शुक्रवार, 22 अप्रैल 2011

ये बेनाम कोई अपने ही रहे होंगे !


सच तो ये है कि मैंने अपनी पिछली पोस्ट को खुद की मसरूफियात के खबरनामे की तरह से अंतरजाल पृष्ठ के हवाले किया था !मंतव्य ये कि कहीं ब्लॉग-जागतिक बंधु बांधव अपने एक पाठक की गुमशुदगी का भ्रम ना पाल बैठें !  हुआ ये कि एन उसी वक़्त क्रिकेट के विश्वविजय अभियान के समापन समारोह की एक नाज़ुक सी घटना का ज़िक्र भी कर बैठा ! मुझे लगा कि राष्ट्रीय प्रतीक और विजय आनंद के दरम्यान होश-ओ-हवास की बारीक सी ही सही पर विभाजक और विवेक सम्मत रेखा होनी ही चाहिए !

समारोह के समय खिलाडियों के व्यवहार को लेकर अपने असहमति कथन में मैंने खिलाडियों के अनजानेपन की एक ढ़ाल भी रख छोड़ी थी !  घटनाक्रम में जिस  संभावना की अनुभूति हुई उसे दर्ज़ करना  मेरा फ़र्ज़  था सो किया !  आलेख पर ब्लॉग-जागतिक मित्रों ने बेहद संतुलित और लाज़बाब प्रतिक्रियायें दर्ज कराईं ! बहरहाल काम काज के बीच जब भी मौका मिलता मित्रों के अभिमत माडरेशन से मुक्त कर जाता !  इस बीच तारीख  आठ  अप्रेल  दो  हज़ार  ग्यारह  को , एक  बेनाम  सुर स्पैम में जा अटका...पहले सोचा कि उसे  वहीं पड़ा रहने दूं पर अब लगता है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार उस पर्देदार  को भी है !   ज़रा गौर फरमाइयेगा कि वे क्या कहते हैं ...

"तुम तो वो लोग हो जो पी के झूमते रहे इंडिया इंडिया करते रहे और उतरने पर तिरंगे का ख्याल आया या अल्ला...इन महान खोजो को करने वालों के लिए नोबुल पुरस्कार की व्यवस्था क्यों नहीं की ?? "

सोचता हूं कि ये बेनाम कोई अपने  ही रहे  होंगे जिन्हें  शराब और तिरंगे बाबत मेरी फिक्र कुछ ज्यादा ही आहत कर गई वर्ना शेष सारे टिप्पणीकारों की प्रतिक्रिया में ये तल्खी कहां है ?   खैर... उन्होंने मुझे विश्वविजय के इस ज़श्न में शरीक माना और पिलाई भी :)  उतारे के बाद ही सही पर ईश्वर और तिरंगे के ख्याल से जोड़ा और इससे आगे भी मेरा हौसला बनाये रखा :)  मुझे उनकी प्रतिक्रिया पर कोई प्रति-प्रतिक्रिया नहीं देनी है पर कहना इतना ही है कि उन्होंने जो भी कहा वो सब अगर अपने नाम से ही कह देते तो क्या मैं बुरा मान जाता :) 



19 टिप्‍पणियां:

  1. हर धर्म में ऐसे लोग बैठे हैं जो असहिष्णुता में अपनी शान समझते हैं ! उनकी नाराजी की अपनी वज़हें रही होंगी मगर दुःख है कि वे इस जहर विखेरने के प्रयास के, दूरगामी परिणाम नहीं समझ पाते ! गैरों को कष्ट पंहुचाते यह लोग, इसमें आनंद लेते हैं !

    मगर आश्चर्य यह है कि आप जैसा इस देश का सपूत भी कष्ट को दिल से लगाता है, मुझे नहीं लगता कि आपको भी कुछ समझाने की आवश्यकता है ! आप शिक्षक हैं और आपकी ही यहाँ बेहद जरूरत है ! यह कष्ट हम जैसों को झेलने दीजिये आप से तो हम जैसे हिम्मत पाते हैं ! ब्लॉग जगत की हालत कुछ ऐसी है ....

    कुछ प्रश्न बेतुके से सुनकर
    पंडित पोथे, पढने भागें,
    कुछ प्रगतिवाद, परिवर्तन
    के सम्मोहन में ही डूब गए
    कीकर, बबूल उन्मूलन की
    सौगंध उठा कर आया था ,
    मैं चिर-अभिलाषित, ममता का, रंजिश के द्वारे आ पहुँचा !
    ऋग्वेद पढाने आए थे ! पर अपनी शिक्षा भूल चले !!

    सादर !

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  2. मेरा "महबूब की मेहंदी " जैसी फिल्मों पर आधारित ज्ञान कहता है की "या अल्लाह " जैसे जुमले प्रयोग करने वाला टिपण्णी कार जनाना है और हो न हो आपका कोई पुराना जानकर है अतः पर्दा जरुरी था. अली सर, इस पर्दानशीं (वर्तनी पर ध्यान न दें सिर्फ भाव पकड़ें) ने अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया इसलिए उन्हें सत्य बताना आपका फर्ज बनता है.

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  3. अपने-बेगाने वाला आपका ये क्राईटेरिया भी खूब है:)

    (एक बेगाना)

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  4. अपने-बेगाने वाला आपका ये क्राईटेरिया भी खूब है:)

    (एक बेगाना)

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  5. रोज देखने-जानने वाले तो ऊटपटांग कमेंट कर देते हैं । यह तो आभासी दुनियाँ है..बड़े-बड़े सिरफिरे आ जाते हैं। कमेंट डीलीट करने का विकल्प सही है। आप दिल दुखायेंगे तो सभी को दुःख होगा।

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  6. अब इन बातों का भी क्या लेना -गौण है ये ,इन्हें भाव क्या देना !

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  7. नाम से कहने पर आप बुरा नहीं मानते....पर उनमे इतनी हिम्मत भी तो होनी चाहिए....वरना परदे में क्यूँ रहते...विकृत मानसिकता वालों का क्या किया जाए....

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  8. नजरिया अपना-अपना, अदा अपनी-अपनी.

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  9. जो खुद को ही ज़िक्र के काबिल न समझते हों, उनका ज़िक्र क्या करना और क्यों करना..

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  10. आज मन कहा टीपूँ , तो क्या टीपूँ ?

    देव सृष्टि सदासद पूर्ण है, दोनों साथ ही रहते हैं, क्या किया जाय;

    उपजहिं एक संग जल माहीं।
    जलज जोंक निज गुन बिलगाहीं॥ [ ~ तुलसीदास ]

    पर यह भी दिखा कि ब्लोगबुड की चिरकुटई बेल्कम के लिये कहीं भी चूकती नजर नहीं आती।

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  11. अब इन बातों का भी क्या लेना -गौण है ये ,इन्हें भाव क्या देना !..........sahmati......

    doosra begana

    pranam.

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  12. ऐसे लोगों पर गुस्‍सा नहीं आता दया आती है।

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  13. Kuch to log kahenge ...
    logon ka kaam hai kahna ...
    chodo bekaar ki baaton mein ...
    kaheen doob na jaaye raina ...

    Ali saahab ... aapka ye andaaz haasy ka tha .. kuch serious na len ....

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  14. पर्दानशीनों के चीखनें से भला क्या होता है??
    अन्धेरे में तलवार लहराने से जंग नहीं जीती जाती जनाब...ज़बान से कहिये बेचारे...और सब भूल जाईये..

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  15. सही कहा, बेनामी हमेशा अपना ही होता है, पर बेचारा सच कहने की हिम्‍म्‍त नहीं जुटा पाता, तो बेनामी का मुखौटा लगा लेता है।

    ............
    ब्‍लॉग समीक्षा की 12वीं कड़ी।
    अंधविश्‍वासी लोग आज भी रत्‍न धारण करते हैं।

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  16. ऐसा भी होता है.इतनी सारी अच्छी टिप्पणियों के बीच एक आध ऐसी भी आ जाती है जैसे चावल में कंकण.
    घुघूती बासूती

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