सोमवार, 26 जुलाई 2010

बाज़ार से गुज़रा हूं खरीदार नहीं हूं मैं !

जन्माष्टमी के खास मौके पर घर के बेहद करीब का गुढ़ई बाज़ार खाली करा दिया जाता और उसके दोनों छोरों पर खालिस कानपुर से बुलाई गई दो नौटंकियां रात भर दर्शकों को आकर्षित करने में लगी रहतीं , सुबह तक मैदान के जिस छोर पर भीड़ ज्यादा बढ़ जाती , यह मान लिया जाता कि यही पार्टी दमदार है !गांव के तमाम लोग अपने अपने बैठने के लिए कुर्सियों , स्टूल्स , बैंचेस वगैरह का इंतजाम खुद करते...सारी बैठक शिफ्टिंग मोड में होती , अपनी कुर्सी उठाओ और चलो दूसरे छोर की तर्ज़ पर !  हमारा घर मौका-ए-वारदात से इतना करीब था कि हम वहां ना भी जाते तो तमाम रात गाने...ठुमके और अश अश की आवाजें चैन से सोने ना देतीं ,  ज्यों ज्यों रात गहराती आवाजें और भी सघन  होती जातीं !  यही एक मौका होता जब आस पास के गांव के रिश्ते नातेदार और साधारण जान पहचान वाले भी हमारे घर का सारा फर्नीचर उठा ले जाते , यहां तक कि तख़्त और मोढे भी ! 

भीड़ खींचने में सफल पार्टी मालमत्ता भी अच्छा खासा जुगाड़ लेती !  यूं तो सारा आयोजन अमूमन दो रातों का होता पर कभी कभार किसी दल विशेष में मौजूद 'नथ'  संख्या आशिक मिजाज़ बन्दों की खीसें ढीले करती हुई  इसे त्रि-रात्रीय भी बना डालतीं !  घोषित तौर पर नौटंकियों का आह्वान विशुद्ध श्रंगार रस नृत्य आस्वादन निमित्त हुआ करता पर डेरे सिमटने के बाद भी कतिपय आयोजनकर्ताओं की कहानियां चटखारे लेकर कही सुनी जाया करतीं  !   हर बरस नये सिरे से यही सिलसिला चलते रहता !  कलाकार कहते कि वे जिस्म के बाज़ार में नहीं हैं , संगीत, नृत्य और श्रंगार मात्र उनकी रोज़ी रोटी है !  अपवादों को छोड़ कर मुझे भी यही यकीन है !

मेरा एक दोस्त बजाज हुआ करता , मैं पढ़ने गांव से बाहर निकला , वह दुकानदारी में रम गया...उस जन्माष्टमी को मैं गांव नहीं आ सका पर सुना कि नौटंकी पांच रातों तक ज़लवा अफरोज हुई !  छुट्टी पर स्टेशन से घर जाते वक़्त राम मनोहर को घर के सामने खडा देख कर मैं , तांगे में बैठा बैठा ही उसे आवाज़ देना चाहता था कि साईस नें कहा ,  कुछ मत कहना ये तीसरी रात का शिकार है...वो लड़की शायद एम ए में पढ़ रही थी उस वक़्त ,  जबकि उसकी पेशेवराना नथ मेरे दोस्त पर कहर गुज़ार गई !लोहे की सांकल से खिडकी पर बंधा हुआ दोस्त अब तक इश्क की तमाम हदें पार कर चुका था उसे मेरी आवाज सुनाई भी कहां देना थी !   हर तरह के इलाज़ बेअसर यहां तक कि हालात से मजबूर घरवालों नें उसकी शादी भी उस लड़की से करवानी चाही पर सारी कोशिशें उसे दीवानगी के आलम से बाहर ना ला सकीं !  सोचता हूं कि ये  एक अलग किस्म का बाज़ार था जहां मनोरंजन के नाम से गज़ब की मार्केटिंग होती !  त्यौहार से पहले ही हल्ला हो जाता इसबार फलां ...इसबार फलां...सम्मोहित खरीदार सांकलों में बांधे जाते , कुछ की ज़मीन जायदाद बिक जाया करतीं ,  कुछेक घर तबाह हो जाते और कुछ ढीठ बेशर्मी से अगले साल का इंतज़ार करते !

समय भले ही बदल गया हो पर मार्केटिंग आज भी इसी न्यूक्लियस के इर्द गिर्द घूमती है !  सीमेंट बेचो या लोहा...चड्ढी बेचो या पोहा, साबुन बेचो या खोवा , गरज़ कि कुछ भी बेचिये जनाब हुस्न , श्रृंगार और रंगीनियत का बाज़ार आज भी गर्म है वो शक्लें बदल बदल कर आपकी जेबें खाली करने का माध्यम बनता है !  कुसूरवार कौन है इसका ? वो जो विज्ञापन कर रहे हैं ? वो जो विज्ञापन बना रहे हैं ? वो जो रोजी रोटी की खातिर इस धंधे में हैं ? ... अरे नहीं मियां ये तो सब मोहरे हैं !  असली खलनायक तो बाजारवाद है जो बेसिक इंस्टिंक्ट को एक्सप्लायट करके पूंजी पीटने में यकीन रखता है !  खरीदार की परवाह का स्वांग रचाता...उसकी यौन आकांक्षाओं को उकसाता  / सहलाता  / फुसलाता   हुआ ,  उसकी गिरह काटता हुआ बाज़ारवाद !


17 टिप्‍पणियां:

  1. ...इसी तरह कई साल पहले बंबई (आज की मुंबई) में पहली बार मुझे नवरात्रों में होने वाले गुजराती डांडिये के बारे में पता चला कि हमारे धार्मिक समारोह किस तरह हर प्रकार की भावनाओं के प्रबल संवाहक भी हैं. हर तरह के छिछोरे लोग इनमें खूब जम कर भाग लेते थे. आयोजक लोग, अंदर घुसने वाले नचनियों से टिकट लगा कर नावां कूटते थे. उससे भी पेट नहीं भरा तो प्रायोजकों का भी जुगाड़ किया जाता था. पूरा धंधा हुआ करता था डांडिया तब तो... अब पता नहीं.. इस मौक़े पर मुंबई गए कई सात हो गए ...

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  2. Oh! Sirf dandiya hi nahi,Ganesh visarjan ke din bhi mahanagron me gazab dhata hai...ullaas bhi hota hai aur chhichhora pan bhi...

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  3. बाजारवाद ...हर बुराई की जड़ इसी में है ...!

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  4. रसिया कृष्‍ण के जन्‍म के मौके पर नौटंकी, संगीत, नृत्य, श्रंगार और प्‍यार तो होना ही था.

    मित्र बजाज का किस्‍सा हम उसी तर्ज पर स्‍वीकार कर रहे हैं '... हमरी ना मानो बजजवा से पूछो ..... दुपट्टा मेरा.

    कृष्‍ण की नौटंकी नथ का बाजार, और बाजारवाद के संबंध में आपका यह चिंतन पढ़ना अच्‍छा लगा भईया.

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  5. गज़ब का सच लिखा है अली साहब। ये मार्केटिंग रूप बदल बदल कर वही पुराना काम करती है। लेकिन साहब, एक बात है, कभी कभी इस बाज़ार में से होकर गुज़रना भी यादगार रह जाता है।

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  6. जबर्दस्त लिखा है आज तो -कुछ पुरानी यादें हो आयीं -जख्म हरभरा उठे ,आपकी लेखनी इतनी नोस्टाल्जिया क्यूं लपेटे रहती है भला ?
    हम तो महफूज हैं ?

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  7. दिलचस्प विश्लेषण, 'रेणु' की 'तीसरी कसम' याद दिलादी. बाज़ारवाद क्या-क्या नहीं कर रहा? [वैसे हम तो पहले ही कट चुके!]

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  8. दिलचस्प विश्लेषण, 'रेणु' की 'तीसरी कसम' याद दिलादी. बाज़ारवाद क्या-क्या नहीं कर रहा? [वैसे हम तो पहले ही कट चुके!]

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  9. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं!
    आपकी चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं!

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  10. @ रमेशकेटीए जी,क्षमा जी , भावना जी , शुक्रिया !

    @ काजल भाई ,वाणी गीत जी , सही है !

    @ संजीव भाई , बढ़िया गाना सुझाया है बजजवा के लिए :)

    @ मो सम कौन ? भाई ,कई बार यादगार बनाने की सोच कर रह गये :)

    @ अरविन्द जी , हा हा हा ! आप बिलकुल महफूज़ हैं :)

    @ मंसूर अली हाशमी साहब , टिप्पणी के पहले हिस्से के लिए शुक्रिया ,बाद वाले हिस्से पर यकीन करता हूं :)

    @ शिवम मिश्रा जी ,लिंक्स के लिए आभार !

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  11. आज जीवन का भला कोन सा कोना ऐसा है जो बाजारवाद के इस सब कुछ लील लेने वाले प्रभाव से बच पाया हो . जिसका बस एक ही मकसद है सहज बुद्धि को दरकिनार करना तथा तार्किकता को घटाना.
    यहाँ कईं दिनों से शहर भर में जगह जगह बडे बडे विज्ञापन होर्डिंगस देखने को मिल रहे हैं...लिखा है--"किडस ब्यूटी पार्लर"
    वाह रे बाजारवाद... बूढे, जवान और अब बच्चे भी...सोचता हूँ कि भविष्य में इसका अगला शिकार कौन होगा ?

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  12. मुझे तो ये ब्लॉग जगत भी एक बाजार सरीखा ही लगता है।
    गलत कहा क्या? चारों तरफ टिप्पणियाँ खरीदने के हथकंडे ही देखने को मिलते हैं।
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    सावन आया, तरह-तरह के साँप ही नहीं पाँच फन वाला नाग भी लाया।

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  13. @ दिनेश भाई ,
    गर्भस्थ शिशु तक नहीं बचा इस मायाजाल से !

    @ ज़ाकिर भाई ,
    :)

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  14. ’तस्‍लीम’ द्वारा आयोजित चित्र पहेली-86 को बूझने की हार्दिक बधाई।
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    सावन आया, तरह-तरह के साँप ही नहीं पाँच फन वाला नाग भी लाया।

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  15. कानपुरिया नौटंकी का क्रेज न पूछिए .. हमारे इधर तो सुनकर ही लोग कई कोस से देखने चले आते थे .. हाँ, एक राम पदार्थ थे जिन्होंने पैसे नहीं दिए थे तो नाचवाले उन्हें ही उठा ले गए थे बाद में लोग कहते थे कि नाचनेवालियों के पेटीकोट धुल के अब मुक्त हो के आये हैं राम पदार्थ , तो एक पहलू यह भी रहा !

    बाज़ार का फंदा वही रहा अब और महीन हो गया है मामला .. पहले मारवाड़ी लोग जहां जाते थे वहा धर्मशाला , कुआं आदि बनवा देते थे अब का बाजारवाद तो और अनुदार है .. विदेशी बाज़ार की चाल का भी असर है !

    विलम्ब से आने के लिए क्षमाप्रार्थी हूँ !

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  16. @ अमरेन्द्र जी ,
    इस तरह से हिसाब चुकता किये जाने की बात हमने भी सुनी हैं !

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