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  4. "दीपक बाबा की बक बक" नाम की अखबार निकली तो ये सब गलतियाँ उसमे जरूरी रहेंगी....
    :)

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  5. @ सर्व मित्रगण ,
    किंचित अवकाश की अनुभूति के समक्ष ढेर सारा बैक लाग है धीरे धीरे सब पोस्ट पढूंगा और प्रतिक्रिया देने का यत्न करूंगा !
    हर दिन मेल देखते वक़्त सामने मौजूद एक आध पोस्ट पर तात्कालिक रूप से टिपियाया भी है पर पठन के लिए लंबित सूची काफी बड़ी है सो घबराया हुआ भी हूं !

    @ सलिल भाई ,
    मरहूम वालिद बुज़ुर्ग का लतीफा गज़ब है :)
    ये बात सनद रहे और वक्त पर काम आये कि सूखने की शुरुवात ही गाढ़ेपन से होती है :)

    @ शालिनी जी ,
    आपका कहना सही है और यही चिंता की बात है!

    @ वाणी जी ,
    आप तो माशाल्लाह बहुत बेहतर लिखती हैं ! हमें गवाह जानिये ! वो समाचारपत्र है और हज़ारों लाखों लोगों से हर दिन संवाद करता है ! बात बस इसीलिए खटकती है !

    @ सतीश भाई ,
    हिसाब क्या करना , भरे पड़े हैं !
    आपकी सलाह ठुकराने का सवाल ही नहीं उठता :)

    @ निशांत मिश्र जी ,
    :)


    @ दीपक जी ,
    ऐसा है तो फिर मेरे पड़ोसी और मेरा का ख्याल ज़रूर रखियेगा :)

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  6. हमने तो यह जाना है कि श से भाषा संस्‍कृतनिष्‍ठ और परिष्‍कृत मान ली जाती है और क ज फ आदि में नुक्‍ता लगा देने से शानदार उर्दू.
    (वैसे जिन गलतियों का जिक्र आपने किया है, वे भूल नहीं, फॉन्‍ट की गड़बड़ी का मामला दिखता है.

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  7. वो उधर फेंके और आप इधर कूड़ें में फेकें -बस यही रास्ता !

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  8. @ राहुल सिंह जी ,
    उसी समाचार में स श ष पर आधारित कुछ सही शब्द भी टंकित हैं इसलिए फॉण्ट की गडबडी का बहाना नहीं चलेगा :)

    @ अरविन्द जी ,
    सुझाव बुरा नहीं है :)

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  9. मुझे लगता है की इस अख़बार का सारा हिंदी टंकण कार्य अंग्रेजी लिपि कर हिंदी में लिप्यांतरित कर किया जाता होगा अतः इस तरीके की गलतियाँ होना स्वाभाविक हैं. मैं भी बहुत बार ऐसी ही गलतियाँ करता रहता हूँ. बोलते वक्त तो मेरी जबान नहीं फिसलती पर लिखते वक्त अक्सर अंगुलियाँ फिसल कर कहीं की कहीं पहुँच जाती हैं. व को ब लिखना भी अक्सर हो जाता है.बहुत जगहों पर मैं वहां को बहां, वजह को बजह, वादा को बादा, वाह वाह की जगह बाह बाह, वज़ूद की बदले बज़ूद लिखने की गलती कर बैठता हूँ जिसकी वजह वही अँगुलियों की फिसलन होती है.

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  10. अली सा!
    समाचार पत्र की बासी सियासत और लंगड़े साहित्य में से आप अर्थशास्त्र क्यों नहीं ढूंढ लेते.. रद्दी में बेचकर... जनाब कोइ आम फेंक रहा हो तो आप गुठलियाँ क्यों जाया करते हैं..

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  11. अखबार अपने घोषित-अघोषित हित पूरे कर पा रहा है(विज्ञापन, व्यक्ति विशेष का प्रचार-प्रसार-पैठ आदि आदि) इसलिये स, श, ष से कोई फ़र्क उन्हें नहीं पड़ने वाला।

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  12. ek dam sateek najar, kam se kam bhashai samhachar patron ko to vartni ka khayaal rakhna hi chaiye!

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  13. कहीं-कहीं से लौट कर आया हूं. जो बात डैस्कटाप में है वो कहीं नहीं :) ....

    आपकी पोस्ट से पता चला कि कहीं एक और जोकर चोरी करते नहीं अघा रहा और खूब जी भर कर मेरे ब्लाग से कार्टून उड़ा रहा है :)

    ... हमारे समाज में बिल्ले लगा कर घूमने वालों की भी एक अजब ही जमात है जो हमेशा इसी उघेड़बुन में लगी रहती है कि कब किसी भी तरह, कैसे भी, कुछ राजनीतिक लाभ हो तो जाए. इस जमात को राजनीति के छुटभइयों तक के साथ फोटो खिंचवा कर ड्राइंग रूमों में टंगवाने (और अब ब्लागों पर चिपकाने का भी) बस मौक़ा भर चाहिये...क्या मज़ाल जो चूक जाएं. चाहे मुबारक़ देने को बहाना हो या किसी का उद्घघाटन/ विमोचन का बहाना, इनकी भूखी आंखें हमेशा कैमरों की ही तरफ फटी मिलती हैं :)

    ये तरह-तरह के दूसरे हथकंडों में भी संलिप्त रहते हैं जैसे किसी न किसी गुट/गोष्ठी/संस्थादि के पदाधिकारी होकर डींगे हांकना, इनकी छातियों पर छाती से भी बड़े साइज़ के बिल्ले चिल्ला कर चिल्ला कर इनको पहचानने की गुहार लगाते रहते हैं, इसी तरह के चव्वन्नी-छाप अख़बार चलाए रखना भी इनका धंघा रहता है ताकि लोगों को तथाकथित प्रभावित करने के धंधे के साथ-साथ, डराने-धमकाने का काम भी चलता रह सके...

    इनके सिर, बस गिनने के काम आते हैं...

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  14. .
    .
    .
    या फिर माध्यमों की भाषाई विकलांगता के प्रति चिंतित होने की आवश्यकता भी है ?

    नहीं कोई जरूरत नहीं है, मेरा तो सोचना है कि उस अखबार का वह लेखक सबको जताना चाहता है कि चीजों के सरलीकरण के इस दौर में 'स' 'श' 'ष' यानी कुल तीन प्रकार की ध्वनियों की आवश्यकता ही क्या है, सोच कर देखिये केवल 'स' से भी ठीकठाक काम चल सकता है और किसी को भी समझने में दिक्कत नहीं आयेगी...
    सिवाय मेरे... मुझे अपने नाम में कुछ बदलना होगा... ;))



    ...

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  15. अधिकाँश लोगों को पता ही नहीं है...सही शब्द, तो ऐसी गलतियाँ तो करते ही रहेंगे.

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  16. बहुत सारे यहाँ 'किरदार' ऐसे,
    बहुत सारे यहाँ 'अखबार' ऐसे,
    चुनावी मौसमो में 'इनकी' आमद,
    लगे बरसात में 'मेंढक' हो जैसे.

    http://aatm-manthan.com

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  17. अली साहब आजकल समाचार पत्रों की आड़ में भी लम्बा खेल चल रहा है..प्रदेश का बहुचर्चित डॉल्फिन स्कूल घोटाले का मुख्य आरोपी भी एक दैनिक समाचार पत्र नेशनल लूक का प्रधान संपादक रहा है..मेरे छोटे से शहर से साप्ताहिक और रोज़ाना के 143 अख़बार निकलते हैं..आलम यह है कि किसी ने अपने घर पर नया पेंट भी करवा लिया हो तो उसके घर पर नये अख़बार का फेंका जाना शुरू हो जाता है..फिर आप तो आप हो..देखिये कहीं अख़बार के लिये मना करने पर आपकी कार्यकुशलता को लेकर कुछ छप जाये तो अचंभित ना होईयेगा...

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  18. आपके ब्लॉग पर पहली बार नहीं आए....किंत आज की पोस्ट से एक बहुत पुरानी घटना याद आ गई जिसे बाँटने का मन "करा" किया सो टिप्पणी देने से रोक नहीं पाए....हमारे साथ की टीचर ने वाइस प्रिंसीपल से नज़दीकी दिखाते हुए उनके पति की खैरियत जाननी चाही..."मैम..ज़लील साहब कैसे हैं"...उस वक्त नुक्ते ने ग़ज़ब ढा दिया और सब शर्म से लाल हो गए..
    इन गलतियों का एक कारण यह भी हो सकता है कि नवीं दसवीं में वर्तनी और वाक्य की अशुद्धि पर कम ध्यान दिया जाता है...

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  19. ज्यादा नामूनेगिरी से अच्छा है की एक ही ''स'' से काम चलाया जाय . जरूरत हो तो 'ष' को कहीं कहीं `ख' कर दिया जाय , जैसे `खट्कोण' आदि..देशभाषाएं कितनी सहज हैं..बाकी अखबार वाले रहम करें और क्या कहूं :-) सादर !

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  20. यह पोस्ट उसके विरोधी अखबार को दे दीजिए..उसने छाप दिया तो फिर आपको अखबार नहीं देगा।

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  21. kisi kee prakriti batane ka nayab tarika pasand aaya. chahe koi ise samalochna samjhe. kisi bhi sandarbh ko bariki se dekhna aur use saralta se banyan karti lekh,sarahnee hai.

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  22. श्री प्रवीण शाह जी से सहमत होने का मन कर रहा है.

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  23. हिन्दी में स, श और ष ही नहीं मात्राओं की भी दुर्दशा है |

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  24. बहुत सुन्दर आलेख,
    समाचार पत्र आप फेंक भी सकते हैं पर आजकल के न्यूज चैनल....- विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

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  25. वर्तनी की ये गलतियाँ असह्य लगती हैं.
    आपका यह समाचार पत्र मुझे मध्यप्रदेशवास के दौरान ऐसे ही जबरन मिलने वाले 'काला सोना' की याद दिलाता है.
    घुघूती बासूती

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  26. Bahut dinon se aapko blog pe dekha nahee! Aap aksar apne lekhan me itne dinon ka gap dete nahee....bahut wyast hain?
    Mera ek aur blog hai,"simte lamhen".Kabhi wahan bhee tashreef layen!

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  27. अली साहब क्या रक्खा है वर्तनियों में ,भाव देखो सामने वाले का .जात न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान .और भाई साहब अखबार कोई गणेश -शंकर विद्यार्थी नहीं लिख निकाल रहें हैं आज ,पूछ लीजिए गौरी -शंकर राज हंसजी से हिंदी पात्र कारिता का भाव .अब पत्रकारिता व्यापार है निगमित हो चुकी है .शुद्धतावाद को ढूंढ रहें है आप ?

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  28. @ वीरू भाई ,
    टालने की कोशिश तो करते हैं पर सरकंडे की कलम और खडिया मिट्टी के दिनों वाली स्कूलिंग पीछा नहीं छोडती :)

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