रविवार, 17 अक्तूबर 2010

तब मै था और तुम भी थीं पर ...

कौन जाने प्रेम एक अनुभूति है ? महज़ ख्याल ? एक आकर्षण...रूहानी या कि जिस्मानी...? पर...जो भी हो,उसके ना होने का तो सवाल ही नहीं उठता...उसका होना तय है ! फक़त मुझमें और तुममें उसकी मौज़ूदगी यक़ीनन उसे लम्हों की बंदिशों में बांधती होगी वर्ना वो तो हम दोनों के होने से पहले भी मौजूद था और बाद में भी रहेगा ! उसका शाश्वत होना कम उम्र इंसानों के रिश्तों को हज़ारों हज़ार सालों से अमरत्व बख्शता आया है ! दर हक़ीक़त नस्लें अपने  खुद के होने  के लिये उसके होने  की मोहताज़ हैं ! तो जब तुम मुझसे पहली बार मिली थीं तो वह केवल प्रेम ही रहा होगा जिसकी वज़ह से हम साथ हुए...बस ऐसे ही हम जैसे दूसरे भी एक साथ हुआ करते होंगे ! 

सोचता हूं कि ये धरती कब और कैसे बनी...सूरज से टूट कर या नहीं भी...फिर उसमें हम पहली बार कब...कहां और कैसे नाज़िल हुए ? योनिज...अयोनिज...सीधे, आडे, तिरछे, गोल...रेंगते...कुलबुलाते...बिलबिलाते हुए...? अंडों की शक्ल में ? चौपाये...दोपाये या कि किसी और तरह से धरती पर हमारे अनायास ही हो जाने के साक्ष्य में समय भी मौन है और इतिहास भी...यहां तक कि विज्ञान भी परिकल्पनाओं के भरोसे...यूं समझो कि इस मसले में विशुद्ध सत्य जो भी है, कहना मुश्किल है...पर तब से अब तक, अपनी दैहिक नश्वरता के बावज़ूद तुम्हारी और मेरी लगातार मौज़ूदगी बतलाती है कि प्रेम उस प्रथम दिन भी था और आगे भी तब तक बना रहेगा जब तक कि हम सब बतौर इंसान जीवित बने  रहना चाहें !   

अभी अभी तो हम दोनों अपने जैसों से मिलकर लौटे है...हूबहू हमारे सी रंगत...कद्रों और फिक्रों वाले इंसान ! तुम खूब जानती होओगी कि हम सा हर जोड़ा इंसान एक दूसरे की फिक्रों में मुब्तिला होकर ही दिन गुज़ारता आया है !...ये फिक्रें अव्वल तो दोपायों को जोड़ा बनाती हैं फिर जोड़ों को समूह और आगे उससे बडा समूह ! तब तो जोड़ों और समूहों के अस्तित्व और उनकी निरंतरता / अमरता के लिये फिक्रें और फिक्रों के लिये प्रेम की मौज़ूदगी अनिवार्य हुई ना ? ख्याल ये कि धरती पर हमारी मौजूदगी के पहले दिन से ही प्रेम हमारे साथ बना हुआ है वर्ना ...

सोचता हूं कि तुमसे जोड़ा बनाने के बाद मुझे तुम्हारे साथ पूरी धरती का एक चक्कर लगाना चाहिए...उन सभी इंसानों को देखना...उनसे मिलना चाहिए...जिन्होने हमारी तर्ज़ पर प्रेम की मदद  से  घर और बस्तियां बसाईं हैं, हमारे इंसान होने और धरती पर हमारी नस्लों की लम्बी उम्र के लिये प्रेम की कृतज्ञता ज्ञापित करने का इससे बेहतर कोई और रास्ता हो भी नहीं सकता पर...इसके लिये मुझे, हम दोनों के लिये वीज़ा और पासपोर्ट की ज़रुरत पडेगी ! सुन रही हो ना ? वीज़ा और पासपोर्ट...हम जहां जहां जाना चाहें वहां के लिये ! जिस प्रेम की वज़ह से हम सब अमर हैं, उसी प्रेम की कृतज्ञता का ज्ञापन बिना पासपोर्ट और वीज़ा के मुमकिन ना होगा अब ! क्योंकि धरती उन दिनों सी कहां रह गई है,जबकि हम पहली बार वज़ूद में आये थे ! तब मै था और तुम भी थीं पर कोई देश नहीं था ! कहने को तो हम आज भी हैं पर धरती टुकडों में तब्दील हो चुकी है...

35 टिप्‍पणियां:

  1. मूल समानता के बाद भी धरती टुकडा टुकडा हो रही है सार्थक चिंता ! अच्छा आलेख !

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  2. "अपनी दैहिक नश्वरता के बावज़ूद तुम्हारी और मेरी लगातार मौज़ूदगी बतलाती है कि प्रेम उस प्रथम दिन भी था और आगे भी तब तक बना रहेगा जब तक कि हम सब बतौर इंसान जीवित बनें रहना चाहें ! "



    क्या बात है.........अली साहब पूरा लेख बहुत सुन्दर है. प्रणाम स्वीकार करें.

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  3. प्रवृत्ति है अनुहार ढूंढने की

    इसीलिये ठगा जाता हूँ मैं॥

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  4. अली सा! दिलों के बीच दीवारें भले न हों, मुल्कों के दरम्यान इतनी सरहदें हैं कि आप वीज़ा की बातें करते हैं, हम तो फोन भी नहीं कर पाते डर से... ई मेल आया
    “भाई जान! इनकी तबीयत बहुत ख़राब है. आपकी आवाज़ सुनना चाहते हैं!”
    मजबूरियाँ और ख़ौफ़ ऐसा कि न जावेद भाई का दर्द सुन सकते हैं न दिलासा दे सकते हैं.... मोहब्बत कायम है... और रहती दुनिया तक कायम रहेगी! आमीन!!
    आपने दर्द की सीवन खोल दी!! कहते हैं न मुर्दे का कफन जितनी दफा सरकाओ, उतनी दफा रोना आता है!

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  5. हम सा हर जोडा इंसान एक दूसरे की फिक्रों में मुब्तिला होकर ही दिन गुज़ारता आया है !...ये फिक्रें अव्वल तो दोपायों को जोडा बनाती हैं फिर जोडों को समूह और आगे उससे बडा समूह ! ... और यही फिक्रें इस समूह को एक दूसरे से बांधें रखती है। इन समूहों का, बस्तियों का कोई नाम, सीमा भले ही तय कर दिया गया हो किन्‍तु इस प्रेम के अंकुरण से उपजे समूह के लोगों के दिलो के बीच स्‍नेह और प्रेम की उपस्थिति ही उनके अस्तित्‍व को कायम रखती है। इस प्रेम की मदद से बसे घरों फिर बस्तियों में रहने वाले जोड़ों के बीच पहुचकर प्रेम की कृतज्ञता ज्ञापित करने की आकांक्षा भावनात्‍मक मन में ही पैदा होती है, आपके इस अनोखे प्रेम दर्शन व प्रेम चिंतन के लिए धन्‍यवाद भईया। .... दो दिलों के बीच का यह प्रेम ही संपूर्ण विश्‍व का मूल है यदि इस दुनिया में कोई परमात्‍मा, ईश्‍वर, खुदा है तो वह प्रेम ही है, इस प्रेम के डोर ने ही जीवन को संभव किया है।

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  6. हम्म.. मियां मजाल ऐसे कोई अनुभवी तोप तो है नहीं, फिर भी जितना भी थोड़ी बहुत सोच समझ रखते है, उसके मुताबिक़ अपने को दुनिया में ऐसा कोई बदलाव नहीं दिखता. अच्छे बुरे लोग तो हर समय हर जगह मौजूद रहतें ही है. ज्यादा दूर क्यों जाएं, अपने अन्दर ही लगभग हर तरह की अच्छाई और कमीनापन मिल जाता है ... हाँ, आजकल खबरें बहुत जल्दी फैलती है.. दुनिया भर में क्या हो रहा है, वो घर बैठे ही पता चल जाता है, और मीडिया ज्यादातर सनसनीखेज़ खबरों में ही दिलचस्पी दिखता है, तो इस तरह की खबरें आस पास ज्यादा सुने पड़े, तो कभी कभी ऐसा लगने लगता है की कुछ गड़बड़ है ... पर फिर थोड़ी देर बाद मूड खुद ही ठीक हो जाता है ...

    खैर, नफ़रत भी मौजूद तो रहती ही है हमेशा से ही, पर जो कुछ भी हो, आखिर में तो आदमी प्यार ही चाहता है, जीवन का आधार तो प्रेम ही है...

    लिखते रहिये ...

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  7. @ रमेश केटीए जी ,
    शुक्रिया !

    @ विचार शून्य साहब ,
    आपको लेख सुन्दर लगा बस यूं समझिये कि ये मेरी मेहनत का सुफल है !

    @ समीर लाल जी ,
    शुक्रिया !

    @ स्मार्ट इन्डियन जी ,
    प्रेम में ठगे जाने का सुख सबको कहां मिलता है :)

    @ संवेदना के स्वर बंधुओ ,
    एक बेहतर टिप्पणी पाकर खुश हूं ! और ये मुर्दे के कफ़न पर रुदन वाला मुहावरा भी खूब है !

    @ संजीव भाई ,
    आपकी शानदार टिप्पणी मेरी पोस्ट को मुकम्मल करती है ! मैं भी सोचता हूं कि ईश्वर अगर है तो उसे केवल प्रेम ही होना चाहिये !

    @ मजाल साहब ,
    प्रेम के साथ नफरतों की मुतवातिर मौजूदगी पर कोई ऐतराज नहीं बस इतनें में ही खुश हूं कि प्रेम को नफरतों पर हमेशा बरतरी हासिल रही है और दुआ ये कि आगे भी ऐसा ही हो !

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  8. बहुत ही सार्थक चिंतन...
    प्रेम से ही यह दुनिया अस्तित्व में आई और आज इसी दुनिया से प्रेम तिरोहित होने लगा है...पर किसी कोने, कन्दरे में बसा प्यार..अपनी उजास से आलोकित करता रहेगा, समाज को...और जबतक दुनिया रहेगी...यह लौ चाहे मद्धम हो जाए...बुझेगी नहीं..इतना विश्वास तो है.

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  9. अली भाई, कैसे इतना डूब कर लिख लेते हैं आप? यकीन जानिए, समझ में नहीं आ रहा कि टिप्पणी में क्या कहूँ? बहुत सुन्दर, शानदार, लाजवाब लिखना आपकी लेखनी की तौहीन होगी शायद।

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  10. बड़ी प्रभावी और प्रेरणादायी आलेख !

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  11. .. क्योंकि धरती उन दिनों सी कहां रह गई है जबकि हम पहली बार वज़ूद में आये थे ! तब मै था और तुम भी थीं पर कोई देश नहीं था ! कहनें को तो हम आज भी हैं पर धरती टुकडों में तब्दील हो चुकी है...
    .....धरती टुकड़ों में बंट चुकी है..इंसान धर्म और जातियों में मगर प्रेम का एहसास आज भी देखने को मिल ही जाता है..जहाँ आप जैसे इंसान हों वहाँ धरती को इसका अभाव नहीं खलेगा।
    ....सुखद एहसास कराती नायाब पोस्ट के लिए आभार।

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  12. @ रश्मि जी ,
    ये उम्मीद / विश्वास हमेशा कायम रहे ! आमीन !

    @ ज़ाकिर भाई ,
    कभी कभी इस किस्म की तौहीन भी होती रहना चाहिये :)

    @ देवेन्द्र भाई ,
    बहुत बहुत शुक्रिया !

    @ मासूम साहब ,
    हौसला बढानें के लिए शुक्रिया !

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  13. ऐसा गंभीर द्वैताद्वैती चिंतन,वाह. आपकी पोस्‍ट में 'ने' पर अनावश्‍यक अनुस्‍वार क्‍यों दिखाई देता है.

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  14. @ राहुल सिंह जी ,
    'ने' को चेक करता हूं ! शुक्रिया !

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  15. 6.5/10

    खुबसूरत पोस्ट
    पढ़कर लगा मानो दिल ने कलम थामी हो.
    ऐसा लेखन जाने कितना कुछ कह जाता है

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  16. बहुत से देश तो अब बस वीज़ा-पासपोर्ट को ही अपनी सीमाओं की सुरक्षा के लिए प्रयोग कर रहे हैं पर नाटो व अमरीका के नेता लोगों को रोक पाने में क़ामयाब नहीं हो रहे हैं. जहां तक बात प्रेम की है, वह निश्चय ही अनुभूति भर है...वीज़ा-पासपोर्ट दोनों से विमुक्त, जब तक कि कोई नींद से जागकर उस पार जाने की ज़िद ही न पकड़ ले...

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  17. आपके दिल की कलम बड़े दिल से चलती है...दिल की बातें बड़े दिल से आप कह जाते हैं और हम सोचते रह जाते हैं कि हमारे दिल में ऐसे ख्याल क्यों नहीं आते हैं...
    गज़ब..

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  18. वाह आप लिखते हैं तो बस अपने साथ सबके हृदय का पिटारा भी खोलकर रख देते हैं।
    घुघूती बासूती

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  19. @ काजल भाई ,
    उन्हें सुरक्षा की जरुरत क्यों आन पड़ी :)
    अनुभूति के लिए शुक्रिया !

    @ अदा जी ,
    बस यूं समझिए कि आप ही की वज़ह से ये ख्याल दिल में आ पाए , बहुत शुक्रिया :)

    @ घुघूती बासूती,
    आपने इसे सबके लिए स्वीकारा बस यही काफी है !

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  20. अली साहब,
    ’चंद्रधर शर्मा गुलेरी’ जी ने लिखा था,
    "जीवन का है अंत, प्रेम का अंत नहीं,
    इस कल्प तरू के लिये शिशिर हेमंत नहीं।"

    प्रेम सनातन है, शाश्वत है।

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  21. आपके चिंतन का विस्तार तो मनन करने लायक है।

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  22. अली भाई, लिखते हैं कि हम लोगों को आईना दिखाते हैं...अब बार बार शर्मिंदगी नहीं झेली जाती :)

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  23. @ मो सम कौन ? जी ,
    एक तरह से देखूं तो जीवन भी टुकडा टुकडा ही सही, इस शाश्वत प्रेम का चिर सहयात्री है! आपका शुक्रिया !

    @ दिनेश भाई ,

    अब आप मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं :)

    @ शरद भाई ,
    शुक्रिया !

    @ राम त्यागी जी ,
    आपका बहुत आभार !

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  24. kyaa kahein...?

    sab pahle hi comments mein kahaa jaa chukaa hai...

    sab bhool kar dobaaraa aayeinge ...

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  25. बहुत ही सुंदर.
    http://sudhirraghav.blogspot.com/

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  26. प्रेम पर पढ़ना भारू है ! सोचना और भी ! गोया , यह फील्ड ही डेंजरस है ! इसलिए पढ़ गए पर बिना लोड लिए !

    छूट गए मनु के प्रेमपत्र के कई अंक ! पढ़ना फिर सोचना , कठिन सा !

    फिर भी हर व्यक्ति की भावनामयता में व्यक्तिनिष्ठता रहती है , जिसका सम्मान किया जाना चाहिए ! आपकी बातों के प्रति ससम्मान हूँ ! आभार !

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  27. बहुत खूब लिखा है अपने....

    एक दम स्पष्ट.....

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  28. धरती टुकड़ों में नहीं बल्कि दिल के टुकड़ों में हम तब्दील हो गए हैं

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  29. सच है प्रेम पहले आया .... लोग आए ... फिर देश धर्म और जाती .... आज प्रेमियों को खोजने जाने के लिए वीसा की दीवारें हैं..... आपका चिंतन वाजिब है ...

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  30. @ मनु जी ,
    आपने आलेख पढ़ा ! बस प्रतिक्रिया ज़रुरी नहीं है !

    @ सुधीर जी ,
    शुक्रिया !

    @ अमरेन्द्र जी ,
    इस फील्ड के खतरों में हमेशा आपके साथ, एक मित्र की तरह से मुझे मौजूद पायेंगे !

    @ राबी ग्रे साहब ,
    शुक्रिया !

    @ अरविन्द जी ,
    ये भी एक पक्ष है !

    @ डाक्टर हरदीप संधू जी ,
    शुक्रिया !

    @ दिगम्बर नासवा जी ,
    हार्दिक आभार !

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