रविवार, 9 जनवरी 2011

नीलवर्ण विष-बेल !

यहां जमीन पर मीलों दूर तक फैले हरे भरे दरख्तों और उनके दरम्यान से गुज़रती कच्ची पक्की सड़कों... बलखाती पगडंडियों और छुटपुट बसी हुई इंसानी बस्तियों में रच बस चुकी बारूद की गंध ...वहां ऊपर आकाश में मंडराते हेलीकाप्टर्स की गडगडाहट और सुबह सबेरे के अखबारों की सुर्ख इबारते अब आदत सी बन चले हैं !गोया हम इंसान ना होकर  संवेदनाहीन रोबोट सा जीवन गुज़ार रहे हों  !  उसपे तुर्रा ये कि  हमारे आस पास की घटनाओं और हालात पर लिखते हुए बन्दों की ना तो कलमें थकती हैं और ना ही रौशनाई कभी सूख पाती है , फिर वेबपेज और कीबोर्ड की सीमाएं तो वैसे भी अंतहीन हैं ! अतिवामपंथ और हिंसा पर वाद संवाद के सिलसिलों और वैचारिक मतमतांतर के इस अहर्निश आयोजन में  हमारी सहभागिता क्या है  ?

व्याधि के कारण और निदान पर हुकांरते राजनैतिक नेतृत्व , रक्षाबलों और बौद्धिक सामर्थ्य से लैस चिंतकों के साथ गहन  विमर्श के ख्याल तो आते हैं पर अपनी सेवागत बंदिशों / आचरण संहिताओं के चलते , एक शब्द भी कहना दूभर हो जाता है !  कई बार कोफ़्त सी होती है  , सब कुछ पढ़ सुन कर खिसियाते कुलबुलाते हम और... मौन हम पर शर्त  है ! मुंह पर टेप लगा कर जीना भी कोई जीना है लल्लू की,तर्ज़ पर बस जिये जा रहे हैं ! कहना ये कि अपने ही सामाजिक सरोकार /  सरोकारों पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का संकट  ?  ऐसी मजबूरियों पे लानत है !  

यूं भी पिछले कई दिनों से नेट और मूड के तालमेल की सारी जुगत व्यर्थ हो रही हैं !  लोग मुद्दे पर लिखें और हम साइड से बचकर निकल लें बस यही एक मात्र विकल्प हमारा अधिकार है ! ... खैर पिछले कई दिनों की अभिव्यक्तिजन्य  कुंठाओं से गुज़रते हुए आज सोचा कि चलो बोलना / लिखना ना सही पर देखना / पढ़ना तो कर ही लिया जाए !  किस्मत बुलंद कि नेट ने धोखा नहीं दिया और अपनी यायावरी शुरू ...ख्याल ये कि टिप्पणी करने के लिए प्रविष्टियों का ज़खीरा खासा बड़ा नज़र आ रहा है , एक से बढ़कर एक प्रविष्टियां ...जी जान से लिखी होंगी मित्रों ने !  महती सरोकारों से लैस प्रविष्टियों पर प्रतिक्रिया से पहले कुछ और वेब पेज खोलता हूं कि अचानक "...प्रियतमा 786 "  के नाम की यू ट्यूब अपनी ओर ध्यान खींचती है ,शायद किसी बंदे को 786  का अंक इस कदर भाया हो कि उसने छोटी मोटी फिल्म ही तैयार कर डाली हो !

वीडियो के शीर्षक में किसी नायिका के नाम के साथ प्रियतमा और फिर उसके साथ धार्मिक नवैय्यत का अंक 786 लगा कि हमें प्रेम के रूहानी पहलू को लेकर गढी गई किसी कथा के दर्शक होने का सौभाग्य प्राप्त होने जा रहा है...यू ट्यूब खोलते ही अपेक्षा के अनुरूप एक प्रेमी जोड़ा नमूदार हुआ है , उम्र यही कोई 16-18 साल के आस पास पर ...अब अफ़सोस कि हम इसे बंद करके जा रहे हैं ! यह खालिस पोर्न फिल्म है ! सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों की तह में लिपटे इस दस्तावेज को विषम सामाजिक समस्या मान भी लें तो हम नायक नायिका और इस व्यवसाय से जुड़े बन्दों का क्या बिगाड़ सकते हैं ?



पुनश्च : 
पोस्ट लिखते वक्त ये ख्याल भी ना था कि पोस्ट के शीर्षक का इस्तेमाल इस फिल्म को खोजने के लिये भी किया जा सकता है !यूं समझिये एहतियातन  शीर्षक बदल  दिया है  !  पोस्ट के विषय से सम्बंधित एक और आलेख लिखने का इरादा है ! आज कल या  शायद आगे किसी दिन कहना ज़रा मुश्किल है  !

24 टिप्‍पणियां:

  1. शर्मनाक बात है और उससे भी ज्यादा शर्मनाक ये है कि शायद कुछ न बिगड़े उनका।

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  2. समाजशास्त्री को चुप बैठना पड़े यह तो सजा काटने सा है. और फिल्म के नाम और फिल्म का आपसी कोई सम्बन्ध हो यह नियम तो हमने कहीं नही पढा.
    घुघूती बासूती

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  3. नेट पर इस तरह के गीत-संगीत-फिल्म, भरे पड़े हैं. बस नज़र पड़ते ही बंद कर देना ही एक उपाय है. और ये सब पानी के बुलबुले से होते हैं ,अपनी गति को प्राप्त होते देर नहीं लगती.
    विकृत मानसिकता के उपज है...इग्नोर करना ही बेहतर है.

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  4. प्रत्‍यक्ष चर्चा में स्‍पष्‍ट कर सकूंगा, लेकिन फिलहाल यहां संक्षेप में कहूं तो पोस्‍ट से मेरी नाइत्‍तफाकी दर्ज.

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  5. @ मो सम कौन ? जी,
    यकीनन कुछ भी नहीं बिगड़ने वाला ,बहुत बड़ा व्यवसाय है ये !

    @ घुघूती बासूती जी,
    नियम तो कुछ भी नहीं बस एक धोखा हुआ ,वो फिल्म वहां मिली जहां उसे होना नहीं चाहिए था !

    @ रश्मि जी ,
    हां इग्नोर करना ही बेहतर है !

    @ राहुल सिंह जी ,
    आपका हक है ,मुझे विस्तृत प्रतिक्रिया का इन्तजार रहेगा !

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  6. रश्मि रवीजा की बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ ....मानसिक विकृतियों के विभिन्न स्वरुप हर तरफ बिखरे हैं ...क्या देखना है यह हमें सोंचना है ...
    बेहतर है कि नज़रन्दाज़ करें ! शुभकामनायें !

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  7. vigyan ka vikas aisee sthitiyan to layega hi.ab to kya shahar kya gaon sabhi iski chapet me aa gaye hain.
    aapke margdarshan se copy-paste to ham seekh gaye.kripya mere blog kaushal par ye bhi batayen ki links kaise jode jate hain aur unse gadgets kaise paste kiye jate hai.aapke aabhari rahenge..

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  8. विकृत मानसिकता के लोग दुनिया में हर जगह भरें हैं। सृष्टि के समय शैतान भी आया। अब उसके वंशज ही ऐसे कार्यों को अंजाम दे रहे हैं।

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  9. मेरे बाबा कहते हैं ...कसाई के सरापने से कहीं गाय मरती है भला ?
    चाँद पर थूकने का अंजाम क्या होता है, सभी जानते हैं...वैसे भी जिसके पास जो है वो वही देगा...इससे बेहतर की अपेक्षा, ऐसे लोगों से करना फ़िजूल है...आप तो बस अपनी कलम के तिलस्म में हम जैसों को बांधते रहें...ताकि ना तो हम ऐसी-वैसी जगह पर जाएँ ना आप...:):)

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  10. डार्लिंग -७८६
    टाईटल खूबसूरत हे, कोई भी आकर्षित हो सकता है
    जैसा कि आप हो गए! और इतने आकर्षित हुए कि
    अपनी पोस्ट का टाईटल भी वही रख दिया
    जिसे पढ़कर हम भी आकर्षित हो गए!
    हहहाहहहहाहा
    खैर ये तो रही मजाक कि बात!
    जहाँ तक ७८६ अंक कि बात हे,
    ये इस्लाम कि धार्मिक मन्येताओं से जुड़ा है!
    और जैसा कि आपने अपने विचार रखे, कि आप किसी
    धार्मिक फिल्म को देखने जा रहे हैं, बकौल टाईटल
    लेकिन ऐसा नही हुआ! हमें भी खेद है, जो धार्मिक
    मन्येताओं के नाम से लोगो कि भावनाओ से खिलवाड़
    करते हैं!, और इनके खिलाफ सख्त से सख्त कर्येबाही
    होनी चाहिए!
    आपकी चिंता जायज है!
    अमीन!

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  11. ये भी दिलचस्प बात है साहब, की हमने आज तक पोर्न का समर्थन करते हुए किसी को नहीं देखा.. कमबख्त फिर ये देखता कौन है ;)

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  12. @ सतीश भाई ,
    ज़रूर नज़रअंदाज ही किया जा सकता है ! शुक्रिया !

    @ शालिनी जी ,
    आपका कहना सही है ! जल्द ही देखता हूं किसी मित्र की कोई ऐसी पोस्ट जो आपकी मदद कर सके !

    @ ललित शर्मा जी ,
    हां वो तब से ही साथ है !

    @ अदा जी ,
    आपकी सलाह ध्यान में रखी जायेगी :)

    @ खरे साहब ,
    निवारण के लिए कोई ठोस कार्यवाही नहीं हो पाने की वज़ह से ही समस्या गहराती जा रही है !

    @ मजाल साहब ,
    इनका चलन यूं ही तो नहीं है ना :)

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  13. बेहद शर्मनाक। इन्हें तवज्जो न देना ही बेहतर। इनके खिलाफ क्या कार्यवाही की जा सकती है यह तो ब्लॉगुरू ही बता सकते हैं।

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  14. एक फ़िल्म में इस व्यवसाय पर रौशनी डाली गई थी.. चुँकि हिंदी फ़िल्म थी इसलिये उसका अंत पॉज़िटिव दिखाना मजबूरी था.. लिहाजा उस व्यवसाय में अंत में मालकिन (जी हाँ भारतीय मूल की एक औरत को यह धंदा विदेश में बैठकर संचालित करते हुए दिखाया था)जब अपनी बेटी को फँसते देखती है तो उसकी आँखें खुल जाती हैं..
    लेकिन आपने जो बयान किया वह शर्मनाक है!!

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  15. अली सा! अपनी पिछली टिप्पणी (चला बिहारी)में जिस फ़िल्म का ज़िक्र किया है उसका भी नाम नीलवर्ण विषबेल का प्रचलित नाम ही रखने की सोची थी प्रोड्यूसर ने किंतु उस नाम पर देश में आपत्ति होती, अतः फ़िल्म का नाम बदलना पड़ा, जैसे आपने अपना शीर्षक बदला..

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  16. हर विवादस्पद मुद्दे पर चुप लगा जाना हमारी नियति और चरित्र बनता जा रहा है ...कभी कभी लगता है की किस लोकतंत्र में जी रहे हैं हम ...

    विकृत मानसिकता के उदाहरण ही तो हैं ...हम बस बच कर निकल लें ..!

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  17. अगर जानबूझ कर इस तरह का नाम रखा गया है तो कुछ नहीं किया जा सकता सिवाय इस तरह के लोगों की बुद्धी पर तरस खाने के

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  18. दो अलग-अलग विष-बेलों पर चिंतन का बेहतर सामंजस्‍य.
    अगली पोस्‍ट के इंतजार में.

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  19. सबसे पहले क्षमाप्रार्थी देर से पहुँचने के लिए , विकृत मानसिकता उदाहरण सही कहा जा सकता है ।

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  20. @ ज़ाकिर अली साहब,
    शर्मनाक ही है !

    @ देवेन्द्र जी ,
    इन पर कार्यवाही किसी ब्लॉगगुरु के वश में नहीं है !

    @ चला बिहारी साहब ,
    फिल्मो के अंत व्यावसायिकता पर निर्भर करते हैं अतः दर्शकों की उम्मीद 'सुखांत' से पीछा नहीं छूटता !
    पोस्ट में उल्लिखित शर्मनाक तो है !

    @ संवेदना के स्वर बंधुओ ,
    भले ही शीर्षक में मैंने लड़की का नाम तीन डाट लगा कर छुपाया था पर एक मित्र ने आशंका जताई और उक्त फिल्म को सर्च भी कर लिया तो मुझे शीर्षक बदलना ही बेहतर विकल्प लगा !

    @ वाणी जी ,
    सोच ही रहा हूं कि इस मुद्दे पर एक पोस्ट और लिखूं !

    @ काजल भाई ,
    शुक्रिया !

    @ संजीव भाई ,
    देखते हैं आपका इंतज़ार कितना लंबा हो जाए :)

    @ प्रिय मिथिलेश जी ,
    देरी कैसी ,आपकी प्रतिक्रिया सही है !

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  21. फर्जी आईडी पर आपकी टिप्पणी राजतंत्र पर देखी। मेरे ख्याल से ID कोई भी फर्जी नहीं होती है। एक नाम से दुनिया में हज़ारों लोग होते हैं, आईडी तो एक को ही मिलेगी ना। बाकी लोग दूसरे नामों से अपनी आईडी बना लेते हैं। ऐसी आईडी को फर्ज़ी नहीं ठहराया जा सकता। ये मेरा मानना है आपकी राय मुझसे जुदा हो सकती है। कुछ ऐसे लोगों को भी फर्ज़ी आईडी वाला मान लिया जाता है जो अपनी पूरी जन्म पत्री, अपना फोटो नेट पर नहीं डालते हैं। मेरे ख्याल से ऐसे लोगों को भी गलत ठहराना ठीक नहीं होगा। ये मेरे विचार हैं, आप क्या कहते हैं?

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  22. आदरणीय / प्रिय बेनामी जी ,
    ये सच है कि दुनिया में हजारों लोगों के नाम कामन हो सकते हैं और फिर एक नई पहचान के साथ नेट अकाउंट खोलने की मजबूरी हो भी सकती है ! यही नहीं अपना प्रोफाइल छुपाना भी किसी तार्किकता / मजबूरी पर आधारित हो सकता है जैसे कि आपने मुझसे संवाद करते वक्त किया है ! यकीन जानिये मुझे इस बात से व्यक्तिगत रूप से कोई समस्या नहीं है कि कोई किस नाम से नेट एकाउंट खोलता है , क्योंकि मुझे उस अधिकार पे विश्वास है जो उस बंदे का है ! लेकिन अगर कोई बन्दा अपने इस गोपन प्रोफाइल वाले नाम का इस्तेमाल किसी दूसरे बंदे को 'टीज़' करने के लिए करता हो तो मुझे गोपन प्रोफाइल की नेकनीयत पर शक करते हुए ये स्वीकारना होगा कि यह इंटेशनल / जानबूझकर है ! उस हालत में मुझे पीड़ित बंदे की चिंता को जायज़ कहना ही होगा और उसकी चिंता के अधिकार को स्वीकार करना होगा !

    मेरा आशय केवल इतना जानिये कि पहचान की गोपनीयता का हक़ तो सभी को है पर "गोपनीयता का मंतव्य" फर्जी और गैरफर्जी की सीमारेखायें तय करेगा !

    मित्रवर मुझे आपके और ग्वालानी जी के संबंधों की मधुरता / कटुता / सामान्यता का ज्ञान नहीं है और उसमें मेरी रूचि भी नहीं है ! पिछले समय भी मैंने आपसे पहचान विषयक कोई आग्रह नहीं किया था , आज भी नहीं कर रहा हूं और इससे आगे भी नहीं करूँगा क्योंकि ये आपका अधिकार है जिसका मुझे सम्मान करना है बस इसी भावना से मुझे ग्वालानी जी की छोटी या बड़ी अस्मिता / पहचान के अधिकार को स्वीकार करने दीजियेगा यह आपसे अनुरोध है !


    आपने पिछली बार भी मेरी पोस्ट पर कोई टिप्पणी नहीं की थी और आज भी तो क्या मेरा विषय चयन और लेखन ...? :)

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  23. पहले तो मैं शीर्षक पढ कर सोचा कि नई पोस्‍ट आ गयी, लेकिन फिर बाद में पता चला कि मामला फुस्‍स।

    हॉं, एक सवाल है, आपने तीन चार ब्‍लॉग अलग से बना तो लिये हैं, पर उनपर भी कुछ कीबोर्ड की खटर पटर भी शुरू करें, निराश लौटते हुए दुख होता है।

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    बोलने वाले पत्‍थर।
    सांपों को दुध पिलाना पुण्‍य का काम है?

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