मंगलवार, 3 अगस्त 2010

कुछ चिपचिपा कुछ तरल सा ...

पिछली गर्मियों की एक  सुबह अपने पड़ोसी मित्र के साथ घर के आंगन में गपशप का दौर चल रहा था , उनका ख्याल था कि मुझे अपने बगीचे में फूलों से ज्यादा सब्जी भाजी उगानी चाहिये ,जिससे कि मेरे माहवाराना बजट पर थोड़ा बहुत पाजिटिव  फर्क पड़ना तय है ... और ये फूल वूल  इनका क्या  ?  अभी खिले और अभी मुरझा गये  !  वे अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर हैं और प्रेम  भी नाप तौल कर करते हैं ! उन्होंने  कुल जमा 3000 वर्ग फीट जमीन  में चार फ्लेट बनवाये  , एक में खुद बसे और बाकी तीन किराए पर !  इधर अपने राम एक छोटी सी खोली और बाकी सात आठ हजार स्कवायर फीट जमीन खाली का अर्थशास्त्र ! दोस्ती हमारी तकरीबन 28 बरस पुरानी , बस ऐसे ही उत्तर दक्षिण अर्थशास्त्र पर निभे जा रही है !

हमारी बातें हमेशा की तरह , शुद्ध पैसे की व्यवहारिकता...से लेकर तितलियों , मधुमक्खियों और परिंदों की चाहत के कल्पनालोक के दरम्यान बेनतीजा झूलती हुई ...अचानक बाहरी गेट पर एक अर्धनग्न किशोर चिल्लाया अंकल जी घर की खिड़कियां बंद कर लीजिये...मैंने पूछा सारी खिड़कियां बंद कर लूं  ?  भला  क्यों ? उसने कहा सड़क के उस पार काम्प्लेक्स से हम छत्ता तोड़कर शहद  निकालने  वाले हैं ,  मधुमक्खियां इस तरफ आ सकती हैं ,  उसकी बात में दम था , लगभग भागते हुए  सारे घर में कर्फ्यू लगा दिया गया ! बीबी बच्चे और हम दम साध कर बैठ गये  कोई आधा घंटा गुजरा मधुमक्खियों के हमले का कोई संकेत नहीं , हिम्मत करके वापसी  दोबारा आंगन में ! थोड़ी देर में वही किशोर फिर से नमूदार हुआ और चिल्लाया अंकल जी शहद लेंगे? मैंने  पूछा  निकाल लिया ? उसने कहा हाँ  !  ठीक है , आता हूँ , वही देखूंगा ...

मित्र के साथ सड़क पर पहुंचे तो पाया कि शहद  का एक बड़ा सा छत्ता सड़क के किनारे पडा हुआ है और बाल्टी में  शहद बिकने के लिए  तैयार ! कुछ और लोग भी खरीदार की शक्ल में बाल्टी को घेरे हुए शायद उन्हें भी हमारी तर्ज़ पर आमंत्रित किया गया था ! छत्ते की मौजूदगी से सम्मोहित ग्राहकों में शुद्ध शहद की खरीदी के नाम से पहले  मैं ,पहले मैं,की होड़ सी लग गई...आखिर में बचे मैं ...मेरे पडोसी मित्र और उनका अर्थशास्त्र !  मित्र ने शहद की जांच परख शुरू की तो विक्रेतागण भाग खड़े हुए ,पता चला कि  टूटा हुआ छत्ता और खिडकियां बंद करवाना , शहद की विश्वसनीयता स्थापित करने का बिजनेस टेक्ट मात्र था वर्ना वो तो गुड का शीरा ही था ! भय के मनोविज्ञान और जीवंत विज्ञापन से पैसे कूटने का यह उपक्रम  मधुमक्खियों की सृजनधर्मिता से छल और शहद के औषध गुणों के नाम से व्यावसायिक ठगी के अलावा और क्या माना जाये  ?

इधर  इंसानों ने भी समूहों में बंध कर शताब्दियों की मेहनत और कुदरत के साथ अपने तालमेल बतौर कुछ  छत्ते डिजायन किये हैं जिनमें शहद सा कुछ चिपचिपा कुछ तरल सा...औषध गुणों से परिपूर्ण जीवनदाई प्रेम रस बसता है ! अभी कल ही कुछ लड़के,सड़कों पर चिल्लाते हुए, लड़कियों को पीटते हुए नमूदार हुए,खूबसूरत चेहरों पर कालिख पोतते हुए ! रमने वाले  देवता निश्चय ही भाग लिए होंगे वहां से...क्योंकि पूज्यनीय नारियां गिर गिर पड़ रही थी ज़मीन पर कटे हुए छत्तों सी ...गालियों के मंत्रोच्चार के बीच ! लातों से अभिषिक्त ! पुजारियों...ओह...आई एम सॉरी...इन व्यापारियों की बाल्टियां भी कथित भारतीय संस्कृति के तारकोलीय शहद से भरी हुई थीं और वे भी आतंकित कर थोप रहे थे अपनी कम्पनी का शहद ! अपने गुड का शीरा !


[ मेरे ख्याल से बेचारी मधुमक्खियां  , बाजारवाद और राजनीति का शिकार हो चलीं हैं ]


37 टिप्‍पणियां:

  1. बनारसी ठग वहां भी हैं क्या ?रही बात जब रमन्ते देवता वहां नहीं थे तो आप क्या कर रहे थे ? केवल आँखों देखी रपट से काम नहीं चलेगा ? या एक दम्मै चुप्पी ही लगा लिए होते बाकी ई सब त चलतै रहे ...

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  2. :) हमारे मुहल्ले में जलेबी के बचे हुए शीरे को प्रसंस्कृत कर मधु बनाने वाला एक था। उसके तरीके भी ऐसे ही भौकाल पैदा करते थे।
    असल में मीठापन है ही ऐसा कि जैसे जैसे अधिक होता जाता है,वैसे वैसे उसके साथ और उसके खिलाफ 'तीत' किस्म के लोग जुड़ते चले जाते हैं। यह पब्लिक को मधुमेह से बचाने का प्राकृतिक तरीका है। :)
    रही बात प्रेम वेम दोस्ती फोस्ती की तो इनके सार्वजनिक अश्लील प्रदर्शन अब आम हो चले हैं। चौंकाने वाला पहलू है कि स्कूलों में पढ़ते बच्चे स्कूटी पर आगे पीछे बैठ स्तन मर्दन, अंग स्नेहन और चुम्बन जैसे काम पूरी निर्लज्जता से करते देखे जा सकते हैं - चलती गाड़ी पर भी जिसमें लड़की ड्राइव करती है। स्कूटी को मैं यौन उन्मुक्ति का वाहक मानने लगा हूँ :) इस पर प्रति दिन के हिसाब से सेक्स टैक्स जैसा कुछ लगा देना चाहिए। सरकार को बड़ी आमदनी होगी।
    भीड़ की मानसिकता से ग्रस्त इसके खिलाफ ऐसे उग्रपंथी ऐक्शन लेते हैं जो ग़लत हैं क्यों कि उनकी सोच का अगाड़ा पिछाड़ा ठीक नहीं है।
    लेकिन सवाल यह भी उठता है कि बच्चों को मर्यादा के पाठ कैसे और किस तरह पढ़ाए जाँय?
    अब आप यह न कहिएगा कि खुद तो गुलगुल्ला खा लिए, अब दूसरों के लिए परहेज के तरीके ढूँढ़ रहे हैं। मुझे वाकई यह समस्या सी लगने लगी है, हमारा जमाना बहुत मर्यादित था।

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  3. कुछ घटनाओं से लगता है कि कबीलों की दुनिया में आ गए है।
    संस्कृति का तालिबानीकरण ठीक नही है।

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  4. हम कालोनी में रहने वाले शहरिया लोगों को कोई भी आसानी से बेवकूफ बना सकता है. किसी ने कहा छत्ता टूट रहा है और हम खिड़कियाँ बंद कर बैठ गए घर के अंदर. गांव होता तो सिर्फ देखने के लिए मजमा लग जाता.
    ...छत्तों के माध्यम से आपने जो चिपचिपी संस्कृती पर व्यंग्य किया है वह लाज़वाब है.

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  5. बहुत सही मुद्दे पर बात...बेहतरीन पोस्ट.

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  6. आपकी लेखनी सहज बोल गयी..जो भी आज हो रहा है....
    सदियों लगीं तब जाकर बन पाया है यह संस्कारों का छत्ता, प्रेम रस से पगे इस छत्ते में कोलतार अगर जगह पाना चाहे तो छत्ता ही टूटेगा...
    बहुत सुन्दर प्रस्तुति..
    आभार...

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  7. कथित भारतीय संस्कृति के तारकोलीय शहद से भरी हुई थीं और वे भी आतंकित कर थोप रहे थे अपनी कम्पनी का शहद !
    गज़ब ...
    अच्छी पोस्ट ...

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  8. अली साहब ये आपकी और आपके मित्र कि सभ्यता है जो आपने शहद के नाम पर गुड का शीरा दिखा आपको धोखा देने का प्रयास कर रहे लम्पटों को आसानी से जाने दिया. पर सभी कि मानसिकता ऐसी नहीं होती. कुछ लोग प्रेम रूपी शहद के नाम पर कामुकता के उतने ही मीठे पर अशुद्ध शीरे को यूँ शहद के नाम पर खुले में प्रदर्शित होते हुए नहीं देख पाते और अपनी मानसिकता के आधार पर प्रतिकिर्या करते हैं.कुछ कि पशुवत मानसिकता होती है. कुत्ते को जो भी संग्दिग्ध लगेगा उस पर वो तो भोकेगा ही. इस में कुत्ते कि मानसिकता पर दोष ना देकर हमें संदिग्ध व्यक्ति को ठीक से व्यव्हार करने के लिए बोलना होगा. अली साहब अपने अपनी बात को बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया. और मुझे एक नया शब्द मिला माह्वाराना अभी तक तो इससे मिलता जुलता दूसरा शब्द ही सुना था.

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  9. Badi tanmaytase padha!
    Mere blog(Bikhare Sitare)pe aapka sawal:Ketkee ka naamkaran:Pandit ji ne devnagree ka 'ke'akshar naam ke liye bataya aur 'ketkee'naam rakha gaya.

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  10. वाह. क्‍या कहने. रिपोर्ट, कहानी बनते बनते कविता बन गई है. एक पूरी कविता. बहुत खूब.

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  11. @ रमेशकेटीए जी ,समीर भाई ,
    शुक्रिया !

    @ बेनामी जी ,
    फिर तो उन्हें भी इसी तर्ज़ पर रोकने वाले भी गलत नहीं माने जायेंगे :)

    @ अरविन्द जी ,
    हाथ पैर नही चलते सो जुबान चला ली :)

    @ गिरिजेश राव जी ,
    प्रेमलीन व्यक्ति का मित्र गुलगुलों पर शिकायत कैसे करेगा :)

    अश्लीलता और मर्यादा पर आपसे सहमत ! स्कूटी वाले टेक्स का सुझाव समस्या की न्यायिक रोकथाम है,सो उसपर भी सहमत !

    @ ललित शर्मा जी ,
    सही है ! तालिबानीकरण का ही एक वर्शन है ये !

    @ बेचैन आत्मा ,
    भाई देवेन्द्र जी शहरी लोगों पर आपकी राय वाज़िब है! प्रविष्टि पसन्द करने के लिये आपका आभार!

    @ समीर लाल जी ,
    शुक्रिया !

    @ अदा जी ,
    आपका स्वागत है !

    @ वाणी जी ,
    शुक्रिया !

    @ विचार शून्य साहब ,
    सार्वजनिक स्थलों पर अशालीन / अमर्यादित / कामुक व्यवहार , व्यक्तिगत रूप से मुझे भी स्वीकार्य नहीं , किंतु मेरा विश्वास कानून व्यवस्था पर अब भी है ! यदि कानून लचर लगें तो उन्हें बदलने के लिये उस ऊर्जा का इस्तेमाल हो जो अनाधिक्रत रूप से लडकियों को पीटनें में व्यर्थ की गई ! उम्मीद है आप मेरे नज़रिये से संतुष्ट होंगे ! आपकी टिप्पणी लिखनें पढनें वालों को हौसला देती है ! शुक्रिया !

    @ क्षमा जी ,
    आपने आलेख पढा ,आभार !
    केतकी का नामकरण पंडित जी के सुझाये 'के'
    से हुआ ! मुझे लगा था कि इसमें आपके सम्वेदनशील मन की कोई भूमिका होगी !

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  12. बहुत खूब, अली साहब, क़ूज़े में समंदर भर दिया है. दिलवालो के यहाँ अर्थ-शास्त्र की परिभाषा बदल ही जाती है.

    # अब बाग़बान बन गए सब्ज़ी फरोश है,
    समझे ना 'अर्थ-शास्त्र' वो खाना बदोश है,
    इज्ज़त के ठेकेदार सड़क पर उतर लिए,
    इफ्फ़त का जिनको पास वो चुप है,ख़मोश है.

    # एक 'व्यापारी' अपने विवेक से यूं भी ठगा गया एक बालक से!.......

    भद्रता
    थप-थप-थप,
    कन्क्रीट की आफ़िस पे लगे शीशे के बंद दरवाज़े को थपथपाने की आवाज़,
    साधारण वेश में एक परेशान बालक की छबी,
    हिलते हुए औंठ, पुनः थप-थप…
    उंगली का इशारा पाकर, पट खोल, केवल सिर ही अन्दर करने का साहस
    जुटाटे हुए…कुछ बोलने की असफल कौशिश !

    इससे पहले कि शब्द उसकी जिव्हा का या जिव्हा उसके शब्दो का साथ दे,
    मैने, अपने हाथ में बची हुई, संतरे की दौनो फ़ाँके उस बालक के हाथ
    पर रख दी!
    (सचमुच, मैरे पास उस वक्त 'छुटटा' कुछ नही था)

    आश्चर्य मिश्रित दर्द का भाव उसके चेहरे पर आकर चला गया।
    "कस्तूरी, बाबूजी कस्तूरी लोगे ?"
    उपर से नीचे तक उस बालक को देखते हुए,
    शब्द खर्च करने की भी आवश्यक्ता न समझते हुए,
    इन्कार में सर हिला दिया।
    चेहरे की मायूसी और गहरी हो गयी,
    दरवाज़ा धीरे से बंद हो गया।
    बंद होते दरवाज़े में से एक तीव्र मगर मधुर सुगंध कमरे में घुस आई,
    पूरा कमरा महक उठा, मन हर्ष से भर गया।

    यकायक कस्तूरी और उस बलक का विचार आया,
    बाहर लपका, सुनसान सड़क पर कोई न था।
    सामने व्रक्ष तले,सदा बैठे रहने वाला बूढ़ा बिखारी,
    संतरे की दो फ़ाँको को उलट-पलट कर आश्च्चर्य से देख रहा था।
    शायद पहली बार मिली हुई ऐसी भीख को,
    और मै ग्लानिवश! फिर आफ़िस के कमरे में बंद हो गया।

    कस्तूरी की महक तो क्षणे-क्षणे क्षीण हो लुप्त हो गई,
    मगर उस बालक की याद की महक अब भी मस्तिष्क में बसी हुई है,
    जिसने मैरी दी हुइ सन्तरे की फ़ांके सिर्फ़ इसलिये स्वीकार कर ली
    कि मैरी दान-वीरता का भ्रम न टूटे…
    …या अपने हाथ पर सह्सा रखदी गई दया की भीख इसलिये वापस नही की कि सुसज्ज कक्ष में बैठा हुआ तथाकथित भद्र-पुरुष ख़ुद को
    अपमानित मह्सूस न करे!

    भद्र तो वह था, जो ज़रूरतमंद तो था, भिखारी नही,
    ख़ुश्बू बेचना चाह्ता था,ठगना नही।
    'ठगा' तो मै फिर भी गया, अपने ही विवेक से,
    जिस विवेक ने मुझे बुद्धिजीवियो (?) की अग्रिम पंक्ति तक पहुंचा दिया है,
    परन्तु मै बहुत पीछे रह गया हूँ उस बालक से जो ख़ुश्बू का झोंका बन
    आया और मुझसे बहुत आगे निकल गया है!!

    मन्सूर अली हाशमी

    चैनल: Blog, हाशिमियात

    -mansoorali hashmi

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  13. अली भाई, इंसान हमेशा से इस सभ्यता को चिपचिपा और गंधैला बनाता आया है। वही सब पहले भी होता था और आज भी हो रहा है। हम सिर्फ इसे होते हुए देख सकते हैं, बहुत होगा तो ब्लॉग पर पोस्ट लिख सकते हैं। इससे ज्यादा हमारे वश में कुछ भी नहीं....

    …………..
    स्टोनहेंज के रहस्यमय… ।
    चेल्सी की शादी में गिरिजेश भाई के न पहुँच पाने का दु:ख..

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  14. @ राजेन्द्र मीणा जी ,
    शुक्रिया !

    @ मंसूर अली हाशमी साहब ,
    आपका रिएक्शन पढकर खुशी हुई ! शुक्रिया !
    एक व्यापारी नें किसी खास लम्हें में जो भी गलती की हो ,उसका मलाल बड़ी बात है ! हर कोई अपने विवेक पे यूं पशेमान नहीं होता !

    @ ज़ाकिर भाई ,
    जिसके जो बस में है उतना तो करे :)

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  15. संस्कृ्ति रक्षा की चिल्लाचोट मचाए रखने वाले ये स्वयंभू ठेकेदार टाईप के जीव खुद भी भला कहाँ जानते हैं कि संस्कृ्ति किस चिडिया का नाम है....संस्कार, संस्कृ्ति जैसे शब्दों को तो इन्होने महज अपना उल्लू सीधा करने का साधन बना रखा है.....
    वैसे एक बात तो है कि हमारे संस्कार और संस्कृ्ति, बिना ये देखे कि व्यक्ति संस्कारित है कि असंस्कारित सबका समान भाव से हित साधने में लगे है...उपदेश झाडने वालों का भी और इसके नाम पर दबंगई करने वालों का भी....
    वैसे आज की पोस्ट में दर्शन से कहीं अधिक रस प्राप्त हुआ---कुछ चिपचिपा कुछ तरल सा :)

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  16. चलिए जानकर प्रसन्नता हुई व सुकून मिला कि आपके राज्य में संस्कृति सुरक्षित है स्त्रियाँ व प्रेमी, स्नेही युवक नहीं भी सुरक्षित हैं तो क्या दुख! असल बात तो संस्कृति है मानव तो बस यूँ ही बाइ द वे वाली चीज है, नश्वर है।
    स्कूटी पर कर तो लगना ही चाहिए क्योंकि इसे प्रायः स्त्रियाँ, लड़कियाँ उपयोग करती हैं। क्यों न उनके घर से बाहर निकलने पर भी कर लगा दिया जाए! बहुत आमदनी हो जाएगी फिर मोटरसायकल पर कर समाप्त भी किया जा सकता है।
    लेख तो शहद पगा था किन्तु कुछ टिप्पणियाँ कोलतार पगी थीं।
    घुघूती बासूती

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  17. हाहाहा , बहुत खूब , लेकिन मज़ा तो तब और भी आता जा इसे खरीद लातें और घर में खूब वाट लगती है, खैर आप बच गए ये बढ़िया रहा , आपने जो अंतिम की लें में लिखा वह मुझे सबसे बढ़िया लगा, आपको पढना हमेशा अच्छा लगता, आपके भाषा प्रवाह से बहुत प्रभावित होता हूँ , और कुछ हिंदी भी सीखता हूँ .........................................

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  18. अली साहब,
    सुबह आपकी पोस्ट पर एक टिप्पणी की थी(अपनी तरफ़ से), जहां तक ध्यान आता है सब्मिट भी की थी और दूसरी विंडो में चला गया था। ये ताकाझांकी ले डूबी। सारी मेहनत बेकार गई और वो टिप्पणी शायद पोस्ट होने से रह गई। अब पूरा दिन दिमाग खपाकर आया हूं,अल्फ़ाज़ बदल गये हैं।
    अब सिर्फ़ इतना कह सकता हूं कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का पक्षधर होते हुये भी सार्वजनिक स्थानों पर अश्लीलता का भी समर्थन नहीं कर सकता और हिंसा का भी समर्थन नहीं कर सकता। जबरन किसी को उनके मन की करने से नहीं रोकना चाहिये, लेकिन स्वतंत्रता का (दुर)उपयोग करने वालों में भी इतनी नैतिकता तो होनी ही चाहिये कि आजाद हवाओं के पोस्ट ईफ़ैक्ट्स झेल सकें। जब अखबार में ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती हैं कि किसी ने किसी पर आरोप लगाया कि दो साल से दुराचार कर रहा था, और आरोप लगाने वाली कोई गरीब, बेचारी, अशिक्षित महिला नहीं बल्कि सुशिक्षित, समर्थ और आत्मनिर्भर श्रेणी से है, तो कैसा लगना चाहिये?
    आपकी पोस्ट जरूर पसंद आई, क्योंकि अपने को और कन्फ़यूज़ कर गई।

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  19. @ दिनेश भाई ,
    आपको चिपचिपा और तरल(दर्शन)रस का आस्वादन करते देख हमें भी बड़ी प्रसन्नता हो रही है :)

    [टिप्पणी में व्यक्त विचारों के प्रति आपका आभार ]

    @ घुघूती बासूती जी ,
    आपकी तल्खी सिर माथे पर !

    @ प्रिय मिथिलेश जी ,
    जरुर अनुज की शुभकामनायें रही होंगी जो वाट लगने से बच गई :)

    @ मो सम कौन ?
    भाई दुःख तो हुआ ये जानकार कि मूल मुझे मिला नहीं पर टिप्पणी के मामले में सूद से काम चला लूंगा :)
    व्यक्तिगत स्वतंत्रता ,सार्वजानिक अश्लीलता ,पर आपके विचारों से सहमत हूं !
    हां इतना जरुर है कि कानून को ठेंगा दिखने वाले संस्कृति ठेकेदारों के अधिकारिता के दावे पर एतराज है !
    मैंने १०-१५ वर्षों से ज्यादा शोषण वाले दावे भी सुने हैं ! दरअसल पारस्परिक सहमति से घट चुकी घटनाओं में कभी ना कभी विरक्ति / तिक्तता आ ही जाती है और फिर सारे सम्बन्ध कुरूप हो उठते हैं , ये इंसानी फितरत है ,बदले की भावना से जान भी ले लेने वाला इंसान , मान और सम्मान भी ले लेता है ! वो जितनी शिद्दत से प्रेम कर सकता है उतनी ही शिद्दत से घृणा भी !

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  20. @ स्कूटी प्रकरण
    बलिहारी जाऊँ ऐसे हास्य बोध पर !
    पढ़ना सेर भर, कहना जेर भर - यह पॉलिसी बस ऐसे ही रौ में अपनाई थी लेकिन आज जाने क्यों लगा कि बहुत समझदारी भरा निर्णय था।

    @ वो जितनी शिद्दत से प्रेम कर सकता है उतनी ही शिद्दत से घृणा भी !

    एकदम सही बात। प्रेम पुराण के बाद घृणा पुराण की योजना बना रखी है। आलस ने अनुमति दी तो वह भी लाऊँगा लेकिन टिप्पणी ऑप्सन बन्द कर के।

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  21. @ गिरिजेश जी
    'स्कूटी' को अशालीनता के विरुद्ध,सांकेतिक न्यायिक अवरोध मान कर मैं अपनी सहमति पहले ही दर्ज करा चुका हूं !

    प्रेम और घृणा पर लिखते हुये टिप्पणी बंद करने का विचार कृपया त्याग दें मेरे ख्याल से ये तो ऐसा हुआ कि पाठक के मुंह पर टेप चस्पा कर ,प्रतिक्रिया का गला घोंट दिया जाये !
    आपके मित्र आपकी पोस्ट पढ़ रहे हों और उनकी जुबाने बंद कर दी जायें यह कल्पना ही वाहियात लग रही है मुझे !

    उत्तर देंहटाएं
  22. .
    .
    .
    अली सैयद साहब,

    उम्दा पोस्ट!

    "इधर इंसानों नें भी समूहों में बंध कर शताब्दियों की मेहनत और कुदरत के साथ अपने तालमेल बतौर कुछ छत्ते डिजायन किये हैं जिनमें शहद सा कुछ चिपचिपा कुछ तरल सा...औषध गुणों से परिपूर्ण जीवनदाई प्रेम रस बसता है ! अभी कल ही कुछ लड़के,सड़कों पर चिल्लाते हुए, लड़कियों को पीटते हुए नमूदार हुए,खूबसूरत चेहरों पर कालिख पोतते हुए ! रमने वाले देवता निश्चय ही भाग लिए होंगे वहां से...क्योंकि पूज्यनीय नारियां गिर गिर पड़ रही थी ज़मीन पर कटे हुए छत्तों सी ...गालियों के मंत्रोच्चार के बीच ! लातों से अभिषिक्त ! पुजारियों...ओह...आई एम सॉरी...इन व्यापारियों की बाल्टियां भी कथित भारतीय संस्कृति के तारकोलीय शहद से भरी हुई थीं और वे भी आतंकित कर थोप रहे थे अपनी कम्पनी का शहद ! अपने गुड का शीरा !"

    अब कहे बिना मन मानता ही नहीं... कथित भारतीय संस्कृति के तारकोलीय शहद को दिन रात ब्लॉगवुड में बेचने का प्रयत्न करने वाले 'कुछ' आपकी इस पोस्ट के कशीदे पढ़ रहे हैं... भाई मन बदल गया क्या ?

    एक बात और यहाँ कहूंगा कि श्लीलता, वर्जनायें, मर्यादा और यौन नैतिकता के पैमाने लगभग हर पीढ़ी में थोड़ा अलग से होते हैं...हमेशा से ऐसा होता आया है और होगा... कोई आसमान नहीं टूटने वाला इस से... ठंड करिये भाई !


    ...

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  23. @ प्रवीण शाह जी ,
    आपकी टिप्पणी के तीसरे पैरे से शुरू करूँ ...! सारी वर्जनाएं , सारी वरीयतायें पीढ़ी से पीढ़ी यानि कि समय ही नहीं बल्कि स्थान से स्थान में भी अलग अलग होती हैं ! सहमत हूं इसीलिए अंदर कुल्फी जमा देने वाली ठण्ड रखकर ही लिखता हूं भाई :)

    अब दूसरा पैरा ...! आप हमेशा से आस्तिकता की वाट लगाते आये हैं फिर भी , आपकी बात में दुआओं का असर देखना चाहता हूं :)

    और पहला ... ! शुक्रिया !

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  24. ओह शक तो हमें भी होता था मगर आज आपने जो खुलासा किया तो सब साफ़ हो गया ..चलिए आगे से जब भी देखेंगे ये शहद वाली बाल्टी तो ध्यान रहेगा ...

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  25. विलम्ब से आने के लिए क्षमा ..
    स्कूटी-मामला एक रूपक की तरह था , और उसपर इतना भृकुटी-चाप ! इस बात पर एक शेर याद आया ---
    या रब न वो समझे हैं न समझेंगे मेरी बात
    दे और दिल उनको जो न दे मुझको ज़बां और ! ~ ग़ालिब
    बाकी आपकी बातों से सहमत हूँ .. क्या किया जा सकता है ? .. कोई हल ? ..
    और गिरिजेश भाई के कमेन्ट बंद करने की 'धमकी' पर आपका तर्क प्रति-धमकी की तरह है ! यही सही भी है ! आभार !

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  26. काश ऐसा सलूक करने वालों की गिरेबां के भीतर क्या है ये सबको पता चल जाए.. मिलावट तो अब व्यापार बन गया है.. सोचने पर मजबूर करती रही ये पोस्ट अंत तक..

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  27. @ अजय कुमार झा जी ,
    टिप्पणी और आगे सतर्क बने रहने के लिए शुक्रिया :)

    @ अमरेन्द्र जी ,
    [ क्या किया जा सकता है ? कोई हल ? ]
    भयावह ये कि इन संस्कृति रक्षकों को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है , अच्छे संकेत ये कि नागरिकों नें थाना घेर लिया और संस्कृति रक्षकों की गिरफ्तारी पर ही बात बनी ! वहां मौजूद संस्कृति रक्षकों के परिजन शर्मसार और रुआंसे हुए तो पर ये भी नहीं कह पाए कि गिरफ्तार बंदे हमारे अपने हैं ! लिहाज़ा जमानत फिलहाल नहीं हुई !

    @ प्रिय दीपक ,
    शुक्रिया !

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  28. पाइरेटिड साफ़्टवेयर और शहद, दोनों ही मुझे एक से लगते हैं ...बहुत मेहनत से बनाई चीज़ पर डाका. रही बात गलीबाज़ों की, वो तो लातों के भूत हैं. पुलिस को चाहिये कि कानून बघारने के बजाय, उन्हें पहले अपने पेटेंटेड अंदाज़ में ठीक से बजा ले...क्या मज़ाल है कि अगली बार ऐसा कुछ करें..

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  29. शहद का अर्थशात्र, समाज में चारो ओर रमने वाले विभूतियों का चोट और भिनभिनाती नि:शब्‍द मधुमख्खियों का ब्‍लेक होल्‍स में समाते विरोध का अनुभव कर रहा हूं।

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  30. चिपचिपी पोस्ट!
    हा हा हा....
    बहुत अच्छे बाऊ जी!

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  31. @ काजल जी ,
    'मेहनत से बनाई गई चीज पे डाका' ये बात संस्कृति पर भी लागू होती !

    @ संजीव भाई ,
    आपकी टिप्पणी में आपके प्रवास की थकान महसूस कर पा रहा हूं :)

    @ आशीष जी
    चिपचिपी अकेली कहां ? तरल भी :)
    शुक्रिया !

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  32. अरे, यह तो नटवरलाल निकला.सुन्दर पोस्ट. आभार.

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  33. पोस्ट पढ़ते हुए सोच रही थी......हमारे यहाँ भी अक्सर दो लड़के खिड़कियाँ बंद करने की ताकीद करने आ जाते हैं...पर फिर ध्यान आया. उस शहद में, छत्ते के टूटे हुए टुकड़े भी होते हैं...और बर्तन भी वे हमसे ही मांग कर ले जाते हैं तो शायद ....शायद हमें इस महानगर में शुद्ध शहद मिल जाता है...या क्या पता...कोई और रास्ता निकाल लेते हों,धोखा देने का ...कुछ कहा नहीं जा सकता.

    कुछ दिनों पहले एक किताब पढ़ी थी Princess of Saudi Arabia और पढ़ते वक़्त लगा , उसमे ७५% ऐसी बातें हैं जो भारत की स्त्रियों की स्थिति से मिलती जुलती हैं....यह लड़कियों के मुहँ पर कालिख पोतने और सरेआम पीटने की खबर सुन तो लगता है. ९०% स्थिति उस देश की स्त्रियों जैसी ही है. और हम उस देश को जाहिल कहते हैं.

    जब तक हर स्कूल में सह-शिक्षा शुरू नहीं होती और लड़के-,लड़कियों को सहज रूप से आपस में मिलने का अवसर नहीं दिया जाता ,स्कूटी हो या कार...इस तरह के uncomfortable scenes का सामना करना ही पड़ेगा.

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  34. अगर घटना सही है या ज्यों-की-त्यों है तब भी लघुकथा मान कर इसे अच्छा और बहुत बढिया कहूंगा।... रिपोर्ट या खबर से अच्छी लघुकथा। मुझे लगा वह लड़का उल्लू बना गया लेकिन उल्लू तो बनाया लेकिन दूसरी चाल से...

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  35. @ प्रिय चन्दन जी ,
    उल्लिखित दोनों घटनायें वास्तविक हैं ! हमने इस संस्मरण को दर्शन का लेबल दिया हुआ है !

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